आम आदमी का अधिकार

अरनी रॉबर्ट्स


किसना को जब से मालूम हुआ था कि अब किसी भी स्कूल में बच्चों का एडमिशन कराया जा सकता है तो उसने ठान लिया था कि वह भी अपने बेटे सुनील को प्राइवेट स्कूल में पढाएगा। जब भी लडके-लडकियों को स्कूल यूनिफार्म में पीठ पर आकर्षक बस्ते उठाए, हाथ में वाटर-बॉटल लिए, चमचमाते काले शू*ा और व्हाइट साँक्स में हँसते-खिलखिलाते हुए जब देखता तो अप्रत्यक्ष रूप से उसे अपना सुनील दिखाई देता। उसका एक सपना था कि उसका चार वर्षीय पुत्र ऐसी स्कूल यूनिफॉर्म पहने और स्कूल बस से उतरकर दौडता हुआ घर में घुसे और माँ से लिपट जाए। पर जब उसकी तन्द्रा टूटती तो उसे लगता यह महज एक सपना है जो शायद कभी पूरा न हो। उसके जैसे मेसन के लिए जिसकी आय इतनी ही है परिवार का भरण-पोषण ठीक से हो जाता है और इस मंहगाई के जमाने में कुछ बचाना तो असम्भव है। वैसे भी मकान बनाने वाले उस जैसे मिस्त्री को वर्षा के तीन-चार महीनों में कामों में इतना ही मिल पाता है कि दो वक्त की रोटी मिल जाती है। क्या पता अपने बेटे को अच्छे स्कूल में पढाने और अच्छी शिक्षा दिलवाने का उसका सपना कभी पूरा हो जाएगा या नहीं। उसकी पत्नी आरती तो उसी के समान सोचती है कि सुनील खूब पढे-लिखे और अफसर बने या फिर डॉक्टर या इंजिीनियर।
उस दिन आरती को बुखार हो गया था तब वह उसे निकट के सरकारी हॉस्पिटल में ले गया था। यद्यपि डॉक्टर को दिखाने में उसे आधा घंटा तो लग गया, परन्तु डॉक्टर ने अच्छी तरह देखा और दवाइयाँ लिख दीं। डॉक्टर जब उसकी जाँच कर रहा था तब उसके मन में विचार आया कि कितना अच्छा हो खूब अच्छी पढाई करके उसका बेटा सुनील भी एक दिन ऐसे ही डॉक्टर बने और दीन-दुःखियों की सेवा करे। यह डॉक्टर कितना अच्छा है। कितने अच्छे से बात करता है। आधा म*ार् तो डॉक्टर की मधुर वाणी से ही ठीक हो जाता है।
किसना जब लाइन में लगकर दवा लेकर आया, तब वह इन्हीं विचारों में खोयी थी।
‘‘क्या सोच रही हो?’’
यही कि डॉक्टर की नौकरी कितनी अच्छी होती है। कितने बीमार इनके दवा लिखने से ठीक होते हैं। कितने आशीर्वाद मिलते होंगे इन्हें। क्या हमारा सुनील भी एक दिन ऐसा ही डॉक्टर नहीं बन सकता!’’
‘‘अरे बावली, इसके लिए बहुत पढाई करनी होती है, और सुना पैसा भी बहुत लगता है। हम लोग सपने देख सकते हैं उन्हें पूरा होते नहीं देख सकते। फिर भी हम तो कोशिश करेंगे कि उसे अच्छा-पढा लिखा सकें, कुछ काबिल बन सकें।’’
आरती ने हामी भरी थी, इससे ज्यादा वह
क्या बोलती।
कुछ दिन बीते होंगे कि बाजार में किसना को उसका मित्र गुलाब सिंह मिला। वह भी उसके समान घर बनाने वाले मिस्त्री का काम करता था।
पूछा किसना ने, ‘‘कहाँ से आ रहे हो गुलाब? क्या आज काम की छुट्टी रखी है?’’
‘‘ना भइया ऐसी बात नहीं है। हम एक घंटा देर से काम पर जाएंगे। बात यह है कि हम अपने बिटवा को स्कूल में प्रवेश दिलाने ले गए थे।’’
‘‘कौन से स्कूल में दाखिला करवाया है उसका?’’
‘‘अरे क्या नाम है उस स्कूल का...अच्छा सा नाम है...हाँ नवजीवन स्कूल जहाँ लडके-लडकियाँ बढिया ड्रेस में गले में टाई लगाए, चमचमाते जूते पहने और बढिया बैग लिए स्कूल जाते है... और पटर पटर अंग्रेजी बोलते है।’’ अरे वाह! यह बात तुमने अच्छी बताई। पर फीस नहीं चुकानी पडेगी, और सुनो अब कोई स्कूल गरीब बच्चों को दाखिला देने से मना मना नहीं कर सकता। ऐसा नियम बन गया है।’’
‘‘क्या कह रहे हो गुलाब?’’ किसना ने आश्चर्य से कहा।
‘‘अरे ठीक कह रहा हूँ....सरकार ने सभी स्कूलों को आदेश दिया है कि गरीब बच्चों को भी किसी भी स्कूल को दाखिला मिलेगा। कोई बच्चा बगैर पढे नहीं रहेगा। पढना उसका अधिकार है। वो हमारे मोहल्ले के राधेश्याम पटवारी बता रहे थे पढाई सब बच्चों का हक है जिस स्कूल में वह चाहे पढ सकता है। इसलिए भइया हम तो अपने बेटे विष्णु को नवजीवन स्कूल में दाखिला दिला आए हैं हमारे घर के आगे एक किलोमीटर दूर ही तो है वह स्कूल। पढ लिखकर साहब बनेगा तो हमारी तरह मजदूरी तो नहीं करनी पडेगी।’’
गुलाब सिंह से यह बातचीत होने के दूसरे ही दिन किसना अपने इलाके के समीप के स्कूल फुलवारी स्कूल में अपने बेटे सुनील के साथ पहुँच गया। बडी सी स्कूल बिल्ंडग के प्रवेश द्वार पर वर्दी में गार्ड बैठा था। साधारण कपडों में किसना और उसके बेटे रोकते हुए उसने कहा, ‘‘अरे..अरे तुम लोग कौन हो और कहाँ जा रहे हो?
किसना उसकी रॉबीली आवाज सुनकर एक
क्षण के लिए तो सहम गया, फिर स्वयं को संयत करते हुए उसने कहा, ‘‘मैं अपने बच्चे के दाखिले के लिए आया हूँ।’’
‘‘क्या काम करते हो?’’
‘‘मैं इमारत बनाने वाला मिस्त्री हूँ।’’
गार्ड के चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान उभर आई।
‘‘अच्छा मिस्त्री हो चुनाई करने वाले। सीमेंट बजरी का काम करते हो। बडे ऊँचे सपने हैं भई तुम्हारे तो। जानते नहीं यहाँ बडे और अमीर घर के बच्चे पढते हैं-व्यापारी, बडे-बडे अफसर, और नेता लोगों के बच्चे। फीस भी भारी होती है यहाँ!’’
गार्ड की बात सुनकर सोच में पड गया किसना। सहसा उसने पूछा
‘‘अच्छा आफ बच्चे कहाँ पढते हैं?’’
‘‘यहीं इसी स्कूल में!’’
‘‘जब आफ बच्चे यहाँ पढ सकते हैं तो मेरा बच्चा क्यों नहीं पढ सकता ? आप न तो व्यापारी हैं, न अफसर और न विधायक।’’
किसना की बात सुनकर गार्ड के मुँह पर जैसे ताला लग गया।
उसने कहा, ‘‘अच्छा जाओ...सीधे बरामदे में चले जाओ.... वहाँ जो चार शिक्षक बैठे हैं वे दाखिला कमेटी के ही हैं। उन से मिल लो...।’’
‘‘धन्यवाद भइया...।’’ कहकर किसना बेटे को लेकर प्रवेश देने वाली कमेटी के पास चला गया।
जब किसना ने अपने बेटे के दाखिले की बात की तो कमेटी के प्रभारी शिक्षक ने कहा, ‘‘यहाँ तुम्हारे बेटे का दाखिला नहीं हो सकता। तुम किसी और स्कूल में कोशिश करो।’’
किसना ने कहा, ‘‘लेकिन साबजी मैंने तो सुना है कि अब कोई भी बच्चा किसी भी स्कूल में दाखिला ले सकता है। मैं चाहता हूँ कि मेरा बच्चा भी इस स्कूल
में पढे।’’
‘‘भई इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ। तुम सामने प्रिंसिपल यानि बडे मास्टरजी के कमरे में चले जाओ...अगर वे कहेंगे तो हम तुम्हारे बच्चे का दाखिला कर लेंगे।’’ टालने वाले भाव से प्रभारी ने कहा। किसना अपने बेटे को लेकर पिं*सिपल के कक्ष की ओर बढ गया।
कक्ष के बाहर बैठे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने उन्हें रोक दिया।
‘‘मैं अपने बच्चे का दाखिला करवाना चाहता हूँ इस बारे में मुझे बडे मास्टर साहब से मिलना है।’’
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने हथेली पर चूना युक्त तम्बाकू मलते हुए कहा, ‘‘देखो भइया यह काम बहुत कठिन है...अच्छे-अच्छे बडे लोग बच्चों को प्रवेश कराने के लिए ऐडी चोटी का जोर लगा देते हैं...हाँ...कुछ पैसा हमारे हाथ में रख दे तो हम कुछ कोशिश कर देंगे अपनी तरफ से...पर दाखिला हो ही जाएगा इसकी कोई गारंटी हम नहीं दे सकते।’’
उसी समय मैडम सरिता भल्ला का उधर से गुजरना हुआ। उनके कानों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नन्दू की बात पडी। गुस्से से वह बोलीं, ‘‘क्या कह रहे तुम इन से?
मैडम को देखकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। वह हाथ जोडता हुआ प्रिंसिपल कक्ष के बाहर खडा हो गया। किसना ने मैडम से कहा कि वह अपने बेटे के स्कूल में दाखिले के बारे में बडे साहब से मिलना चाहता है। मैडम सरिता ने कहा, ‘‘मैं आपको प्रिंसिपल सर से मिलवा देती हूँ। आप उन से बात कर लीजिए।’’ किसना बटे को साथ लेकर प्रिसिंपल साहब के चेम्बर में आ गया। वे फोन पर किसी से बात कर रहे थे। फोन पर उनकी बात खतम हुई तो किसना ने हाथ जोडकर उन्हें नमस्कार किया।
‘‘ये आप से कुछ बात करना चाहते हैं अपने बच्चे के एडमिशन के बारे में।’’- यह कहकर मैडम वहाँ से चली गईं।
‘‘श्रीमान मेरी बडी इच्छा है कि मेरा बच्चा आफ स्कूल में पढे। चार वर्ष की उम्र है इसकी...। इसे गिनती-जोड-बाकी थोडा बहुत आता है। होशियार है यह बहुत। अगर आपकी किरपा (कृपा) हो जाए तो इसका भविष्य बन जाएगा।’’
प्रिंसिपल सर ने उकताए भाव से किसना और सुनील की ओर देखा और बोले, ‘‘वो सब ठीक है कि तुम्हारा बेटा बहुत कुछ जानता है। पर तुम देख रहे हो यहाँ का माहौल? क्या इन बडे घर के बच्चों के साथ इसकी पटरी बैठ जाएगी? क्या तुम इसे कोचिंग के लिए भेज सकोगे? मुझे नहीं लगता कि यह सब हो पाएगा।’’
‘‘श्रीमान् बच्चे तो सब आपस में घुलमिल जाते हैं उनमें भेदभाव, उच्च नीच की भावना नहीं होती है। ऐसा तो बडे लोग करते हैं। कुचिंग (कोचिंग) भी करवा लूँगा साहब। मैं और मेहनत करूँ गा तो कुछ और पैसा हाथ में आएगा...बस आप इसे दाखिला दे दीजिए।’’
किसना ने प्रिंसिपल सर से बहुत मन्नतें की लेकिन इसका कोई असर उन पर नहीं हुआ। ऊ ब कर वे बोले, ‘‘अब तुम जा सकते हो।’’
किसना निराश होकर प्रिंसिपल कक्ष से बाहर आ गया। बहुत से बच्चे अपने माता-पिता के साथ आए हुए थे। बच्चे एक दूसरे के पीछे भाग दौड रहे थे। किसना यह सब देखकर सोचने लगा ‘क्या उसका बेटा कभी ऐसे स्कूल में इस तरह हँसते-खिलखिलाते हुए भागदौड कर पाएगा? क्या वह कभी इस तरह की स्कूल की वरदी में आ पाएगा?’
अभी वह बाहर की ओर जा ही रहा था कि वह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो पिं*सिपल कक्ष के बाहर मिला था आकर पूछने लगा, ‘‘क्या हुआ भइया...हो गया तुम्हारे लाडले का दाखिला?’’
‘‘नहीं हुआ भइया।’’ मुँह लटका कर किसना बोला।
‘‘होगा भी नहीं...मैंने कहा था न यहां बडे घर के बच्चों को ही प्रवेश मिलता है। पिछले दरवाजे से हम भी दाखिला दिलवा सकते हैं।’’
‘‘पिछला दरवाजा यानि? किसना ने समझ में न आने वाले भाव से पूछा।
‘‘अरे तुम बुद्धू हो यार...मैंने कहा था न कि कुछ पैसा मेरे हाथ में रखो-मैं कोशिश करूँगा...पर केवल कोशिश...कोई गारंटी नहीं।’’
किसना को यह सुनकर गुस्सा आ गया।
‘‘अच्छा तो तुम मुझसे रिश्वत माँग रहे हो। जानते नहीं रिश्वत लेना और देना दोनों जुर्म है। भगवान का धन्यवाद करो कि इतने बडे स्कूल में तुम्हे नौकरी मिली हुई है। तुम से तो हम ही अच्छे हैं जो मेहनत-मजदूरी करते हैं और जो कमाते हैं उसमें संतोष करते हैं। मेरे बेटे का दाखिला हो न हो...मैं तुम जैसे लोगों को रिश्वत
नहीं दूंगा।’’
किसना की फटकार सुनकर उस व्यक्ति ने बुरा सा मुँह बनाया और वहाँ से चलता बना।
स्कूल परिसर से निकलकर वे लोग पैदल ओमबाग चौराहे तक आए और बस की प्रतीक्षा करने लगे। हल्की सी सरदी तो थी ही क्योंकि पिछली रात अच्छी बरसात हुई थी, पर बेबसी और निराशा के कारण किसना के पसीने छूट रहे थे।
तभी उसे काफी भीड आगे विनोदनगर चौराहे की ओर दिखाई दी। कई लोग तेजी से उस ओर बढ रहे थे। किसना ने किसी व्यक्ति से इसका कारण जानना चाहा तो उसने बताया कि उस शहर की समस्याओं के निवारण हेतु उस क्षेत्र के सांसद विधायक व जिला कलेक्टर व अन्य अधिकारी शिविर में आए हुए हैं।
यह सुनते ही किसना के मन में विचार आया कि क्यों न वह अपने बेटे के लिए उन बडे लोगों से अरज करे। कुछ संकोच सा भी हुआ कि पता नहीं वे इस बारे में उसकी बात सुनें या न सुनें। खैर जो भी हो देखा जाएगा यह सोचकर वह शिविर की आरे बढ गया।
साहब लोग ‘समस्या निदान शिविर में पहुँच चुके थे और लोग अपनी समस्याएँ उनके सामने रख रहे थे।
भीड तो बहुत थी पर जैसे-तैसे किसना सुनील का हाथ पकडकर उन लोगों तक पहुँच ही गया, ठीक सांसद महोदय के सामने। उसने हाथ जोडकर उन्हें नमस्कार किया। ‘‘क्या बात है क्या कहना चाहते हो?’’ सांसद महोदय ने आत्मीयता से पूछा।
‘‘श्रीमान् मैं फुलवादी स्कूल में अपने बच्चे का दाखिला करवाने के लिए गया था...पर वहाँ किसी ने मुझ गरीब की नहीं सुनी, बल्कि यह कहा गया कि मुझ जैसे महान बनाने वाले कारीगर के बच्चे का दाखिला वहाँ नहीं हो सकता, वहाँ केवल बडे घर के बच्चे ही पढ
सकते हैं।’’
सांसद जी ने बहुत ध्यानपूर्वक किसना की बात सुनी और बोले ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’
‘‘जी हजूर...किसना?’’
‘‘देखो किसना शिक्षा की नई नीति के अनुसार हर बच्चे को शिक्षा पाने का अधिकार है...और इसके तहत हर स्कूल में दाखिले कम आय वाले लोगों के बच्चों के लिए सुरक्षित हैं। अगर वहाँ तुम्हारे बच्चे के दाखिले के लिए मना कर दिया गया है तो यह गलत है।’’- यह कहकर उन्होने साथ बैठे अधिकारियों को आदेश दिया कि वे सम्बंधित स्कूल के प्रिंसिपल को फोन करें और हिदायत दें कि कोई कम आय वाला व्यक्ति अपने बच्चे के एडिमिशन के लिए आता है तो उसे एडमिशन दें।’’
शिक्षा अधिकारी ने प्रिंसिपल को फोन लगाया।
‘‘यस सर...मैं फुलवारी स्कूल का प्रिंसिपल अनिरूद्ध गुप्ता बोल रहा हूँ। आदेश करिए श्रीमान्!’’
‘‘ऐसा है गुप्ता जी...सांसद महोदय जो इस शिविर में हैं वे जानना चाहते हैं कि एक मेसन आज अपने बच्चे को लेकर एडमिशन के लिए आया था...आपने उसे एडमिशन क्यों नहीं दिया? क्या आपको शिक्षा की नई नीति के बारे में बताना होगा! आफ पास फिर उस व्यक्ति जिसका नाम किसना है भेजा जा रहा है उसके बच्चे का एडमिशन कर सूचित करें।’’
‘‘हो जाएगा श्रीमान्...आय एम वैरी सॉरी सर...आगे से ऐसा नहीं होगा।’’
सांसद महोदय किसना से कहा, ‘‘जाओ किसना अब तुम्हारे बेटे का दाखिला हो जाएगा। फीस, पुस्तकें, यूनिफार्म किसी चीज के लिए भी तुम्हे खर्चा नहीं करना पडेगा।’’ यह कहकर उन्होने सुनील को अपने पास बुलाया और उसके सर पर हाथ रखके कहा, ‘‘बेटा खूब पढो, लिखो और अपने परिवार और देश का नाम रोशन करो।’’
सुनील ने झुक कर उनके पाँव छुए।
जब किसना बेटे के साथ शिविर से बाहर निकला तो खुशी के मारे उसके पाँव जमीन पर नहीं पड रहे थे। उसे लग रहा था जैसे मुँह मांगी मुराद पूरी हो गई हो।?
पोस्ट ऑफिस रोड भीमगंजमण्डी, कोटा-३२४००२ (राज.)
मो. ९४१४९३९८५०
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