तुलसीदास और भानुभक्त आचार्य : रामाख्यान परंपरा के अमर गायक

डॉ. संध्या कुमारी सिंह


रामाख्यान या रामकथा से भारतीय समाज के रेशे अत्यंत प्राचीन काल से जुडे रहे हैं साथ ही भारत से बाहर का इतर समाज भी राम कथा से प्रभावित और प्रेरित होता रहा है। भारत की हर भाषा और हर संस्कृति में रामाख्यान के आदिम बीज मिलते हैं। हर भाषा-भाषी समाज ने राम के आख्यान को अपने साहित्य में पिरोया है, अपने चिंतन और जीवन-शैली में किसी न किसी रूप में समाहित किया है। मान्यता है कि विश्व की लगभग तीन सौ भाषाओं में राम का आख्यान अपने विविध आयामों के साथ मौजूद है। यहाँ तक कि राम की कथा हमारे पडौसी देशों में जातीय स्मृति और चेतना का आधार भी बनी है। यहाँ कोई साधारण बात नहीं है बल्कि यह रामाख्यान की विविधता और आयामों को दर्शाता है। जहाँ तक हिंदी और नेपाली भाषा की बात है, तो ये दोनों भाषाएँ भी इस रामाख्यानक परम्परा का अपवाद हैं और इन दोनों में रामाख्यान को अपने समय और समाज को पहचानने और दिग्दर्शित करने के लिए अपनाया गया है।
<br/>रामाख्यान या राम-कथा पर बात करते वक्त यह समस्या आती है कि आज रामाख्यान को किस रूप में पढा जाए या देखा जाए। प्राथमिक स्तर पर इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि राम-कथा का अनवरत विकास होता रहा है। समय और स्थान के अनुरूप राम की कथा अपने कलेवर और अर्थ बदलती रही है। इसलिए यह जरूरी है कि रामाख्यान पर बात करते वक्त तयशुदा ढाँचों को तोडा जाए यानी इस पर उदारता के साथ बात की जाए। रामाख्यान को देखने और समझने की विविध दृष्टियाँ हो सकती हैं और होनी भी चाहिए। किसी भी कृति को पढने और समझने की अपनी कुछ कसौटियाँ होती हैं। परंतु सबसे बेहतर कसौटी यह है कि हम उस कृति को उसके समय और काल से निकालकर हम अपने वर्तमान में रखकर पढें। क्योंकि कालजयी कृतियाँ हमेशा अपने समय को लांघती हुईं वर्तमान में आती हैं और फिर भविष्य की और उन्मुख हैं। इसी कसौटी पर रामाख्यान को या राम-कथा को देखा जाना चहिए।
<br/>राम की कथा केवल धार्मिक रूपक की कथा मात्र नहीं है बल्कि राम की कथा मानवीय मूल्यों में आस्था रखने की कथा है। इसलिए और संस्कृति के हर नाजुक और संकटपूर्ण मोड पर हर भाषा के संवेदनशील रचनाकार राम कथा की ओर देखते रहे हैं। इसका कारण यह है कि रामाख्यान जीवन की स्वीकृति का और जीवन के राग-विराग का आख्यान है। इसलिए हर देश, हर जाति की श्रमशील और जुझारू जनता को राम कथा में अपनी संघर्षशलता, मानवीय वेदना-संवेदना और आस्था को कहीं न कहीं ठौर मिलता है। यही कारण है कि हर काल और दिक में राम की कथा अपनी महता सिद्ध करती आई है। चूँकि आज सबसे ज्यादा संकट मानवीय मूल्यों पर दिखाई पड रहा है, मानवीय मूल्यों से हमारी आस्था डिग रही है, अतः यह जरूरी है कि राम कथा को हम आज के इस परिदृश्य में इस तरीके से देखें ताकि मानवीय मूल्यों में हमारी आस्था अक्षुण्ण बनी रहे।
<br/>तुलसीदास और भानुभक्त आचार्य अपनी-अपनी भाषा और समाज के कालजयी रचनाकार हैं। १६ वीं शताब्दी के तुलसीदास (१५३२-१६२३) और १९ वीं शताब्दी के भानुभक्त (१८१४-१८६९) के समय में लगभग तीन सौ वर्षों का अंतराल है। इसके बावजूद दोनों एक भाव-भूमि पर खडे दिखाई देते हैं। दोनों ने राम-कथा को जन-जन के कंठ तक पहुँचाया। दोनों ने अपनी विलक्षण लेखनी से राम-कथा को अपने समय तथा समाज के सामने आदर्श-संहिता के रूप में रखा है।
<br/>हिंदी में राम-कथा को वृहद् जनमानस तक पहुँचाने और अपार लोकप्रियता दिलाने का श्रेय महाकवि गोस्वामी तुलसीदास को जाता है जिन्हें आचार्य रामचंद्र शुक्ल लोकनायक कवि की उपाधि देते हैं। लोकवादी कवि तुलसी की अमर कृति ‘रामचरितमानस’ वस्तुतः एक ऐसी कृति है जो राम के चरित्र को मानवीय गरिमा के आभा से मंडित करके मानवीय मूल्यों को अपने समय की सबसे बडी जरूरत सिद्ध करती है और आख्यान ही आख्यान में भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के समन्वय का सुन्दर उदाहरण भी गढती है।
<br/>‘रामचरितमानस’ की रचना सं. १६३१ में हुई थी। यह रामायण की परम्परा में होते हुए भी वाल्मीकि के संस्कृत रामायण का अनुवाद मात्र नहीं है, बल्कि तुलसीदास ने रामायण को अपने समय और समाज के अनुरूप पिरो लिया है। तुलसी जिस समय और समाज को संबोधित कर रहे थे वह समय और समाज मध्य काल का था, सामंती राजतन्त्र द्वारा संचालित था तथा साथ ही अनेक सम्प्रदायों में बंटा था। अनेक मत मतान्तर अपने-अपने प्रभावों और दुष्प्रभावों के साथ उस समय चल रहे थे। ऐसे समय में तुलसी जिस चरित्र को या आख्यान को अपने समाज और समय के लिए चुनते हैं वह राम का चरित्र है, वह राम का आख्यान है जो इन तमाम भेदों से ऊपर के लिए चुनते हैं वह राम का चरित्र है, वह राम का आख्यान है जो इन तमाम भेदों से ऊपर उठते हुए केवल मानवीय सत्य की बात करता है। असल में वह भक्ति आन्दोलन के समय में बुना हुआ चरित्र है। भक्ति आन्दोलन, जिसकी सबसे बडी देन है कि उसने मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखना और पहचानना सिखाया। हमारे समाज का सामंती ढाँचा मनुष्य को जाति, वर्ण, धर्म, लिंग आदि में बाँटकर देखने का अभ्यस्त था। इसके विपरीत भक्ति आन्दोलन इस बात पर बल दे रहा था कि मनुष्य की पहली और अंतिम पहचान उसका मनुष्य होना ही है। ऐसे भक्ति आन्दोलन को दिशा देने के के लिए तुलसीदास मर्यादा पुरुषोत्तम राम को आधार बनाते हैं। यह उस समय की सबसे बडी जरुरत भी थी कि जनमानस के सामने मूल्यों की स्थापना के लिए उपदेशकों की तरह उपदेश नहीं देते हैं बल्कि स्वयं को उदाहरण बनाकर जनमानस के सामने अपने आपको प्रस्तुत करते हैं। यानी यह नायक खुद अपना दर्पण और सक्रियता तथा कर्मठता की मिसाल बनता है। शक्ति, शील और सौन्दर्य के ताने-बाने से तुलसी अपने राम के चरित्र को बुनते है। शक्ति के साथ शील और सौन्दर्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है तुलसी के राम में। इन तीनों के मणिकंचन योग से राम लोकनायक बनते हैं।
<br/>यह लोकनायक एक तरफ मानवीय करुणा से आप्लावित है तो दूसरी तरफ असत्य, अधर्म और अन्याय के लिखाफ सक्रिय प्रतिरोध भी प्रकट करता है। एक ऐसा नायक जो मानवीय मर्म को पहचानता है इसलिए अपने आदर्शों का मान रखने के लिए वनवास भी सहर्ष स्वीकार कर लेता है। राजकीय जीवन का परित्याग करने में राम को एक क्षण की देरी नहीं लगती है। सत्ता का मोह राम को बाँध नहीं पाता। राम का वनवास असल में मुख्यधारा से कटे हुए लोगों से, जातियों से, उपजातियों से, समूहों से, समाजों से मिलने और उन्हें जानने का एक उपक्रम बनता है। राम की वनवास यात्रा एक तरह से अपने समय को और अपने समाज को समग्रता में देखने की यात्रा है। और इसी यात्रा के क्रम में राम मानवीय सत्य की स्थापना करते हैं। यह यात्रा सहज नहीं है इस यात्रा में संघर्ष कदम-कदम पर हैं। वे अविरल और अनवरत संघर्ष करते हैं। ऐसे कर्मयोगी राम के आख्यान को तुलसी जन मानस में स्थापित कर रहे होते हैं।
<br/>तुलसी के राम वाल्मीकि और भवभूति के राम से अलग हैं। वाल्मीकि के राम तो मनुष्य हैं पर तुलसी अपनी राम भक्ति की वजह से राम को एक तरफ विष्णु का अवतार बताते हैं मनुष्य दूसरी तरफ उसी अवतारी राम में मानवीय गुणों का आलोक भी प्रज्जवलित करते हैं। कहीं-कहीं तुलसी के राम ईश्वरीय अवतार से ज्यादा मानवीय दिखते हैं। अपने इसी मानवीय रूप को विस्तार देने के लिए तुलसी के राम समाज के उन लोगों को अपना आत्मीय बनाते हैं जिन्हें समाज हाशिए पर रखता है। केवट, निषाद, जटायु, शबरी-सब राम के अपने आत्मीय-बंधु हैं प्रकारांतर कहा जाए तो तुलसी अपने राम का साधारणीकरण करते हैं पर पूरी गरिमा के साथ। इस साधारणीकरण में राम अपने देवत्व को त्यागकर उस रूप में आ जाते हैं जहाँ ‘जाकी रही भावाना जैसी, प्रभु मूरति देखि तिन तैसी’ के तर्ज पर राम सबके अपने बन जाते हैं। यही राम का जनतात्रिक रूप है।
<br/>तुलसी का रामचरितमानस एक ऐसी कृति है जो कथा-काव्य के रूप में हमारे सामने आती है। जिसमें समाज के हर वर्ग, हर तबके से विविध प्रकार के चरित्र हैं, और उन नाना प्रकार के चरित्रों से नानाभावों और मनोदशाओं के द्वारा सामाजिक आदर्शों की बात की गई है। इस कथा के केंद्र में राम हैं पर यहाँ राम अकेले नहीं है। राम के साथ उनका पूरा परिवार है। उनके जरिये पारिवारिक आदर्शों की बात की गई है। चाहे सीता हो, या लक्ष्मण या भरत हों- सब अपने-अपने आदर्शों की कसौटी पर खरे उतरते हैं। कोई असफल नहीं होना चाहता। एक तरह से कहें ये सारे पारिवारिक सदस्य राम की ताकत बनते हैं। आज जब पारिवाकि मूल्य ध्वस्त हो रहें हैं, स्वार्थों की आपाधापी में पारिवारिक सम्बन्ध कुचले जा रहे हैं तो ऐसे समय में राम और राम के परिजन कुछ रोशनी तो देते ही हैं।
<br/>सामाजिक आदर्श को गढने में पारिवारिक आदर्श अहम् भूमिका निभाते हैं। इसलिए यहाँ राम के साथ उनका परिवार भी है और एक पूरा समाज भी है जिसमें मित्र हैं, शत्रु है, खल संत हैं, मानव हैं, बानर-रीछ हैं, वनवासी भी हैं तो कोल-किरात-भील जैसी आदिवासी जातियाँ भी हैं। एक तरह से कहें तो यह कह सकते हैं कि पूरा समाज जिसमें मानव और मानवेतर जातियाँ भी हैं, अपनी दुर्बलताओं और सबलताओं के साथ उपस्थित है। पूरे समाज के चित्रण के बिना सामाजिक यथार्थ को समग्रता में देखा नहीं जा सकता, इसलिए तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ भारतीय समाज का सम्पूर्णता में प्रतिनिधित्व करता है।
<br/>रामचिरतमानस के सन्दर्भ में एक और बात जिसका उल्लेख करना जरूरी हो जाता है और वह है-रामराज्य की परिकल्पना। रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में रामराज्य की बात की गई है। दरअसल यहाँ तुलसी रामराज्य के रूप में एक लोकतांत्रिक सपना देखते हैं- ‘‘कीरति भनिति भूति भली सोई, सुरसरि सम सब कर हित होई।’’ जहाँ सभी बिना भेदभाव तथा भय के रह सके। यानी तुलसी सामाजिक समरसता की बात कर रहे हैं। सामाजिक समरसता किसी भी लोकतंत्र की सबसे बडी ताकत होती है। सामाजिक समरसता के बिना लोक का मंगल हो ही नहीं सकता। ‘जासुराज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी।’ यानी जिसके राज में प्रजा दुखियारी हो उसे राज करने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए रावण-राज्य नष्ट होता है। रावण-राज्य प्रतीक है अन्याय का, असत्य का, अधर्म का और अहंकार का। जाहिर-सी बात है सत्ता का यही चरित्र सत्ता को ले डूबता है। रावण-राज्य के बरक्स राम-राज्य की परिकल्पना करना जनता के पक्ष में खडा होना है। रामराज्य को लोकतंत्र से जोडना तुलसीदास के प्रगतिशील दृष्टिकोण को दर्शाता है।
<br/>नेपाली भाषा और समाज में राम-कथा को जातीय चेतना का केंद्र बनाने का श्रेय भानुभक्त आचार्य को है। भानुभक्त की ‘भानुभक्त रामायण’ नेपाली भाषा की वह अमर कृति है जिसने नेपाली जाति को जातीय एकता के सूत्र में बाँधा और उन्हें उस परम्परा में जोड दिया जो परम्परा राम के आख्यान से जुडी हुई थी। भानुभक्त जब नेपाल में राजतंत्र प्रचलित था। गोरखा नरेश राजा पृथ्वी नारायण शाह का शासन था और वे अपनी विस्तारवादी नीति के चलते नेपाल को हमेशा युद्ध की आग में झोंकें रखते थे। जाहिर है युद्ध की परिस्थितियाँ किसी भी देश के लिए शुभ नहीं होत। जब राजनीतिक हालात बेहतर न हों तो सामाजिक स्थिति संतोषजनक कैसे हो सकती है? सामाजिक अव्यवस्था का सीधा असर आम जन पर पडता है। उस समय की परिस्थितियाँ बताती हैं कि जनता
<br/>बेहाल थी। ऐसे समय में भानुभक्त राम की कथा को अपने उस जनमानस के सामने रख रहे थे जो राजतन्त्र द्वारा प्रताडित थी।
<br/>भानुभक्त का यह कदम-राजतन्त्र के बदले रामाख्यान की शरण म जाना एक तरह से राजतन्त्र की खिलाफत करना भी है। रामाख्यान को आम जनता की बोली में उनके सामने रखकर उनकी चेतना को परिमार्जित करने का महत्वपूर्ण कार्य भानुभक्त करते हैं। भानुभक्त अध्यात्म रामायण को अपनी मौलिक उद्भावनाओं से नेपाली भाषा और संस्कृति के आत्म सम्मान का प्रतीक बनाते हैं। भानुभक्त भी अपने समाज के लिए शक्ति, शील और सौंदर्य से समन्वित राम के चरित्र के चरित्र को आदर्श नायक के रूप में चुनते हैं। इसका कारण यह है कि भानुभक्त जिस राजतन्त्र की तानाशाही के शिकार थे और उनके साथ-साथ नेपाल की आम जनता भी उसी तंत्र से त्राहि-त्राहि कर रही थी उसके सामने एक लोकतांत्रिक विकल्प के तौर पर राम के आदर्श और संघर्ष पूर्ण चरित्र के आलावा और कोई रास्ता न था। इसलिए भानुभक्त रामाख्यान को अपने नेपाली समाज के जातीय एकता और मतादर्श के लिए अपना पाथेय बनाते हैं।
<br/>भानुभक्त राम-कथा को नेपाल की संस्कृति के अनुरूप नई मौलिक उद्भावनावों के साथ पुनः सृजित करते हैं। राम के साथ राम-कथा के अन्य पात्रों को भी नया रूप-रंग-आकार देते हैं। जैसे भानुभक्त राम को ब्रम्ह के रूप में चित्रित करते हैं। उनके चरित्र में न मानवीय दुर्बलताएँ हैं और न मानवीय मनोभाव। उन्हें सुख-दुःख व्यापते ही नहीं हैं। भानुभक्त तुलसीदास की तरह यह मानते हैं कि राम का अवतार भक्तों को कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ है-‘‘भू भार हर्न निमित्त आज भगवान् यस पृथ्वी तल मा धारया।’’ यहाँ राम भले ही अवतार लेते हैं परन्तु वैष्णव संप्रदाय के मतानुरूप नहीं हैं बल्कि नेपाली संस्कृति के मानदंडों पर निर्मित राम हैं। इस प्रसंग में हमारी दृष्टि भानुभक्त के ‘रामायण’ में अयोध्या कांड के श्लोक संख्या ६० पर जाती है जहाँ भानुभक्त लिखते हैं- ‘‘गंगा पार तरि मिर्ग मारि पहुवा तारेर खाया तहां। तेसरो वास रघुनाथ तहीं भयो एक वृक्ष का तल महान म्हण म्हण महँ।।’’ यहाँ लक्ष्मण, कौशल्या, सीता, अहिल्या आदि के चरित्र में भी नए रंग और नए पुट देखने को मिलते हैं। रामकथा में उन्होंने अपने देश की सामाजिक रीतियों, वेशभूषा, भौगोलिक विशेषताओं आदि को प्रकट कर दिया है जिसके फलस्वरूप नेपाली रामायण वास्तव में नेपाल की आदि रामायण बन जाती है जिसमें नेपाली संस्कृति जीवंत हो उठी है। अपनी रचना में भानुभक्त ने कुछेक नए प्रसंग जोडे भी र्हैं। इन में भानुभक्त नेपाल की अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं की रक्षा करते हुए देखे जा सकते हैं।
<br/>समग्रतः हम देखते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास और भानुभक्त आचार्य रामाख्यान परम्परा के दो ऐसे गायक हैं जिसमें एक राम भक्त है तो दूसरा राम भक्त न होते हुए भी इस रामाख्यान परम्परा से जुडता है और राम कथा से अपने देशवासियों को जोडता है। ये दोनों महाकवि राम की कथा के जरिये अपने समाज की आत्मा को स्पर्श करते हैं, अपने समाज की प्रबुद्धता को नई दिशा देते हैं, अपने समाज की जिजीविषा को बचाए रखते हैं। दोनों ही रामायण की प्राणवत्ता और प्राणशक्ति से परिचित थे। इसलिए ये दोनों चेतनाशील महाकवि अपनी-अपनी भाषा और समाज की जातीय चेतना का निर्माण कर सके हैं। तुलसीदास और भानुभक्त अपने समय और हमारे अपने समय की भी सबसे बडी आवाज बनते हैं। इस आवाज की एक और खूबी है कि इस में ईमानदारी और लोकमंगल का समन्वय है। इस समन्वय का प्रमाण है कि आज भी गोस्वामी तुलसीदास और भानुभक्त आचार्य अपनी-अपनी रचनाशीलता से रामाख्यान परम्परा के अमर गायक बने हुए हैं। ऐसा नहीं है कि इनमें अंतर्विरोध नहीं है। पर ये दोनों अपने अंतर्विरोधों को लांघते हुए ये साहित्य और समाज के सापेक्ष चिरंतन मूल्यों के साथ खडे दिखाई
<br/>देते हैं। ?
<br/>फ्लैट-१६/ए, मांगलिक अपार्टमेंट १६७/८७, घोषवाडा रोड, बैरकपुर, कोलकाता-७००१२०, मो. ८९८१६१३९७२
<br/>हार्दिक बधाई
<br/>राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ को राजस्थान सरकार ने राज्य मंत्री स्तर का दर्जा प्रदान किया है। इसके लिए बधाई एवं शुभकामनाएँ ।
<br/>-समस्त अकादमी परिवार
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