जीवनदाता

दीनदयाल नैनपुरिया


रमेश को जब यह खबर मिलती कि फलां शख्स की मौत रक्त की कमी के कारण हो गई है तो उसकी रूह कांप उठती। कुछ पल के लिए उसका बदन ठंडा पड जाता था। कभी वह खुद से घृणा करता तो कभी कोसता था खुद को। वह अंर्तमन से कहता कि शायद मरे ही प्रयत्न में कोई कमी रह गई। मैं ही कुछ और अधिक लोगों को जागरूक कर पाता तो उनके रक्त से उस शख्स की जान बच सकती थी।
रक्तदाता के तौर पर जरूरतमंदों के लिए मददगार बनने के बाद भी रमेश का ध्येय पूरा नहीं हो पा रहा था। अनेक रक्तदान जागरूकता कार्यक्रम करने के बावजूद अस्पताल में निरंतर रक्त की कमी के कारण मरीजों की मौत हो रही थी। थैलेसीमिया के बच्चों को भी प्रतिमाह बडी मात्रा में रक्त की जरूरत पडती थी, जिसकी पूर्ति नहीं हो पा रही थी।
रमेश १८ साल का था तब से हर तीन महीने में रक्तदान करने का कर्तव्य निर्वहन कर रहा था। वह एक दिन भी ऊपर नीचे नहीं होने देता था। रक्तदान शिविर में बढचढ कर हिस्सा लने के लिए लोगों को जागरूक नागरिक बनने का पाठ पढता था। उससे मिलने वाले या जान पहचान या आस-पडोस में रहने वाला कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जिसने उसकी प्रेरणा से रक्तदान नहीं किया था। कई लोग ऐसे थे, जिन्होंने साल में दो या तीन बार रक्तदान का संकल्प लिया था और बिना किसी दबाव के खुशी-खुशी शिविर में पहुँचते थे।
कुछ लोग उसे जीवनदाता कहते थे तो कुछ चलता-फिरता ब्लड बैंक, पर उसकी सोच इससे इतर थी। उसका मानना था कि अगर वह जीवनदाता या चलता-फिरता ब्लड बैंक होता तो रक्त की कमी से कभी कोई इंसान नही मरता। रक्त की कमी का निदान तब ही हो सकता है जब ज्यादा से ज्यादा लोग रक्तदान करने के लिए आगे आए। रमेश को अपना यह उद्देश्य पूरा करना कठिन जान पडता था।
एक लम्बे अरसे बाद उसका मित्र राकेश परिवार के साथ कनाडा से भारत भ*मण पर आया था। वह जब भी रमेश से मिलता तो कहता, ‘तुम रक्तदान जैसे पागलपन कब तक करते रहोगे। मेरा कहना मानो तुम मेरे साथ मेरी कंपनी में काम करो। तुम अच्छे पढे-लिखे इंसान हो।’
रमेश ने कहा, ‘मेरा एक छोटा-सा व्यापार है उसी में मेरे परिवार का गुजारा बसर हो जाता है। बस मेरे लिए तो यही काफी है। तुम्हारी इतनी बडी कंपनी है जहाँ पर काम करने में शायद मैं खुद को असहज महसूस करूँ।’
रमेश ने बात जारी करते हुए कहा, ‘रक्तदान करना मेरा पागलपन नहीं, बल्कि इसे मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ। मैं तो तुम्हें भी करने को कहता हूँ।’
‘मैं तुम्हारे इस पागलपन में शरीक नहीं हो सकता।’
‘शायद तुम रक्तदान का महत्व ही नहीं समझ पाए।’
‘मैं समझना भी नहीं चाहता।’
‘आज हम किसी की मदद करेंगे तब ही कल कोई हमारी मदद के लिए हाथ आगे बढाएगा। इसीलिए माँ के गुजरने के बाद मैंने इसे अपना ध्येय बना लिया था। मैं नहीं चाहता कि मुझे फिर से वही दिन देखने को मिले।’
‘रमेश मुझे अफसोस है कि आंटी के निधन के दौरान मैं तुम्हारे साथ नहीं था।’ रमेश के कंधे पर हाथ रखते हुए राकेश ने कहा।
राकेश मुझे अफसोस है कि आंटी के निधन के दौरान मैं तुम्हारे साथ नहीं था।’ रमेश ने कंधे पर हाथ रखते हुए राकेश ने कहा।
राकेश की बात अभी खत्म नहीं हुई थी, ‘उस वक्त इतनी सुविधाएँ भी नहीं थीं। आज देख लो, पैसा देकर कहीं से भी रक्त लिया जा सकता है। बहुत से
ब्लड बैंक है और कई लोग तो रुपए पैसे में ही रक्तदान करते हैं।’
‘अगर ऐसा होता तो कोई भी व्यक्ति रक्त की कमी के कारण दम नहीं तोडता। मैंने खुद देखा है लोग हाथ में नोट लेकर भटकते रहते हैं। पर रक्त का एक कतरा भी उनको नसीब नहीं हो पाता है और उनके सबसे प्रिय व सबसे अजीज लोग अस्पताल में तडप-तडप कर दुनिया को अलविदा कह जाते हैं। ऐसे वक्त डॉक्टर भी खुद को लाचार सा महसूस करते हैं।’
‘शायद अब तुम मुझे अपनी बातों से भावुक करना चाहते हों। पर मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। मैं जिस काम को करने के लिए तैयार नहीं वह कभी नहीं कर सकता।’
यह कहने के बाद राकेश तो वहाँ से चला गया। पर रमेश देर तक शांत मुद्रा में बैठा रहा। अपनी माँ के पास होने पर भी उसे नहीं बचा पाने की घटना कचोटने लगी थी। देखते ही देखते वह अपने बीते कालखंड में लौट गया। जहाँ उसकी माँ अस्पताल में खून की कमी के कारण जिंदगी और मौत से लड रही थी।
उसके पिता को खून के इंतजाम के लिए दर-दर की ठोकरे खानी पडी रही थी। जहां भी मदद के लिए जाते तो सिर्फ निराशा ही हाथ लगती। उस वक्त रमेश १४ साल का ही था। यह वही वक्त था, जब राकेश अपने माता-पिता के साथ कनाडा में जाकर बस गया था और रमेश अपनी जिंदगी के सबसे मुश्किल हालात से लड रहा था। उसके पिता की जब भी किसी डॉक्टर पर नजर पडती तो वह उसकी तरफ लपक पडते और खून का इंतजाम कराने की विनती करते। रक्तदाता के इंतजार में उनकी आँखे पथरा गई थीं। उसके पिता हालात से लडते-लडते हार मान चुके थे।
डॉक्टरों का एक ही जवाब था कि ब्लड बैंक में उस समूह का रक्त नहीं है, जिसकी उनको जरूरत है। कई लोगों से रक्तदान करने के लिए मिन्नतें की, पर कोई भी आगे नहीं आया। किसी ने देना चाहा तो उसका रक्त उस गु*प से नहीं मिल पाता था। माँ अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थीं। वह टकटकी लगाकर रमेश को ताकती रहती थीं। उसकी हालात दिनोंदिन बिगडती जा रही थी। डॉक्टर उसकी माँ का चैकअप करने के बाद भर्ती कक्ष से बाहर निकल ही रहे थे कि रमेश ने डॉक्टर का हाथ पकड कर कहा, ‘डॉक्टर साहब आप मेरा खून लेकर मेरी माँ के चढा दीजिए, मगर मेरी माँ की जान
बचा लीजिए।’
मगर तुम तो अभी बच्चे हो। हम तुम्हारा खून कैसे ले सकते हैं। देख, हम उनकी जान बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। बाकी सब ईश्वर की मर्जी पर निर्भर है।’ यह कहने के बाद डॉक्टर उसका हाथ छुडाकर वहाँ से चला गया।
रमेश निराश हो गया और माँ के बेड की तरफ आकर बैठ गया। उसने कहा, ‘माँ मैं कैसा बेटा हूँ, जो तुम्हारे के लिए कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ।’
वह बेटे की तरफ निशब्द होकर अपलक देख रही थी। अपने दोनों हाथ फैलाकर उसे और नजदीक आने को कहा। वह बेटे के माथे के चूमकर बोली, ‘तुम मेरे लिए दुखी मत ह। यह साँस कभी न कभी तो थमनी ही है।’
‘नहीं माँ ऐसा मत कहो। मैं किसके सहारे जीऊँगा।’
‘तुम्हें अब किसी के सहारे की नहीं, बल्कि दूसरों का सहारा बनने की जरूरत है।’
‘माँ तुम क्या कह रही हो। मैं कुछ समझ नहीं
पा रहा।’
‘जरा देखो इस अस्पताल में। क्या सिर्फ मैं ही अकेली हूँ, जो मौत से लड रही हूँ। वादा करो कि तुम ऐसे ही लोगों की जिंदगी में दुबारा उजियारा फैलाओगे।’
यह कहते-कहते उसकी तबीयत बिगडते लगी। डॉक्टरों ने उसे बचाने की लाख कोशिश की, पर नाकाम रहे। रमेश को लग रहा था कि माँ अभी आँखे खोलकर उसको पुकारेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रमेश चीखा-पुकारा, बदहवास हो गया मगर उसकी माँ मौत के आगोश में समां गई थी।
माँ की लाश के हाथ रखकर उसने एक प्रण लिया कि बडा होने पर रक्तदान कर किसी भी बच्चे की माँ को उनसे जुदा नहीं होने दूँगा। मेरा जीवन दूसरों की जिंदगी को बचाने के लिए समर्पित कर दूँगा।
माँ की मौत के कुछ साल बाद युवावस्था में प्रवेश करने के साथ ही उसका रक्तदान करने का कारवां शुरू हो गया। जो पिता कल तक कंधों पर बैठाकर चला करते थे, उनका भी वह संबल बन गया था। रमेश बीवी बच्चों वाला होने के बाद भी नकी की राह पर चल रहा था उसके बच्चे भी प्रेरित हो रहे थे और दूसरे लोगों भी सीख दे रहा था। लेाग उसकी बातों को आत्मसात कर उसका साथ देने लगे थे। तब ही रमेश को सरसरी महसूस हुई और वह अतीत से लौट आया।
गर्दन ऊपर उठाकर देखा तो उसके पिता उसे कंबल ओढा रहे थे। इतनी सर्दी में बाहर बैठकर किस सोच में डुबे हो बेटा।
राकेश का भारत भ्रमण पूरा होने वाला था। इस बार रमेश राकेश को एक बढिया तोहफा देकर विदा करना चाहता था। अब तक राकेश ही उसे महंगी भेंट देकर जाता रहा था, पर रमेश इस बार नहीं चूकना चाहता था। तब ही उसको राकेश के बेटे की सडक हादसे में घायल होने का समाचार मिला। जैसे किसी ने उसे धक्का देकर खाई में धकेल दिया। रमेश तडप उठा।
राकेश के बेटे का काफी खून बहने के कारण उसकी हालत बेहद नाजूक बनी हुई है। ब्लड बैंक का खून पहले ही थैलेसीमिया के बच्चों के काम आ गया था। डॉक्टर ने ब्लड आने तक इंतजार करने का दिलासा दिया था। राकेश पागलों सी सूरत बनाकर इधर-उधर भागता फिर रहा था। रमश के वहाँ पहुँचने पर राकेश उसके सामने बिफर पडा वह बेटे को बचाने की दुहाई दे रहा था। डॉक्टर राकेश का खून लेने से मनाकर चुके थे। क्योंकि उसका ब्लड ग्रुप अलग था, परंतु रमेश और राकेश के बेटे का ब्लड ग्रुप मिल गया था। इससे ऑपरेशन के बाद उसकी जान बच गई। एक क्षण के लिए उसका यह रक्तदान किसी कीमती वस्तु से भी बडा तोहफा है।
राकेश को आज रमेश की कही हुई बात एक इबारत लग रही थी। वह सोच में डूबा था कि अगर उसका दोस्त रमेश नहीं होता तो वह अपने बेटे को खो देता। उसने रमेश से माफी मांगी और कहा, ‘मैं यह भूल गया था रुपए पैसों से विलासिता की चीजे जरूर खरीदी जा सकती हैं, परन्तु किसी की जिंदगी नहीं। तुम सचमुच मेरे लिए देवता बनकर आए हो।’
‘मुझे इतना बडा दर्जा मत दो।’
‘आज महसूस हुआ है कि तुम्हें लोग जीवनदाता क्यूँ कहते हैं।’
तब ही अस्पताल में एक व्यक्ति चीखता-पुकारता हुआ दाखिल हुआ। उसकी बेटी खून से लथपथ हो रही थी। उसे सीधे आईसीयू की तरफ ले जाया गया और पिता वहीं बदहवास स्थिति में आईसीयू के बाहर फर्श पर बैठ गया। राकेश वहाँ से जाने लगा तो रमेश ने कहा, कहाँ जा रहे हो।
राकेश ने कहा, मैं रक्तदान करने ब्लड बैंक जा रहा हूँ। शायद मेरा भी रक्त किसी के काम आ जाए।
उस क्षण रमेश के चेहरे पर अजब सी
चमक थी। ?
२७११, चौकडी तोपखाना, हजूरी कोठी, कोलियान छावनी वालों का टीबा, जयपुर-३०२००३ (राज.), मो. ०९५०९२७३८६१
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