दो ग़ज़लें

डॉ. निसार राही


(१)
कहीं सराब कहीं आब ही से निकली है
ये कायनात किसी ख्वाब ही से निकली है
है आफताब के दम से हर एक दिन लेकिन
हमारी रात तो माहताब ही से निकली है
तू ही बता कि ये सच है कि झूट है गालिब
कि शाइरी तिरे अस्बाब ही से निकली है
किनारे बैठ के करते हो मोतियों की तलाश
खबर गुहर की तो गरकाब ही से निकली है
न जाने किस लिये मशहूर है रकीबों में
वो एक रस्म जो अहबाब ही से निकली है
पहुँच ही जाएगी इक रोज़ आस्मानों तक
अगर सदा दिले-बेताब ही से निकली है
‘निसार’ बीच भंवर में फँसे तो ये जाना
हर एक शै’ किसी गिरदाब ही से निकली है। ?
(२)
तुम्हारे नाम के दावे पे कुछ दलील न हो
अगर है फासिला हाइल तो फिर फसील न हो
हर एक राह में कितने अलाव जलते थे
दुआ ये माँग कि अब शब कोई तवील न हो
किसी की तिश्नालबी का है वास्ता सब को
सफर हो दश्त का लेकिन कहीं सबील न हो
फकीर रात में अक्सर दुआएँ करता है
तुम्हारी याद की दौलत कभी कलील न हो
जो शे’र कहता है तो ये खयाल भी रखना
कोई भी लफ़्ज तेरी ज़ात से ज़लील न हो
सिला मिले न मिले उस की आरज़ु कब है
मगर कोई तेरी तारीफ में बखील न हो
तुम्हीं बताओ कि होगा ये किस तरह मुमकिन
कि ज़िक्र आग का हो और वहाँ खलील न हो
हर एक फासिल साँसों से नापना है ‘निसार’
किसी के ज़िक्र के रहते में संगे-मील न हो ?
ए-३१, महावीर नगर, पाल लिंक रोड, जोधपुर-३४२००८
मो. ९४१४७०१७८६
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