पाँच गज़लें

अनिरुद्ध सिन्हा


(१)
दर्द की धूप को शिद्दत से सजाया जाए
मैं चलूँ और मेरे साथ में साया जाए
जिसने हर बार मुहब्बत का किया है सौदा
उसको रिश्तों की अदालत में बुलाया जाए
गुम न जाएँ अंधेरों में कहीं घर सारे
शाम होते ही चिरागों को जलाया जाए
बिजलियाँ तोड दिया करती हैं शाखों की लचक
ऐसे मौसम में खुले सर को बचाया जाए
जो कि हालात के वारों से डरे सहमे हैं
कैसे लडते हैं उन्हें चलके बताया जाए ?
(२)
बारहा लाजवाब आता है
ज़ख्म देकर जो ख्वाब आता है
रूठने और फिर मनाने से
इश्क में इन्कलाब आता है
ढूँढता है कहाँ उजालों को
रो*ा तो अफताब आता है
अब कहाँ प्यार के लिफाफे में
खत में लिपटा गुलाब आता है
तो ग*ाल खिंच के खुद चली आती
शेर जब कामयाब आता है ?
(३)
अनमोल ये गुहर है इसे आज़मा के देख
माथे पे अपने देश की मिट्टी लगा के देख
कुछ हुस्न भी पडे हैं मुहब्बत के सफर में
काँटे हैं जितने राह में उनको हटा के देख
जीवन में फैल जाएगी हर सिम्त रोशनी
दिल में कोई उम्मीद का दीपक जला के देख
ये आँधियाँ न तुझको हिला पाएँगी कभी
थोडा सा अपने पाँव ज़मीं से अडा के देख
आवाज़ से लबों की रहेंगी न दूरियाँ
होठों पे एतबार का जज्बा सजा के देख ?
(४)
मैं ढूँढता हूँ आज मेरा घर कहाँ गया
रिश्तों के बीच प्यार का मंजर कहाँ गया
अपनी ही धुन में लोग हैं खोए हुए तमाम
तनहा हरेक शख्श है लश्कर कहाँ गया
वो भी तो अपने आप में सिमटा रहा बहुत
मैं भी हदों को तोड के बाहर कहॉ गया
सुलगा हुआ है दिल में वही एक ही सवाल
रौशन हो आदमी का मुकद्दर कहाँ गया
मुश्किल के इस सफर में मुझे भी तलाश है
जो सर उठा यकीन से वो सर कहाँ गया ?
(५)
खफा-खफा सा मुझे रात भर जगाता है
तेरे बगैर जो रातों में ख्वाब आता है
दिया है हुस्न परस्तों ने ज़ख्म कुछ ऐसा
अब उसका जिस्म उजालों में थरथराता है
हवा के साथ सफर में अकेली कश्ती को
कभी-कभी तो समुंदर भी आज़माता है
लहूलुहान सितारे तमाम हो जाते
स्याह रात में जब घर कोई जलाता है
अंधेरी रात के हमलों से होके बेपरवाह
तेरा ख्याल मुझे खुद ही खींच लाता है ?
गुलजार पोखर, मुंगर (बिहार)-८११२०१
+++++++++