गतांक से निरन्तर....

डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी


भारतीय समाज सनातन काल से उत्सवधर्मी रहा है। पर्व-संस्कृति यहाँ के जन-जीवन का अटूट हिस्सा है। दीपावली का उत्सव संपूर्ण राष्ट्र में उल्लास पैदा कर देता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अबकी बार अयोध्या में ऐतिहासिक आयोजन किया, इस पर बुद्धिजीवियों की कई प्रतिक्रियाएँ आई, कुछ ने उपहास भी उडाया। इस संदर्भ में जयपुर से अशोक आत्रेय ने लिखा- ‘‘कुछ अति-उत्साही दिशाहीन वामपंथियों को शायद किसी विभ्रमवश ऐसा लगा जैसे अयोध्या पाकिस्तान में है....जहाँ राम के वनवास के बाद उनके लौटने के प्रसंग को व्यर्थ में ही इतना महत्त्व मिल गया...। यह कितनी अजीब बात है कि बहुत सीमित लोग...मात्र दिखावे के लिए लोग हिन्दू-धर्म का इसलिए विरोध करते हैं, क्योंकि इससे उनकी तथाकथित प्रगतिशीलता पर मुहर लग जाती है और वे सभी एक झंडे के नीचे खडे रहकर एक दूसरे की पीठ थपथपा लेते हैं।’’ अयोध्या ः एक अनाम योगी के फुटनोट्स...श्ाृंखला में अपने विचार प्रकट करते हैं- ‘‘भारत में धर्म का स्वरूप समाज व्यवस्थाओं से जुडा है। धर्म सामाजिक आचरण और मर्यादा को सर्वोच्च रूप है। धर्म से जुडे तमाम चरित्र और घटनाएँ मानव समाज और पर्यावरण के इर्द-गिर्द बुना वह ताना-बाना है जो हमारी आस्थाओं और मर्यादाओं को दिशा देता है, नियंत्रित करता है। वैदिक आधारों पर टिका भारतीय समाज धर्म के बिना...बिना रीढ के किसी पशु की तरह लुंज पुंज हो जाएगा।’’
छठ-पर्व पर मैत्रेयी पुष्पा और मंगलेश डबराल की टिप्पणियों से ईलोक में बहस चल पडी। यह विमर्श और आस्था के मध्य वैचारिक परिणति का केन्द्र न बनकर मात्र आरोप-प्रत्यारोप बनकर रह गई। मंगलेश डबराल ने लिखा- ‘‘मेरे खयाल से हर पर्व पर और हर दिन स्त्रियों का सिंदूर लगाना बंद हो जाना चाहिए। दरअसल, सिन्दूर में कुछ दाम्पतिक, गठबंधनात्मक, प्रवेश-निषेध सरीखे संकेतक निहित हैं, जो बहुत हद तक स्त्री-विरोधी हैं, इस तर्क के बावजूद कि स्त्रियाँ ऐसा चाहती हैं और उससे बाल जल्दी सफे द हो जाते हैं। यह भी एक मुद्दा है।’’
मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी पोस्ट हटाते हुए लिखा कि ‘‘मेरी सिंदूर-पोस्ट से छठ वाले लोगों को इतना कष्ट होगा। मुझे अन्दाजा न था कि वे स्त्रियों के सिन्दूर के लिए स्त्रियों को ही बेशुमार गालियाँ देने लगेंगे। अपमान किसी भी स्त्री का नहीं होना चाहिए।’’ इस विवाद पर कृष्ण कल्पित ने प्रतिक्रिया देते हुए लिखा- ‘‘ताजमहल और सिंदूर का विरोध करने वालों की मानसिकता एक है। उनके लिए ये दोनों गुलामी के प्रतीक हैं और इन्हें ढहा देना, पोंछ देना चाहते हैं। इसका विपुल और पवित्र सौन्दर्य इनको दिखाई नहीं देता।’’ अरुण माहेश्वरी ने लिखा- ‘‘किसी भी पारंपरिक धार्मिक पर्व या उत्सव के सांस्कृतिक पक्षों की अहमियत को न समझकर उन्हें शुद्ध विवेकवादी तर्कवाद की कसौटी पर कसने की जिद से मनुष्यों के आत्मिक संसार में से एक प्रकार के जबरिया विरेचन से अधिक शायद कुछ हासिल नहीं हो सकता है।’’
राजस्थानी के प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक आईदान सिंह भाटी ने हिन्दी संसार में राजस्थानी की भूमिका को चिह्नित किया है। वे लिखते हैं - ‘‘राजस्थानी कविता का इतिहास और उसकी जडें हमें ‘अपभ्रंश’ के दोहों में मिलती हैं। इसका विकास ही आधुनिक रूप में दोहा साहित्य के रूप में सामने आता है। लौकिक काव्य ‘ढोला-मारू रा दूहा’ इस अपभ*ंश के दूहा काव्य का विकास है। कालांतर में राजस्थानी का एक भाषा-रूप डिंगल काव्य के रूप में विकसित हुआ, जिससे हमारी आज की हिन्दी का आदिकाल विकसित हुआ। इस डिंगल के मध्यकाल की सुप्रसिद्ध कृति ‘वेलि कृष्ण रुक्मणि री’ सुप्रसिद्ध है। इसी मध्यकाल में भक्त कवयित्री मीरां की वाणी ने राजस्थानी साहित्य को एक विशेष ऊँचाई प्रदान की। इस तरह चन्द वरदायी का ‘पृथ्वीराज रासो’ मीरां की वाणी और पृथ्वीराज राठौड की ‘वेलि कृष्ण रुक्मणी री’ की त्रयी हिन्दी-संसार में राजस्थानी का प्रतिनिधित्व करने के लिए सुख्यात रही है।’’
भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय एकता विषयक परिसंवाद के अंशों को साझा करते हुए प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा लिखते हैं- ‘‘समकालीन हिन्दी कविता में भी राष्ट्र के सामने मौजूद संकटों और राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्वों को लेकर चिंता का स्वर उभार पर है। आज की कविता भारत की समकालीन दुरावस्था से बैचेनी का साक्ष्य देती है। कवि धूमिल को यदि आजादी के भटकाव का बैचेन कर देने वाला अनुभव होता है, तो उसकी पीडा समझी जानी चाहिए या आजादी सिर्फ तीन धके हुए रंगों का नाम है। जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई खास मतलब होता है।........ आज देश पर आक्रमणकर्ताओं की निगाहें लगी हुई हैं। जब अलग-अलग प्रांत, भाषा और इलाकों के नाम पर अलगाव और विभेद के बीज बोए जा रहे हैं, तब आधुनिक कविता के जरिए उभरती राष्ट्रीय एकता की आवा*ाों को सुना जाना चाहिए।’’
आज के दौर में तथाकथित चालाक एवं घटिया लेखकों के बढते वर्चस्व पर गोरखपुर से दयानंद पाण्डे लिखते हैं- ‘‘लेखक कई तरह के होते हैं। एक हैं जो कुछ सार्थक लिखते हैं, पर सफलता के बा*ाार से गुम हैं। लेकिन पाठकों में लोकप्रिय हैं। एक हैं जो लफ्फाजी लिखते हैं। पाठकों आदि की बात करने वालों को यह प्रतिक्रियावादी कहकर खारिज कर देते हैं। एक और हैं जो लफ्फाजी ही हाँकते हैं, लफ्फाजी ही खाते हैं, लफ्फाजी ही पीते हैं। सब कुछ मौखिका विषय कोई भी हो, वह एक ही विषय पर बोलते हैं। हर जगह, हर स्थिति में एक ही बात। लेखन के बाजार में इन्हीं की चाँदी है। वाम, जनवाद, प्रगतिशील, धमनिरपेक्षता, दलित, मुस्लिम, फेस्टिवल, कार्निवल, फोटो, अखबार, बयान आदि-आदि सब इनके ही हैं। सारे विमर्श और वगैरह-वगैरह इनके ही हैं। आप भी इनको सैल्यूट कीजिए। आखिर प्रबंधन का जमाना है। वह सबकुछ प्रबंध करने में माहिर है। सो प्रबंध कर लेते हैं। ऐसे तीनों तरह के लेखक हर शहर, हर प्रांत और हर भाषा में उपस्थित हैं।’’
विख्यात कवि विजेन्द्र ने मुक्तिबोध के बहाने अभिव्यक्ति की प्रेषणीयता पर चिंतन करते हुए अपना मत प्रकट किया है- ‘‘जहाँ तक अभिव्यक्ति का सवाल है, मैं फिर कहूँगा कि आदर्श स्थिति यही है कि हम ऐसी भाषा में लिखने की कोशिश करें, जो आम जनता तक पहुँचने में समर्थ हो।...... मैं आलोचना में रामविलास शर्मा की भाषा को आदर्श मानता हूँ। सामाजिक विषयों पर लिखने में राहुल सांकृत्यायन की भाषा को आदर्श मानता हूँ।....मुक्तिबोध का विकास बहुत पेचीदा है। एक तो यह नहीं कि मुक्तिबोध आधुनिकतावाद के शिकार थे, इसलिए उन्होंने जटिल भाषा लिखी। यह भी नहीं कि विचारधारा के मामले में वे बहुत उलझे हुए थे। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष अपने लिए व्यक्तिगत स्तर पर उन विचारों से निपटना चाहते थे और रचनाओं के माध्यम से उनसे निपट
रहे थे।’’
यह नहीं भूलना चाहिए कि मुक्तिबोध उस पूरे दौर में आन्दोलन से कटे हुए थे। अकेले जूझ रहे थे। कोई साथी नहीं था। यानी मुक्तिबोध एक ऐसी कैद में थे, बाहरी दुनियाँ से कटे हुए- इसलिए उनके लेखन में जो उलझाव मिलेगा, उसका यह भी कारण है कि जीवित आन्दोलन का अभाव था और जहाँ आन्दोलन था भी उस आन्दोलन से मुक्तिबोध का जीवित संफ रह ही नहीं पाया।
‘नक्षत्रहीन समय में’ में अशोक वाजपेयी की पंक्तियों को दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने साझा किया है। कविता की शक्ति व सामर्थ्य का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘‘कविता हमें आग और हिंसा से, नश्वरता और प्रतिकार से, घृणा और अत्याचार से, अन्याय और बाजार से बचा नहीं सकती, लेकिन वह हमें इनका तीखा एहसास करा सकती है कि ये मानवीय स्थिति और नियति के लिए अनिवार्य नहीं हैं कि इनमें से अधिकांश हम ही ने रचे और पोसे हैं, कि उनके लिए ज्यादातर हम ही जिम्मेदार हैं। कविता अंधेरे में रोशनी का दरवाजा नहीं खोलती। वह अंधेरे में हमें उसे टटोलते हुए रोशनी की ओर जा सकने की संभावना का विकल्प, अक्सर इशारे से सुझाती है। कविता रास्ता नहीं दिखाती, क्योंकि ज्यादातर तो उसे खुद रास्ते की तलाश होती है, वह इस तलाश में आपको शामिल होने का न्योता जरूर देती है।’’
गद्य को कवियों की कसौटी कहा गया है। आशुतोष कुमार ने प्रश्ा* उठाया है कि ‘‘गद्य कवीनां निकषं वदन्ति’, तो कविता को श्रेष्ठ गद्य के एक तत्त्व के रूप में क्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता?...... गद्य मेरे जानते अनुभव की भाषा के जरिए व्यवस्थित करने की कोशिश है, जबकि कविता भाषागत व्यवस्था की निरंकुशता के खिलाफ एक बगावत। गद्य रास्ता बनाते कदम कदम चलाने की कोशिश है तो कविता एक ही उडान में आर-पार हो जाने का दुस्साहस। यानी गद्य क्रमिक यात्रा है तो कविता एक संक्रांति है। गद्य तर्क की खोज है तो कविता विक्षिप्त का साक्षात्कार। ....... क्या यह सच नहीं है कि एक सीधी रेखा खींचना सबसे मुश्किल काम है? वक्र रेखा तो एक बच्चा भी खींच लेता है। गद्य एक सरल रेखा है, कविता वक्र रेखा।’’
जय प्रकाश मानस ने हिन्दी पुस्तकों की बिक्री अत्यधिक न्यून रहने पर प्रश्न किया है- ‘‘क्या कारण है कि विश्व की तीसरी सबसे बडी भाषा होने के बाद भी हम हिन्दी के रो*ा घोषित बडे से बडे लेखक और उसकी महान-से-महान किताब बमुश्किल ह*ाार दो ह*ाार ही बिक पाती है, जबकि अन्य भाषाओं में यह संख्या लाखों तक जा पहुँचती है। हाल ही का एक उदाहरण लें- २०१५ का साहित्य की नोबेल पुरस्कार विजेता बेलारूस की स्वेतलाना अलेक्सीविच की पहली किताब ‘वार्स अनवोमैनली फेस’ की अब तक २० लाख प्रतियाँ बिक चुकी हैं।’’
राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष को राज्य मंत्री का दर्जा दिया। इस खबर पर साहित्य-प्रेमियों ने उल्लास से स्वागत किया। सवाई सिंह शेखावत ने अपने संदेश में लिखा- ‘‘खबर है कि अच्छे कवि, बेहतर इंसान और वर्तमान में राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष मित्र इन्दुशेखर तत्पुरुष को राजस्थान सरकार ने राज्य मंत्री का दर्जा दिया है।.... मित्र आप सफलता की शीर्ष सीढियों पर चढते
हुए इसी तरह नेक और विनम्र बने रहें, यही
शुभकामना है।’’ ?
एफ ६-७, रजत विहार, निम्बाहेडा, जिला-चित्तौडगढ (राज.)
मो. ९८२८६०८२७०
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