तीन कविताएँ

विवेक चतुर्वेदी


दुनिया भर के बेटों की ओर से....
एक दिन सुबह सोकर
तुम नहीं उठोगे बाबू...
बीडी न जलाओगे
खूँटी पर ही टंगा रहा जाएगा
अंगौछा....
उतार न पाओगे
देर तक सोने पर
हमको नहीं गरिआओगे
कसरत नहीं करोगे ओसारे
गाय की पूँछ ना उमेठोगे
न करोगे सानी
दूध न लगाओगे
सपरोगे नहीं बाबू
बटैया पर चंदन न लगाओगे
नहीं चाबोगे कलेवा में बासी रोटी
गुड की ढेली न मंगवाओगे
सर चढेगा सूरज
पर खेत ना जाओगे
ओधें पडे होंगे
तुम्हारे जूते बाबू....
पर उस दिन
अम्मा नहीं खिजाऐगी
जिज्जी तुम्हारी धोती
नहीं सुखाएगी
बेचने जमीन
भैया नहीं जिदियाएँगे
उस दिन किसी को भी
ना डांटोगे बाबू
जमीन पर पडे अपलक
आसमान ताकोगे
पूरे घर से समेट लोगे डेरा
बाबू तुम
दीवार पर टंगे चित्र में
रहने चले जाओगे
फिर पुकारेंगे तो हम रोज
पर कभी लौटकर ना आओगे।। ?
मिट रहा हूँ मैं
मिट रहा हूँ मैं
जैसे दिए की थरथराती लौ
समेट लेती है अपनी इयत्ता को स्वयं में
मिट रहा हूँ मैं
बाती देगी कुछ देर तलक
सुगंधित धुँए की लकीर सर्पिल
शेष रह जाएगा दिए में तेल
जैसे शेष रह जाएँगी मेरी वासनाएँ
मिट रहा हूँ मैं
अपनी बेबूझ जिजीवषा से
चढे गए शिखरों की स्मृति के साथ।
तुम इस दिए को तैरा देना किसी नदी के निर्जन घाट पर
जिसमें मैं माटी-सा रहा इतने बरस और मत रूके रहना
चील गिद्धों के महाभोज तक।
बस प्यार की अँजुली भर करना तर्पण और लौट जाना उस पार
उस घाट पर
मैं फिर मिलूँगा आऊँगा फिर
इस अलिखित आश्वासन के साथ
मिट रहा हूँ मैं।। ?
कामकाजी औरत की आँख में
टूटते खपरैल से झाँकता है नीला आसमान
वहाँ से धागा निकाल बुन रही है औरत एक कालीन
आँगन में बिछी है लाल मुरम
उससे लाल बटन बनाकर
औरत टाँक रही है बच्चे के अँगरखे में
दरकती दीवारों पर ऊग रह है जो
पीपल का पौधा
उधर से हरा रंग खींच चढा रही है औरत
लिफाफे के कागज पर
समय का चक्र सबसे
तेज गति से घूम रहा है औरत की सिलाई मशीन में
और आज का सबसे सुंदर और सजीला सपना
दिख रहा है इस कामकाजी
औरत की आँखों में।। ?
१२५४, एच.बी. महाविद्यालय के पास, विजयनगर
जबलपुर (म.प्र.), मो. ७६९७४६०७५०
++++++++++