क्रान्तिकारी गजलकार - दुष्यंत कुमार

सुरेन्द्र अग्निहोत्री


यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
आम आदमी की मुसीबतों के प्रति समझदार, सतर्क, स्वावलंबी, क्रांन्तिकारी गजलकार दुष्यंत कुमार स्वाभिमानी, ऊर्जा व स्फूर्ति से भरपूर गजलकार थे। समकालीन हिन्दी कविता विशेषकर हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली वो शायद ही किसी विरले कवि को मिली है। दुष्यंत का लेखन का स्वर सडक से संसद तक गूँजता है। कवि ने कविता, गीत, गजल, काव्य नाटक, कथा आदि सभी विधाओं में कलम चलायी है लेकिन गजलों की अपार लोकप्रियता ने अन्य विधाओं को नेपथ्य में डाल दिया। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा कैफ भोपाली का गजलों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही अपनी रचनाओं में स्थान दे रहे थे। साहित्य के संक्रमण काल में जब गीत और नवगीत तथा छंदों के प्रति जनमानस के बीच नई कविता के पुरोधा हिकारत का वातावरण बना रहे थे यहाँ से संक्रमण काल में दुष्यंत कुमार ने गजल को हिन्दी गजल के रुप में प्रतिष्ठा दिला कर सम्मानित किया। प्रारम्भ में दुष्यंत कुमार परेदशी के नाम से लेखन करते थे। पिता उन्हे प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. की शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत कुछ दिन वे आकाशवाणी में ज्यादा दिन टिक न सके। अपने ही मुल्क में आम आदमी को दोयम दर्जे का नागरिक बनकर जीना मंजूर नहीं। इलाहाबाद में कमलेश्वर, मार्कण्डेय और दुष्यंत की दोस्ती बहुत लोकप्रिय थी। वास्तविक जीवन में दुष्यंत बहुत, सहज और मनमौजी व्यक्ति थे। निदा फाजली उनके बारे में लिखते हैं-‘दुष्यंत की नजर उनके युग की नई पीढी के गुस्से और नाराजगी से बनी है। यह गुस्सा और नाराजगी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के खिलाफ नए तेवरों की अवाज थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछडे वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। दुष्यंत एक कालजयी कवि हैं और ऐसे कवि समय काल में परिवर्तन हो जाने के बाद भी प्रासंगिक रहेंगे।’
दुष्यंत कुमार की कुछ पंक्तियाँ देखेंः
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
क्रांन्तिकारी गजलकारः दुष्यंत कुमार मुहब्बत प्रेम के प्रति अनुराग रखते थे। वास्तविक जीवन में तारतम्य के अनुगामी रचनाकार के कई रुप उनकी गजलों में देखने को मिलते हैंः
वो घर में मेज पे कोहनी टिकाये बैठी है
थमी हुई है वहीं उम्र आजकल, लोगो
दुष्यंत कुमार की पूरी गजल तो मुहब्बत को ही समर्पित है-
चाँदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी
फिर मेरा जिक्र आ गया होगा
बर्फ-सी वो पिघल रही होगी
कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी
सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शम्मा सी जल रही होगी
तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फसल रही होगी
जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी गजल रही होगी
उनकी प्रकाशित कृतियों में कविता संग्रह-सूर्य का स्वागत आवाजों के घेरे, जलते हुए बन का वसंत, गजल संग्रह-साए में धूप तथा काव्य-नाटिका-एक कंठ विषपायी प्रमुख हैं। दुष्यंत कुमार की जिन गजलों और कविताओं को याद किया जाता है उनमें से प्रमुख रचनाओं के
अंश देखें ः
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है
कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे
दास्ता अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिंजरा उन के पिंजरे में सुआ
जिस तरह चाहो बजाओं तुम हमें
हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं।
थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आएँगे
दुष्यंत कुमार ने गजलों को कहते समय भाव पक्ष को अधिक ध्यान दिया है। चाहे शास्त्रीयपक्ष का अतिक्रमण क्यों ना करने पडे लेकिन वे हिन्दी गजल को संवेदनात्मक बदलाव की ओर ले गये।
उनकी गजले सौंदर्यवादी होते हुए भी जनवादी गंजले बन गई जो संसद से सडक तक परिवर्तन की बात को, आम से खास तक को सुनाकर सोचने को विवश करती हैः-
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ,
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दआ
गिडगिडाने का यहाँ कोई असर होता नहीं
पेट भर कर गालियाँ दो आह भर कर बद्-दुआ
इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
जब तलक खिलते नहीं है कोयले देंगे धुआँ
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कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए
देश की आजादी के बाद के मोह भंग की स्थिति
खडे हुए थे अलावों की जाँच लेने को,
सब अपनी अपनी हथेली और जला के बैठ गए
और फिर इस बेबसी और लाचारी के विरुद्ध विद्रोह करने वाले स्वर काट दिए गए, इसीलिए दुष्यंत कुमार कहते हैंः
लहू-लुहान नजारों का जिक्र आया तो
शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए।
दुष्यंत कुमार प्रेरणा भी देते हैं
जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
(गुलमोहर देश के उस गौरव का प्रतीक है, जो शायद समस्याओं के बावजूद हर भारतीय महसूस करता है)। ‘साये में धूप’ गजल संग्रह दुष्यंत कुमार की एक ऐसी पुस्तक है जिस की कोई गजल तो क्या, एक-एक ‘शेर’ भी अपनी अलग वजूद रखता है। गजलकार दुष्यंत नेअपनी पूरी जिन्दगी समाज के उन कुरीतियों और विद्रोह के लिए समर्पण कर दिया उसके लिए वो ता-उम्र लिखते रहे और लडते रहे। वे अपने आप में एक खुशनुमा इंसान थे और साथ ही वही वे व्यवस्था के लिए एक थे। विद्रोह एक आग थे। वे अपने उसूलों पे चल के साधारण सी जिन्दगी जीने वाले दुष्यंत जहाँ अपनी लेखनी से आग उगलते थे वहीं प्यार की मीठी फुहार भी बरसाते थे। अपने युग की पीडा को पूरी शिद्दत के साथ उन्होंने महसूस किया और उसे पूरी ईमानदारी के साथ कागज पर उतारा है। दुष्यंत की गजलें आज के सच को उजागर करती हैंः
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’ ?
ए-३०५ ओ.सी.आर. बिल्डिंग, विधानसभा मार्ग, लखनऊ (उ.प्र.)