छह लघुकथाएँ

आकांक्षा यादव


रावण
दशहरे का त्यौहार आते ही रामू बहुत खुश हुआ। नए कपडे, खिलौने और मिठाईयाँ। वह बार-बार माँ की साडी पकडकर खींचता कि जल्दी चलो न मेले में। उधर माँ रामू के बाप का इंतजार कर रही थी कि वह आए तो उसके साथ चलें। पर वह तो अपनी ही दुनिया में मस्त था।
दोस्तों के साथ पैग पर पैग चढाते उसका नशा बढता ही जा रहा था। लडखडाते कदमों से वह घर पहुँचा तो खाने की फरमाईश कर डाली। खाना न मिलने पर रामू की माँ को ताबलतोड थप्पड जड दिए। उसके लिए यह कोई नई बात नहीं थी। रामू खडा होकर ये सब देखता और कभी बीच में आने की कोशिश करता तो उसे भी दो-चार थप्पड नसीब हो जाते।
.....इतने सब के बावजूद आखिरकार माँ जो माँ ठहरी। शाम को राजू को लेकर मेले पहुँच ही गई। मेले में उस समय ‘रावण दहन’ की तैयारियाँ चल रही थीं।
...‘‘माँ! रावण को इस तरह क्यों जलाते हैं?’’ रामू ने
उत्सुकतावश पूछा।
‘‘बेटा, रावण बहुत बुरा आदमी था। वह सबसे लडाई करता और आतंक फैलाता। उसने तो कईयों को मारा भी।’’
‘‘.....पर माँ, पापा भी तो....’’
इसके पहले कि वह बात पूरी कर पाता, माँ ने उसके मुँह पर अपना हाथ रख दिया और अपने आसुँओं को पोंछते राजू के लिए मिठाईयाँ खरीदने चल पडी। ?
अवार्ड
पूरे ऑफिस में चर्चायें आरंभ हो गई थीं कि इस साल बेस्ट परफार्मेन्स का अवार्ड किसे मिलेगा? बात सिर्फ अवार्ड की नहीं थी, उसके साथ प्रमोशन भी तो जुडा था। हर कोई जुगत लगाने में लगा था कि किसी प्रकार यह अवार्ड उसे मिल जाए।
उसे तो आए हुए अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे, पर उसके कार्य करने के तरीके व ईमानदारी की चर्चा सर्वत्र थी। जब भी कोई मिटिंग होती तो बॉस उसे शाम को रोक लेते और वह बडे करीने से सभी एजेंडों के लिए नोट्स लिखकर फाइनल कर देता। बॉस भी उसकी कार्य-शैली व तत्परता से प्रभावित थे। उसे लगता कि अवार्ड तो उसे ही मिलेगा।
पर जब अवार्ड की घोषणा हुई तो उसका नाम नदारद था। मन ही मन बहुत बुरा लगा। शाम को बुझे मन से वह घर जाने के लिए उठा। जब वह बॉस के चैम्बर के सामने से गुजरा तो अंदर से आ रही आवाज सुनने के लिए अनायास ही ठिठक गया।
....‘‘ जबसे मैं यहाँ आया हूँ, तुमने हमारी बहुत सेवा की है। तुम भी हमारी जाति के हो। तुमसे तो हमारी धर्मपत्नी और बच्चे भी बहुत खुश रहते हैं। जब भी उन्हें मार्केटिंग इत्यादि के लिए जाना होता है, तुम्ही को याद करते हैं। आखिर कुछ तो खूबी है तुममें।....और हाँ, पिछले महीने निरीक्षण के लिए आई टीम की तुमने इतनी अच्छी अवाभगत की, कि वह तो होटल के कमरों से बाहर निकले ही नहीं और वहीं पर निरीक्षण की खाना पूर्ति कर चले गए।....अच्छा यह बताओ, सारे बिल तो मैनेज हो गए....अगले महीने बेटे का बर्थडे है, उसके लिए भी तो तुम्हें ही प्रबन्ध करना है।’’
यह कहते हुए बॉस ने जोरदार ठहाका लगाया। अब उसे अवार्ड का राज समझ में आ चुका था। ?
बडा आदमी
राम सिंह ने अपने इकलौते बेटे को बडी शानो-शौकत के साथ पाला। गर्व से मित्रों को बताते कि बडा आदमी बनने हेतु कैसे उन्होंने गाँव के घर को छोडा और यहाँ शहर में सेटल हो गए। इकलौते बेटे को लेकर उनकी तमाम अपेक्षाएँ भी थी और सपने भी। जब वह सफल हुआ तो उनके दोनों हाथ में लड्डू थे। अपने से बडे घर की लडकी से उसकी शादी की और जमकर दहेज लिया।
जिंदगी आराम से गुजर रही थी कि एक दिन अपने बेटे को मित्रों से कहते सुना- ‘‘यदि बडा आदमी बनना है तो यह शहर छोड किसी महानगर में बसना होगा। यहाँ तो अब दम घुटता है।’’
अब उसके सामने वह दिन तैरने लगा, जब बडा आदमी बनने हेतु उन्होंने माता-पिता को गाँव में अकेला छोडकर शहर मे बसने का फैसला किया था। ?
अनाथ
रातों-रात शहर में सांप्रदायिक दंगा फैल गया था। कई दिनों तक यह चलता रहा। लाशें ऐसे गिरती मानों विकेट गिर रहे हों। हर संप्रदाय के नेता दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहे।
किसी तरह मामला शांत हुआ तो जाँच पर बात आकर अटकी। लाशों पर राजनीति भारी पड रही थी। दोनों पक्ष के लोगों ने अपनी बात रखी और मरने वालों हेतु मुआवजे की मांग की।
एक पक्ष के १७ लोग मरे थे तो दूसरे पक्ष के १३ लोग पर अभी भी एक का अंतर दिख रहा था। दोनों पक्ष हैरान कि यह कौन शख्स हो सकता है?
दोनों पक्षों ने लाश देखी तो वह अनाथ बालक था, जो घूम-घूमकर गुब्बारे बेचता था। अब दोनों पक्ष के लोग आपस में निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि उस अनाथ को हिन्दू माना जाये या मुसलमान? सरकारी अधिकारी अपने आकडेबाजी दुरुस्त करने में लगे थे।
हिन्दू या मुसलमान के निर्णय में उस अनाथ की आत्मा अभी भी भटक रही थी। ?
चैट
कमरे में देर रात लैपटॉप पर बैठकर वह फेसबुक पर चैट कर रहा था। मीठी बातों का रोमांस जब हद से पार कर गया तो उस ४५ वर्षीय पुरुष ने लडकी को लिखा, ‘अपना वेबकैम ऑन करो।’।
लडकी अपने कम्प्यूटर का कैमरा खोलती है और ज्यों ही उसकी तस्वीर सामने आती है, त्यों ही उस पुरुष के मुँह से निकलता है, ‘अरे तुम!’
दूसरी ओर से लडकी अवाक होकर कहती है, ‘पापा आप!’ ?
अंधविश्वास
आज सावन का पहला सोमवार था। रमा खूब करीने से मंदिर को धो-पोंछकर मूर्ति सजा रही थी। शिवलिंग पर फूल-माला चढा ही रही थी कि अचानक उसकी बेटी वहाँ आई और पूछ बैठी- ‘‘मम्मी हम पूजा क्यों करते हैं?’’ अपनी बेटी के इस जिज्ञासु प्रश्न का हँसते हुए रमा ने जवाब दिया- ‘‘बेटी, हम भगवान की कृपा पाने के लिए और अपनी भावना को प्रदर्शित करने के लिए पूजा करते हैं।’’
‘‘...लेकिन भगवान है कहाँ मम्मी?’’
.....‘‘यहाँ इस मूर्ति में।’’
अचानक बात करते-करते रमा का संतुलन बिगडा और भगवान की मूर्ति टूट गयी।
‘‘अरे! यह क्या हो गया अब तो ईश्वर का कोप सहना पडेगा।’’
मूर्ति के समक्ष हाथ जोडकर रमा गिडगिडाने लगी-‘‘हे भगवान! गलती से ऐसा हो गया। हमसे भूल हो गई, क्षमा करना प्रभु।’’
......‘‘मम्मी! इसमें घबराने की क्या बात है? पत्थर की मूर्ति ही तो थी टूट गयी। बाजार से नई
खरीद लेना।’’
‘‘अरे नहीं बेटी! जरूर कुछ अशुभ घटित हुआ है। लगता है भगवान जी हमसे नाराज हो गए हैं।’’
...ट्रिन..ट्रिन..ट्रिन.. बेटी ने फोन उठाया और चीख पडी- ‘‘मम्मी, पापा का एक्सीडेंट हो गया है। वे अस्पताल में भर्ती हैं। जल्दी से चलो।’’
‘‘......मैंने कहा था न कि कुछ अशुभ घटित होने वाला है। ऐसा करो, तुम अपनी स्कूटी से अस्पताल निकलो और मैं मंदिर होकर आती हूँ। भगवान का कोप है, मंदिर में प्रसाद चढा दूँ। पंडित को दान देकर भिखारी को भी खाना दे दूँ ताकि तेरे पापा जल्दी से ठीक
हो जाएँ।’’
‘‘....मम्मी तुम भी किस अंधविश्वास में पडी हो। यह कोप नहीं है। पापा को इस स्थिति में हमारी जरूरत है। तुम भी मेरे साथ चलो।’’
‘‘...नहीं बेटी, तुम अभी यह चीजें नहीं समझोगी। तुम चलो, मैं भी मंदिर से सीधे वहीं पहुँचती हूँ।’’
बेटी अस्पताल पहुँची तो डॉक्टर ने बताया कि काफी खून बह गया है। तुरंत ‘बी पॉजिटिव’ ब्लड की जरूरत है। उसे याद आया की मम्मी का भी बी पॉजिटिव ब्लड है। पर मम्मी फोन उठाए तो सही।
इधर बेटी ब्लड बैंक का नंबर ढूँढकर ‘बी पॉजिटिव’ ब्लड की माँग कर रही थी और उधर रमा अंधविश्वास में गुम होकर मंदिर के दरवाजे पर भिखारियों को खाना खिलाने में जुटी थी....।। ?
टाइप-५, निदेशक बंगला, पोस्टल ऑफिसर्स कॉलोनी, जे डी ए सर्किल के निकट, जोधपुर-३४२००१ (राज.) मो. ०९४१३६६६५९९
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