चार कविताएँ

हरदान हर्ष


गाँव में औरत
लाल तारा डूब गया था
बुझ गये थे टिमटिमाते दीये
आखिर वह सो गई थी
तकिये से बतियाकर।
मुरगे कि बांग तकिया सुनता
उससे पहले ही बिस्तर समेट
ढबने लगी थी घर
रसोई की खटपट में वह
नहीं सुन पायी पंछियों का कलरव।
सूरज उगाली के उजास में
चिडिया ज्यूँ चिहुँक उठती शायद
पर, रंभाती गाय को
खिलाने, पिलाने, दुहने में वह
नहीं गा सकी अरुणोदय-गान।
घर गुवाड बुहार चूल्हा-चौका
दो रास सूरज चढते ही खेत में कलेवा
फिर, खुरपी की व्यग्र धनु...
अपनी व्यस्तताओं में वह
नहीं लडा सकी अपने नन्हें को लाड।
खटन की लम्बी परिक्रमा में
गृहस्थ के चूल्हे जलती
गीली लकडी सी धुँआती धूँ-धूँ
पनीली आँखों नहीं देख पाती वह
सांझ का मेहंदी रचा आसमान। ?
किराये की बस्ती में
सागर उदास
सूना तट
सन्नाटा चहुँ ओर
किराये की बस्ती में।
ठहरा सागर, भाटा
मुस्कराती नहीं अनमनी लहरें
लश्टम-पश्टम
अपने-अपने में खोई
कैद चौ-हद्दी में।
चिकनी चौरस सडकें
पलक पाँवडे बिछाये
पहुँचा रही भरी जेबें
थडी, हाट, बाजार...गुलजार
दिली रिश्ते तरसें
घर-आंगन को।
ग्राहकी के रिश्ते
पुख्ता करता
भरपूर सुविधाओं के साथ
तराजू थामें खडा है
इस शहर का बाजार
जीवन के राजनामचे में।
शुक्रिया!
शहर की सडकों पर
दरवाजे नहीं
दिन हो या रात
पगों लगे रास्ते
छाँया की तरह
साथ हो लेते हैं हर वक्त
सुकून की खोज में। ?
*ाहर बुझे साये
सुकून के घर
अमन-चैन के
गीत गाते चाँद पर
अब-तब पड जाती है
कुदृष्टि राहु-केतु की।
बिखरी पगडंडियों के जाल से
सिमटकर जब हम
एक राह होने लगते हैं
उठकर ऐतिहासिक खण्डहरों से
राहु-केतु दीवार बन जाते हैं
हमारे खुले आँगन।
जब धूप मुस्कुरा रही होती है
पंछी चहचहा रहे होते हैं
हवा सद्भावना को गीत गा रही होती है
तब हमारे परिवेश ये राहु-केतु
मंडराते लगते हैं गिद्ध बनकर
आतंक मचाने!
बडे मायावी हैं ये राहु-केतु
भाँति-भाँति के मुखौटे ओढ-ओढ कर
प्रकट हो जाते हैं अब तक
हमारे अमीमय जीवन को विषाक्त करने।
जब उभरने लगे हैं चारों ओर
राहु-केतु के *ाहर बुझे साये
हमारे भविष्य की गोद में अंधकार भरने
तो क्यों न मिलकर बांध दे हम
सद्भावना की बंदनवार
हर घर....हर द्वार....। ?
एकाकार बिन्दु
तनिक उचक कर देखो
विगत वीथियों में
बरसाती मौसम की तरह
बदलता रहता है तुम्हारा व्यवहार।
कभी श्रावण की पे*मझडी
कभी घृणा भरी घडी में
मैंने तुम्हें पाया है
पे*म और घृणा के बीच
किसी बिन्दु पर।
जब जब तुम्हारे सपनों में
मनोहारी छटा रही है
तब तब मैं सब कुछ भुलाकर
आकर एकाकर हो जाता हूँ
जरूरत के उस बिन्दु पर
जहाँ तुम खडी होती हो। ?
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