तीन कविताएँ

डॉ. शुभदर्शन


कपास की आत्मा
किसान ने बोई कपास, सींचा
फूल उगे तो तोड
खूब धुंना
ईजाद किया पेंजा
और
उससे निकाल उसकी
आत्मा-बिनौला
करके दो हिस्सों में
कह दिया तुम आ*ााद हो
फिर शुरू हुआ
दोनों के अलग-अलग
दबाने का षडयंत्र
बिनौले की पिराई से
निकाला तेल और खल
कर दी पशुओं के हवाले
उधर रूई भी
पेंजे की जद में आकर
हुई रोआं-मर्जी से
कभी रजाई, कभी सिरहाना,
तो कभी सूत बना
कर दिया रंग-बेरंग
तरह-तरह के कपडे बुन
किसान से बुनकर
व्यापारी तक
सभी का सधा स्वार्थ
केवल कपास के मसल-कुचल
न जाने किसान, धुनकर, बुनकर
या व्यापारी
किसकी शरारत थी
कि राजनीति के कान में पहुँची
और
उसने अपना लिया ?
संघर्ष के जख्म
समुद्र से भाप बन
होश में आया बादल
पहाडों से गुजरा
तो हो गया पत्थर
रुआं-रुंआ उडता हुआ कंकरीट
बन गए बिना हल जोते
धरती में सियाड
सूरज से बन
उसी से संघर्ष में टूटा
छितरा गया
बहुत उदास थका हारा
नहीं छिपा पाया
घायल हुई संवेदना
कुछ छींटों में पिघला
और बरस कर बोला-
अब तुम यह संघर्ष छोड दो।
कैसे बताऊँ
जन्म से संघर्ष की आग में
तप रही जिन्दगी की रेत पर पडी
तुम्हारी कुछ बूंदों ने
तृप्ति नहीं
तपिश को हवा दी है
जला दी हैं
उन छपरैलों की उम्मीदें
जो
भूख की वाचालता में सहमी
कच्ची दीवारों के झरोखों को
गोबर से लीपने में असमर्थ
बटोरती रहीं साहस
अपनी मुसीबतों पर मरहम लगाने
जो जिंदगी जीने की शर्त थी
कल-कल करते चश्में के नाद से
तुम्हारी गर्जना मिल
जो संगीत पैदा करती है
वह भी कानों में
पिघले सीसे-सी उतरती रही
और कडकती बिजली में
संघर्ष के जख्म
जुगनूओं से चमकाते रहे
कूडे के डंप से
बीनते कुछ अधूरे सपने
भरी दोपहरी में
सडक पर बिछाते तारकोल
थकन में वट की जड से चिफ
उनींदे में ढूंढते रहे
माँ की गोद
उस पक्षी-सा
आँधियाँ उडा ले गईं
जिसका घोंसला और
उधेड बुन में कुछ देर बैठ
उसी शाखा पर
फिर चुनने लगा हो तिनके
हर खुशी हारने के बाद
तूफां में कैसे जलती है मशाल
कैसे जिंदा रहता है संघर्ष
समुद्र से भाप बन
होश में आया मेघ
क्या जाने ?
याद आती है लडकी
बचपन में लडती थी भूख
तो भागता था
खेत किनारे बनी
क्यारियों के बीचों बीच
बेमौसम फालसे के ठंडल चबाते
पीलू की झाडियों पर
न*ार पडते ही
टूट पडते
खट्ठा-मीठा स्वाद चखते
सब भूल जाता
अपनी सहेलियों को छोड
मरे साथ
मिट्ठ गर्म का मजा लेते
अपनी बारी पर झगडते
लडकी की हरकतों के साथ
वह लडकी अब भी आती है
मेरे सपनों में
लडती है मुझसे
हर छोटी बात पर
होता है दिमाग में विस्फोट
तो भागता हूँ
झाडियों का आराम ढूँढते
इस कंकरीट शहर में
साथ नहीं रह पाता
उस लडकी के
सडांध उठती है
उसे शरीर से गोबर की
जो
उपले थापते दीवारों पर
उसके नाखुनों
नहीं, उसकी सांसो से
घुस चुकी आत्मा तक
कभी ससुराल से प्रताडित
तंदूर में भुनते गोश्त समय
झुलसते बालों-सी
वह श्यामली, सुंदर लडकी
भूख से ज्यादा
अब याद आती है वह लडकी ?
७- फ्रेंड्ज कॉलोनी, पीछे ः सेक्रेड हार्ट स्कूल, मजीठा रोड
अमृतसर-१४३००१ मो. ०९४१७२९०५४४