लोकमाध्यमों की सूचनात्मक परम्परा : मेवाड के वाचिक माध्यम

अनुश्री राठौड


सूचनात्मक वाचिक माध्यमों के तहत उन सभी माध्यमों का लिया जा सकता है, जिनके द्वारा किसी सार्वजनिक सूचना को जन सामान्य तक पहुंचाया जाता था। जैसे किसी त्योहार-समारोह, किसी सर्व सम्मत तिथि की घोषणा, जाति बिरादरी और पंचायत की बैठकें एवं फैसले, किसी व्यक्ति विशेष के आगमन-प्रस्थान तथा किसी व्यक्ति विशेष, समुदाय अथवा गांव पर आई या आने वाली विपत्ति, अचानक घटी किसी अच्छी-बुरी घटना आदि की सूचना को जन सामान्य तक पहुंचाना।
मेवाड के कई गांवों में रियासत काल में इन कार्यों के लिए बलाई जाति का व्यक्ति होता है, जिसे सारे गांव की सर्वसम्मति से ‘गांव बळाई’ के पद पर मुकर्रर किया जाता है। जिसे राज्य, गांव ठाकुर तथा गांव के प्रतिष्ठित परिवारों की और से इस कार्य के बदले पारिश्रमिक मिलता था। यह पारिश्रमिक प्रत्येक फसल की कटाई पर निश्चित तौल के अनाज के रूप में होता था जिसे स्थानीय बोली में ‘कमीण कारू की सूंकडी’ कहा जाता था। इसके अलावा त्योहारों के अवसर ये प्रत्येक घर जाते, जहां से उन्हें तैवारी (त्योहारी) के रूप में मिष्ठान, अनाज और कभी-कभी नगद भी दिया जाता था। यही नहीं गांव में होने वाले किसी भी भोज में चाहे वह व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक इनके नाम का कांसा (पूरा परिवार जीमें उतना भोजन) भी निकाला जाता था। कई गांवों में यह परम्पराएं आज भी मौजूद हैं।
इनके अंतर्गत हम निम्न माध्यमों को ले सकते हैं-
१. रेड पाडना अथवा हेला पाडना (सार्वजनिक सूचना)।
२. हाका पाडना (आकस्मिक घटना की सूचना)।
३. वार पाडना (हमला आदि की स्थिति में पुकार)।
४. धाडा पाडना (लुटेरे द्वारा लूट की पूर्व सूचना)।
५. हलकारा देना अथवा हरकारा आना (राजकीय कार्यवाही, आगमन-प्रस्थान की सूचना)।
६. वरवधाऊ अथवा ऐपन आना (जानागम की सूचना)।
७. नूता अथवा बुलावा देना (स्नेहभोज और हर्षोत्सव आदि की सूचना)।
८. तेडा देना (मौत-मरण और मृत्युभोज आदि की सूचना)।

रेड पाडना ः सामाजिक पंचायतों, पंच-पटेलों अथवा जाति बिरादरी की बैठकों में सामाजिक हित अथवा सकल समाज को प्रभावित करने वाले कई निर्णय लिये जाते हैं, जैसे किसी खास वजह-यथा बरसात नहीं होने, गांव के इंसानों या पशुओं में कोई महामारी फैलने से सारे गांव का सामूहिक रूप से गांव के बाहर जिमण या उजरणी (इंद्रदेव की पूजा और प्रसादी) करना या रोग मुक्ति की आस से सार गांव के पशुओं को किसी देवरे में पंख दिलाना, किसी त्योहार की तिथि विशेष को लेकर असमंजस होने पर सर्वसम्मति से कोई एक दिन निश्चित किया जाना, किसी के द्वारा पंचायत बिठाई जाने की मांग आना, किसी परिवार या व्यक्ति विशेष को जाति समाज या जाजम से निष्कासित करना-हुक्का पानी बंद करना-गांव बदर करना या पंचायत द्वारा कोई अन्य दंड देना आदि।
इन सूचनाओं को जनसामान्य तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘गांव बळाई’ गांव की गलियों में घूमता हुआ ऊंची आवाज और कम शब्दों में प्रसारित करता चलता रहता है इसे हेला अथवा ‘रेड पाडना’ कहा जाता है। मेवाड अंचल में रेड पाडना शब्द अधिक प्रचलन में है। गांव बळाई सूचना प्रसारण के वक्त अपने हाथ में एक मजबूत मोटा डंडा रखता है जिसे वह किसी पत्थर अथवा दीवार पर जोर-जोर से पटकता हुआ चलता है ताकि लोगों का ध्यान उस की और चला जाए। कई बार वह ध्वनि विस्तार के लिए भूंगळ वाद्य का भी प्रयोग करता है।
हाका पाडना ः गलियों में दौडते हुए किसी विशेष घटना की सूचना को जनसामान्य तक पहुंचाने की प्रक्रिया ‘हाका पाडना’ कहा जाता है। हाका का शाब्दिक अर्थ होता है जोर-जोर से चिल्लाते हुए अपनी बात कहना। कई लोक हाका को रेड का पर्यायवाची अथवा समानार्थी शब्द समझते हैं परंतु प्रयोग की दृष्टि से उनमें बहुत फर्क है। रेड में जिन सूचनाओं को जनसामान्य तक पहुंचाया जाता है, वे या तो निर्धारित होती हैं अथवा सर्वसम्मत्ति से लिए गए निर्णय परंतु आकस्मिक घटने वाली किसी घटना की जानकारी जन-जन तक पहुंचाने तथा मददगारों को घटनास्थल पर बुलाने के उद्देश्य से जो सूचना प्रसारित की जाती है, उसे ‘हाका पाडना’ कहा जाता है। जैसे कोई व्यक्ति कुएं में गिर गया, कहीं आग लग गई, या किसी अन्य वजह से कोई मुसीबत आ गई, किसी की जान पर बन आई आदि। ऐसी सूचनाएं कई बार गांव बळाई के नहीं पहुंच पाने की स्थिति में गांव का कोई भी व्यक्ति दे देता। हाका पाडने वाला व्यक्ति दौडता जाता और ऊंची आवाज में घटना और घटनास्थल की जानकारी देता जाता।१
वार पाडना ः चोर-लुटेरों के आने अथवा किसी भी प्रकार के हमले की स्थिति में पूरे गांव अथवा समुदाय को मदद के लिए लगाई जाने वाली पुकार को वार पाडना कहा जाता था। जिसको भी सबसे पहले पता चलता वो गलियों में दौडता-चिल्लाता हुआ पुकार लगाता जाता- ‘चोर आया रै चोर, दौडज्यो रै दौडज्यो’ ‘डाकू आया दौडज्यौ, आवज्यौ’ जैसे-जैसे लोग सुनते, लाठियां, तलवार आदि लेकर उसके साथ जुडते जाते एवं अन्य लोगों को मदद के लिए पुकारते दौडते चले जाते और चोरों, लुटेरों अथवा हमलावरों को घेर लेते।२ हाका की तरह वार का भी शाब्दिक अर्थ चिल्ला-चिल्ला कर अपनी बात कहना ही होता है। मेवाड के लोकसमाज में जब कोई व्यक्ति बेवजह चिल्ला-चिल्ला कर बोलता है तो सामने वाला व्यक्ति झुंझलाकर कहता सुना जा सकता है। कि ‘वारां कां म्हेली रौ, जो केवणो है धीरप ऊं केवै नीं- अर्थात चिल्ला क्यों रहे हो, जो कहना है शांति से कहो ना।
धाडा पडना ः स्वतंत्रता से पूर्व मेवाड के साथ ही राजस्थान के विभिन्न अंचलों में ऐसी कई जातियां थी, जिनके पास न जमीन थी न जायदाद और न भरण-पोषण के कोई अन्य स्थायी साधन। इनमें से अधिकांश जातियों की आजीविका का माध्यम दस्यूकर्म रहा था। दस्यूकर्म में संलग्न जातियों में कालबेलियां, मीणा, सांसी, गरास्या आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। पारस्परिक जातिय एकता के सूत्र में बंधे ये लोग यायावर जीवन व्यतीत करते थे और जहां भी उचित लगता अपने अस्थायी डेरे डाल कर परिवार के साथ रहते थे।
पेट पालने के लिए मुख्य रूप से शिकार और आखेट पर निर्भर रहते थे परंतु जीवन की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ये लूटमार, राहजनी एवं ठगी का रास्ता अपनाते थे। इनमें से कई लुटेरे दल ऐसे होते थे जो लूट को अपना ईश्वर प्रदत्त कर्म समझते थे तथा धर्म की राह पर चलते हुए सिर्फ धनकुबेरों को ही लूटते थे और आवश्यकता पडने पर असहाय निर्धनों की सहायता भी करते थे। इन लुटेरों की जो खास बात थी वो ये थी कि ये जिस भी गांव में लूट के लिए जाते वहां पहले अपने किसी प्रतिनिधि को भेज कर सूचना पहुंचा देते कि हम लूट के लिए आने वाले हैं।
लूट की सूचना देकर लूटने वाले ये लूटेरे धाडाती कहलाते थे और इस प्रकार की लूट को ‘धाडा पाडना’ कहा जाता था। राजस्थान के लोकसाहित्य में निर्धन असहायों की सहायता करने तथा धनकुबेरों के यहां धाडा पटकने वाले अनेकों धाडातियों की कथाएं प्रचलित हैं, जिनकी प्रसिद्धि अन्य लोकनायकों से कम नहीं आंकी जाती। लुटेरे लूट से पूर्व सूचना भी देते हैं यह सुन कर आश्चर्य होना लाजमी है परंतु ऐसे ही किसी दल के अस्सी वर्षीय वंशज ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि- ‘जिण भांत नाहर रो करम व्है शिकार कर आपणो पेट भरणो वणी ई भांत ‘धाडो पटकणो’ म्हाणै बाप-दादा ने भगवान रो सुंप्यो करम हो। पण वे लूट सूं पेल्या लुटवा वाला नै सूचना दे सावचेत कर देवता हा, फैर ई वो लुट जावतो तो यो वंडो भाग व्हैतो।’
मेवाड में कई गांव ऐसे भी थे जो ऐसी सूचना के बाद अपने बचाव के उपाय कर लेते थे। राजसमन्द जिले के राछोटी गांव की सत्तर वर्षीय गेंदकुंवर का कहना है कि यहां आजादी से पहले एक विशेष जाति के लोग चोरी करने आने से पहले चेतावनी दे जाते थे कि फलां दिन हम गांव में चोरी के लिए आंएगे। फिर सभी गांव वालों ने मिल कर इस तरह की लूट से बचने का उपाय खोजा और गांव के सब घर वाले मिल कर स्वेच्छा से अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार इतना धन-धान्य इकट्ठा कर दे देते थे, जितना वो वहां के किसी एक घर से एक बार में लूट कर ले जाते थे। फिर नियत तिथि को गांव के मुख्य चौराहे के चबूतरे पर सारा सामान ‘अमल-पाणी और बीडी’ के साथ रख कर छोड देते। लूटेरे आते, अमल-पाणी करते, बीडी पीते और धन लेकर लौट जाते। इसमें दो फायदे होते एक तो लुटेरे दल को बिना किसी हिंसा-झडप के गुजारे लायक माल मिल जाता तथा दूसरा गांव में थोडा थोडा भार तो सब के ऊपर आता परंतु कोई एक अकेला घर लुटने से बच जाता। फिर कालांतर में यह उस गांव की परंपरा बन गई। आजादी के बाद धाडे पडने बंद हो गए और धाडाती भी खत्म हो गए लेकिन गांव के लोग ने उनको धानचून देना बंद नहीं किया। वर्ष में एक बार उस जाति का कोई प्रतिनिधि गांव आता और सब मिल कर उसे धानचून दे देते। गांव वालों का मानना है कि ‘चोरी चोरी से जाता है, हेराफेरी से नहीं’ भले ही धाडाती खत्म हो गए पर वे लोग आज भी आस-पास के गांवों में छोटी-मोटी चोरी चकारी करने से बाज नहीं आते हैं। इस स्वेच्छिक सहयोग से वे कम से कम उनके गांव में तो चोरी नहीं करते हैं।३
हलकारा (हरकारा) ः फौजों में हरकारे होते थे। ये प्रायः तेज धावक होते थे और एक बात को दूसरी जगह पहुंचाते थे। पूर्वकाल में शत्रुओं के आगमन, सैन्य संसाधन और प्रस्थान की कार्रवाही इन हरकारों की सूचना पर ही की जाती थी। ये हरकारे ही गांव या राजधानी में घूमकर जनता को सचेत करते थे। राजा-महाराजा के आगनम-प्रस्थान, यात्रा, स्वागत आदि के मौकों पर भी इस वाचिक परम्परा का निर्वाह किया जाता था। राजस्थानी लोकनाट्य-ख्याल में संदेश प्रेषण का कार्य हरकारे के माध्यम से होने की परम्परा है। मंच पर राजदरबार में प्रवेश करते ही हरकारा सर्वप्रथम अपना परिचय देता है यथा- ‘आयो हरकारो राजा केसरसिंह को नेपालकोट स्यूं।’ कई ख्यालों के प्रारंभ में टेर शुरू कर दी जाती है जिसमें आरंभ होने वाले ख्याल की हल्की सी झलक मिल जाती है और उसके बाद स्तुतिपरक छंद दे दिये जाते हैं। यह टेर प्रायः हलकारे की ही हुआ करती है जो दर्शकों को चुपकर
खेल प्रारंभ कर देता है। हरकारे को हलकारा भी कहा जाता है।४
पद्मश्री सीताराम लालस संपादित राजस्थानी सबद कोस के अनुसार हलकारा शब्द का शाब्दिक अर्थ है- संदेश वाहक, चिट्ठी पत्री ले जाने वाला, हांकने वाला, आगे बढने वाला समूह के आगमन-प्रस्थान, किसी आक्रमण आदि की सूचना देने वाला, दूत कार्य करने वाला, आवाज देने वाला, चपरासी आदि है।५ नागरी प्रचारिणी सभा के शब्दकोश में ‘हलकारा’ की देशज संज्ञा के रूप में लिखा गया है।६ रियासत कालिन हलकारों की परम्परा आज भी अदालतों में देखी जा सकती है, जब पेशी के दौरान वहां का पहरेदार अथवा चपरासी वादी-परिवादी को आवाज देकर हाजिर होने के लिए कहता है।
वरवधाऊ अथवा ऐवन ः वरवधाऊ यानी विवाह के लिए वर के पहुंच जाने की बधाई लेकर जाने वाला व्यक्ति। मेवाड में प्रायः इस तरह के तमाम बधाई संदेश नाई द्वारा ही दिए जाते हैं। वरवधाऊ भी वर पक्ष की ओर से गया नाई होता है, जो वधुपक्ष को बरात के पहुंच जाने की सूचना देते हुए बधाई देता है। इस बधाई संदेश को प्राप्त करके वधुपक्ष वरवधाऊ अर्थात सूचना लेकर आने वाले नाई को मीठा भात खिलाते हैं और कपडे गहने और रुपयों आदि का नेग (उपहार) देते हैं। लोककाव्यों में इन्हें ‘एपन’ भी कहा जाता है। इसके लिए आल्हा-ऊदल लोककाव्य की ये पंक्तियाँ उल्लेखनीय है-
ऐपनवारी बारी लाय, ताको नेग दियो परवाय ।
गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली में भी ऐपन का जिक्र आया है-
अपनो एपन निज हथा, तिय पुजहि निज भीति ।
फरई सकल मनकामनां, तुलसी प्रिति प्रतीति ।। (दोहावली)
इसका एक स्वरूप शिव पुराण में भी मिलता है, जब भगवान शंकर पार्वती जी से विवाह करने पधारते हैं और बारात के पहुंचने से पूर्व गंधर्व आगे जाकर राजा हिमाचल को सूचित करते हैं कि बारात पहुंचने वाली है।
वरवधाऊ की परंपरा मेवाड की संस्कृति में बहुत पुरानी है आज संचारक्रांति के युग में कब वर निकासी हुई, बारात अभी कहां हैं, कितनी देर में पहुंचने वाली है, इन सभी बातों की पल-पल की सूचना वधुपक्ष के पास रहती है। परंतु जब संचार के आधुनिक साधन नहीं थे तो बारात जब गांव अथवा नगर से कुछ दूर रहती नाई पहले आगे जाकर वधुपक्ष को बधाई देते हुए सूचित करता कि बारात पहुंचने वाली है। इस सूचना को पाते ही वधुपक्ष में हर्ष की लहर दौड जाती और वे बारात के स्वागत की तैयार में जुट जाते।७
नूता (न्यौता) अथवा बुलावा ः गांव बलाई द्वारा घर-घर जाकर किसी समारोह, उत्सव, कार्यक्रम एवं भोज आदि की सूचना देना नूता अथवा बुलावा देना कहा जाता है। प्रथम दृष्टतया ये दोनों शब्द एक ही अर्थ देते प्रतीत होते हैं परंतु इनमें सूक्ष्म अंतर है कि बुलावा सिर्फ समारोह, उत्सव तथा कार्यक्रम में शामिल होने के लिए होता है जबकि नूता किसी भोज में भोजन करने के लिए दिया जाता है। बुलाया का एक ही प्रकार होता है जबकि नूता के तीन प्रकार होते है- पहला ‘सघरी’ अर्थात पूरे परिवार के लिए, दूसरा ‘घरपतिया’ अर्थात प्रत्येक घर से एक सदस्य और तीसरा ‘पगडीबंध’ अर्थात का सिर्फ पुरुष सदस्य।
तेडा ः तेडा भी एक प्रकार का नूता या बुलावा ही होता है, इसमें भी जिमण जीमने अथवा किसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए गांव बळाई परिजनों-परिचितों के घर जाकर बुलावा देता है। परंतु यह नूते या बुलावे से इस अर्थ में अलग है कि ‘बुलावा या नूता’ हर्षोल्लास के मौको पर दिए जाते है और ‘तेडा’ मृत्यु संबंधी मौकों पर।
जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो गांव बळाई को स्थानीय परिजनों और खास परिचितों के घर दौडाया जाता जो प्रत्येक के घर जाकर सूचना देता कि ‘फलां जी सुरग सिधार ग्या, छेली क्रिया न दाग में भेळा व्हैवा अर लाकडी देवा पधारज्यो।’ इस खबर के मिलते ही उस घर की औरतें छेली क्रिया (अंतिम संस्कार की तैयारी) में सहायता देने और पुरुष दाग (अंतिम संस्कार) में सहयोग देने अपने घर से लाई लकडी लेकर साथ चलता।८ आज भले ही शहरों-कस्बों में अंतिम संस्कार में शामिल होना और मृतक को लकडी देना महज औपचारिकता रह गई हो परंतु कई गांवों में आज भी लकडी देने की यही परम्परा देखी जाती है। हाल के दिनों में मैंने झाडोल तहसील के एक गांव ‘कौचला’ के पास ऐसी ही शवयात्रा देखी थी।
दाह संस्कार के बाद तीसरे के भोज एवं फूल बीनने का तेडा, नवमी के भोज एवं घाटा स्नान (शुद्धिकरण) का तेडा, बारहवें के भोज और तेरहवें के रंग दस्तूर का तेडा दिया जाता है। ये कार्य मुख्य रूप से गांव बळाई द्वारा कराया जाता है परंतु गांव बळाई के नहीं होने की स्थिति में उसकी स्त्री या फिर नाई अथवा नाईन भी इस कार्य को करते है।
हालांकि आधुनिककरण, पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव और सूचना एवं संचार क्रांति के दौर में ये सभी परम्परागत सूचनात्मक माध्यम अप्रासंगिक होकर इतिहास बन गए, किंतु पिछले कुछ वर्षों से जब सांस्कृतिक परम्पराओं के पुनरुद्धार के प्रयास प्रारंभ हुए तो इन माध्यमों ने लोकजन का ध्यान पुनः अपनी ओर खींचा। ?
संदर्भ ः
१. थामला गांव निवासी भेरुलाल बलाई (गांव बळाई) ने बताया।
२. थामला गांव के ठाकुर साहब प्रतापसिंह जी चौहान ने बताया।
३. राछोटी गांव के गेंदाकुंवर ने बताया।
४. भारतीय लोक माध्यमः डॉ. महेन्द्र भानावत, डॉ श्रीकृष्ण ‘जुगनू’ पृ. २८।
५. राजस्थानी सबद कोसः संपादक सीताराम लालस।
६. नागरी प्रचारिणी सभा हिन्दी शब्दकोश।
७. थामला गांव निवासी किशनलाल नाई ने बताया।
८. श्रद्धेय सासूमां साहिबा चंद्रकुंवर ने बताया।
एस १/३४, सविना सेकण्ड, नेला रोड, हिरण मगरी, सेक्टर-१४, उदयपुर (राज.) मो. ९४६०३४२५९०
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