दो कविताएँ

राजेन्द्र निशेश


समय के साथ
समय के साथ
बहुत कुछ पीछे छूट जाता है
या कुछ रह जाता है
जिसे छूटना होता है अन्तराल में!
छले और खरीदे जाते हैं पल
कुछ सत्ता के दलालों द्वारा,
सिद्धान्तों और ईमानदारी के खोखलेपन का
इतिहास लिखते हुए,
लोकतन्त्र की टेढी चाल
आतंक और भय की स्थितिय को
नहीं पढ पाती
या पढना नहीं चाहती।
क्या समय को लौट आना होता है पुनः
जहाँ से चला था
और छूट गया था अतीत बनकर! ?
कंकरीट का जंगल
गहन कंकरीट के जंगल में
तब्दील हो गया है मेरा शहर
हवा इतनी बोझिल
कि स्वयं सांस लेने में असमर्थ
थके-हारे मौसम में
नहीं है अब कोई उत्तेजना
न किसी सम्बोधन का वीत-राग।
दिन-रात सडके बहती हैं
किसी सर्पदार धारा की तरह
किसी रेगिस्तान का मंजर दिखलाती हुई,
अंधेरा खोजता है पलट-पलट कर
खोये हुए जुगनूओं का झुंड,
कोयल, तोता, चिडिया को
ढूँढती हैं ठूंठ वृक्षों की टहनियाँ।
अजनबियत का लबादा ओढे
मिलता है हर शख्स एक दूसरे को
अपनी ही दुनियाँ में खोया हुआ
अनजान कि कभी यहाँ पर भी
बहती थी एक फूलों वाली नदी। ?
सेक्टर-४०-सी, चंडीगढ-१६००३६ मो. ९४१७१०८६३२
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