इक्कीस हाइकु

राजेन्द्र परदेसी


(१)
धरती पर
प्रदूषण की आंधी
विनाश ढाती
(२)
वृक्ष शिखर
व्याकुल से लगते
छूने को नभ
(३)
मन की व्यथा
छलकती नेत्रों से
तरल रूप
(४)
व्यथा में डूबा
टिमटिमाता दिया
निहारती माँ
(५)
हवा हो जाता
सीमा जब लांघता
पानी का ताप
(६)
अपने सभी
पर भर न पाते
एकाकीपन
(७)
बहती नदी
सागर में मिलती
खो के अस्तित्व
(८)
नदी के तीर
होकर भी अलग
चलते साथ
(९)
उगे ज्यों सूर्य
प्रकाशमय करो
लाओ सबेरा
(१०)
वसंत आते
भंवरों को कलियाँ
स्वयं लुभाती
(११)
सांझ झुकती
आस्था वह पूजती
दीप जलाए
(१२)
कोहरा घना
भयभीत सूरज
भींचता आँख
(१३)
सवार रही
सौन्दर्य की तस्वीर
बेबसी कोई
(१४)
महाशापित
पत्थर की अहल्या
राम ने खोजा
(१५)
रोज जलाती
उम्मीद का दीपक
जीवन संध्या
(१६)
राह देखते
झुर्रियाँ पड गई
चेहरे पर
(१७)
हताश मन
बेतहाशा भागता
छिपा चेहरा
(१८)
थरथराते
बाजों के चंगुल में
विवश पंछी
(१९)
पाखण्डी पथ
कपट भरी दांव
घायल पाँव
(२०)
सीने में दबा
स्वयं से मिला दर्द
सालता सदा
(२१)
फूल महका
समय साथ झडा
नियति यही ?
४४-शिव विहार, फरीदी नगर, लखनऊ मो. ९४१५०४५५८४
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