अकाल के बाद

सुमन आशीष


झुरियों पर भरे उसके चेहरे पर मटमैली पीली आँखें इस कदर धंसी थी कि उनकी जगह दो गड्डे ही न*ार आते थे। गड्डों में ठहरा सूनापन इतना गहरा और घना था कि उनसे ची*ाों का यही रंग दिखाई देता न हरा, न समूचा कत्थई, मटमैला पीला रंग। वह पुतलियाँ फैला कर प्रकृति की तरफ देखता। छितराए सूने पेडों और बेखौफ डोलते कुत्तों के सिवाय वहाँ कुछ नहीं होता।
वह देख रहा था पेडों के काले निर्जीव साये लम्बे होकर बालू पर पसरने लगे थे, जहाँ प्रकृति को निगलने जैसा सन्नाटा था। वहाँ मौन मूर्तिवत् वह भी प्रकृति का हिस्सा लग रहा था। झुर्रियों से भरे चेहरे पर विषाद की एक-एक रेखा स्पष्ट दिखाई देती थी। आँखों में बालू सा पीलापन और चेहरे पर उदासी जैसे उसकी नियति ही बन गई थी। क्षितिज पर आँखें टिकाए कितना समय गुजरा, इसका उसे अंदाजा नहीं। हवा का हरेक झौंका उसे झकझौर कर आगे बढ जाता और वह बैठा रहता जहाँ का तहाँ हवा के कठोर थपेडे सहती किसी चट्टान की तरह। कभी-कभी एक फीकी मुस्कान उसके क्षत-विक्षत होठों पर तैर जाती जिसे वह तत्काल जीभ फेरकर मौन धारण कर लेता।
इक्की-दुक्की झाडियों के पार जब टिटहरी का उदास स्वर गूँजता तो उसका मन उस अनजान जीव के प्रति कृतज्ञता से भर उठता, वह भला मानता कि कोई उसका दर्द जानता है।
बीते सालों की पीडा और दुखों ने उसे ऐसी शक्ल दी कि वह आदमी से अधिक कागज की पुडिया ही न*ार आता था। उसके समूचे व्यक्तित्व पर उदासी एवम् सूनेपन की अमिट छाया स्पष्ट दिखाई पडती थी। बावजूद इसके भी पराई पीडा उसे झकझोर जाती गाँव में किसी की बेटी ब्याहती तो झाडू-बुहारी का दाम नहीं लेता दिन देखता ना रात, ऐेसे काम करता जैसे खुद की बेटी ब्याहकर जा रही हो। गोखे पर खडा होकर टुकर-टुकर देखता ओर जब विदाई के क्षण नजदीक होते तो छाती थामकर धम्म से अपने को जमीन पर गिरा देता। यह इस तरह का दृश्य होता कि पत्थर भी रो दे किंतु विधाता के कठोर निर्णय का रहस्य कौन जाने जो उसके नर्म हृदय के सर्वथा
विपरीत था।
इंद्रदेव की कोपदृष्टि हुई तो पूरे साल पानी नहीं बरसा, एक बूँद भी नहीं। एक साल की बात होती तो बनती पूरे तीन साल एक बूँद भी नहीं।
सारे कुए-बावडी पैदों से झाँकने लगे थे। सिवाय उसकी आँखों के कहीं भी पानी नहीं था। गहरी हताशा और निराशा के साथ उसने आसमान देखा और अपना सिर सूखी जमीन पर टिका दिया, जहाँ आँसूओं की बूंदों के अवशेष भर शेष थे और शेष था बहुत कुछ यादों
के सहारे....
....जैसे कल की ही बात हो। मूँगफली की फसल रेत हो गई थी। बाजरा भी इक्का-दुक्का दाने देकर सूख चुका था। दूसरी फसलें बोई नहीं गई थी। ये दो ही आवश्यक फसलें थी जिन पर उसके जीवन की आशा टिकी थी। पत्नी का बाला बेचकर कहीं बीज का जुगाड कर पाया था, जिसे भी काल बनकर अकाल लील गया। यह अकाल का दूसरा बरस था। कहते हैं मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। इधर फसल रेत हो गई और उधर बीस भेडों का खेड एक-एक कर काल के मुँह में समा गया।
यह मुँहपका रोग था। पशुओं की बिरादरी में जानलेवा महामारी। मुँह झाग आते तो भेडे इधर-उधर मुँह पटकने लगती। मुँह पटकने के साथ ही खून टपकना शुरू हो जाता और पीडा का यह क्रम उनके बेदम होकर गिरने तक जारी रहता। उनकी लंबी पुतलियाँ आँखों के ऊपरी हिस्से पर जाकर ठहर जाती तब उनकी मुद्रा किसी ध्यान मग* ऋषि की भाँति होती। समाधीस्थ ऋषि की तरह जिसकी समाधि अब कभी नहीं टूटेगी।
चिरशांति उसके चेहरे पर फैल जाती है।
‘‘न जाने काल का मुँह कितना बडा है जी’’ कहते-कहते धापू की आँखे भर आई। धापू जो ओछे कद की दुबली औरत थी, उसकी पत्नी थी और बुरे दिनों का सहारा भी।
‘‘कुछ भी वह कहाँ भूला था।.....उस दिन वह भूखा लेटा था, धरती के दुख अथवा अपने दुख से उस दिन वह बहुत दुखी था। तब बडी मनुहार से धापू ने उसे खाने के लिए मना लिया था।
उसने बंद आँखों से भूख को टटोला और अपने को भी, फिर एकाएक सजीव होकर खाना प्रारम्भ
कर दिया।
धापू की शांत किंतु नम आँखों में न जाने क्या था कि सब कुछ भूल जाता। सारे दुख, सारी पीडा, उसकी आँखों में ही चुक जाते थे।
यह सावन था और धरती जेठ के सूरज-सी जल रही थी, इसलिए इक्के-दुक्के ही लोग बाहर निकलते दिखाई देते। ये वो लोग थे जो लू के थेपडों से अपनी झोपडी बचाने के तमाम प्रयासो में व्यस्त थे।
लू के हर थपेडे के साथ उसकी झोंपडी भी चली जाती और वह भी उसे बचाने के प्रयास में इधर-उधर दौडने लगता। उसे लगता झौंपडी अब शीघ्र ही घायल भेड की तरह दम तोड देगी।
‘‘सावन उतर गया और....धापू ने आसमान को देखा और अपने पति को भी।
‘‘भादो अभी बाकी है धापू’’ पत्नी का दर्द कम करने के प्रयास व्यर्थ रहे, उसकी आँखें आँसुओं से
भर गई।
धापू अपने पति को देखती तो उदास हो जाती। अकाल के रूप में साक्षात् काल सिर पडा था जिसकी मार झेलने के लिए वह और उस जैसे मिट्टी का दर्द समझने वाले मुट्ठी भर लोग रह गये थे। बाकी अकाल की दस्तक के साथ ही अन्यत्र जा बसे थे।
धूल भरी आंधियाँ उड रही थी और तपती पटपड जमीन तवे-सी जल रही थी। वह धरती की पीडा का अनुभव करता जैसे कोई भूखी बेवा अपना ही माँस नोच रही हो। तब वह एक बच्चे की तरह जो अपनी माँ के खाली स्तनों से खेलता है, अपने अस्थि पंजर हाथों से बालू उठाकर जमीन पर गिरा देता और जब बालू पूरी तरह से फिसलकर धरती पर गिरती, तब वह लगभग रो पडता।
‘‘आखिर कोई कितना सहे भगवान, निर्वंशी का दुख और बुढापे की पीडा पहले ही थी अब धरती की पीडा देखनी बाकी रह गई थी।’’ कहकर वह दोनों हाथों से अपने आँसू पोंछ लेता।
चारे पानी के अभाव में लोगों ने अपने ढोर-ढंकर खुले छोड दिये थे। कुछ तो डोल-डाल कर वापिस मालिक से नाता जोड चुके थे और कुछ थे जिन्हें ढाणी से दूर सरकारी नर्सरी में हाँक दिया गया था। जमीन पर हरा-पीला खत्म होने के बाद स्वार्थी दलालों के हाथों ओन-पौने दामों में बूचडखाने भेज दिए गये थे और कुछ जहरीले पदार्थ, प्लास्टिक की थैलियाँ और सूखी हड्डियाँ खाने से मर गये थे।
उसकी उदासी और एकाकीपन का धापू अच्छी तरह समझती थी और घुटती थी। उस दिन वह सर्वथा मौन थी और उदास भी। गरीबी और दुखों में भी चमका उसका चेहरा मुरझाकर पीला पड गया था। जून की जमीन से तपते शरीर पर आलू बुखारे-सी लाल आँखें पानी की हल्की परत से उभर कर अधिक ऊपर आ गई थी, जिनसे गर्म बफारे उठने-सा आभास हो रहा था। धापू का चेहरा देखकर वह अंदर तक कांप गया- ‘‘हे, भगवान धापू को बचा लेना, वही तो मेरा एक मात्र सहारा है’’ कहकर उसने अपना दायां हाथ धापू की कनपटी पर रख दिया और गर्म अहसास के साथ तुरन्त हटा लिया। वह तवे-सी जल रही थी। उसके छूने पर वह छूई-मूई सी सिमट गई, अपना पेट पकडकर और अपनी देह को लगभग पुडिया सी बाँधकर वह उडती हुई झोपडी से बाहर निकल आई। उसे ‘‘कै’’ हुई थी, हरी झक्क पित्त की कै। एक बार, दो बार...सारा दिन।
यह शाम थी जब ढाणी के लोग-बाग अपनी-अपनी झोपडियों से निकलकर छितराये पेडों की छाया में खाटें खींच लाए थे। दिन भर की गर्मी, उमस और पीडादायक थकान के चिन्ह उनके चेहरों पर समाप्त प्राय थे। उनका वार्तालाप इतना स्पष्ट था कि सुना जा सकता था। उनमें से कुछ दिन भर की उमस अथवा आगामी मौसम के तेवर पर चर्चा कर रहे थे, कुछ अपनी जीर्णशीर्ण झौपडियो तथा निरंतर समाप्त होते जा रहे राशन पर चिंतित थे, कुछ ढाणी के मंदिर में नौ दिन की अखण्ड रामयाण के बावजूद बूंद भर भी पानी न बरसने पर दुखी और कुछ मौसमी बीमारियों से चिंतित।
‘‘हमें भी ढाणी छोड देनी चाहिए’’ उनमें से एक ने कहा।
‘‘और क्या शहर जाकर ही मजदूरी करेंगे, अब यहाँ जिएँगे कैसे?’’ दूसरा बोला।
‘‘बैठे-बैठे तो पहाड भी खाली हो जाता है, ऐसे काम न चलेगा’’ तीसरे ने कहा।
‘‘सब पैसे का खेल है भाई, देख ही रहे हो सब अपना-अपना जुगाड करने शहर चले गये हैं।’’
धापू लगभग उसके पास सरक आई थी किन्तु असहाय कैदी की तरह उसके हाथ जैसे बँधे थे।
‘‘हम भी क्यों न ढाणी छोड दें जी’’ धापू
ने कहा।
उसने बिना कुछ बोले मुट्ठी से रेत छिटका दी।
शाम हो चुकी थी। उसने लालटेन जलाई तो अंधेरा कोनों में दुबक गया था। काँपती लौ में सब कुछ काँप रहा था। अंदर भी, बाहर भी। छान पर लटकती लालटेन हरेक वस्तु को उजाले में देख रही थी। एक खूँटी पर उसकी फटी-पुरानी धोती टँगी थी, दूसरी पर एक थैला जिसमें बचे-कुचे गेहूँ और बाजरे के बीज रखे थे, जैसे उसका मुँह चिढा रहे थे। कोने में लोहे की पुरानी जंग लगी बाल्टी रखी थी और दूसरे कोने में पडी खाट पर धापू अपने जलते बदन से सिक रही थी।
उस रात ढाणी में श्मशान सा सन्नाटा था। अचानक किसी शोर ने उस सन्नाटे को तोडा। वह आत्म-विस्तृत सा मौत का कोहराम सुनता रहा। फिर से पेचिश ने एक बच्ची की जान ली थी। इस ढाणी में कोई भी मौत की भयावहता से न डरते थे, न परेशान होते थे बल्कि मौत की पीडा से तडपते वे स्वयं मौत के आमंत्रण हेतु प्रार्थनाएँ करते थे।
धापू प्यास के मारे तडप रही थी, अकाल में मानवता की आशा व्यर्थ थी। उसने तय किया कि वह स्वयं पंचायत के हैंडपम्प पर पानी लाने जाएगा।
जो यहाँ से तीन किलोमीटर से कम दूरी पर
नहीं था।
...परन्तु कुछ सोचकर उसने पाँव बढा दिए और बुढाती चाल से हैंडपंप तक आ पहुँचा, जहाँ पहले से ही आधे किलोमीटर लम्बी कतार में लोग पहल करने के लिए झगड रहे थे। उसने भीगी, भारी एवं सूजी पलकों को उठाकर उन्हें देखा और धापू को भी जो पानी के अभाव में वहाँ दम तोड रही थी। तीन घण्टे की असीम पीडा, थकान और लाचारी के बाद उसकी बारी आई, अब उसे हैण्डपंप हाथ लगा था, जैसे दुनियाँ की सबसे कीमती वस्तु हाथ लगी थी, उसने झटपट पानी भर लेने की चाह में हैण्डपम्प के हत्थे को ऊपर उठा दिया किंतु सुबह से सबको पानी देकर थकने के बाद अब लगभग कीचड ही उसके हाथ लगा था किन्तु फिर भी वह प्रसन्न था। उसकी चाल में अचानक युवाओं सी स्फूर्ति भर गई और लम्बे-लम्बे फलांगों से दूरी नाप कर वह शीघ्र झोपडी के द्वार पर आ पहुँचा लेकिन झोंपडी में पसरा असीम सन्नाटा देखकर वह डर गया। उसकी हिम्मत जवाब देने लगी, उसे लगा जैसे वह टूटकर शीघ्र ही जमीन पर गिर पडेगा। जिस शक्ति के बल पर वह दौडा आ रहा था, अब उसे लगने लगा जैसे वह सब शक्ति चुक गई थी, वह बाटी रख कर धम्म से जमीन पर गिर पडा। तभी अनन्त पीडा में भीगे शब्द
सुनाई दिए-
‘‘सुनो जी, तुम आ गये हो?’’
‘‘अच्छा हुआ ऽऽ दुऽऽखी मत होऽऽना, मैं बारिश लेने जा रही हूँ। बाऽऽरिशऽऽऽ।’’ टूटते शब्दों के साथ उसकी आत्मा ने भी उसके शरीर से समस्त रिश्ते तोड लिए थे। उसकी देह में शांति के तमाम लक्षण थे किंतु शांति नहीं थी तो उसमें जिसने धापू को जिलाने के तमाम प्रयास किए और तमाम प्रयासों में वह असफल रहा...।
यादों का क्रम टूटा। टप-टप की आवाज उसके कानों में गूँज उठी। वह निर्लिप्त अनमना सा चारों तरफ देखता रहा। टपटप की आवाज ने चारों तरफ के वातावरण को नम और शीतल बना दिया। अंगारे की देह शीतल राख में तब्दील हो चुकी थी किंतु तीन साल का अकाल भोगने और धापू को खोने के बाद उसे अन्दर-बाहर की रिक्तता ही नजर आती थी। आज भी बारिश से बेखबर वह धापू की यादों में जीवित उसके अंतिम शब्दों को याद कर
रहा था...
‘‘सुनो ऽऽ तुम ऽऽ आ ऽऽ गए, मैं बारिशऽऽ लेने ऽऽ जा ऽऽ रही हूँ...।’’
बार-बार ये वाक्य उसकी आत्मा में गूँज रहे थे। उसने धापू के आत्मिक अहसास अथवा लम्बे अरसे बाद धरती की ठण्डक को महसूस करके अपनी आदत के अनुसार उसने आसमान की ओर देखा।
शीघ्र ही आँखों का पानी बारिश के पानी में मिलकर एक हो गया।
वह बारिश में पूरी तरह भीग चुका था। धापू के एक-एक शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे-
‘‘मैंऽऽ बारिश... लेने ऽऽ जा ऽऽ रऽऽही हूँऽऽऽ।’’
बारिश की बूंदे तेज और तेज होती जा रही थी। पानी जमीन में समाकर बह निकला था। उसके सूखे होंठो पर एक फीकी मुस्कान तैर गई जिसे उसने जीभ फेरकर शांत कर लिया। बुढाती देह को खींचता हुआ वह झोपडी तक आ पहुँचा। बारिश का पानी उसकी खाली और खली झोंपडी तक आ पहुँचा। बारिश का पानी उसकी खाली और खुली झोंपडी में निर्बाध भर रहा था। उसने आसमान की ओर देखा। आसमान झर रहा था तथा साँझ के काले-सुनहरे बादलों के बीच कहीं-कहीं का खाली स्थान गाँव की गरीब औरत की जर्जर होती चुनरी की तरह छितरा रहा था। संध्या अपने सुनहरे पंख गिरा कर रात्रि का रूप ले रही थी और आसमान काली घटाओं का टोप पहने रात्रि को दबे पाँव बुला रहा था।
अमावस की रात थी। अंधकार में डूबे आसमान पर अब जुगनू चमकने लगे थे, मेंढक और झिंगुरों के कोलाहल में बस्ती का कोलाहल डूब रहा था। दूर झोपडियों से टिमटिमाती लालटेन हवा में काँप रही थी। वह निस्पंद लेटा भोर के इंतजार में नींद के आगोश में समा गया।
भोर का सूरज धरा को सुहागन बना रहा था। उसकी आँखें मोतियों से भर गई जिन्हें उसने आँखें भींचकर जमीन पर लुढका दिए।
वह आते-जाते लोगों को देख रहा था। उसके चेहरों पर प्रसन्नता झलक रही थी। बारिश ने मौसम को खुशनुमा बना दिया था। उसने मन ही मन कुछ निश्चय किया या बात कोई और थी वह लकडी का सहारा लेते हुए उठा और थैले को आंगन में खाली कर दिया... उसमें कुछ बीज और पैसे थे जो धापू ने बुरे समय के लिए रख छोडे थे। बीज लगभग रेत हो गए थे किंतु पैंसों की चमक बरकरार थी। उसने निश्चय किया कि वह इन पैसों से बीज खरीदेगा और धापू के सपने को पूरा करेगा। कदम बाहर रखे ही थे कि सेंगर चौधरी से भेंट हो गई। गाँव की पंचायत में उसकी बडी पूछ थी। पांच सौ आबादी वाली ढाणी में पंच-सरपंच तक उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते थे। गाँठ का पूरा और बात का पक्का था। सेंगर। सेंगर के खेत का रास्ता उसकी झोंपडी के आगे से निकलता था। इसलिए आज भी आवाज लगाई-
‘‘काका बरसात के लिए मनौतियाँ मना रहे थे और जब बारिश से ताल-तलैया भर गए तुम सोये पडे हो, सूखे के सूखे। धरती की प्यास बुझ चुकी है काका। कुंओं के पैदों में पानी झांकने लगा है। उठो काका उठो।’’ कहकर वह आगे बढ गया।
यह दोपहर का समय था, जब ढाणी का कोलाहल लगभग शांत हो चुका था, वह धापू के पैसों से कुछ बीज खरीद लाया। अपनी प्रसन्नता और धापू की यादों को अपने सीने में दबा वह सेंगर से ट्रेक्टर की बात करने गया ताकि अगली सुबह बीज बोने की शुरूआत की जा सके। अकाल के दौरान एक सेंगर ही जुबान का पक्का निकला जो उसे छोडकर शहर नहीं गया। उसे देखते ही सेंगर नीमडी के नीचे खाट खींच लाया। उमस से बेहाल शरीर से पसीना चू रहा था। आसमान काले बादलों से घिरा था मतलब बारिश कभी भी पुनः शुरु हो सकती थी। थोडी देर के बाद मतलब की बात शुरू की जा सकी।
अपने वायदे के अनुसार सेंगर सुबह होते ही ट्रेक्टर ले आया। जमीन में बीज बोये जाने थे। गीले और सुनसान खेत में इक्की-दुक्की झाडिया उग आई थी, सेंगर ने ट्रेक्टर घुमाया और जमीन को साँस लेने के लिए छोड दिया, धरा का पेट चिर चुका था। लग रहा था जैसे मिट्टी पर लहरिया बिछा हो। दो दिन बाद सेंगर के साथ जाकर वह बीज फेंक आया। बारिश ने लाज रखी और खेत में धरा को चीरकर बाजरे के अंकुर निकल आये उसने खेत को दूर से देखा और गद्गद् हो गया।
चार महीने कैसे निकल गये पता ही नहीं चला। हरा झक्क बाजरा अपने लचीले पैरों पर हवा से रुख मिलाता तो उसका मन एक साथ गिरते-उठते बाजरे की ताल और लय में खो जाता। बाजरे का दाना सर्रों से होकर जैसे बाहर निकलना चाहता हो। चमकीला सलेटी दाना पककर अधिक चमकीला हो गया था। बाजरे की हरियाली उसके संपूर्ण व्यक्तित्व में उतर आई थी। ?
१२८-रूपनगर, हिरणमगरी, सेक्टर-३, उदयपुर (राज.)
मो. ९४६८७१३७०९
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