धुंध के उस पार

विपुल ज्वालाप्रसाद


धूप अब लम्बे-लम्बे दरख्तों की फुनगियों से होकर ऊँचे-ऊँचे पहाडों के शिखरों पर बैठी थी। पक्षी अपने-अपने बसेरों की ओर हवाई जहाजों के से फार्मेशन में लौट रहे थे। वह भी दिनभर की हाडतोड मेहनत करके अपने घर लौटी। सौताने (सुस्ताने) की गरज से अपने घर की माटी की दीवार से सटी पटिया पर बैठ गई थी। तभी उसका चार वर्षीय बालक गाँव में इधर-उधर भटकता धूल-धूसरित उसके आंचल से आ लिपटा था ‘‘अम्मा! कछू खाइवे कूं देउ। भौत (बहुत) भूख लग रई....’’ तो वात्सल्य में मौम होते हुए उसने बालक को आश्वासन की थपकी लगाई ‘‘हवाल (अभी) बनाऊँ रोटी अपने लाल के लें... तौनू (तबतक) तू रमेशिया की दुकान ते पाँच रूपैया के नमकीन ले आ.... बिनि (उनको) खाई लीओ.....’’ और उसने अपनी अंटी से पाँच रुपया का सिक्का निकाल बालक की हथेली पर रख दिया।
उसको भी कडकडाती भूख सता रही थी। कुछ देर सुस्ताने के बाद, वह घर में घुसी। घर में आकर देखा तो हेतराम पौरी में शराब के नशें में धुत्त पडा था। उसके मुँह से लार टपक रही थी। जिस पर मक्खियाँ भिनभिना रहीं थी। वह बुदबुदाई ‘‘जाइ बराइदऊं (जलादूं) जब देखू तब मूत ही पीए देखूं......पतौ (पता) नई कौन से जनम को बैरू (बैर) लै रयौ ऐ....’’ उसकी उपेक्षा कर वह घर के भीतर घुसी तो खानेदाने की मिट्टी की सब कलसियाँ रीती पडी थीं। वह दौडी-दौडी गांव के किराने की दुकान पर गई। वहाँ से आटा खरीदा। सब्जी वाले से सब्जी। झटपट रोटियां बनाई। चंदू को रोटियाँ परोसी। ये ठंड के दिन थे। चंदू रोटी खा, चूल्हे में जलती आग से हाथ-पैर सेकने लगा था। वह फिर बुदबुदाई ‘‘होसु आइ गयो हो तो जा करमजले के पेट में भी कछु ठुंसू’’ लेकिन हेतराम पर तो नशा इस तरह तारी था कि वह उसको आडे पडे से बैठा करती तो फिर जमीन पर आडा पड जाता था। वह उसको उसी स्थिति में छोड ‘‘जा अभागे तेरे भाग में भूखौं ई मरनो ए तो मरि...’’ वह चूल्हे के पास आ रोटी परोस स्वयं खाने लगी।
अंधेरा गाढा दर गाढा होता जा रहा था। चिमनी के मरियल उजाले में उसने जमीन पर कांथली बिछाई और चंदू को छाती से चिपटा सोने का उपक्रम करने लगी। लेकिन दुखती पसलियों का दर्द उसे सोने ही नहीं दे रहा था। वह सोते से उठ बैठी। हल्दी का पुल्टस बना पसलियों की सिकाई करने लगी। सिकाई कर दूसरी करवट ले फिर लेटी तो नींद आँखों से कोसों दूर थी। विचारों के ढेर-ढेर पखेरू उसके जहन में फडफडाने लगे थे। पहले उसका विवाह सामाजिक रीति-रिवाज से उसके बापू ने ठीक ही जगह किया था।
उसका पहले वाला आदमी पातीराम गोरा-चिट्टा, हट्टा-कट्टा, सुघढ युवक था। वह ईंटों के भट्टे पर ईंट थापने का काम करता था। पाती के बाप के पास चार-पाँच बीघा खेत भी था। वह पाती के साथ खुश थी। इसी दौरान उसके गर्भ में चन्दू आ चुका था लेकिन शनैः-शनैः उसे पता चला कि पाती तो पक्का ढीली लांग वाला........असली लंपट। पाती को इस कुकर्म को छोड देने के लिए वह बहुत विवश करने लगी। वह उससे खूब लडती-झगडती। पाती उसको ऐसा बुरा काम नहीं करने का आश्वसन देता। लेकिन वह फिर अपना काला मुँह करने से नहीं चूकता था। अंत में वह उसी ओर से उदासीन हा ेगई थी। मन को समझा लिया था कि यह नीच जैसा करेगा बैसा भरेगा।
और हुआ भी यही। एक दिन पाती ने एक नाबालिक लडकी से बलात्कार कर डाला। लडकी इस कारण मर गई। पाती पर मुकदमा चला। उसको आजीवन कारावास हुआ। मुकदमें में उसके सब खेत-क्यार भी बिक गए। उसका बाप इस सदमें को झेल नही पाया। वह स्वर्गवासी हो गया। फलतः उसके बाप ने उसका इस कलंकी के साथ धरेजा (नाता) कर दिया।
शुरू-शुरू में तो इस हत्यारे में कोई ऐब-खोट नहीं था। वह मजूरी करता था। वह भी उसके साथ मजूरी पर जाने लगी थी। दोनों की मजूरी की आय से घर में सुख-सम्पन्नता के पखेरू चह-चहाने लगे थे। पाती दूसरे मजूरों को ब्याज पर उधार रुपया भी देने लगा था। इससे वे मजूर उसको बोहरा जी बोहरा कहने लगे थे। पाती इस सम्बोधन को सुन फूल कर कुप्पा हो जाया करता था। बडा गरूर हो गया था उसे। अपनी अच्छी आर्थिक स्थिति के कारण पाती मजूरी पर जाना अपनी हेठी समझने लगा था। इसलिए मजूरी पर अब उसने जाना बंद कर दिया था। अब वह गांव में ही गप्प-सडाके मारता फिरता था। फालतु दिमाग शैतान का घर। धीरे-धीरे समय काटने के लिए वह जुआ खेलने लगा था। अब उसकी मजूरी से ही घर की गाडी बडी कठिनाई से ढिकलती थी। जिस दिन यह जुआ में जीत आता, छाती तान कर घर आता था। और जिस दिन जुआ में हार जाता तो भीगी बिल्ली बन घर के एक कोने में आ पडता था। जुआ में हारने के गम को गलत करने के लिए यह शराब भी पीने लगा था। सट्टे खेलने की भी आदत हो गई थी। जब इसके पास जुआ-सट्टा खेलने के लिए पैसे नहीं होते तो यह उसको मारपीट, जबरदस्ती उसकी मजूरी के पैसे भी छीन ले जाता था। एक दिन उससे जुआ-सट्टे के लिए पैसे छीनने के चक्कर में पाती ने उसको ऐसी कसकर उसकी कमर में लात मारी कि वह आंगन में बिछी पत्थर की पटिया पर चारों खाने चित्त जा पडी। पटिया की किनोर उसकी पसलियों में घुस गई। वह दर्द से बिलबिला उठी थी। वह अस्पताल तो जा नहीं सकी थी। गांव से अस्पताल कोस दूर था। वह पसलियों में होले-होले दर्द को तो सहन कर लेती, लेकिन जब दर्द ज्यादा होने लगता तो किसी के द्वारा बताई हल्दी की पुल्टस से वह अपनी पसलियों की सिकाई कर थोडा चैन ले लिया करती थी।
बहुत देर तक होले-होले दर्द में भी एक ही करवट लेटे रहने से एकाएक उसकी पसलियों में मर्मांतक पीडा होने लगी। वह पीडा से कराह उठी। फिर चूल्हा जला हल्दी की पुल्टस से पसलियों की सिकाई करने लगी। विचारों के परिंदे फुर्र कर उड गए। वह सिकाई करते-करते सोच रही थी कि एक तो इस जालिम को वह कमाकर खिलाए। ऊपर से उसकी मारपीट भी सहे। यह कहाँ का न्याय? नहीं....नहीं....अब वह इसके और जुल्म-सितम नहीं सहेगी। उसने तत्काल हेतराम का घर छोडने का निर्णय लिया। बोरी में आवश्यक सामान बांधा। और पौ फटने-फटने ग्वालियर जाने वाली बस में चंदू को साथ ले, ग्वालियर के लिए रवाना हो गई।
अब सूरज आकाश में गजेक भर चढ आया था। ग्वालियर अब आने ही वाला था। शहर के बाहर एक तालाब खुद रहा था। तालाब की खुदाई के लिए मजूर आ रहे थे। उसने बस को वहीं रूकवा लिया और उस दिन काम की निगरानी करने वाले मेट से मिल, वह भी तालाब खुदाई की मजूरी में लग गई।
शाम को मजूरों की छुट्टी होने पर वह भी चंदू के साथ मजदूरों के साथ हो ली। मजूरों की झुग्गी-झोंपडियों के पास एक खाली कोठरी में किराये पर रहने लगी। एक दिन उसकी कोठरी के पास रहने वाली उसकी पडोसिन उससे बोली ‘‘दरी! तू तालाब की खुदाई में हाडतोड मेहनत करती है। मजूरी भी इस काम में अच्छी नहीं मिलती। इससे तो अच्छा है तू शहर के बडे-बडे आदमियों के यहाँ झाडू-पोंछा का काम करने लग। मेहनत भी तुझे कम करनी पडेगी-पैसे भी अच्छे मिलेंगे। तीज-त्यौहार के वक्त इनाम-इकरार भी मिलेंगे इन लोगों से।
जुलाई का माह लग गया था। पहले-पहल वारिस से जमीन सोंधी-सोंधी महक छोड रही थी। बच्चों के स्कूल खुल गए थे। सुखिया की कोठरी के सामने से चमकीले बूट पहने साफ-सुथरे कपडों में टाई लगाए बच्चे स्कूल के लिए निकलते तो उसके हिया में भी चंदू को स्कूल भेजने की हूक उठती थी। और एक दिन तो चंदू उन बच्चों को देख कहने लगा ‘‘अम्मा! हों बी इसकूल जांगा....’’ चंदू के कथन ने उसकी हूक को और बलवती कर दिया ‘‘हां....हां....क्यों नहीं लला! हों बी अपने बचवा को स्कूल भेजूंगी.......’’
सुखिया ने चंदू को स्कूल में भर्ती करा दिया। झाडू-पोंछा के काम से उसे अच्छी आय हो जाया करती थी। फलतः चंदू की पढाई कक्षा दर कक्षा बढने लगी थी। चंदू के जहन में बारहवीं कक्षा को पढने वाले विज्ञान शिक्षक की यह बात बडी शिद्दत से घर कर गई कि जो विद्यार्थी कडी मेहनत परिश्रम करते हैं तथा अपने उद्देश्य तक पहुँचने का दृढ संकल्प संजोए रहते है। वे अवश्य ही अंसभव कार्य को भी संभव कर डालते हैं। चंदू की कडी मेहनत और कुछ कर गुजरने का दृढ संकल्प रंग लाया। वह पूरे प्रदेश में विज्ञान संकाय में सीनियर सैकंडरी की परीक्षा में प्रथम आया। इस पर सुखिया ने भी पक्का निर्णय कर लिया कि उसे कुछ भी करना पडे, पहाड भी उसके मार्ग में बाधा बन जाय तो भी वह चंदू को आगे पढाने से नहीं ठहरेगी। जहाँ चाह-वहाँ राह।
तभी कोटा के एक शिक्षण संस्थान के प्रधान ने सुखिया से सम्फ साधा। उसने चंदू को अपने शिक्षण संस्थान में प्रवेश लने के लिए सुखिया को प्रेरित किया। तथा सुखिया को उसने आश्वासन दिया कि संस्थान चंदू के अध्ययन तथा रहने-सहने का समस्त व्यय वहन करेगा। अंधे को और क्या चाहिये दो आँखे। कोचिंग संस्थान के प्रधान को आशा थी कि चंदू अवश्य ही उस परीक्षा में अनोखा कर उसकी कोचिंंग संस्थान का नाम रोशन करेगा। उसकी प्रसिद्धि का वर्धन करेगा।
उस दिन सुखिया को एकाएक बुखार आ गया था। चंदू उस परीक्षा को देकर कुछ समय से सुखिया के पास ही था। चंदू ने डॉक्टर से मिल सुखिया को दवा-गोली दिलाईं। तथा यह सोचकर की माँ की मासिक मजूरी में कोई नागा नहीं हों। वह उसकी जगह उस दिन नियत स्थानों पर झाडू-पोंछा का काम करने चल दिया। वह उस दिन उस उद्योगपति के यहाँ झाडू-पोंछा करते देख उसको टोका ‘‘तुम कौन...?’’ चंदू ने बडी शिष्टता, विनम्रता, सलीके से उनको उत्तर दिया ‘‘सर! मैंने आई.आई.टी. की परीक्षा उत्तीर्ण की है। आज ही आई.आई.टी. का रिजल्ट आया है।
‘‘अच्छा!! तुम आई.आई.टीअन.....’’ उद्योगपति की आँखे आश्चर्य के मारे कपाल से जा लगी। ‘हाँ मैंने भी आज के अखबार में आई.आई.टी. की परीक्षा का परिणाम देखा है। कोटा की एक कोचिंग संस्थान का विद्यार्थी आई.आई.टी. की परीक्षा में पूरे देश में प्रथम आया है। अखबार में छपा उसका फोटो कुछ-कुछ तुमसे मिलता-जुलता है।’’ चंदू बोला ‘‘सर! वह मैं ही हूँ’’ उद्योगपति आश्चर्य में अपलक कुछ देर तक उसको देखते रहे तथा बोले ‘‘तुम छोडो....छोडो उस सफाई के काम को.....मेरे पास ऊपर की मंजिल पर मेरे ड्राईंग रूम में आओ।’’ चंद्रप्रकाश साथ में लाए साफ कपडों को पहन उद्योगपति के ड्राईंग रूम में गया। उद्योगपति ने घंटी बजाई। प्रत्युत्तर में एक महरी आ पहुँची। उद्योगपति ने उसे दो जगह चाय-नाश्ता लाने का आदेश दिया। अशोक सैन चाय सिप करते चंद्रप्रकाश से बोले ‘‘मेरी एक बडी कंस्ट्रक्शन कंपनी है। यह कंपनी बडे-बडे संस्थानों, सरकारी कामों का ठेका लेती है। इन कार्यों की देखभाल करने के लिए मुझे एक सीनियर इंजीनियर की जरूरत है। क्या आप मेरी इस कंपनी के जोइन करना पसंद करेंगे?’’ हालांकि चंद्रप्रकाश के पास बहुत सी प्रतिष्ठित कंपनियों से प्लेसमेंट के लिए बहुत एस.एम.एस. आए थे। चंद्रप्रकाश ने सभी के ऑफरों को नकारते हुए अशोक सैन की ही कंपनी में काम करना फिलहाल ठीक समझा। कुछ दिनों का प्रशिक्षण लेकर चंद्रप्रकाश कंपनी में स्वतंत्र रूप से काम करने लगा। उसके सुपरवीजन में चल रहे कंपनी के बडे-बडे काम उसकी कार्यशैली, मेहनत, परिश्रम के कारण नियत तिथि से पूर्व ही पूर्ण होने लगे। उसकी ईमानदारी, नेकनीयति के कारण कपनी द्वारा किये गये कामों में सही, उचित मेटेरियल प्रयुक्त होने से कंपनी चंद्रप्रकाश के अथक परिश्रम, योग्यता, ईमानदारी के कारण प्रगति के सौपान दर सौपन चढने लगी। अशोक सैन ने अब चंद्रप्रकाश को कंपनी को मुख्य कार्यकारी इंजीनियर बना दिया था। अशोक सैन ने अब चंद्रप्रकाश पर बहुत विश्वास करने लगे थे। अब वह कभी-कभी ही कंपनी के कामकाजों पर सरसरी निगाह डालते थे। अब कंपनी का सारा प्रबंधन अशोक सैन ने चंद्रप्रकाश पर ही डाल दिया था। चंद्रप्रकाश कंपनी के कामकाजों से मिले अतिरिक्त समय में वह उस परीक्षा की भी तैयारी कर रहा था।
उस दिन पूरा का पूरा शहर धुंध-कोहरे की गिरफ्त में था। कडाके की ठंड लोगों के शरीर में सुई सी चुभ रही थी। अशोक सैन सुबह की सैर कर अपनी कोठी की वाटिका में घूम-घूम वहाँ मुस्कुराते-खिलते फूलों की गंध का लुफ्त ले रहे थे। तभी उन्होंने अपनी कोठी से सटे चंद्रप्रकाश के बंगले में गुलगपाडा सुना। माजरा जानने हेतु अशोक सैन अपनी कोठी के बरामदे में पडे सोफा पर बैठ चंद्रप्रकाश के यहाँ हो रही बातों को बडे गौर से सुनने लगे। उन लोगों की बातों से वे जल्दी ही ताड गए कि यह सब इलेक्ट्रिक व प्रिंट मिडियाकर्मी हैं। शायद ये अपनी कंपनी की बढती शौहरत के विषय में चंद्रप्रकाश का इंटरव्यू लेने आए हैं।
लेकिन तभी एक इलेक्ट्रिक मिडिया कर्मी को चंद्रप्रकाश से कहते उन्होंने सुना ‘‘सर! देश में आई.ए.एस. की परीक्षा में प्रथम आने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई....शुभकामनाएँ।’’
‘‘धन्यवाद.........!!’’ चंद्रप्रकाश बोला।
‘‘सर! आई.ए.एस. की परीक्षा में देश में प्रथम आने के लिए आप किसको श्रेय देते हैं?’’
‘‘इस परीक्षा में प्रथम आने का श्रेय में मेरी माँ की कडी मेहनत उनका एवं मेरे गुरूजनों का सही मार्गदर्शन, उनके आशीर्वाद को ही है।
‘‘सर अब आप इस कंपनी को छोड आई.ए.एस. का पद सुशोभित करेंगे?’’ एक प्रिण्ट मिडिया कर्मी ने चंद्रप्रकाश से पूछा। यह सुन अशोक सैन गहन सोच के जलकुण्ड में डुबने-उतरने लगे। अब मेरे उस सपनों का क्या होगा? जो उन्होंने एवं उनकी पत्नी रमा ने अभी कुछ ही दिन पहले बुने-गुथे थे। उन्हें अपने सपनों का किला ध्वस्त होता सा लगा। लेकिन तभी एक प्रिंट मिडिया कर्मी के प्रश्न का चंद्रप्रकाश द्वारा दिये गए उत्तर ने उनके सपनों को अपूर्व रूप से जगर-मगर जला दिया ‘‘ नहीं मैं इस सार्वजनिक कंपनी में ही काम करना पसंद करूँगा। मेरा ऐसा मानना है कि मैं इस कंपनी के माध्यम से स्वतंत्र, स्वच्छंद, निर्विघ* रूप से समाज, देश की बेहतर सेवा
कर सकूँगा।’’
यह सुन अशोक सैन ने सोचा कि अब अपने उस सपने को साकार करने के लिए उन्हें और समय जाया नहीं करना चाहिए। नीम अंधेरे में एल.ई.डी. की दूधिया रोशनी में चंद्रप्रकाश का बंगला नहा रहा था। एकाएक अशोक सैन तथा उनकी पत्नी को अपने यहाँ आया देख सुखिया और चंद्रप्रकाश को बेहद अचंभा हुआ। सुखिया दम्पति को देख हाथ जोड सामने आई ‘‘पधारो सेठ सा..! मेरे बडे भाग्य कि आप मेरी कुटिया पर पधारे...’’ सुखिया के इस शिष्ट एवं स्नेह सने व्यवहार ने दम्पति को मौम कर दिया। अशोक सैन प्रत्यत्तर में सुखिया से बोले ‘‘अब आप हमारे हाथ मत जोडिए। अब तो हमारें दिन है आफ हाथ जोडने के....’’ यह सुन सुखिया भौचक रह गई
‘‘यह क्या आप उल्टी गंगा बहा रहे हैं सेठ जी..... मैं तो आपकी नौकरानी.... आप मेरे
हाथ जोडेगे.....?’’
‘‘नहीं मैं उल्टी गंगा नहीं बहा रहा सुल्टी गंगा ही बहा रहा हूँ। आपको समधिन बनाने की मेरी बडी हार्दिक आकांक्षा है।’’
‘‘आप मुझे समधिन बनाएंगे?!! किस तरह....?’’ उसके चेहरे पर ढेर-ढेर अचंभे के बादल घिर आए।
‘‘मैं अपनी पुत्री आस्था का हाथ चंद्रप्रकाश को देना चाहता हूँ। चंद्रप्रकाश की तरह वह भी बडी मेधावी, कुशाग्र, तेज है। घर-गृहस्थी के कार्यों में बडी कुशल-निपुण है। उसने भी पुना युनिवर्सिटी से एम.बी.ए. में टॉप किया है... मेरी बेटी चंद्रप्रकाश को बेहद पसंद करती है।’’ और कुर्सी पर पास ही बैठे चंद्रप्रकाश की ओर उन्मुख हो उससे पूछने लगे ‘‘क्यों बेटे! आपको भी मेरी बेटी पसंद है न?’’ संकोच में आकंठ डूबे चंद्रप्रकाश ने अपनी गर्दन नीची कर ली। उसके चेहरे पर आनंद...प्रसन्नता...उल्लास की रोशनाई दिप-दिप करने लगी थी। चंद्रप्रकाश की मौन स्वीकृति समझ अशोक सैन फिर सुखिया से मुखातिब हुए ‘‘मेरी अब वृद्धावस्था आ चुकी है। आस्था के अलावा और कोई मेरी संतान है नहीं। अतः आस्था का हाथ चंद्रप्रकाश को देने के साथ-साथ आज से मैं कंपनी की बागडोर भी उसको सौंपना चाहता हूँ।’’
यह सुन सुखिया निस्सिम आनंद, उल्लास, आल्हाद की नदिया में बेतरह उफन आई थी। यद्यपि अब उसका जीवन बडे सुख-चैन, आराम, सम्पन्नता में सराबोर था। लेकिन नियति कभी उसके जीवन में ऐसा अप्रत्याशित अजूबा भी घटित करेगी, ऐसे सोच को आधार देने की उसने कभी कल्पना ही नहीं की थी। अवर्णनीय उत्साह, जोश, हर्ष आनंद, प्रसन्नता, खुशी में पगलाई सुखिया के पैर ही जमीन पर नहीं टिक पा रहे थे। ?
कृष्णा कॉलोनी, रामगंज मण्डी-३२६५१९, कोटा (राज.)
मो. ९१६६०९९२९९
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