स्वयं प्रकाश और उनका चेखवीय रचना संसार

बालमुकुन्द नंदवाना


स्वयंप्रकाश ने वर्ष १९७० के आस पास कहानी लिखना प्रारम्भ किया। उस समय तक नई कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी आदि का अंधड काफी धीमा पड चुका था। बहुचर्चित समानांतर कहानी का दौर आना बाकी था। आगे चलकर कहानी पत्रिका ‘सारिका’ के माध्यम से कमलेश्वर ने समानांतर कहानी की अवधारणा को विकसित किया। उन्होंने ‘इतिहास के नंगा हो जाने’, ‘आम आदमी के द्विविधा रहित होकर संघर्ष करने का आह्वान’, पूँजी के प्रभुत्व के खिलाफ खडे हो जाने’, की बात की। इसके साथ ही समय के भयावह यथार्थ को कहानी की चिंता का केंद्र-बिंदु बना कर एक नई पीढी उभरी-संजीव, स्वयंप्रकाश, असगर वजाहत, पंकज बिष्ट, नमिता सिंह, उदयप्रकाश, अरुण प्रकाश जैसे कथाकारों ने अपनी पहचान ‘जनवादी’ कथाकारों के रूप में बनायी। ‘‘जनवादी कहानी’’ के बारे में आलोचक हेतु भारद्वाज का कहना है-‘‘जनवादी कहानी वैचारिक दृष्टि से माक्र्सवादी विचाधारा का पोषण करती है, परन्तु वह विचारधारा को रचनाकार के अनुभव से अलग सत्ता नहीं है’’। स्वयं प्रकाश की कहानियों की जन-पक्षधरता प्रेमचंद की कहानियों की परम्परा से आती है।
समकालीन कहानी की बात करें तो हमारे समय के तीन वरिष्ठतम प्रतिनिधि कहानीकारों में स्वयं प्रकाश, संजीव और उदयप्रकाश के नाम सम्मान से लिए जाते हैं। इन तीनों कहानीकारों की स्थिति के बारे में आलोचक रविभूषण का यह वक्तव्य है ः ‘‘समकालीन हिंदी कथाकारों में स्वयंप्रकाश, संजीव और उदयप्रकाश की भिन्नता सहज स्पष्ट है। स्वयंप्रकाश, हिंदी विकास की परम्परा से सहज जुडते दिखाई देते हैं, प्रेमचंद के बाद अमरकांत और स्वयंप्रकाश जिस प्रकार एक सहज विकास की परम्परा में हैं, उस प्रकार न तो संजीव हैं और न ही उदयप्रकाश।’’
प्रेमचंद की विकास पंरपरा से जुडने का अर्थ क्या है? यहाँ स्वयं स्वयंप्रकाश को उद्धृत करना यथेष्ट रहेगा। अपने एक कहानी संग्रह की भूमिका में स्वयं प्रकाश कहते हैं- ‘‘इसका अर्थ था यह समझना कि अनुभववाद यथार्थवाद नहीं है कि दुनिया साहित्य से नहीं राजनीति से बदलती है। कि इतिहास कुछ नेता नहीं, जनता बनाती है और बदलती है कि राजनीति परहेज की चीज नहीं है। कि यथार्थ गतिशील है, समाज वर्गों में विभक्त है, कि समाज के अंतवर्गीय अंतर्विरोधों को समझना अच्छी कहानी के लिए भी जरूरी है। कि लोकप्रियता और श्रेष्ठता में कोई अनिवार्य विरोध नहीं है और अपने समय के प्रश्नों से कतराकर कोई रचना कालजयी नहीं हो सकती।’’
स्वयं प्रकाश के कहानी कहने का अलग अंदाज और ढब है। उनकी कहानियों पर चेखव का गहरा प्रभाव है। वे चेखव को अपना कथा-गुरु मानते हैं। उनका कहना है-‘‘मैं प्रेमचंद को पढकर नहीं, चेखव को पढकर कहानी के क्षेत्र में आया।’’ यहाँ हम स्वयं प्रकाश की कुछ चुनिन्दा कहानियों की चर्चा करेंगे। ये उनके गुरु चेखव की कहानियों की ही तरह हो-हल्ला नहीं मचातीं, बस एक लोक सृजित करती है, एक सृष्टि रचती हैं, एक वातावरण निर्मित करती हैं; और पाठक रसास्वादन करता है, लेखक की मंशा को भांपता है। कहानी के सार को आत्मसात कर लेता है।
कहानी ‘स्वाद’ में कंपनी के युवा बॉस के आचरण से कहानी का नायक अपमानित, दुखी और त्रस्त है। स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। अतः तनावपूर्ण जीवन जी रहा है। जिसके फलस्वरूप पति-पत्नी के जीवन में एक अजीब सी कुंठा है। घर में व्याप्त इस कलह-क्लेश में पल रहा उनका ६-७ साल का पुत्र-बिट्टू माँ-बाप के प्रेम-स्नेह से वंचित है। वह दोनों का प्यार चाहता है। वह घर के माहौल को सहज करने की पूरी कोशिश में असफल होने पर वह झल्ला उठता है। ‘‘सहसा उसकी नजर ग्रीटिंग कार्ड पर पडी, जो बडी मेहनत से बनाया था उसने। मम्मी-पापा को उनकी वेडिंग एनिवर्सरी पर देने के लिए जो, आने वाली है कुछ रोज बाद। और उस कार्ड के टुकडे-टुकडे करके बिखेर दिए। इस पर भी तसल्ली नहीं हुई तो लात लगाई पलँग के कोने में पडी पिचकी हुई फुटबॉल को।’’ क्रोध की हद पार कर बिट्टू हिंसक हो जाता है और यह क्या? उस क्रोध-जनित हिंसा-उन्माद में उसे एक विचित्र प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है। ‘‘अचानक एक अजीब बात हुई। तकिये की, खिलौनों की पिटाई करने में बिट्टू को मजा आने लगा। क्रोध काफूर हो गया। क्रोध का कारण भी बिसर गया। पीटने का सुख सब पर हावी हो गया.... उन्माद की सी स्थिति हो गई। किलकारी मारने जैसा आलम हो गया। पहली बार, बार चखा था हिंसा का स्वाद।’’ बिट्टू की हिंसा आयातित नहीं है, घर में व्याप्त भयावह वातावरण उसकी हिंसा का कारण है।
स्वयंप्रकाश की ऐसी ही दो कहानियाँ हैं, पहली-‘‘एक यूँ मौत’’। और दूसरी-‘ढलान पर’। पहली कहानी में असामयिक मौत है एक प्रतिभा की, गुमनाम मौत है एक प्रबुद्ध विद्धवान की, एक अकर्मण्य आदमी की। कहानी को पढकर पाठक के हृदय में एक टीस उठती है कि काश! वैसा न होकर ऐसा होता तो अच्छा होता। और कहानीकार की भी यही पीडा है। कहानी के नायक में असाधारण प्रतिभा है, कैशौर्य अवस्था में आते-आते उसने पढाई-केरियर आदि के बारे में अपनी मान्यताएँ गढ ली हैं-‘‘अब तक वह पढे-लिखों के फिटमारेपन की स्थिति समझ चुका था और ‘जब मैं सर्विस करूँगा.... या जब सौ-सौ के नोट मेरे हाथ में होंगे... जैसे बचकाने सपने उस पर से उड कर उससे छोटों के मन पर बैठने जा चुके थे।’’ लडकियाँ-शादी-बच्चे, इनके बारे में उसका अपना न*ारिया है, अतः नितांत अकेला है ‘‘क्योंकि कुछ-न-कुछ खाने के लिए कुछ-न-कुछ कमाना जरूरी था’’ इसलिए अध्यापक है, परन्तु परीक्षा-पद्धति को हास्यास्पद मानता है। उसकी दिलचस्पी है शतरंज और विज्ञान में। और ललक है विज्ञान की प्रतिभाएँ खोजने की। उसकी दिनचर्या अनियमित और जीवन उबड-खाबड और बेतरतीब है। उसे न ऊधो का लेना है न माधो का देना है। वह व्यवस्था से नाराज है या यूँ कहें उसमें मिसफिट है। ‘‘वह न कुछ करता था न किसी का प्रशंसक था, न निंदक। वह हर चीज का निर्लिप्त, निष्क्रिय और निर्विवाद आलोचक था और इस पूरे तमाशे से लगता था कि या तो वह समय से पहले पैदा हो गया है, या बहुत बाद में।’’ उसका यह खामोश व्यक्तित्व भी कुछ लोगों के लिए आकर्षक और अनुकरणीय है। ‘‘...उसने सादगी को भी ऐसा अर्थ-सा दे रखा था कि कई लोग उसका अनुसरण करने की कोशिश करते थे। वह अपनी गुमनामी में भी ख्यात था और अपनी निष्क्रियता से भी लोगों में एक अजीब सी कचोट पैदा करता था।’’ एक दिन उसके बचपन का दोस्त उससे मिलने आता है और कहता है कि तुम्हारी असफलता का दोषी पूरा समय है, पूरा समाज है। वरना तुम कुछ न कुछ अवश्य बन जाते। वह पलट कर कहता है। ‘‘मैं क्या बन जाता तो तुम मुझे सफल मानते?’’ और एक दिन वह गुमनाम मौत मर जाता है। ‘‘बगैर पीछे कोई रोनेवाला छोडे, जैसे वह जिया वैसे ही मर गया। उसकी मौत पर शायद उसे खुद भी अफसोस न हो।’’ उसका जीवन सफल रहा या असफल, लेकिन निरर्थक जरूर रहा। हाँ, वह समाज के लिए कर सकता था। इसका अफसोस पाठकों और कहानीकार दोनों को है- ‘‘क्योंकि इस बेहूदा दुनिया की बेहूदगी समझने के बावजूद उसने इसके खिलाफ न तो आवाज उठाई, न उन लोगों को ढूँढने की कोशिश की जो उसी ही की तरह ‘जानते’ थे। क्योंकि तब वे सब मिलकर शायद इस दुनिया को कुछ कम बेहूदा बनाने की तरकीब कर सकते थे।’’
‘ढलान से’ कहानी एक निर्धन परिवार में जन्में, अपनी लगन, मेहनत, प्रतिभा और ईमानदारी के बलि पर एक सम्मानजनक ओहदे तक पहुँचे एक बुढाते अविवाहित अफसर के अकेलेपन की कहानी है। उम्र के उनचासवें वर्ष में प्रवेश करते हुए उनको सहसा अपने बूढे होने का अहसास तीव्रता से हाने लगता है। वे अपने को चुस्त-दुरुस्त करने कि कोशिश में लग जाते हैं-वर्जिश, सुबह की सैर आदि आदि। लेकिन तुरंत ही इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ‘‘मामला शारीरिक नहीं, दरअसल मानसिक है। ‘‘आदमी बूढा तभी होता है जब वह सोचता है कि वह बूढा हो रहा है। जिसका मन जवान है उसका तन जवान है।’’ और उन्होंने अपनी दिनचर्या बदलने का उपक्रम किया-बाल डाई किये, सजधज कर ऑफिस गए, क्लब गए, खेला-खाया-पिया और पस्त हो कर घर लौटे। अस्वस्थ हो गये। वास्तव में ‘‘कुछ भी कर लो...बुढापा स्थगित भले हो जाय, निरस्त तो नहीं होगा। दिक्कत यह है कि आप अकेले बूढे नहीं होते....आफ साथ आफ विचार, आदर्श, मूल्य...एक पूरी दुनिया बूढी होती चलती है।’’ यकायक भयावह अकेलापन उन्हें घेर लेता है, अपनी प्रेयसी के साथ बिताए दिन याद आते हैं ‘‘क्या शादी न करने का निर्णय सही था? उन्हें भविष्य की चिंताएँ सताने लगती हैं।’’ इसी अकेलेपन को दूर करने के लिए वे जयकिशन (उनके सहकर्मी का पुत्र) व उसके दोस्तों को बियर पार्टी के लिए आमंत्रित करते हैं। उत्साह से सारी तैयारी करते हैं। पूरा एक पीढी का अंतर हैं। आज के युवा की अपनी जीवन शैली है। उनके लिए इस पार्टी का अंत बडा ही भयावह तथा पीडादायक होता है। युवा प्रारम्भिक औपचारिकताएँ निभाने के बाद अपने में ही मशगूल हो जाते हैं। नाचना-गाना शुरू होता है...और वे भी शरीक हैं, अपनी पुरानी हसीन यादों के साथ ... कि अचानक एक युवा जोर से हँसता है, हँसता ही जाता है और उसे कहता है- ‘‘अंकल यू डोंट डांस प्लीज! फोर गोड्स सेक! प्लीज डोंट ट्राय टू डांस!’’ वे उपहास का पात्र बन जाते हैं। ‘‘ही लुक्स सो फनी यार!’’ इस असहज स्थिति में पार्टी समाप्त हो जाती है। और अंत में जाते जाते उन्हें एक कॉम्प्लीमेंट और मिलता हैः ‘‘इट वाज फन ओल्डमैन’’। वे उन युवाओं के व्यवहार से क्षुब्ध हैं, अपमानित हैं। उनके अन्दर कुछ है जो सुलग रहा है- ‘‘जब सब चले गए तो उन्होंने देखा कि उनके ड्राईगरूम का लगभग सत्यानाश हो चुका है। कालीन पर नमकीन, पानी, बीयर ही नहीं...सिगरेट के कुछ मसले हुए टुकडे भी पडे हैं...जिनमें से एक सुलग रहा है।’’
उपरोक्त तीनों कहानियों में निर्मित परिस्थितियाँ ही सब कुछ कह देती हैं। इसी तर्ज पर स्वयं प्रकाश की अन्य अनेक कहानियाँ हैं, मसलन, ‘बिछुडने से पहले’, ‘तीसरी चिट्ठी’, ‘उल्टा पहाड’ आदि जिनकी शैलीगत विशेषता उनके कथा-गुरु चेखव की कहानियों की बरबस याद दिलाती है। ?
संदर्भ ः
१. हेतु भारद्वाज, हिंदी कथा साहित्य का इतिहास
२. चर्चित कहानियाँ, (भूमिका) सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली (प्रथम संस्करण, १९९५)
३. मेरी प्रिय कहानियाँ, राजपाल एंड संस, दिल्ली (प्रथम
संस्करण २०१४)
१५२, टैगोर नगर, हिरणमगरी सेक्टर-४ उदयपुर-३१३००२
मो. ९९८३२२४३८३