चार कविताये

बी.एल. माली ‘अशांत”


जल धरती
जल धरती के भीतर है।
धरती के पेट से हुआ है जल प्रजनन
धरती जल की जननी है-माँ
जल निर्माण-तत्त्व पिता
जल प्रजनन-पिता विज्ञान
पाताल पिता है जल का,
धरती पेट।
धरती के पेट ने संजोया है जल
भीतर से बाहर आया है जल
बाहर से ही सपने लेकर उडा है
बादलों के उनमान
सपनों से भर बरसा है जल
इन्द्र नहीं।
इन्द्र स्वंय जल का निर्माण है। ?
पूर्ण जल प्रजनन
जल से रची है धरती
संस्कृति और सभ्यताएँ
धरती पानी की रचना है।
रचना के मानिंद
पूर्ण है जल
धरती ने ही पाला है जल
अपने भीतर
उसने ही मांगा था पातालों से जल
बदले में अपने भीतर से निकाल कर दिया है
आदमी
सभ्यता और संस्कृति।
धरती ने संजोया है जल
अपने भीतर
उसी ने संजोया है जल
अपने भीतर
उसी ने दिया धरती को फल
प्रजनन-धन।
धरती प्रसूता है
आदमी की, सभ्यताओं की और संस्कृतियों की
ये धरती की संताने हैं।
जलयुक्ता है धरती
सभ्यता संस्कृति भी जलयुक्ता है,
जीवन धरती की कोख से निकला है।
वह धरती पुत्र है
धरती माँ। ?
जल साँसें
सूखी नहीं होती हैं साँसें
उनका उद्गम
जल है
धरती है।
धरती शरीर है।
धरती की साँसें
जल अनुशासन है। ?
प्रलय परिवर्तन
प्रलय की परिभाषा पढो!
सभ्यताएँ मरी नहीं हैं।
उनकी जबान दबी है।
सभ्यताओं का सच
दबा है धरती में
कल वह फिर आयेगा।
प्रलय
पूर्ण नहीं है
वह आदमी को नहीं
सभ्यताओं को मारता है।
सभ्यताएँ दब आईं
मिट्टी के नीचे
खंडहरों में
अब वे बोल नहीं सकतीं
उनके जबडे खोले नहीं गये
पुरातत्त्वविदों और भाषाविदों से।
धरती से निकली सभ्यताएँ बोलती थीं,
जल से बनीं, पली थीं
नदी घाटी सभ्यताएँ
आदमी के मानिंद। ?
३/३४३, मालवीय नगर, जयपुर-३०२०१७
मो. ९४१४३८६६४९
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