दो कविताएँ

बंशीलाल दर्जी


ये सपने
ये सपने भी गायब के होते हैं
रात को थका-हारा,
विचारों के स्नेहिल-निर्झरों में गोते लगाता,
भय, कुण्ठाओं और खोखली परम्पराओं की पाताल-जडों से
छुटकारा पाने, खुद को बचाने की जद्दोजहद में
आखिरकार डूब ही जाता हूँ मायावी सागर में।
फिर देखो...बिना हड्डी-पूँछ के सपने
बिना माथे का आदमी, अथक रास्ते
कल्पनाएँ, बिम्ब, फैंटसी, वगैरह-वगैरह
मुझे क्या पता, स्वप* इतना उन्मादक होगा?
और सोचूं भी क्यो?
जिसकी तकदीर ही खुदा के चौखट गिरवी पडी हो
जिसका बचपन भयंकर काल का त्रास बना हो
और यौवन चतुर्दिक अगि*ज्वाला-दग्ध हो,
गर्दन और रीढ की हड्डी
पैरों तले रगडी, रौंदी और मसली गयी हो
भला वो भी सपनें देख सकता है क्या?
सपनों के लिए सुनहरी नींद
और नींद के लिए भरपेट भोजन चाहिए...खैर
चिरनिद्रा में देखता हूँ कि छुक-छुक रून-झुन करती
तेज गति से दौडी आ रही एक बुलेट ट्रेन
किसी चिरपरिचित चेहरे का पदार्पण
अनुपम बसंत श्री शोभा, मदमाती मुस्कान
मोरपंखी, परिधान, मधुमासी चपलता
गुलाबी सरहद से ढके मखमली होंठ
मानों कि संकेत कर रहे हो
मुझे बुला रहे हो
मुझसे बतियाने, रीझने-खीझने
अश्रुबिन्दुओं से तृण-तुण को भिगोने
जैसे कि आश्रय ढूँढने को आतुर हो!
सारा ही दृश्य मादक, मनोहर, मदमस्त था
और मैं भी उन्मुक्त.....फिर क्या था
चिरसंचित स्वप* भंग, वही टरटराती खटिया,
वही सिलवटों भरा बिस्तर
और दशकों से संघर्षरत मेरा तकिया। ?
करवा चौथ
जरा मेरी भी सुन लो ओ चाँद!
पृथ्वीलोक में भले ही वैश्वीकरण का दौर हो,
उत्तरआधुनिकता और प्रतिस्पर्द्धा
चरमोत्कर्ष अवस्था में हो
पर अपनी न*ार
मायावी सौन्दर्य में मत भटकाना।
इत्र, पसीने से लथपथाते मुखमंडल में
चमकीली साडी, आपादमस्तक आभूषणों में
भारी भरकम मंगलहारों और
खनखनाते कंगनों में मत खो जाना
हो सके तो उन्हें भी नजरअन्दाज करना
जो पति-परमेश्वर को तेरे ही साथ
छलनी से झांकने के लिए,
अपने प्राणवल्लभों को रिझाने के लिए,
सवेरे से ही करवाचौथ कार्यक्रम को
अन्तिम रूप देने में व्यस्त हो
फल, दूध और फलाहारी खा-पीकर
सतीत्व निभा रही तथाकथित मंगलामुखी
मंगलाचारी शक्तियों को भी छोड ही देना ओ चाँद।
हो सके तो, अगर हो सके तो
अपनी मृदुल शीतलता उस देवी तक पहुँचना
जिसका सिंदूर कुछ दिनों पहले ही
सरहद की हिफाजत में उजड गया
जिस देवी के देवपुरुष ने
हँसते-हँसते उत्सर्ग किए मातृभूमि रक्षार्थ निज प्राण
और उसी जांबाज की बदौलत
मकान की छत, माँ का लाल, नारी का सुहाग जिन्दा है
गर मरी है तो इन्सान की इन्सानियत
इन्सान का स्वाभिमान और भी बहुत कुछ
पर तुम मत भटकना चाँद। ?
राजकीय महाविद्यालय, जालौर (राज.)
मो. ९५८७१२१८३३
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