उत्तरार्द्ध चरित्र : महाकवि की तर्जनी

कुबेरनाथ राय


रवीन्द्रनाथ ने रामायण के बारे में एक स्थल पर लिखा है कि रामायण में सारे पराक्रम सारी उपलब्धियों के मध्य जो सत्य स्थापित होता है, वह है ‘त्याग’। प्राप्ति नहीं त्याग ही रामायण की मूल स्थापना है। पाना नहीं, खोना भी नहीं (क्योंकि खोना तो व्यक्ति की सिद्धि या उपलब्धि की प्रतिकूल अवस्था में घटित होता है), परंतु पाकर त्याग कर देना, प्राप्ति के हृदय में स्थित वैराग्य की उपलब्धि करना- यही राम के जीवन का निर्माता है। उपलब्धि के मध्य हाहाकार करता हुआ वैराग्य का शून्य ही, रामायण ही नहीं समस्त भारतीय साहित्य की केंद्रीय भावभूमि है। राज्याभिषेक की तैयारी है और उसी के मध्य त्याग अपना भिक्षापात्र लेकर राम के सम्मुख आकर अपना दायित्व मांगता है। फिर दुबारा राज्याभिषेक और फिर संवत्सर बीतते-बीतते वही निर्मम भिखारी द्वार पर हांक लगा देता है। फिर त्याग और पूर्ववर्ती त्याग से अधिक कटुतर। अंत में तीसरी बार अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर पुत्र-प्राप्ति घटित होती है, पर वहां भी सीता का पाताल-प्रवेश होता है और ‘त्याग’ अपना पावना वसूल कर लेता है। रामचंद्र के जिम्मे समस्त जीवन देना ही देना रहा; दायित्व का अविच्छिल वहन पर प्राप्ति या पावना के नाम पर महाशून्य का हाहाकार। व्यक्तिगत संदर्भ में यह ट्रेजेडी है, पर इतिहासगत संदर्भ में यही महिमा है। सुमंत्र को यह बात ज्ञात थी। दुर्वासा ऋषि ने राम के संबंध में दशरथ से बहुत पूर्व एक बात कही थी कि यह राम महान् यशस्वी और महान् अभागा होगा, इसे दुःख ही दुःख लिखा है। इसे सब कुछ को और सब कोई को, सीता-लक्ष्मण तक को त्यागना पडेगा। दशरथ के आदेश से सुमंत्र ने इस बात को गुप्त रखा था। परंतु सीता-निर्वासन के अवसर पर निर्जन वन में व्यथित लक्ष्मण को वृद्ध सुमंत्र ने यह बात यह कह बताई कि, ‘इसे भरत को शत्रुघ्न न जानने पावें।
भविष्यति दृढं रामो दुःख प्रायो विसौख्य भाक
प्राप्स्यते च महाबाहुर्विप्रयोगं प्रियैर्द्रुमम्।।११।।
त्वां चैव मैथिली चैव शत्रुघन भरतौ तथा
सत्यजिष्यति धर्मात्मा कालेन महता महान्।।१२।।
इदं त्वामि न वक्तव्यं सौमित्रे भरतेऽपिवा
राज्ञा वो व्याहृतं वाक्यं दुर्वासा यदुवाचह।।१३।।
(यह राम सौख्य रहित और प्रायः दुःख भोगने वाला ही होगा। यह धर्मात्मा और महात्मा राम बहुत-सा समय बीत जाने पर हे लक्ष्मण! तुम्हारा, सीता का और भरत का भी त्याग कर देगा। हे लक्ष्मण, राजा दशरथ के प्रश्ा* करने पर दुर्वासा मुनि ने उनसे जो कहा वह यही है, इसे तू भरत-शत्रुघ्न को मत बताना।-उत्तरकांड ५०)
इस स्थल पर मुझे स्मरण हो आता है वर्जिल के महाकाव्य ‘ईनीड’ का नायक इनिआस (*द्गठ्ठद्गड्डह्य)। ईनियास सर्वध्वसं-प्राप्त ट्रोजन जाति के अवशिष्ट चिह्नों को लेकर अपनी निर्मम नियति की यात्रा पर चल पडता है। उसकी नियति है ‘लैटिन’ नामक एक नयी जाति की स्थापना जो कालांतर में विश्व-विजयी ‘रोमन’ के नाम से विख्यात होगी। परंतु एक महान् राष्ट्र के बीजारोपण की नियति का अर्थ होता है निर्मम महिमा का वरण या आरोपण, और वह महिमान्वित शीष व्यक्तिगत दृष्टि से अभागा शीश ही कहा जाएगा। इस महान् नियति की उपलब्धि के लिए ईनिआस को एक-एक करके पत्नी, प्रेमिका और बंधुओं को खोना पडता है, सूखे काष्ठ का भक्षण करके जीना पडता है, अंधतमसाच्छन्न मृत्युलोक तक में प्रवेश करके मृतात्माओं की सलाह लेनी पडती है, महान् प्रतिद्वंद्वियों को पराजित और निहत करके उसको जो विजयश्री मिलती है उसे भोगना भी उसे बदा नहीं। लैटिनम की राजकन्या और लैटिनम प्रदेश दोनों उसे प्राप्त होते हैं और निश्चित हो जाता है कि ट्रोजनों और लैटिनों के रक्त-संयोग से जो नयी ‘रेस’ या ‘जाति’ बनेगी उसका नाम ‘लैटिन’ (रोमन) होगा। परंतु इस भूमिका को निभा देने के कुछ दिन बाद वह टाइबर नदी में डूबकर मर जाता है। ईनिआस के चरित्र में राम जैसी महानता नहीं, और न रामायण और ‘ईनीड’ के आदर्शों में ही कोई तुलना हो सकती है। राम अवतार हैं और ईनिआस मनुष्य। मेरा तात्पर्य यहां पर सिर्फ एक समानता का उल्लेख करना है जिसे पश्चिमी आलोचकों ने वर्जिलिअन ‘पिटी’ या ‘करुणा’ कहा है। इसमें करुणा या व्यथा भीतर-भीतर ‘पुटपाक प्रतीकाशः’ सुलगकर स्वयं भस्म बन जाती है और मनोभूमि में देवताओं जैसी निर्लिप्तता का प्रवेश हो जाता है। फल होता है सुख-दुःख दोनों के प्रति निरपेक्ष दृष्टि का जन्म। यह एक तरह की लोकोत्तरता है। ईनियास की इस ‘पिटी’ को समझने के लिए ‘स्तोइक’ दर्शन का सहारा लेना पडता है और दूसरी ओर राम की इस त्याग करने की क्षमता, स्वयं के प्रति इतनी निर्ममता को समझने के लिए वेदांत का आश्रय लेना पडता है। मुझे लगता है कि वर्जिल और वाल्मीकि दोनों (कम से कम मेरे लिए) एक-दूसरे को स्पष्ट करते हैं। महाभारत के युधिष्ठिर में भी उत्तरार्द्ध काल में इसी क्षमता की उपस्थिति पाई जाती है।
यदि उत्तरचरित न घटित हुआ होता तो रामकथा एक वीरगाथा (हीरोइक पोयम) बनकर रह जाती। तब राम के चरित्र का वह अंश जो भवभूति की प्रसिद्ध उक्ति ‘पुटपाकस्य प्रतीकाशः रामस्य करुणोरसः’ द्वारा व्यक्त होता है, अनभिव्यक्त रह जाता, लीला अधूरी रह जाती; और जब लीला का जन्म ही मर्यादा सहने के लिए हुआ है तो क्या ‘आह’ क्या ‘उह’, तब दुःख-वेदना-विषाद की क्या चिंता? राम में छोटा या अल्प कुछ भी नहीं। जो कुछ है यह गगनाकार, सागरोपम एवं वृहत्तम आयाम में उपस्थित है। अभय, शील, वत्सलता, रोष के साथ-साथ सहन-क्षमता भी उसी आकाशेपम आयाम में है। यह अमाप सहन-क्षमता उद्घाटित नहीं होती यदि उत्तर-चरित का काव्य किसी द्वितीय वाल्मीकि (यदि उत्तरकांड प्रक्षिप्त हों तो) और भवभूति द्वारा नहीं लिखा जाता। राम वनवास के बाद से ही आजीवन अकेले रहे। सीता के साथ उनका तादात्म्य ऐसा है कि उसमें सीता की सत्ता निष्क्रिय या व्यक्तित्वहीन रहती है अतः उनका मानसिक अकेला-पन खंडित नहीं होता और जहां पर सीता उनके साथ तादात्म्य नहीं बैठा पातीं वहां उनके लिए वे सर्वथा अगम हैं। उदाहरण के लिए, राक्षसों से अकारण रौद्रता या वैर का सीता विरोध करती हैं और वे समझ नहीं पातीं कि राम नियति के यंत्र की तरह हैं। अपनी नियमित एवं अपने दायित्व की चेतना का भयावह मानसिक भार उन्हें अकेले-अकेले झेलना है। अस्तित्व के निम*तर स्तरों पर अवश्य लक्ष्मण और सीता समव्यर्थी हैं। और संभवतः जितनी कि द्वितीय नियमित अर्थात् रामराज्य स्थापन। इस द्वितीय नियति की मात्रा में अस्तित्व के चरम और निम्नतर दोनों स्तरों पर वे अकेले पड जाते हैं, और संभवतः यही कारण है कि उस ‘जीवेम शरदः शतम्’ के युग में भी आरोपित नियति की उपलब्धि हो जाने पर कुछ दिन और रहना उन्हें पसंद नहीं, और ७२वें वर्ष में वे लीला-संवरण कर लेते हैं। उत्तर चरित के साढे तीन वर्षों का यह लोकारण्य अधिक निःसंग, अधिक ममताहीन और अधिक वसूलने वाला सिद्ध होता है। यह कोलाहलयुक्त लोकारण्य उन्हें निविड अकेलेपन में फेंक कर ही शांत नहीं हो जाता है। निविड अकेलेपन से जूझा जा सकता है। पर उससे भी गहरी ट्रेजडी घटित होती है लोक व्यवस्था की लौह-उंगलियां उनके व्यक्तित्व को निरंतर चपटा करती रहती हैं और पूर्वार्द्ध का ‘रामत्व’ यत्र-तत्र विकृत भी होता जाता है। यदि शम्बूक-प्रसंग को उनके जीवन-चरित में प्रक्षिप्त न माना जाए (मैं तो इसे असल रामकथा पर अनुस्मृति की कलम बांधना भर मानता हूं।) तो मैं कहूंगा कि यह उस रामत्व की ट्रेजेडी है जिसने शबरी के जूठे बेरों को खाया था और निषाद को पावन किया था।
तुलसीदास और राममनोहर लोहिया की तरह मेरा भी विश्वास है कि शम्बूक उपाख्यान ‘असल’ खांटी रामकथा का अंश नहीं, कर्मकांडी संप्रदायवाद तथा मनुस्मृति की कलम काटकर इस रामकथा की पवित्र शाखा में शाप की तरह इसे बांधा है किसी द्वितीय वाल्मीकि ने; और कम से कम छः चिलम गांजा पीकर तो बांधा ही है अन्यथा उस ब्राह्मण कुमार को जो शम्बूक की तपस्या के कारण मरता है, ‘पांच सहस्त्र वर्षों का’ अप्राप्त यौवन किशोर नहीं लिखा गया होता। ‘‘अप्राप्त यौवनं बालं पंच वर्ष सहस्त्रकम्। अकाले कालमापन्नं मम दुःखायपुत्रक।’’
(उत्तर, ७३-५) मेरी दृढ धारणा है कि आदि वाल्मीकि एवं श्रीमद् रामानुजाचार्य के बाद रामकथा के असली मर्म एवं असल ‘जेनुइन’ रूप को पहचानने वाला तुलसीदास से बढ कर और कोई नहीं हुआ है। उन्होंने शम्बूक उपाख्यान को संभवतः शास्त्रीयता के काले बाजार में बिकने वाला मिलावट का माल मानकर ही अस्वीकृत कर दिया है। क्योंकि शम्बूक-उपाख्यान को रामकथा का ‘असल’ अंश मान लेने पर वे सारे दावे खंडित हो जाते हैं जिनके आधार पर आज राम को साक्षात् विग्रहवान धर्म मानकर हम प्रतिष्ठित कर चुके हैं। यह शम्बूक-प्रसंग वैष्णव वेदांत एवं भक्ति का निषेध है। इसे सही मान लेने पर भी हमें मान लेना पडेगा कि पूर्वार्द्ध के राम कुछ भिन्न थे, और उत्तरार्द्ध में स्थापित व्यवस्था के दबाव में पडकर उनका व्यक्तित्व ‘चपटा’ हो गया है। और जब अवतार की यह हालत है तो शिल्पी साहित्यकार और अध्यापक व्यवस्था से प्रतिबद्ध होकर कहां तक अपने मर्म के प्रति, अपनी असलियत के प्रति, अपने आत्मधर्म के प्रति सच्चा और ईमानदार रह पाएगा यह सोचने की बात है। इसी से मेरा आधुनिक साहित्यकार से निवेदन है कि तुम कभी भी किसी भी ‘स्थापित व्यवस्था’ के प्रति प्रतिबद्ध होकर, उसका पुर्जा बनकर मत खटो, तुम कभी भी अपने आत्मसत्य एवं ‘स्व-धर्म’ के प्रति झूठ मत बनो अन्यथा राम (?) और भीष्म-द्रोण की तरह तुम भी विकृत और चपटे हो जाओगे। अतः ‘‘स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देखु विहंग विचारी! बाज पराये पानि परि तू पंच्छीन न मार।’’
सीता-निर्वासन भी स्थापित व्यवस्था एवं विधितंत्र के दबाव में पडे राम की लाचारी का ही द्योतक है। परंतु शम्बूक-प्रसंग की तरह यह शत-प्रतिशत उनके व्यक्तित्व या ‘स्व’-धर्म की पराजय नहीं। इस सीता-निर्वासन के प्रसंग का एक उज्जवल दिक भी है। यह रामत्व की व्यर्थता और उसके परिहास-पूर्ण पराजय का द्योतक न होकर उनके गंभीरता रूप ‘राघवः करुणोरसः’ (राम मूर्तिमान करुणरस हैं) का उत्कृष्टतक उद्घाटन हमारे सम्मुख रखता है। आज महिला-मुक्ति आंदोलन के सतीर्थ्य इस बात के लिए राम की निंदा करते हैं, कभी-कभी अत्यंत कुत्सित इंगित प्रस्तुत करके अपने मन की वासना का विषय-वस्तु पर आरोपण भी करते हैं, परंतु एक अर्थ में राम का यह कार्य आलोच्य होते हुए भी उनकी हीनता का द्योतक नहीं। उन्होंने सीता का निर्वासन करके सर्वाधिक अपने को ही दंडित किया था, इस तथ्य को नये लोग भूल जाते हैं और इसे ‘नीच राम’ (?) का ‘नारी समाज पर अत्याचार’ मानकर तरह-तरह की अनाप-शनाप बातें करते हैं। यह बिल्कुल सतही और एकांगी दृष्टि है। यह उत्तरचरित एक ट्रेजेडी है और इस ट्रेजेडी का आरोपण भाग्य (ग्रीकः‘फेट’) या चरित्र (शेक्सपियर ः ‘कैरेक्टर’) के माध्यम से नहीं, ‘व्यवस्था’ के द्वारा होता है। यह स्वयं मानव द्वारा स्थापित विधि-तंत्र या ऋतचक्र की ट्रेजेडी है। विधि-तंत्र की स्थापना करके मनुष्य इसी का दास हो जाता है और यह मुक्ति नहीं बंधन का रूप धारण कर लेती है। आधुनिक समाजवादी व्यवस्था में मनुष्य इसी ऋत-चक्र या ‘व्यवस्था’ के सिंहासन के सम्मुख राम तक असहाय हो जाते हैं। कृष्ण रहते तो धक्का मारकर तोड डालते। पर ये तो मर्यादा पुरुषोत्तम ठहरे और व्यवसथा की गुलामी का ही दूसरा नाम मर्यादा है। परंतु इस ट्रेजेडी के भीतर राम का समुद्रोपम गंभीर एवं पर्वतोपम धीर रूप जिस प्रकार जिस बृहत्तर आयाम में उद्घाटित होता है उतना किसी अन्य घटना द्वारा नहीं। इसे पढकर रामचंद्र से बरबस स्नेह हो जाता है और वे और मोहक हो उठते हैं एवं वे भक्ति नहीं प्रेम-पात्र हो जाते हैं। गोसाई जी दास्य भक्ति में सराबोर थे। इसी से सीता-निर्वासन की थीम को छोड दिया था। सीता-निर्वासन पर गोसाई जी जैसे तरह हृदय को लेकर लिखा जाए तो निश्चय ही दास्य का रूपांतर सख्य में हो जाएगा। यह थीम तो सूरदास के ही उपयुक्त है।
आज हमारी दृष्टि भंगी ‘ग्रह-ग्रासित पुनि बात बस तेहि पुनि बीठी मार’ की स्थिति में आ गई है। यही कारण है कि हमें राम और युधिष्ठिर जैसे चरित्र ‘सीधे-सादे’ एवं ‘सपाट’ अनाकर्षक और ‘भोंदू’ लगते हैं। लगता है कि गंभीर एवं अर्थ-संपृक्त तथ्य ग्रहण करने की क्षमता को हमारी प्रज्ञा खो चुकी है। राम, युधिष्ठिर या गौतम बुद्ध के चरित्र में कुछ भी रंग-बिरंगे, रूमानी या चाकचिक्य-युक्त नहीं, जो कुछ है वह सादा है, पारदर्शक है, निर्मल है एवं प्रसन्न गंभीर जल की तरह तलदर्शी है। परंतु हमारे लिए गहरा अर्थ वहीं पर प्राप्त होता है जहां ढाबर-घोल जल है, गंदला पानी है और सेवार-काई के नीचे अनेक डुंडुभसर्प बिलबिला रहे हैं। प्रसन्न गंभीर जल को गहरा मानना हमारी रुचि के प्रतिकूल लगता है क्योंकि उसमें फॉयड और किन्से को अंटाने का उपाय नहीं। इसी से हमें मेघनाद, रावण या कर्ण अधिक आकर्षक लगते हैं। मेघनाद और कर्ण खंड दृष्टि से आकर्षक अवश्य हैं। परंतु खंड दृष्टि तो रूमानी दृष्टि है, वह समग्र को देखने-दिखाने की क्षमता से रहित है। मेघनाद और कर्ण अपने में लाख सही एवं लाख मोहक हों, पर समग्र दृष्टि से देखने पर वे जिस चक्र के अंग या पुर्जे बनकर काम कर रहे हैं, वह निश्चय ही मोहक नहीं और वह निश्चय ही पापचक्र है।
अतः खंड दृष्टि से रोमैंटिंक दृष्टि से, मेघनाद या कर्ण पर कोई माइकेल या कोई दिनकर भले ही महाकाव्य लिख दें, पर क्लासिकल दृष्टि वाला अर्थात् समग्र दृष्टि वाला कोई भी ऋषि-कवि इन पात्रों को अपने काव्य का नेता या नायक नहीं बना सकता, क्योंकि ये ‘नेगेटिव हीरो’ या ‘प्रतिनायक’ ही हो सकते हैं, ‘पाजिटिव हीरो’ होने की प्रामाणिकता ये अनृतचक्र का अंग बनकर खो चुके हैं। जिस चक्र के वे अंग हैं उसकी गति ही ऋत-विरोधी और अनृत-मुखी अर्थात् ‘निगेटिव’ दिशा में चल रही है। दूसरी बात यह है कि खंड-दृष्टि व्यक्ति-सापेक्ष होती है। व्यक्तिगत दृष्टि से जो महत्त्वपूर्ण लगता है समग्र दृष्टि या समूहगत दृष्टि से वह तुच्छ और महत्त्वहीन लगता है समग्र दृष्टि या समूहगत दृष्टि से वह तुच्छ और महत्त्वहीन भी हो सकता है। उदाहरण के लिए उर्मिला का चरित्र है। वह काव्य के ऋतचक्र या ‘पाजिटिव’ चक्र का ही अंग है।
अपनी इकाई के भीतर, व्यक्तिगत दृष्टि से देखने पर उसकी करुणा काव्य का महान् विषय बन सकती है। इसी से टैगोर जैसे रोमैंटिक मन वाले कवि को उसकी उपेक्षा अखरी और उसे उन्होंने उपेक्षित उर्मिला के रूप में देखा। ‘परमकारुणिकेन मुनिना वाल्मीकिना विस्मृतासि’ कहकर उन्होंने अश्रुपात किया। परंतु वाल्मीकि की दृष्टि तो क्लासिकल दृष्टि है। वे समग्र दृष्टि से, समूचे महाकाव्य की दृष्टि से उर्मिला का चरित्र महत्त्वपूर्ण नहीं मानते हैं और यदि उसका कुछ महत्त्व है भी तो वह नकारात्मक ही है, उससे लक्ष्मण की महिमा का ही ह्वास होता है। काव्य की मूल थीसिस पौलस्त्यवध से भी उर्मिला के सारे अश्रुपात का कोई तात्त्विक या घटनागत तालमेल नहीं है। फलतः व्यक्ति या स्वतंत्र इकाई के रूप से महत्त्वपूर्ण होते हुए भी यह व्यक्तिगत व्यथा समग्र महाकाव्य की दृष्टि से महत्त्वहीन है। महाकाव्यकार का मन बडा अनुशासित होता है और वह कथामार्ग की मोहक लताओं, कुंजों की ओर आकर्षित न होकर, समूची बाट की दृष्टि में रखकर चलता जाता है। अन्यथा लक्ष्य गौण हो जाएगा और अगल-बगल के विरामकुंज ही अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाएंगे।
यह खंड-दृष्टि हमारे अंदर रोमैंटिक साहित्य के प्रसार के कारण प्रविष्ट हुई है। एक सीमा तक रोमैंटिकता और व्यक्तिवाद सही हैं और उनकी सही सीमा के भीतर उन्हें अस्वीकार करना भी एक दुराग्रह है। अतः उर्मिला, कर्ण या मेघनाद अपनी सीमा के भीतर, व्यक्तिसत्ता के हिसाब से, अपने ‘पाजिटव’ गुणों के कारण हमसे अपना प्राप्य ले लेते हैं और उस सीमा तक उन्हें नमस्य और मोहक करने में कोई आपत्ति नहीं। आपत्ति है उस समय जब वे इतने मोहक और नमस्य हो उठें कि लक्ष्मण और अर्जुन तुच्छ बन जाएं, ‘पाजिटिव हीरो’ का महत्त्व ही खंडित हो जाए और ‘खंड’ ही ‘समग्र पर आरोपित हो जाए। ऐसी अवस्था में कला ग्रहण-ग्रस्त हो उठती है। मिल्टन के ‘पैराडाइज लॉस्ट’, माइकेल के ‘मेघनाद-वध’ और शेक्सपियर के ‘मैकबेथ’ में कला इस ग्रहण-वेध से ग्रस्त होकर ऐबनार्मल बनने की अवस्था में आ गई है और ‘मैकबेथ’ में तो वह ऐबनार्मल हो ही गई है क्योंकि उसमें शैली और काव्य के *ाोर से ‘पाप’ को (अर्थात् मन की नकारात्मक ‘निगेटिव’ वृत्तियों को) ही मनमोहक बनाया गया है। यह कला नहीं आत्मपीडन-रस है। इधर नये साहित्यकारों ने इस खंड-दृष्टि और व्यक्तिवाद को, रोमैंटिकता भी से आगे बढाया (रोमैंटिकता सदैव मानसिक स्वास्थ्य का प्रतिषेध नहीं) और इसके आगे जाकर ह्वासोन्मुखता और गलित वृत्ति (डिकेंडेंस) को अपनाया और वे शुद्ध शैली के *ाोर से रावण और दुर्योधन के प्रेतों को मोहक करने लगे-मन की नकारात्मक ‘निगेटिव’ वृत्तियां साहित्यकार की सहानुभूति की पात्र बनीं और उन्हें ही नवलेखन के उपयुक्त माना गया। इसी से नव-लेखन और नवबोध के प्रति जागरूक पाठक को राम-युधिष्ठिर-बुद्ध के अपने निर्मल प्रसन्न गंभीर रूप में कोई रस नहीं मिलता। सादा निर्मल जल हमारी दमित वासनाओं की तुष्टि का साधन कैसे हो सकता है?
हमारी पीढी दमित वासना ‘लिबिडो’ से ग्रस्त पीढी है और रावण-दुर्योधन जैसे ‘निगेटिव हीरो’ के माध्यम से ही वह अपने को भावात्मक स्तर पर तुष्ट कर सकती है। यह पीढी रावण, नरकासुर, अलाउद्दीन खिलजी, मदाम बोमर्स, फोउस्ट, शैतान, एकिलीज, लेडीचैटरली और लोलिता के माध्यम से अपने को आत्मतुष्ट कर रही है, पर राम-युधिष्ठिर के माध्यम से निर्मल रसबोध के आहरण में नितांत अक्षम हो गयी है। यह तथ्य एक सामूहिक मनोविकृति का लक्षण है। और इस मानसिक विकृति का एकमात्र उपचार है राम, बुद्ध, ईसा आदि ‘पाजिटिव हीरो’ के साथ हमारा मानसिक संस्पर्श, इनके निर्मल चरित्र में मानव-स्नान, इनकी निर्मल कथा के ध्यान से मानस-प्रक्षालन। और कोई उपाय नहीं। एक बार कुंभकर्ण ने रावण से पूछा ‘‘तुम माया द्वारा राम का वेश धारण करके क्यों नहीं सीता को छलपूर्वक भोगते हो?’’ रावण का उत्तर थाः ‘‘क्या करूं, रामरूप धारण करने पर, मेरी वासना ही शांत हो जाती है, सारी कामतृषा ही समाहित हो
जाती है।’’
‘‘रामः किंनुभवान भून्न ताली-तमाल दलश्यामम्
रामाङ्ग भजतो ममोपिकलुषो भावो न संज्ञायते।’’
कामतृषपीडित रावण का यह क्षोभ संभवतः दमित वासना को स्वाद-पूर्वक अहरह पीती हमारी पीढी का भी क्षोभ है, इसी से वह राम के चरित्र में भावानुप्रवेश करने को तैयार नहीं। तो भी मैं बेहया बनकर राम-चर्चा कर
रहा हूं।
वाल्मीकि की ऋषि-दृष्टि दार्शनिकता से परिपक्व थी। अतः उन्हें उत्तर राग उतना महत्त्वपूर्ण नहीं जंचा कि वे उसे अभिव्यक्ति दें। वस्तुतः ‘रामायण’ राग नहीं वीरता काकाव्य है। ‘वीरता’ और ‘करुणा’ ये ही उसके दो विषय है। परंतु ‘प्रेम’ उसका विषय नहीं। प्रेम के दो रूप होते हैंः परंतु उत्तर राग का सर्वोत्तम उदाहरण है रामचंद्र का प्रेम। उत्तर राग दांपत्य प्रेम का गहनतर और निर्मल रूप होता है। पूर्वराग के श्रेष्ठ आलंबन हैं कृष्ण, तो उत्तर राग के श्रेष्ठ आलंबन हैं रामचंद्र। वाल्मीकि राम की मानुषी गरिमा की उनकी वीरता, उनके शील और उनकी तपस्या को तो अभिव्यक्त करते हैं, परंतु उस तपस्या का ही एक कांत-सुकुमार दिक अनभिव्यक्त रह जाता है, वह है उत्तर राग। इसी उत्तर राग को घनीभूत और प्रगाढ करने के लिए भवभूति ने पंचवटी-प्रसंग की अवतारणा की है। राग यानी प्रेम यदि वह ईश्वरीय प्रेम नहीं है, तो सदैव रूमानी ही रहता है। रूमान को पूर्णतः तिरस्कृत करके प्रेम या राग की अवतारणा संभव नहीं। वाल्मीकि द्वारा उद्घाटित शील और तपस्या के साथ भवभूति ने एक नया आयाम जोड दिया है, राम के भारतीय साहित्यव्यापी चित्र में। इस नये स्पर्श से राम का ‘पोर्ट्रेट’ हीनतर नहीं, बल्कि पूर्णराग की कविता में तो भारतीय साहित्य में एक से एक बडे नाम हैंः कालिदास, जयदेव, विद्यापति, सूरदास आदि। परंतु दांपत्य प्रेम जैसे घरेलू एवं सामान्य विषय के माध्यम से उत्तर-राग की श्रेष्ठ कविता उपस्थित करने वाले भवभूति अपने क्षेत्र में अकेले और अद्वितीय हैं। दांते ने ‘वीतानुओवा’ (नवजीवन) में जो बीट्रिस के लिए उत्तर राग की कविता प्रस्तुत की है परंतु उत्तर राग है ही नहीं। वह तो उसकी पूर्वराग-तृषा का ही पुनः पुनः स्मृति-चर्वण मात्र है। इस क्षेत्र में भवभूति भारतीय साहित्य ही नहीं विश्वसाहित्य में अकेले और अद्वितीय ज्ञात होते हैं।
यह उत्तर राग रामचद्र के जीवन में तितिक्षा से जुडा है। तितिक्षा यानी दुःख सहने की क्षमता। यदि पूर्व चरित राम के ‘साहस’ का काव्य है तो उत्तर चरित उनकी तितिक्षा का। पॉल टिलिय की एक उक्ति हैः ‘‘अपने आत्म-सत्य का निर्भय वरण ही साहस है, अपनी अंतरात्मा के दावे को स्वीकार कर लेना ही साहस है।’’ २०वीं शती आत्मदमन की शती है। और इसमें प्रत्येक पग पर ‘आत्म-सत्य’ को मुष्टिगत और अवरुद्ध करने की, आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष किए जाते हुए पारदर्शक एवं स्पष्ट सत्यों को दमित करने की शक्तियां ज्यादा सक्रिय हैं। उनमें ही एक शक्ति है बहुमत या लोकमत भी। सत्य एक स्वतंत्र सत्ता है। वह सर्वदा बहुमत का ही पर्याय नहीं हो सकता। बहुमत तो वर्तमान के द्वारा रेखांकित रहता है और उनका जन्म दबाव के फलस्वरूप भी हो सकता है। दबाव और क्षय की तकनीक २०वीं शती में बडी ही उलझी हुई और मायावी हो गई है। अतः सर्वदा बहुमत ‘सत्य’ का पर्याय हो, ऐसा कहना न्यायसंगत नहीं। परंतु ‘साहस’ की परिभाषा है सारे दबावों और दमनों के विरुद्ध अपने आत्मसत्य को लेकर अकेले पड जाने पर भी निस्संकोच और निर्भय होकर उसके प्रति ईमानदार रह जाना। असंख्य विरोधी व्यूहों के बीच अपनी आंतरिक निष्ठा के प्रति ईमानदार रह जाना और किसी अंधअमोघ नियति या कानून या ‘ऋत’ के विरुद्ध अकेले भी खडे हो जाना ही असली साहस है। प्रत्येक पैगंबर के सामने जब वरण का प्रश्ा* उपस्थित हुआ तो उन्होंने अपने आत्मसत्य को ही वरण किया। वरण का ऐसा एक प्रसंग आया था रामचंद्र के सम्ुख चित्रकूट सभा में। लोकमत था कि रामचंद्र अयोध्या लौट चलें। लोकमत का यह दबाव अपने साथ ‘वेदमत’, ‘नृपनय’ और ‘निगम’ के दबावों को लेकर उपस्थित हुआ था (‘कहब लोकमत वेदमत भूपनय निगम निचोड’)। तो भी राम अपनी आत्मा द्वारा स्वीकृत सत्य को ग्रहण करके अडिग रहे और उन्होंने ‘साहस’ दिखाया। वरण का दूसरा प्रसंग आया रावण-वध के बाद सीता-अपवाद के प्रसंग में। परंतु राम का साहस इस उत्तरचरित में हीन पड गया। वे लोकमत के दबाव के सम्मुख झुक गए और आत्मोपलब्ध सत्य को स्वीकार करने का साहस उनमें नहीं रहा। परंतु इस साहसहीनता के साथ कायरता नहीं, तितिक्षा जुडी है, त्याग का आदर्श जुडा है। इसी से यह भी महान् है। भले ही यह साहसहीनता हो, परंतु इसके बिना राम का रामत्व अधूरा रह जाता। प्रथम एक ‘अस्तित्व’ एक सजीव सत्ता है। परंतु दूसरी बार वे राजा हैं। और राजा व्यक्ति नहीं एक ‘संस्था, एक अवधारणा होता है जो भावहीन तथा ऋत-बद्ध ‘अस्तित्व’ है, जो सर्व तंत्र-स्वतंत्र नहीं, जो विविध प्रकार के दबावों का दास है और स्वयं भी एक दबाव या दमन की शक्ति है। अतः उत्तरचरित में राम का कार्य व्यक्ति के हिसाब से साहसहीनता है, परंतु राजा के हिसाब से महिमा है। और यह महिमा राम नामक व्यक्ति से साहस नहीं तितिक्षा की अपेक्षा करती है। यह उनकी अमानुषी या देवोपम सहन-क्षमता और त्याग का परिचायक है। यह उन्हें ‘क्लेश-कर्म-विपाकहीन’ ईश्वरत्व का स्वभाव ग्रहण करने को बाध्य करती है। यह बेचारा ईश्वर ही है जो दूसरे के दर्द को तो रोम-रोम अनुभव कर रहा है (कम से कम हम मानुषजन तो उससे यही अपेक्षा करके बैठे हैं) पर स्वयं अपने दर्द का अनुभव कर पाने की क्षमता से हीन है! रामचंद्र के उत्तर चरित में भी कुछ ऐसी ही निर्विकारता आ गई है। उत्तर राग के संदर्भ में राम का यह विशुद्ध, निर्विकार और विदग्ध रूप सामने आत है। विदग्ध अर्थात् विशेष रूप से दग्ध। ‘पुटपाक प्रतीकाशः’ करुण रस वस्तुतः विदग्ध करुण रस है। ?