दो गीत

पं. गिरिमेाहन गुरु


दृग रहे स्वप्रिल
हम रहे शीतल
भले ही / आग के आगे रहे
रेत पर बन नाव
चलना
स्वयं को ही स्वयं
छलना
वह मिला प्रतिफल
कि जिससे / उम्र भर भागे रहे
कल्पना के तन्तु
बुनना
उधेडना फिर शीश
धुनना
दृग रहे स्वप्रील
भले ही/ रात भर जागे रहे। ?
यादों के हंस
स्वपन्न आते हैं तुम्हारे इस तरह
आ रहे हों हंस पर्वत पार से उड-उड......
बोझ बन दीवानगी के क्षण
रोकते हैं चेतना के द्वार,
झुलसती आती तुम्हारी याद
एक लू सी देह का संसार।
जिन्दगी भोगे हुये क्षण को
नव वधू सी देखती मुड-मुड.....
सरसराहट पीर की पाती नहीं
ठहरने का कहीं भी नव स्थान,
दौडता था जो कि तन में पे*म बन
रक्त वह होने लगा निष्प्राण।
कौन है जो आज भी भीतर
कसमसाता टूटता जुड-जुड...... ?
नर्मदा मंदिरम्, गृह निर्माण कॉलोनी, होशंगाबाद (म.प्र.)
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