एक साहित्यिक की डायरी

रेखा कुमारी खराडी


मुक्तिबोध जितने बडे कवि हैं उतने ही बडे आलोचक, कथाकार और उपन्यासकार भी हैं। उनका साहित्य हमारे समय में एक अनुपम धरोहर है क्योंकि मुक्तिबोध के साहित्य में तात्कालिक समय का जीवंत इतिहास दर्ज है। इस तरह से देखा जाए तो ‘एक साहित्यिक की डायरी’ जैसी मिसाल अभी तक दूसरी हिंदी साहित्य में उपलब्ध नहीं है। शायद यही वजह है जिसकी और श्री अदीब संकेत करते हैं कि उनकी डायरी उस सत्य की खोज है जिसके आलोक में कवि अपने अनुभव को सार्तभौमिक अर्थ दे देता है।
‘एक साहित्यिक की डायरी’ हिंदी में डायरी विधा की पहली कृति है जो फैण्टसी, मनोविश्लेषण, तर्क, कविता, आत्माख्यान के विविध स्तरों पर एक साथ चलती है, या यों कहें कि इन सबको एक में समन्वित करके एक नई ही विधा संभावना की ओर इंगित करती है। इस कृति में शैली गुण और विचार तत्व दोनों ही विद्यमान है और इन्हीं गुणों के कारण पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है और आदर सम्मान पाया है।
‘एक साहित्यिक की डायरी’ के प्रकाशन की बात की जाए तो बहुत ही दिलचस्प कहानी है। इसके पहले संस्करण की पांडुलिपि मार्च १९६४ को भोपाल में श्रीकांत वर्मा को सौंपी थी और वे जिस रूप में चाहते थे उसी रूप में वह प्रकाशित हुई। उस पांडुलिपि में ‘कटुयान और काव्य सत्य’ और ‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी’ शीर्षक नहीं थे। फलस्वरूप वह पहले संस्करण में भी नहीं हैं तो कुछ अपने आपसे किंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दुनिया से बहस करने की प्रक्रिया में अपने-आपसे बहस चालू रखते हैं। मुक्तिबोध ऐसे ही थोडे से लोगों में और उनकी ‘एक साहित्यिक डायरी’ ऐसी ही है। अपने आप से या किसी दूसरे से बात करते हुए मुक्तिबोध पाठक को कुछ इस तरह इस वार्तालाप का साक्षीदार बना लेते हैं कि निःसंग रहना कठिन हो जाता है। दूसरे से प्रश्न करने के साथ-साथ अपने आप पर भी उस प्रश्न का वैसा ही वार और इस प्रकार विचार की गति के साथ अपने आपको स्तर-स्तर खोलते जाना न कोई छिपाव, न कोई दुराव। सतत् आत्म सजगता के बीच आत्म विडंबना का निरंतर निर्मम बोध। यह पारदर्शी ईमानदारी ही है जो मुक्तिबोध की ‘एक साहित्यिक की डायरी’ को अनूठा आकर्षण प्रदान करती है।
मुक्तिबोध की डायरी निजी स्मृतियां ना होकर, इसमें साहित्य संबंधी तथ्यों का डायरी विधा में एक काल्पनिक मित्र केशव के साथ हुए संवाद के रूप में लिखा गया है। कहीं-कहीं केशव के स्थान पर ‘मित्र’ वह अथवा अन्य किसी पात्र के साथ संवाद शैली में निबंध रचना की गई है। जिसमें काव्य संबंधी आधारभूत तत्वों, शिल्प स्वरूप रचना की स्थितियों परिस्थितियों के साथ रचनाकार की रचना प्रक्रिया का भी सुक्ष्म विश्लेषण किया गया है। इसमें कहीं-कहीं नाटकीय शैली के भी दर्शन
होते हैं।
१. मुक्तिबोध ने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में कुल १३ प्रकरणों का समावेश किया गया है जो इस प्रकार हैं-‘तीसरा क्षण’, ‘एक लंबी कविता का अंत’, ‘डबेर पर सूरज का बिम्ब’, ‘हाशिये पर कुछ नोट्स’, ‘सडक को लेकर एक बातचीत’, ‘एक मित्र की पत्नी का प्रश्न चिन्ह’, ‘नये की जन्म कुंडली एक’, कुटुयान और काव्य सत्य’, ‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी ः एक’, ‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी ः दो’ आदि।
इस कृति का प्रथम प्रकरण ‘तीसरा क्षण’ में उनके काल्पनिक मित्र केशव के साथ बौद्धिक वार्तालाप है। इसमें मुक्तिबोध के सृजन प्रक्रिया, फैण्टेसी शिल्प, अनुभूति भाषा आदि से संबंधित उनकी विचारशीलता एवं मान्यताओं के दर्शन होते हैं। इस प्रकरण में कवि ने संवाद शैली का प्रयोग किया है-
‘‘इस बीच उसके नाद प्रवाह में कोई परिचित
नाम सुना।
मैंने चौककर पूछा, ‘‘क्या’’?
‘‘हमने कल तय कर लिया कि इस गर्मी में
विवाह कर लेंगे।’’
मैंने बहुत विस्मय से पूछा,
‘‘क्या!........किससे?’’
‘‘केटी से।’’
‘‘कौन केटी?’’२
मुक्तिबोध की यह प्रवाह शैली निबंध को पढने योग्य बनाकर गंभीर पांडित्य से मुक्त करती है। उनके निबंध कहानीनुमा हैं जो उत्सुकतावश पाठक को बांधे रखते हैं। ‘तीसरा क्षण’ निबंध में मुक्तिबोध द्वारा केशव की व्यक्तिगत बौद्धिकता का चित्रण इस प्रकार है-
‘‘समय गुजरता गया। उसे अपनी जिंदगी में विशेष सफलता नहीं मिली। मारो-खाओ, हाथ मत आओ।’’ के इस जमाने में उस जैसे आदमी की क्या चलती। समय ने हम दोनों के चेहरों पर सूखेपन और अनाशा की कालिख पोत दी थी। दुनिया की नजरों से दूर अकेलेपन के अंधेरे में हम दोनों अलग-अलग पृथ्वी के दो छोरों पर सांस ले रहे थे- ‘‘केशव बहुत बदल गया था। तमाम बाल सफेद हो गए थे। चेहरे पर गहरी लकीरें हो गई थीं। वह बुड्ढा हो गया था। इसके बावजूद स्वास्थ्य बहुत अच्छा था। समयहीन तो वह कभी
नहीं रहा, किंतु फिर भी अब उसमें पहले से अधिक
स्फूर्ति थी।’’३
इस निबंध के ऐसे अंश पाठक को संभावित घटनाओं के बारे में जानने के लिए उत्साहित करते हैं। मुक्तिबोध ने कला के तीन क्षण माने हैं। कला का पहला क्षण है जीवन का उत्कृष्ट तीव्र अनुभव क्षण। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते-दुःखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैण्टेसी का रूप धारण कर लेना मानो वह फैण्टेसी अपनी आंखों के सामने खडी हो। तीसरा और अंतिम क्षण है फैंटसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता। मुक्तिबोध का कहना है कि शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया के भीतर जो प्रवाह बहता रहता है वह समस्त व्यक्तित्व और जीवन का प्रवाह होता है। इस प्रकार मुक्तिबोध तीसरा क्षण की बात करते हुए कहते हैं कि फैण्टेसी को जितना शब्दबद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है फैण्टेसी अपने मूल रूप से उतनी ही दूर चली जाती है। यह कहना कठिन है कि फैण्टेसी का यह नया रूप अपने मूल रूप की प्रतिकृति है। फैण्टेसी को शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया के दौरान जो-जो सृजन होता है-जिसके कारण कृति क्रमशः विकसित होती जाती है वही कला का तीसरा और अंतिम क्षण है।
मुक्तिबोध केशव के व्यक्तित्व को विश्लेषित करते हुए कहते हैं कि-‘‘मनुष्य का व्यक्तित्व एक गहरा रहस्य है इसका प्रथम भाग मुझे केशव द्वारा मिला इसलिए नहीं कि केशव मेरे सामने खुला मुक्त रहते नहीं था। उसके जीवन में कोई ऐसी बात नहीं थी जो छुपाने लायक हो। वह सचमुच बहुत दयालु, धीर-गंभीर, भीषण कष्टों को सहज ही सह लेने वाला अत्यंत क्षमाशील था। किंतु साथ ही वह शिथिल, स्थिर, अचंचल,यंत्रवत और सहज स्नेही था। उसमें सबसे बडा दोष यह था कि उसमें बालकोचित बाल सुलभ गुण-दोष नहीं थे। मुझे हमेशा लगा कि उसका विवेक वृद्धता का लक्षण है।’’
मुक्तिबोध तीसरे क्षण में कला के मूल द्वंद्ध अत्यंत महत्त्वपूर्ण और सृजनशील है। भाषा एक परंपरा के रूप में फैण्टेसी के मूल रंग को विस्तृत कर देती है, किंतु साथ ही उस फैण्टेसी में संशोधन भी उपस्थित करती जाती है। साथ ही फैण्टेसी अपने मूल रंगों के निर्वाह के लिए अपने मूल रंगों की अभिव्यक्ति के लिए भाषा पर दबाव लाती है, उसके शब्दों और मुहावरों में नयी अर्थमत्ता, नहीं अर्थ क्षमता, नई अभिव्यक्ति भर देती है। कला के तीसरे क्षण में यह महत्वपूर्ण द्वन्द्व है।
‘एक साहित्यिक की डायरी’ का दूसरा प्रकरण है ‘‘एक लंबी कविता का अंत’’। यह निर्विवाद है कि मुक्तिबोध ने काव्य के क्षेत्र में पर्याप्त कार्य किया है। उनकी चर्चित कविताओं में ऐसी कविताएं अधिक हैं जो आकार में बहुत बडी है। इस प्रकार की लंबी कविताओं के बारे में मुक्तिबोध ने अपने अंतर्गत मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं के आकार, स्वरूप और विस्तार के बारे में चर्चा की है। इसी चर्चा के दौरान मुक्तिबोध में प्रगतिशीलता, यथार्थवाद, कविता की रचना प्रक्रिया आधुनिक सहित्यकारों की स्थिति, उनके स्वभाव और उनकी श्रेणियों का विवेचन किया है। मुक्तिबोध की कविताएँ यथार्थ के भयावह परिदृश्य को उभारती हुई आकार में बडी हो जाया करती हैं। और आकार की दीर्घता उनकी चिन्ता का कारण बन गयी। उनको यह भी भय है कि उनकी कविता बहुत बढ गयी तो मासिक पत्रिका में असंभव हो जाएगा और हिन्दी आलोचक कविता की दीर्घता को अच्छा नहीं मानते है- ‘‘यथार्थ के तत्व परस्पर गुम्फित है यही कारण है कि मैं छोटी कविताएं लिख नहीं पाता और जो छोटी होती है वस्तुतः छोटी ना होकर अधूरी होती हैं। और इस प्रकार न मालूम कितनी ही कविताएँ मैंने अधूरी लिखकर छोड दी हैं। उन्हें खत्म करने की कला मुझे नहीं आती यही मेरी ट्रेजेडी है।’’४
मुक्तिबोध अपनी अभिव्यक्ति में यह बताना भी नहीं भूले हैं कि उनकी व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक क्या थी कुल मिलाकर मुक्तिबोध ने इस प्रकरण में कविता की रचना, प्रक्रिया को अभिव्यक्त किया है।
वहीं दूसरी ओर उनके समकालीन साहित्यकारों विचारकों, आधुनिकतावादियों की स्थिति का भी निरूपण किया है। ‘एक लंबी कविता का अंत’ विचारों का जनक निबंध है। इसमें मौलिकता, अस्पष्टता और साफगोई के कारण उनके विचार प्रभावी रूप से सामने आए हैं।
‘एक साहित्यिक की डायरी’ का तीसरा प्रकरण है ‘डबरे पर सूरज का बिम्ब’। इसमें मुक्तिबोध की व्यंग्य शैली के दर्शन होते हैं। इसमें मुक्तिबोध ने मध्यमवर्गीय संस्कारों वाले बुद्धिजीवी की मानसिकता पर व्यंग्य किया है। इस निबंध का नायक अपने सिद्धांतों के प्रति अनुभव संसार को नहीं छोडने के संकल्प लेने की प्रक्रिया में प्रयत्नशील है। जैसे कि मुक्तिबोध ने इस निबंध में कुंठा की बहुत ही रोचक ढंग से आत्मा व्यंग्यात्मक शैली में विवेचन की है- ‘‘कुंठा-कुंठा मैं नहीं समझता’’ उस ने जवाब दिया’’ हर जमाने में गरीबों की मुश्किल रही है। हर जमाने में एक श्रेणी का दिल नहीं खुला है। बहुत विशाल श्रेणी का, भारतीय जनता का, मेहनतकश का।’’ वह आगे कहता गया, पिछला कौन सा ऐसा युग था जिस में कुंठा ना रही हो। और फिर कुंठा का मतलब क्या है?’’ उसने समझाते हुए कहा, ‘‘कुंठा का आधिपत्य तो अब समझना चाहिए जब कुंठा के बुद्ध बुनियादी कारणों को दूर करने की बेसब्री ओर विक्षोभ न हो।’’५
‘हाशिए पर नोट्स’ के अंतर्गत मुक्तिबोध ने एक आलोचक की तटस्थता पर जोर देते हुए कहा है कि आलोचक को निष्पक्ष भाव से आलोचना करनी चाहिए। एक आलोचक को अपनी आलोचनात्मक भावना को प्रधान मानते हुए तटस्थ रूप से कृति की समीक्षा करनी चाहिए और उस कृति को विश्वास के बल पर श्रद्धा हृदय से नहीं बुद्धि से उत्पन्न हुई है। और उसी माक्र्सवाद की बहुतेरी आलोचना अंधी भावना से प्रेरित हुई है। मुक्तिबोध इसी संदर्भ में कहते हैं कि व्यक्ति में अंधश्रद्धा नहीं होनी चाहिए। निष्पक्ष एवं तटस्थ रूप से की गई आलोचना से मनुष्य में सुधार किया जा सकता है और मनुष्य अपनी सीमा और कमजोरियों से ऊपर उठ सकता है। निष्कर्ष रूप में मुक्तिबोध यह कहना चाहते हैं कि बुनियादी श्रद्धा के फलस्वरूप ही इतना सारा साहित्य लिखा गया है।
‘सडक को लेकर एक बातचीत’ में मुक्तिबोध ने निम* वर्ग के काव्य को भी पत्रिकाओं में प्रकाशित करने पर जोर देते हैं। और भौतिक संस्कृति की बात करते हुए कहते हैं कि बौद्धिक संस्कृति की दो विशेषताएं हैं। एक बौद्धिक संस्कृति की मुक्तिबोध निंदा करते हैं।
‘‘एक मित्र की पत्नी का प्रश्ा* चिन्ह’’ के अंतर्गत मुक्तिबोध ने व्यक्तित्व का विश्ा*ेषण किया है। यह विश्ा*ेषण संवाद शैली में हुआ है। मुक्तिबोध की लंबी-लंबी बहसें सिर्फ उनके व्यक्तित्व को ही प्रतिष्ठित नहीं करती बल्कि उनके मित्रों को भी एक पूर्ण व्यक्तित्व प्रदान करते हुए पाठकों के सामने उजागर करती हैं। और यह व्यक्तित्व विश्लेषण करके मित्रों के क्रियाकलापों और विशेषताओं के माध्यम से उजागर हुआ है। एक तरह से देखा जाए तो मुक्तिबोध में वैज्ञानिक व्यक्तित्व विश्ा*ेषण प्रस्तुत किया है-
‘‘व्यक्तित्व के न मालूम कितने ही पहलू हैं जो मुझसे छिपे हुए हैं। जैसे पंखुरी के भीतर पंखुरी अथवा प्याज की परतों के अंदर ही परतें। फिर व्यक्तित्व का जो रूप आज हमें दिखाई देता है कहां तक स्थायी है हम नहीं कह सकते। तीसरे सबसे बडी बात यह है कि व्यक्तित्व के निर्माण की कार्य कारण परंपरा का यदि अध्ययन करें तो आप देखेंगे कि व्यक्तित्व निर्माण में चेतन मन का रोल बहुत कम होता है और उससे हम रोल संकल्पशक्ति का। दोनों के रोल निस्संदेह कम होते हैं लेकिन होते हैं बहुत ही महत्त्वपूर्ण इतने महत्त्वपूर्ण की उन्हीं के कारण मनुष्य है।’’
‘नए की जन्म कडली एक और दो’ के अंतर्गत मुक्तिबोध ने जीवन के संवेदनात्मक ज्ञान को एक मूल्य के रूप में स्थापित किया है। साथ ही अपने मित्र के राजनीति में उतरने के प्रसंग को लेकर राजनीति की निंदा की है। और समाज और परिवार का समर्थन करते हुए यह कहते हैं कि व्यक्ति का विकास समाज और परिवार से ही होता है। संस्कृति की शिक्षा समाज और परिवार से ही प्राप्त होती है। साहित्य और राजनीति के पास ऐसी कोई दृष्टि नहीं होती है जो परिवार तथा समाज और परिवार से ही प्राप्त होती है। साहित्य और राजनीति के पास ऐसी कोई दृष्टि नहीं होती है जो परिवार तथा समाज के पास होती है। इस तरह व्यक्ति के जीवन के आधार तत्वों की बात की जाए तो सांस्कृतिक तत्व ज्यादा महत्व रखते हैं।
इसी चर्चा को ही नए की जन्मकुंडली में आगे बढाते हुए मुक्तिबोध नए मूल्यों की स्थापना करने पर बल देते हैं। ‘‘सवाल पूरी परंपरा को समाप्त करके नए मूल्यों की नई परंपरा के अभाव में अंतर प्रवृतियों के दास हो गए हैं। इन अंतः प्रवृत्तियों का चाहे जितना आदर्शीकरण किया जाए। वे मात्र व्यक्तिगत हैं। और इस समय तो नए मूल्य के केवल बौद्धिक स्तर पर हैं। वे जीवन का अनुशासन क्या कर सकेंगे। यदि समाज की संस्कृति मुख्यतः बौद्धिक संस्कृति होती, वैज्ञानिक दृष्टि समाज की प्रधान दृष्टि होती, तो शायद यह संभव भी था। किंतु यह नए मूल्य कुछ ही लोगों के प्रवाह की नालियां बन रहे हैं।’’
इस तरह मुक्तिबोध ने पुरानी परंपराओं के स्थान पर नए मूल्यों की स्थापना को अनिवार्य माना है।
‘वीरकर’ के अंतर्गत मुक्तिबोध वीरकर के माध्यम से जीवन के तत्वों की महत्ता को समझाने का प्रयत्न किया है। उनका कहना है कि रचनात्मक स्तर पर जीवन के वास्तविक तत्वों की उपेक्षा करना गलत है। उनका कहना है कि साहित्य का विकास तभी संभव है जब समाज का विकास हो, देश का विकास हो और विशेष रूप से मानव का विकास हो। मनुष्य का विकास ही समग्र विकास है। यहां मुक्तिबोध एक साहित्यकार के संवेदनात्मक जीवन तत्वों की बात करते हैं जो इन की दृष्टि में ठीक नहीं है- ‘‘तथ्यों से क्यों जी चुराते हो? उस वर्ग के आलोचक तुम जैसों को कहते हैं कि तुम ऑब्सक्योर हो। जो लिखते हो उसका ठीक-ठीक अर्थ समझ में नहीं आता। या फलाँ हो फलाँ हो। असल में तुम्हारी दुनिया ही अलग है। तुम्हारे डिजिट्स (गणित) ही अलग हैं। तुम्हारा वातावरण ही अलग है। तुम्हारी प्रेरणा भी भिन्न है। वह भला उनके लिए अनुकूल क्यों होगी? वह उन्हें समझने कैसे आ सकती है? क्यों, वह उन्हें सुंदर क्यों लगेगी?’’
‘विशिष्ट और अद्वितीय’ प्रकरण में मुक्तिबोध ने जन साधारण के जीवन सत्य को उजागर किया है। साथ ही साथ इसी जीवन सत्य की उपेक्षा करने वाली साहित्यिक मान्यताओं की निंदा की है। इस संदर्भ में मुक्तिबोध ने ‘नई कहानी’ और ‘नई कविता’ पर भी व्यंग्य करते हैं-
‘नई कहानी’ में आधुनिक मानव की जो विचित्र मनोदशा है उसको अगर आप उसके सारे संदर्भों से काटकर उसके सारे बाह्य सामाजिक पारिवारिक इत्यादि संबंधों से काटकर, उस मनोदशा को मानो अधर में लटकाकर चित्रित करेंगे तो मनोदशा के नाम पर (कहानी में) एक धुन्ध समा जाएगी। कहानी में अगर सिर्फ भीतरी ढूंढ हो और सिर्फ वही वह रहे और इसी की इतनी प्रधानता हो की वस्तु सत्य के संवेदनात्मक चित्रों का प्रायः लोप हो जाए तो आप वही गलती करेंगे कि जो (मेरे ख्याल में) नई कविता ने की। कविता की कला, कथा की कला से अधिक अमूर्त तो वैसे ही होती है, इसलिए संभवतः उसमें वे बातें खप भी जाती हैं। किंतु कहानी में? यानी मैं चाहता हूं कि साहित्य में मानव की पूर्ण मूर्ति स्थापित की जाए?
आगे मुक्तिबोध इसी संदर्भ के अंतर्गत आचार्य रामचंद्र शुक्ल का उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि बाल बच्चेदार व्यक्ति और अकेले व्यक्ति के विचारों और भावनाओं में घर आ वैषम्य है। मुक्तिबोध का कहना है कि बाल-बच्चेदार कवि या साहित्यकार की प्रतिभा व्यापक कोमल भावना या करुणा के भाव में परिवर्तित हो जाती है। मुक्तिबोध इसी प्रकरण के संदर्भ में कहते हैं कि कभी आदित्य और विशिष्ट होते हैं। शायद अद्वितीय और विशिष्ट हैं इसलिए कवि हैं। पर जो कभी अपने आप को अद्वितीय समझते हैं या जिन्होंने अद्वितीय कि जो परिभाषा अपने लिए बना रखी है उसे मुक्तिबोध दोष देते हैं। इस तरह से मुक्ति बोध ने अलग अलग श्रेणियों के कवियों के साहित्य का विश्लेषण किया है।
‘कुटू मानव काव्य सत्य’ के अंतर्गत मुक्तिबोध ने प्रेम कथा के माध्यम से वास्तविक जीवन और लेखक की वास्तविक मानसिकता का अवलोकन करते हुए निर्मम निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। साथ ही साथ मुक्तिबोध ने साहित्य में जीवन मूल्य और आदर्श कोई स्थापित किया है-‘‘इतना निश्चित है कि वह शुक्ल के प्रेम से वशीभूत होकर शुक्ल को मदद करने के लिए तैयार नहीं है।’’
जो आंसू वह लगातार बाहर रही है, वह विरह के कहे जा सकते हैं क्योंकि आरक्षण का भाव वीरा से उत्पन्न हुआ है। किंतु उस दुख की करतूतें उसकी तीव्रता और रक्षा की है विरह कि नहीं...’’ मित्र ने जोर जोर से आगे कहना शुरू किया-
उसके आंसू काव्य सत्य हैं।
उसका उल्लास काव्य सत्य था।
उसका प्रेम काव्य सत्य है।
उसका वियोग काव्य सत्य है । ६
मुक्तिबोध ने इसी प्रकरण में कवि के अंतर्द्वंद को उजागर किया है- ‘‘सामंजस्य की कल कल्पना यांत्रिक रूप से लागू नहीं की जा सकती। यह तो ठीक है और इस बात का शीघ्र पता चल जाता है कि एक प्रतिवादी प्रगतिवादी विद्यार्थी मजदूर- किसानों की हडताल है तोडता है या नहीं वह जनता के विरुद्ध अधिकारियों का गुप्तचर है या नहीं अथवा वह एक दोहरी दुरंगी उर्दू मही मूवी नीति का अवलंबन कर रहा है या नहीं। इनकी रूप रेखाएं स्पष्ट होती हैं साधारण पढी-लिखी जनता इसे खूब जानती है अवसरवादी दृष्टियां और कार्यनीति के विविध रूपों और प्रकरणों प्रकारों का तुरंत पता चल जाता है। किंतु.... किंतु.... महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रकार की विसंगतियां छोड जो तुरंत ही प्रकट हो जाती हैं अन्य विसंगतियां पहचानना मुश्किल रहता है और बहुधा मनुष्य अपने मानसिक स्वार्थों की दृष्टि से अन्य में विसंगतियां और बुद्धि
ऊंचे आदर्शों को आगे करके उनके झंडे के नीचे
काम करती हैं।’’
‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी’ के अंतर्गत मुक्तिबोध रचना प्रक्रियागत संघर्षों के निर्माण को जीवन तथ्यों या वस्तु तथ्यों से जोडते हुए व्यक्तिगत तथा अभी व्यक्तिगत ईमानदारी के जटिल प्रश्ा*ों से जूझते हुए दिखाई देते हैं- ‘‘मैंने अपने को संवारते हुए, अटकते हुए और शब्दों के लिए भटकते हुए कहा, ‘‘तुम भले ही फ्रॉड कहलो। इसमें व्यक्तिगत ईमानदारी जरूर है। डायरी मेरी व्यक्तिगत इमानदारी का सबूत है।’’
‘‘जिंदगी एक महाविद्यालय या विश्वविद्यालय नहीं है। वहां एक प्राइमरी स्कूल है, जहां टाट पट्टी पर बैठना पडता है। जरा-सी बात पर चाटे के आघात की सारी संवेदनाएं गालों पर झेलनी पडती है। जी हां! इस जिंदगी का यही हाल है! भय, आतंक, विचित्र आशंकाएं, अजीबोगरीब उलझाव, कटी हुई टाट पट्टियां, पुराने स्याही रंगे टेबल, गुरुजी की भयानक दुतरफा मुंहतोड घर में माता-पिता की डांट फटकार और बच्चे का कमल छोआ-सा शरीर!’’
मुक्तिबोध इसी प्रकरण में व्यक्तिगत इमानदारी को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि व्यक्तिगत ईमानदारी का अर्थ है- जिस अनुपात में जिस मात्रा में, जो भावना या विचार उठा है, उसको उसी मात्रा में प्रस्तुत करना। जो भावना विचार जी स्वरूप को लेकर प्रस्तुत हुआ है उसको उसी स्वरूप में प्रस्तुत करना लेखक का धर्म है।
मुक्तिबोध की डायरी की भाषा सहज सरलता के कलेवर से युक्त है। उनका विचार-विमर्श और लंबे-लंबे संवाद एक विशेष प्रकार की संवेदनात्मक उपस्थिति दर्ज करते हैं। मुक्तिबोध की एक साहित्यिक की डायरी में विचारों की गंभीरता को है उसमें भावात्मक और आत्म परम तत्व शामिल हैं।
इनकी डायरी के प्रकरणों की रचना शैली को डॉ. मोतीराम वर्मा के शब्दों में इस तरह से कह सकते हैं कि ‘‘इन निबंधों का प्रत्येक प्रकरण सीदी-साधी शुरुआत, अक्सर कहानी जैसी बल्कि आत्म कथानक व्रत के एक मार्मिक अंश जैसी जो आपने विकास क्रम में सरजी जीवन की जटिलताओं के किसी पाषाण खंड से जा टकराती जहां प्रश्ा*ों के टुकडे फूट पडते हैं फिर उन टुकडों की चिंतन के सूक्ष्म हजारों से सर्जनात्मक छानबीन की जाती है। बीच-बीच में जरूरत के मुताबिक व्यंग्य की एक ही हल्की चोट की आवाज सुनाई देती है और अंततः यह महसूस होता है कि अपूर्व सा कुछ अनमोल यद्यपि निहायत परिचित लगने वाला समाधान हाथ आ गया है।’’७ ?
संदर्भ ः
१. मुक्तिबोध का रचना संसार, वर्षा अग्रवाल साहित्य भंडार प्रकाशन, २०११ पृ.सं. - २५४
२. एक साहित्यिक की डायरी, मुक्तिबोध, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, २०११ पृ.सं. - १८
३. वही. पृ.सं. - १९
४. वही. पृ.सं. - ३०
५. वही. पृ.सं. - ४३
६. वही. पृ.सं. - ९९
७. मुक्तिबोध का गद्य साहित्य, मोतीराम वर्मा पृ.सं. - ८४
शोधार्थी ः हिन्दी विभाग, मो.ला.सु.वि.वि., उदयपुर