आठ दोहे

भगवती प्रसाद गौतम


हिन्दी वह तासीर
हँसती, गाती, मुलकती, सतत निभाती नेह।
फहर चली हिन्दी-ध्वजा क्या बाहर क्या गेह।।
जैसे माँ आ-आ-निकट दुलराती भर बाँह।
हिन्दी वैसे दे रही, घर-आँगन को छाँह।।
आंध्र, हिमाचल, मध्य भू, दिल्ली, राजस्थान।
अगणित आँखों में बसी निज भाषा की आन।।
तुलसी, सूर, कबीर क्या, रवि, खुसरो, हरिचंद।
देश-धरा को दे गए मन-मोहक मकरंद।।
रग-रग में छाया रहा जिसका मृदुल मिठास।
उस वाणी में ही रमा अंतस का विश्वास।।
जगती की सिरमौर है, जन-जन का उत्थान।
महलों की ताकत यही, झुग्गी की मुस्कान।।
हिन्दी भारत भारती, हिन्दी मानस सार।
हिन्दी ने पग-पग रचा समता का संसार।।
युग-युग की बारहखडी, पल-छिन बहता नीर।
जन से जन बरबस जुडे, हिन्दी वह तासीर।। ?
१-त-८, अंजलि, दादाबाडी, कोटा-३२४००९ (राज.) मो. ९४६११८२५७१
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