छह कविताएँ

पूनम पाण्डे



मेरा मन भी
वहीं रहता है
जब तुम
अपने मन में
कुछ बतिया
रहे होते हो
मेरे कान
सब सुन रहे
होते हैं
जब तुम
कुछ कह
नहीं पाते मगर
कहना चाहते हो
वहीं पर स्पर्श
कर ही लेती हूँ
तुम्हारे हृदय की
सबसे शरमीली
धडकन को भी।
तुम्हारी दिनचर्या
के साथ ही
दौडती है
मेरी कल्पना
और अपने
अन्तरयामी होने
का आभास
होने लगता है। ?

मन तो आत्मा का
श्वेत प्रकाश है।
और यही उजाला
शनैः शनैः एक
व्यक्तित्व से दूसरे
व्यक्तित्व को
रोशन करता जाता है।
मन की कल्पना
कोई झूठ नहीं होती
मन अपनी एक
कल्पना के सहारे
दूसरी कल्पना की
नींव तैयार करता है।
इस तरह मन
अपने अधूरेपन को
पूरा करता है लेकिन
फिर किसी पूर्णता की
तरफ बढ जाता है!
मन के आँगन में
फूल खिलते हैं
संगीत बजता है
पंख लगाकर पंछी उडते है
सागर ठाठें मारता है।
मन के पास अपनी
लय, छंद और ताल है। ?

बादल
जब तुम
सूरज से मिलो या
बतियाओ
तो, एक बात याद रखना
धरती का
हाल-चाल
भी बताना
आजकल
वो किसी
न किसी
उथल-पुथल
में उलझी
कभी-कभार
मौसम से
सामंजस्य करती
कभी मौसम
के तेवर पर
चौंकती
दिखायी दे जाती है।
सूरज से कहना
कभी-कभी
उसका काला क्रोध
धरती को
बुखार भी दे जाता है।
सूरज से मिलो
तो धरती का हाल कहना। ?

हवा, तुम दुलार रही हो
जंगलों को बादलों को
तुम्हारे प्यार से ही
पर्वत सज उठता है
हरियाली से।
किलक उठते हैं तालाब
इठलाती है मछलियाँ
बादलों को भी अच्छा नये-नये
रंग बदलना अच्छा लगता है
मौसम भी खुद को
परिभाषित कर पाते हैं
हवा, तुम यों ही
दुलारती रहा करों।
सारी बस्ती में
मुस्कुराहट पनपने
लगती है
जब तुम्हारे लहकने से
वातावरण बना रहता है
जीवन्त रस मय
तुम ही हो
धडकनों को
देती हो शरीर
तुम्हारा होना बहुत
अर्थपूर्ण है। ?

जी भरकर सबसे घुली मिली
फिर जिन्दगी से मुलाकात कर ली।
सबकी पसंद नापसंद को समझा
इस तरह खुद से बात कर ली
किसी की छोटी सी
जरूरत पूरी करके
मानो अपने लिए कोई सौगात कर ली।
किसी की खुशी में शामिल होकर
जन्नत अपनी कायनात कर ली।
अनुभूतियों के पन्नों में रंग भरना था
इसलिए एकान्त की दवात भर ली।
बेपरवाह मन
पक्षियों का कलरव और प्रकृति
अलमस्ती के पलों में संग
यह बारात कर ली। ?

मन की किताब में
जब झांका
एक पन्ना हिला
आंका-बांका
थोडा सा खुशियों
वाला अनुवाद
ऐसी ही लगती हमें याद
किस्सों का डेरा लगा हुआ
लम्हों का फेरा लगा हुआ
यादों का कैलेण्डर हिलता
उसमें तरीखों से मिलता
कभी टीस का भी आभास
कभी जुगनुओं सी कौंधे है।
बैचेनी को भी बाँधे है।
धडकन करती है संवाद
कभी पलट आती कोई बात
अतीत का बहीखाता इसके पास। ?
दुर्गेश, पुष्कर रोड, कोटडी, अजमेर-३०५००४ (राज.)
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