तीन गज़लें

रज़ा मोहम्मद खान


(१)
न पूछो ज़माने में क्या ढूँढते हैं
सताये हुए इक आसरा ढूँढते हैं
दिया है मुझे दर्द जिसकी जफा ने
उसी दर्दे-दिल की दवा ढूँढते हैं
बहुत ज़ख्म खाये फिज़ाओं से हमने
बहारों की अब तो फ़ज़ा ढूँढते हैं
नहीं जब रहा गमगुसार अपना कोई
सितमगर का ही आसरा ढूँढते हैं
मझदार में अपना डूबा सफीना
किनारों पे बैठे वो क्या ढूँढते हैं
है अब भी जुबां पे मेरे नाम तेरा
वो गैंरों में मेरा पता ढूँढते हैं
समन्दर की लहरें जिसे खा गई थी
वो ज़मीं पर मेरा नाम लिखा ढूँढते हैं
किया ज़ुर्म हमने तुम्हें भूलने का
उसी ज़ुर्म की हम सज़ा ढूँढते हैं
ज़माना जिन्हें ढूँढ पाया ना अब तक
उन्हीं मज़िलों का पता ढूँढते हैं। ?
(२)
मेरी उल्फत का यूं सिला देगा
दर्द देगा वही दवा देगा
पहले भडकायेगा वो शोलों को
फिर वो चिंगारियां बुझा देगा
भूल जाने का मश्वरा तेरा
मर्ज़ को और भी बढा देगा
यही उम्मीद ले के बैठे हैं
जब भी देगा वो कुछ सिवा देगा
आगे अब अपनी अपनी किस्मत है
दर्द वो ही, वही दवा देगा
अब तो मझदार हो या हो साहिल
सब है मंज़ुर जो खुदा देगा
दिल दिया है तो फिर भरोसा कर
वो ही मंज़िल से भी लगा देगा। ?
(३)
बीच आंगन में आ गई दीवार
कई दिलों को खा गई दीवार
दुश्मनों को खुशी नसीब हुई
दोस्तों को जला गई दीवार
फिर मुहब्बत भी काम ना आई
ऐसी नफरत जगा गई दीवार
ईंट-गारे में कितनी ताकत है
ज़िन्दा रिश्तों को खा गई दीवार
जो थे अपने, वही पराये हुवे
गैर अपने बना गई दीवार
आँसूं बन कर बही खुशी मेरी
ऐसा सैलाब बहा गई दीवार
ज़ब्त करने से काम इतना हुआ
दर्द दिल का बढा गई दीवार
जाने क्यूँ थमते नहीं आँसूं मेरे
झडी ऐसी लगा गई दीवार
एक पडौस बन गया परदेस
दूरियाँ दिलों की बढा गई दीवार । ?
मोहल्ला बम्बा, छोटी हवेली के पीछे गली में, जोधपुर
मो. ९६८०६४८८८३
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