कुँवर नारायण की ऐतिहासिक कविताओं में ‘सामान्यजन’

अमरनाथ प्रजापति


जब कोई रचनाकार अतीत की घटनाओं या ऐतिहासिक विषय-वस्तु को रचनात्मक कैनवास पर रखता है तो वह वर्तमान और भविष्य में उसकी प्रासंगिकता, उसकी वैचारिक ऊर्जा तथा उसके मर्म को ढूँढने की कोशिश करता है। वह इतिहास की गहराई में पैठकर अपनी विचारधारा और अपने अनुभव के अनुरूप सामग्री को टटोलकर नए कलेवर में प्रस्तुत करता है। वह केवल इतिहास की घटनाओं और युद्धों का विवरण ही प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसकी संस्कृति, सभ्यता और संवेदना को भी शिद्दत से महसूस करता है।
प्रत्येक रचनाकार का इतिहास-बोध, पर्यवेक्षण-क्षमता, दृष्टिकोण एवं प्रस्तुतीकरण भिन्न-भिन्न होता है। समकालीन कवि श्रीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही और कुँवरनारायण की ऐतिहासिक रचनाओं में पर्याप्त भिन्नता दिखाई पडती है। इसे स्पष्ट करते हुए श्रीराम वर्मा लिखते हैं- ‘‘श्रीकांत वर्मा, साही जी और कुँवरनारायण तीनों युद्ध की स्थितियों में मनुष्य को पाते हैं। श्रीकांत वर्मा का तेवर आक्रामक का, विजेता का रहता है, उनका युद्ध शायद अस्तित्वपरक है, भौतिक है। साही के युद्ध में हवाले नहीं, विवरण नहीं, तथ्य और सत्य है। वह युद्ध भौतिक-अभौतिक दोनों के बीच से, संधि से, धुंधलके से उठता है, दरअसल वह युद्ध मनोविज्ञानिक है, वैचारिक है।’’१ इस कथन से स्पष्ट है कि कुँ वरनारायण ने इतिहास-बोध को बिल्कुल नए तरीके से ग्रहण किया है। उनकी कविताओं में घटनाओं के ब्यौरों के बजाय इतिहास को गहराई से देखने की कोशिश की गयी है। उसमें वैचारिक एवं मार्मिक संवाद दिखाई पडता है।
कुँवरनारायण के यहाँ इतिहास माहिमा मंडित, मोहक, रोमांचित तथा रूमानी नहीं, बल्कि सामान्य जन की पीडा, अत्याचार, हत्या, पराधीनता आदि को मर्मान्तक ढंग से प्रस्तुत करता है। उनके यहाँ चारण कवियों की तरह राजाओं, योद्धाओं और वीर पुरुषों के शौर्य गाथा का न तो बखान है न उसमें कोई दिलचस्पी है। वे सबसे अलग सदियों से पिसते आ रहे सामान्य लोगों के साथ खडे होते हैं। विष्णु खरे के शब्दों में- ‘‘कुँवरनारायण इतिहास के धीरोदत्त विजयी या पराजित नायकों में न हैं और न उनके साथ हैं- वे उस सामान्य जन के साथ हैं जो हमेशा ही पिसता है।’’२ ‘गोलकुंडा की एक शाम’ कविता में वे कहते हैं ः
बारूद में आग लगाने के इतिहासों से अलग
एक तीसरा इतिहास भी है
रहमतशाह की बीडियों और
मत्सराज की माचिस के बीच सुलहों का। ३
कुँवरनारायण इतिहास के भीतर मानवीय संवेदना की तलाश करते हैं जो युद्धों, संघर्षों और बर्बरताओं से इतर हैं। जो हमेशा कसे बादशाहों की आक्रान्ताओं और महत्वकांक्षाओं की भेंट चढता आया है। सत्ता के संघर्षों में कितनी चीखें अंधेरी गलियों में गुमनाम हो गयी? किसी रचनाकार ने आज तक ऐसे इतिहास की टोह नहीं ली। कुँवरनारायण ऐसी हत्याओं और चीखों को अपनी कविताओं में उतारते हैंः
किसी टूटे हुए खंजर की मूठ हाथों में लिए
सोच रहा हूँ-
खंजरों के बारे में
उन्हें चलने वाले हाथों के बारे में
कातिलों और हमलों के बारे में
हजारों वर्षों के बारे में
और एक पल में अचानक
किसी अंधी गली में खो जाने वाली
चीख के बोर में......४
सत्ता और साम्राज्य के स्याह अंधेर, हत्या और दुराचार से पीडित बच्चे, बूढे, औरतों के दर्द को कवि ने ‘इब्नेबतूता’ कविता में गहराई और सूक्ष्म ढंग से देखने की कोशिश की है। इब्नेबतूता की इतिहास दृष्टि के माध्यम से कवि एक साम्राज्य के खूनी दस्तावेज को उघाडकर रख दिया है। उस इतिहास का पन्ना रक्तरंजित और सुल्तान के अंधी रवैयों के परिणामों से पटा हुआ है। जो मशाल की फीकी रोशनी में छटपटाता हुआ प्रतीत होता है। हर एक पन्ना बर्बर हत्याओं से सना हुआ है ः
इस बर्बर समारोह में
कौन हैं ये अधमरे बच्चे,
औरतें जिनके बेदम शरीरों में हाथ-पाँव
एक-एक कर अलग किये जा रहे हैं?५
कुँवरनारायण ऐतिहासिक विरासत और शाही साम्राज्य के वर्तमान वस्तुस्थितियों को ब्यौरा प्रस्तुत करते हैं तथा वर्त्तमान समय में उसकी अनुपयोगिता और महत्त्वहीनता को रेखांकित करते हैं। उसके खँडहर में अनेक बादशाहों के साम्राज्यों के विध्वंस, उत्थान-पतन, हिंसात्मक रवैय, विश्वासघात, युद्ध, हार-जीत, शोक-संताप आदि दफन हो गए हैं। ‘गोलकुंडा की एक शाम’, ‘लखनऊ’ और ‘विजयनगर’ जैसी कविताओं में इसे देखा जा सकता है। गोलकुंडा का किला किसी जमाने में शाही किला हुआ करता था किन्तु आज वह खँडहर में तब्दील हो गया है तथा आम आदमी के लिए मात्र पर्यटन स्थल और जीवन यापन का साधन बन रह गया है ः
जो टैक्सी चलाता
जो रोज उन्हें खँडहर दिखा कर घर पहुँचता,
जिसकी कोई वाबस्तगी नहीं
पर्यटकों या खंडहरों से, उसके लिए वक्त
वह वक्त है जो मीटर की रफ्तार से
नगद गुजर रहा।६
लखनऊ के अतीत की शान-शौकत किस तरह वर्तमान में अपनी पहचान के लिए भी संकटग्रस्त है, उसका सजीव चित्र ‘लखनऊ’ कविता में उभरकर सामने आता है। लखनऊ जो कभी ‘शामें अवध’ की नवाबी रौनक में डूबा रहता था आज वहां उदासी, बेरौनक और दमघोंटू भागमभाग है। आज वह अधमरे बूढे-सा खाँसता प्रतीत होता है ः
‘‘किसी नौजवान के
जवान तरीकों पर त्यौरियाँ चढाये
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे
अधमरे बूढे-सा खाँसता हुआ लखनऊ।७
इसी तरह वे ‘रास्ते’ (फतेहपुर सीकरी) कविता में यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि इतिहास में फतेहपुर सीकरी बादशाहों की शानो-शौकत के लिए जाना जाता है। शाही लोगों के आवागमन, चकाचौंध से हर समय दरबार मशगूल रहता था। वह आज पूरी तरह से वीरान और निर्जन हो चुका है। इतना भव्य इमारत का सौन्दर्य फीका पड चुका है। उसके पत्थर भी ऊब रहे हैं। जिस रास्ते से कभी बादशाहों का आना-जाना रहता था उधर अब आम लोगों का आना-जाना भी नहीं होता ः
ये रास्ते, जो कभी खास रास्ते थे,
अब आम रास्ते नहीं।
ये महल, जो बादशाहों के लिए थे
अब किसी के वास्ते नहीं।
आश्चर्य कि उन बेताब जिंदगियों में
सब्र की गुंजाइश थी...।
और ऐसा सब्र कि अब ये पत्थर भी उब रहे हैं। ८
भौतिक उत्थान और सत्तात्मक शिखरों को कुँवरनारायण कविता में बार-बार ध्वस्त करते हैं। उसकी नश्वरता को वे भली-भाँति पहचानते हैं। वे सामान्य जीवन और मानवीयता के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। सत्तात्मक महत्वाकांक्षा और सांसारिक ऊँचाइर्या सिर्फ मृगजल ही साबित हो सकती है, जिसका कोई अंत नहीं होता है। ‘कुतुबमीनार’ कविता में व्यंग्य के माध्यम से कहते हैं ः
क्या ये सीढियाँ हमें
उस सबसे ऊँची वाली जगह पर पहुँचा सकती हैं
जहाँ मीनार खत्म हो जातीं
और एक मस्तक शुरू होता
ताजपोशी के लिए?९
कुँवरनारायण इतिहास और वर्तमान में लगातार आवाजाही करते हुए हिंसा और आतंक के खिलाफ एक सुधारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। वे हिंसा और आतंक का विरोध संयमित और वैचारिक ढंग से करते हैं, कभी सीधे-सीधे तो कभी व्यंग्य से। वे सामान्य जनजीवन के पक्षधर हैं। उनकी संवेदना, शोषित, उपेक्षित लोगों से अधिक जुडती हैं। वे आम लोगों की पीडाओं, दुखों एवं दर्दों को गहराई से महसूस करते हैं। इस सन्दर्भ में अनंत विजय पालीवाल कहते हैं - ‘‘ इतिहास और आज में दखल देती कुँवरनारायण की ये कविताएँ किसी भी समय पर एक मार्मिक दस्तक हैं। ये दखल देती हैं आक्रान्ताओं की बर्बरता पर कभी सुधारक के रूप में, तो कभी व्यंग्य और कभी-कभी सीधे आगाह और चेतावनी देते हुए। कुँवरनारायण किसी भी हिंसा के खिलाफ हैं, अतः वे आततायियों के खिलाफ भी हिंसात्मक स्वर मुखर नहीं कर पाते। लेकिन कविता में व्यंग्य और प्रतीकों के वे महारथी हैं।.... अतीत के सारे परदे वे परत दर परत खोलते चले जाते हैं। जहाँ कई चहरे बेनकाब होते हैं तो कई नकाबों से मुक्त भी होते हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उनका व अंतिम लक्ष्य कोई है तो वह आम आदमी।’’१० उन्हें बादशाहों का राजनीतिक दाव-पेंच और छल-छद्म का जीवन दमघोंटू लगता है। ‘अमीर खुसरो’ कविता में इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं जहाँ खुसरो दिल्ली में अनेक बादशाहों को बनते-उजडते देख स्वतन्त्र और सामान्य तरह का जीवन जीने के लिए बेताब होता है ः
ऊ ब गया हूँ इस खेल तमाशे से
यह ‘तुगलकनामा’- बस, अब और नहीं।
बाकी जिंदगी जीने दो
सुल्तानों के हुक्म की तरह नहीं
एक कवि के खयालात की तरह आजाद।११
इस तरह हम देखते हैं कि कुँवरनारायण का इतिहासबोध बिल्कुल नए तरीके से उभरकर सामने आता है। उनकी कविताओं में बादशाहों और योद्धाओं के गुणगान के बजाय उनके अत्याचार हिंसा अनैतिक और अमानवीय रवैयों का विरोध है। सत्ता के लालच, भौतिक और सांसारिक भूख, साम्राज्यों का विस्तारीकरण आदि के प्रति सहज असहमति है। उसमें सामान्य जन के प्रति गहरी सहानुभूति और संवदेना दिखाई पडती है। उनके दुखों, पीडाओं, शोषण और हत्याओं के खिलाफ वे खडे होते हैं। वे अहिंसा, मानवीयता और पे*म-सौहार्द के पक्षधर हैं। ये उनकी ऐतिहासिक कविताओं को वैशिष्टय है जो अन्य रचनाओं में नहीं दिखाई पडता है। ?
संदर्भ ः
१. कुँवरनारायण ः उपस्थिति, सं. यतीन्द्र मिश्र, पृष्ठ संख्या-३१६
२. कुँवरनारायण ः उपस्थिति, सं. यतीन्द्र मिश्र, पृष्ठ संख्या-१३९
३. कोई दुसरा नहीं, कुँवरनारायण, पृष्ठ संख्या-५८
४. वही, पृष्ठ संख्या-६०
५. अपने सामने, कुँवरनारायण, पृष्ठ संख्या-८९
६. कोई दूसरा नहीं, कुँवरनारायण, पृष्ठ संख्या-५८
७. अपने समाने, कुँवरनारायण, पृष्ठ संख्या-५४
८. वही, पृष्ठ संख्या-८१
९. वही, पृष्ठ संख्या-८८
१०. पूर्वाग्रह, सं. पे*मशंकर शुक्ल, जुलाई-सितम्बर, २०१५, पृष्ठ १९८
११. इन दिनों, कुँवरनारायण, पृष्ठ संख्या-१३५
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, कमरा संख्या-१०१, विंग-सी, एन.आर.एस. हॉस्टल, हैदराबाद विश्वविद्यालय-५०००४६ मो. ८९८५०३५५९०
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