पत्नी का मायका

तरुण कुमार दाधीच


शादी के बाद यानी दाम्पत्य सूत्र में बंधने के बाद पुरुष को ससुराल नाम का तिलस्म बेहद रोमांचित करता है। इतना ही नहीं पुरुष का ससुराल में आवागमन यदि एक निश्चित समयावधि, समुचित अंतराल और वहाँ पर दामाद जी का ठहराव सीमित है तो स्थिति कमोबेश सम्मानजनक तो नहीं कही जा सकती। पुरुष का ससुराल अर्थात् ‘पत्नी का मायका’ जनाब कम अहमियत नहीं रखता। यदि हम पुरुषों ने पत्नी को उनके मायके की स्वतंत्रता में जरा भी दखल दी तो इसका अच्छा खासा खामियाजा भुगतना पड
सकता है।
दरअसल यह खामियाजा किश्तों में भुगतना पडता है। जीवन में पहली बार हमने सटीक बहाना बना कर पत्नी को दो दिन पहले उनके मायके से ससुराल बुला लिया। उस समय तो मामूली व्यंग्य बाण और कटाक्षों के बाद यथास्थिति बहाल हो गई। पंच विकार मानव को क्या नहीं करवा देते, यह तो वही बता सकते हैं जो भुक्त भोगी हैं। पर एक बार बीवी को मायके से बुलाने में सफल होने के बाद हमारा हौसला या यों कहें कि हमारा दुस्साहस बढ गया।
अगली बार धर्मपत्नी पूरे एक माह के लिए अपने मायके गई। एक सप्ताह में ही हमें उनकी कमी खलने लगी। महाकवि तुलसी की तरह करने की हिम्मत तो नहीं हुई कि हम हमारी रत्नावली के पीछे हम भी हमारे ससुराल जा धमकें। धमक भी गये तो महाकवि बनने का सपना ही देखते रहेंगे। सपने देखने में क्या? दिन में देखो या रात में कोई फर्क नहीं पडता। फर्क तब पडता है जब सपने को हकीकत में बदलने के लिये पुरुषार्थ न किया जाय। बिना पुरुषार्थ के प्रारब्ध बन ही नहीं सकता।
यह तो हम जानते ही हैं कि कभी-कभी दुस्साहस हमारे लिये भारी पड जाता है। खैर हिम्मत और दुस्साहस कर हमने श्रीमती जी को चार दिन पहले बुलवा लिया। हम बडी भारी गलती करके जो पहले बुलवा लिया। काश कि चार दिन बाद यानी कि एक माह के उपर चार दिन बाद बुलवाते तो हमें कई महीनों तक असहनीय पीडा से न गुजरना पडता।
यह सर्वविदित है कि लडकी वाले लिहाज के मारे लडके वालों की बात मान लेने पर राजी हो जाते हैं। जल्दी बुलाने की हमारी जिद के चलते श्रीमती जी को बिना रिजर्वेशन ही आना पडा। घर वालों ने हमारी श्रीमती जी का द्वार पर भाव-भीना स्वागत किया और हम भी उनकी न*ार-ए-इनायत पाने के लिये उनकी तरफ उत्सुक मन और अपलक नेत्रों से निहारने लगे। पर, यह क्या? हमारी श्रीमती जी ने हमारी तरफ देखा जरुर लेकिन न*ारें मिलते ही नजरें फेर ली जैसे हमारा उनसे जन्म जन्मान्तर का रिश्ता ही न हो।
हम तो श्रीमती जी के आगमन की प्रतीक्षा में पलक पावडे बिछाये बैठे थे पर यात्रा की थकान का बहाना बनाकर सोने लगी। सोई भी ऐसे जैसे उन्हें हमसे कोई सरोकार ही नहीं। हम भी लाचार थे। नींद हमें आधी रात के बाद तक नहीं आई। सोचते रहे कि ऐसा क्या गुनाह हमसे हो गया है जो श्रीमती जी बेहद नाराज हैं। लेकिन वजह हम सुबह तक जागकर भी न जान सके।
सुबह वे उठीं लेकिन उन्हने न हमें उठाया और न ही बतलाया। बस अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई। चाय लेकर छोटी को भेज दिया पर खुद नहीं आई। हमारा माथा ठनका। जरूर श्रीमती जी हमसे नाराज हैं। पर वजह क्या है हमें पता तो पडे।
दिन पर दिन बीतने लगे। जाकर किससे कहें? घर में पत्नी के होते हुए भी हम मानो ऐसा वनवास भोग रहे थे कि क्या बयान करें और क्या नहीं। हमसे रहा नहीं गया। सब्र का बांध टूट पडा तो हाथ पकड कर पूछ ही लिया। बंदूक की गोली की तरह जवाब मिला- ‘‘चार दिन मायके रुक जाती तो कौन सी भैंसे दरवाजे तोड रही थी! पिताजी की बर्थ डे थी और अगले दिन सहेली की ‘रिंग सेरेमनी’ और और वो...’’ ज्वालामुखी फटने के बाद हमारे ख्याल-ए-शरीफ में आया कि सारे दुष्परिणाम श्रीमती जी को चार दिन पहले बुला लेने के कारण देखने पडे हैं।
मैंने मनाने की खूब कोशिश की पर सब नाकाम। श्रीमती जी का मुख मंडल लाल गोले की तरह तमतमाया हुआ ही रहा। घर के सारे काम सुचारु रूप से होते और पत्नी की तरफ से भी कोई दिक्कत नहीं। समय पर चाय-नाश्ता, लंच, डिनर मिलते पर उनमें ‘अपनापन’ जैसी सबसे बडी चीज की कमी थी। कभी कोई तकरार भी नहीं हुई। वे अपना और हम हमारा काम करते। संवादहीनता भी इतनी नहीं रही। पर अंतरंगता तो ऐसे गायब हुई जैसे गधे के सिर से सिंग! नायड भाषा में कहें तो ‘आपणास’ नहीं रहा।
दिन बीतते चले गए और श्रीमती के मन में करुणा का भाव जाग्रत नहीं हुआ। हमें भी अपनी गलती का अहसास होने लगा कि जो अपने घर को छोडकर सदा के लिये हमारे पास आ गई है तो उसकी खुशी के लिये उन्हें क्यों न उनके मायके रहने दिया? धीरे-धीरे हमारी श्रीमती जी अब न रूठी हुई रहती और न खुश। बस तटस्थ रहती। हमारी तरफ उनकी दिलचस्पी गिरगिट की तरह रंग बदलती ही रहती।
वाकई इस स्थिति से हम अंदर तक हिल गये। कहाँ तक कहें और क्या कहें? हम चौबे जी छब्बे जी बनने गये थे और दुबे जी भी नहीं रहे। परमात्मा को याद करने के अलावा और उनसे रहम की भीख मांगने के अलावा हमारे पास कुछ नहीं बचा। सही मायने में हम दोनों की स्थिति एक समान थी। श्ाृंगार के वियोग पक्ष में संयोग की आशा संजोये हमें बस मृग मरिचिका जैसा प्रतीत हो रहा था।
समय ने करवट ली। मैं तो कहूँगा परमात्मा को मुझ पर रहम आ गया। हमारे ससुराल से धर्मपत्नी जी की सहेली की शादी का बुलावा आया। ये धर्मपत्नी जी की वही करीबी सहेली थी जिनकी मंगनी यानी ‘रिंग सेरेमनी से पहले ही हमने उन्हें बुला लिया था। अब क्या था?’ श्रीमती जी को तो मेरे ससुराल जाना ही था। नियत समय से दो दिन पहले हमारी पत्नी अपने मायके गई। पाँच-सात दिन में लौटने का कह कर गई।
सहेली की शादी सानन्द सम्पन्न हुई। पाँचवें दिन श्रीमती जी ने छोटी को फोन पर बताया कि जिस दिन भाभी को आना है, उस दिन का रिजर्वेशन नहीं मिलने के कारण वे एक दिन पहले आ रही है। मेरा माथा ठनका। सच, अब मैं कोई दुस्साहस नहीं कर सकता। मैंने तुरंत श्रीमती जी को फोन लगाया और विनम्र शब्दों में कहा कि आप भले ही दो दिन बाद आ जाइयेगा पर एक दिन क्या एक घंटे पहले आने की भी मत सोचना।
श्रीमती जी का मन मयूर नाच उठा और वे चहक उठी। बात भी बडे प्रेम से की। अपना ध्यान रखने की हिदायत भी दी और फोन रखने से पहले सी.यू. कहकर हमारे हृदय-तल की बंजर भूमि में नेह का मेह बरसा दिया। अब तो उनकी प्रतीक्षा सुखद लग रही थी। पिछले कुछ महीनों से हमारे बीच के अपनेपन में जो अदृश्य दीवार खींच गई थी वो हमारे इतना कहने पर जर्र से टूट गई कि वे अपने मायके से अपनी सुविधानुसार आ जाय।
हमें शादी किये हुए आज बरसों हो गए हैं पर हमने उन्हें समय से पहले कभी नहीं बुलवाया। एक या दो दिन को क्या, पूरे सप्ताह ज्यादा रह लें पर वे आएं तभी जब वे चाहें। साल में एक दो बार धर्म पत्नी का मायके जाना हमारे लिये सुखद होता है। वे अपनों के साथ रहती है, अपनों से मिलती है। उसका मन बहल जाता है। या यों कहें तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं कि वह खुशियों से ‘फुल रिचार्ज’ हो कर लौटती है दुबारा मायके जाने तक। यह जरूरी भी है।
धर्म पत्नी का मायका नारी का वो उर्जा कोष है, जहाँ कुछ समय जाकर वह पूरे वर्ष प्रसन्न रहती है। सही भी है कि जड को काटने का कोई प्रयास करेगा तो वो पल्लवित और पुष्पित कैसे होगी? बीवी अपने मायके से जब अपनी इच्छा से आना चाहे, आने दीजिये वरना जनाब घर में मचने वाला ‘मौन शीत युद्ध’ किसी ‘मुखर शीत युद्ध’ से कम नहीं होता। हमने तो सुखद दाम्पत्य के लिये ऐसा कर ही लिया। आप भी चाहें तो स्वीकार करें। खैर, पसंद अपनी-अपनी, ख्याल अपने-अपने। शुभम्। ?