प्रेमचन्द के उपन्यासों में स्त्री सशक्तीकरण

प्रो. डॉ. उमाकुमारी


हिन्दी गद्य साहित्य का सम्राट प्रेमचन्द आधुनिक हिन्दी साहित्य नभ का सूरज है। सन् १८८० में जन्मे प्रेमचन्द उर्दू साहित्य से होकर हिन्दी साहित्य क्षेत्र में प्रविष्ट हुए और साधारण मनुष्य के यथार्थ जीवन के चित्रण के द्वारा हिन्दी गद्य साहित्य को एक नया मोड दे दिया। उनकी रचनायें हिन्दी साहित्य की अनमोल निधियाँ हैं जो विश्व साहित्य की महत्वपूर्ण रचनाओं से तुलना योग्य हैं। यदि प्रेमचन्द को हिन्दी साहित्य से अलग करें तो वह ऐसा लगेगा जैसे सुगन्ध रहित कुसुम। हिन्दी गद्य साहित्य को नवोन्मेष तथा
<br/><br/>नव जीवन प्रदान करके उसे समृद्ध बनाने में प्रेमचन्द का योगदान
<br/><br/>अविस्मरणीय है।
<br/><br/>प्रेमचन्द ने ग्यारह उपन्यासों की रचना की। उनके सभी उपन्यासों में साधारण मध्यमवर्गीय मनुष्य के जीवन में भरी समस्याओं एवं संघर्षों का यथा-तथा चित्रण देखने को मिलता है। वे एक जनवादी साहित्यकार थे जिन्होंने मानवमूल्यों को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। गाँधीवाद का प्रभाव भी उन पर पडा था। पे*मचन्द के सभी उपन्यास उनके जीवन दर्शन के परिचायक हैं। समाज में फैले अन्यायों, विसंगतियों एवं अन्धविश्वासों का उन्मूलन करके साधारण जनता के जीवन को आसान बनाने की कोशिश वे करते रहे। अपने आदर्शों से साहित्य को समृद्ध बनाकर उसके द्वारा जन-जीवन को सुधारना उनका लक्ष्य था। ‘‘प्रेमचन्द साहित्य को जीवन की आलोचना या व्याख्या मानते हैं। उसके द्वारा मानवीय चरित्र पर, जीवन पर वे प्रकाश डालना चाहते हैं। साहित्य को आप केवल दिलबहलाव की चीन नहीं मानते, बल्कि उसे लोकमंगल का सशक्त सामाजिक साधन समझते हैं।’’१ उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व बेजोड था। ‘‘प्रेमचन्द परिश्रमी एवं कर्मठ थे, परन्तु विचारों में उच्च और रहन-सहन में सादगीपूर्ण थे। उनका मानवपक्ष बडा सशक्त और विकसित था, अतः उनकी संवेदना और सहानुभूति अत्यन्त व्यापक थी। समाज के दलित, पीडित, दीन-दुखिया लोग, शोषित मजदुर भोले-भाले किसान, सामाजिक व्यवस्था के शिकार स्त्री-पुरुष, मध्यवर्ग के नौकरीदार और व्यवसायी, अधिकारी, जमींदार सभी के लिए उनके साहित्य में यथोचित स्थान
<br/><br/>मिला है।’’२
<br/><br/>प्रेमचन्द के उपन्यासों में यथार्थ सामाजिक जीवन के चित्रण करते वक्त स्वाभाविक रूप से अनेक पुरुष एवं नारी चरित्रों का उद्घाटन हुआ है। नारी पात्रों के केन्द्र में रखकर उन्होंने ज्यादा उपन्यासों का गठन नहीं किया। निर्मला, सेवासदन आदि कुछ को छोड कर उपन्यासों में नारी पात्रों को अधिक महत्व नहीं दिया गया है। प्रेमचन्द से पूर्व हिन्दी साहित्य में ज्यादातर नारी पात्रों का चित्रण केवल विलास का साधन या पुरुष की सपंत्ति के रूप में हुआ है। उसमें नारी को ज्यादा महत्व या स्थान नहीं था।
<br/><br/>प्रेमचन्द के समय देश भर में स्वतंत्रता आन्दोलन हो रहा था। देश के सामाजिक, राष्ट्रीय, धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों में परिवर्तन का स्वर गूँज रहा था। इन सबका प्रभाव नारी पर भी पडा और स्त्री अपने अधिकार एवं महत्व के बारे में अवगत होने लगी। एक कठपुतली की तरह रहने को अब वह तैयार नहीं थी। इस तरह नारी जीवन में उत्पन्न बदलाव का चित्रण प्रेमचन्द के उपन्यासों में देख सकते हैं। ‘‘प्रेमचन्द, गांधीवादी जीवन-मूल्यों पर विश्वास रखते थे और गांधी नारी की अदम्य शक्ति के संपूर्ण विकास के पक्षधर थे। जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति के पथ पर आगे बढने के लिए नारी का आवाहन किया और नारी ने भी उस आवाहन को प्रचण्ड प्रमाण में दाद दी।’’३
<br/><br/>प्रेमचन्द नारी शिक्षा को आवश्यक समझते थे। उनका मत था- ‘‘जब तक सब स्त्रियाँ शिक्षित नहीं होंगी और सब कानून-अधिकार उनको बराबर न मिल जायेंगे, तब तक महज बराबर काम करने से भी काम नहीं चलेगा।’’४ अपने उपन्यासों के पात्रों के द्वारा भी उन्होंने इस बात का समर्थन किया है। ‘गबन’ नामक उपन्यास के पात्र पं. इन्द्रभूषण का कहना है- ‘‘जब तक स्त्रियों की शिक्षा का काफी प्रचार न होगा, हमारा कभी उद्धार नहीं होगा।’’५ गोदान का पात्र प्रो. मेहता भी ‘वीमेन्स लीग’ के समारोह में भाषण देते वक्त स्त्री-शिक्षा की आवश्यकता और महत्व का उद्घाटन करता है।
<br/><br/>प्रेमचन्द के उपन्यासों में पात्रों की बहुलता होती है तो यह उनकी एक विशेषता है। नाना-विध प्रकार तथा विभिन्न स्वभाववाले नारी पात्रों की सृष्टि उन्होंने की। उनके नारी पात्रों में असाधारणता या अस्वाभाविकता का नाम और निशान लेशमात्र नहीं है। वे सब समाज में जीती औरतों के प्रतिनिधि हैं। उच्चवर्ग की नारियों का चित्रण उन्होंने बहुत ही सहजता से किया, परन्तु निम्न तथा मध्यवर्ग की औरतों का चित्रण उन्होंने अधिक किया है। ‘गबन’ नामक उपन्यास में मध्यवर्ग की खोखली प्रवृत्तियों तथा प्रदर्शनों की भावना का चित्रण हुआ है। इस उपन्यास की नारी पात्र ‘जलपा’ पहले आभूषण आदि पर तत्पर, अपनी स्थिति से अनजान औरत थी। लेकिन जीवन में विपरीत परिस्थिति आ जाती है तो उसमें अपूर्व साहस भर आता है और वह तपस्विनी जैसी हो जाती है। उस साधारण नारी में जो परिवर्तन आ जाता है उसकी वजह उसके हालात ही हैं जो उसमें छिपी शक्ति को जगाते हैं, जिससे उसके जीवन का रुख ही बदल जाता है। उसी तरह गोदान का नारी पात्र मालती धन लोलुप, स्वार्थ डॉक्टर थी जो धनी चिकित्सार्थिय की सेवा करने में रुचि रखती थी। बाद में उसके चरित्र में परिवर्तन आ जाता है और उसमें सेवा भाव जाग उठता है। मालती और सरोज मध्यवर्गीय नारी को नया-पथ दिखाती हैं। मालती वैवाहिक जीवन को बन्धन में पडने को तैयार नहीं होती। वह अपनी शक्ति को मानव कल्याण के लिए प्रयुक्त करना चाहती है। वह मेहता से कहती है ‘‘हम पुरुषों से सलाह नहीं माँगतीं। अगर वह अपने बारे में स्वतंत्र हैं तो स्त्रियाँ भी अपने विषय में स्वतंत्र हैं।’’गोदान की ‘धनिया’ नामक अनपढ, गँवार औरत भी किसी से नहीं डरती। वह भी जीवन भर संघर्ष करती रहती है। सामाजिक कुरीतियों तथा पुरुष समाज के कुत्सित व्यवहारों पर वह तीखा प्रहार करती है। मालती जैसे पात्रों के द्वारा उपन्यासकार ने यही साबित किया है कि मनुष्य में खासकर के, औरतों में अच्छाई तो है ही, बस उसे जगाने की जरूरतभर है।
<br/><br/>‘सेवासदन’ उपन्यास मध्यवर्गीय नारी-मनोविज्ञान का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास की नारी पात्र सुगन ने भी जीवन में भोगलालसा को महत्व दिया जिसने उसे एक वेश्या बनने को मजबूर किया। वेश्या जीवन के कटु अनुभवों से उसकी आँखें खुल गयीं और उसे महसूस हुआ कि उसने अपने जीवन में क्या खोया है और क्या पाया है। आखिर उसे बुराई से अच्छाई की ओर भागना ही पडा। वह वेश्या-जीवन को हमेशा के लिए छोडकर, सेवासदन में सेवा कार्य में जुड कर अपने जीवन को एक नया मोड देती है। इस तरह वह सबसे निम्न स्थिति से सबसे ऊँची स्थिति पर पहुँच गयी, या यूँ कहें उपन्यासकार ने उसे पहुँचाया। अपनी शक्ति, अपनी अपनी हैसियत को आखिर, उसने जान लिया जिससे उसके व्यक्तित्व एवं जीवन में ऐसा परिवर्तन आ गया। यह भी ध्यान देने की बात है कि सुमन को उसके समाज ने ही वेश्या बनाया, सामाजिक कुरीतियों का शिकार होकर उसका जीवन उजड गया। अनेक ऐसी मध्यवर्गीय औरतों के प्रतिनिधि के रूप में प्रेमचन्द ने उसको प्रस्तुत किया है। स्त्री वात्सल्य, सेवा, प्रेम एवं त्याग का मूर्त रूप होती हैं, यही उसकी शक्ति हैं, यही उसका आभूषण है। जब उसमें निहित ये भावनायें जागृत होती हैं तब वह शक्ति स्वरूपिणी बन जाती है। जालपा, मालती, सुमन आदि नारी पात्रों म यही परिवर्तन आया है।
<br/><br/>प्रेमचन्द के ‘प्रतिज्ञा’ नामक उपन्यास की सुमित्रा अपने अधिकारों के प्रति सजग है। वह पुरुष की दासता को स्वीकारना और सहन करना अपमान समझती है। आर्थिक पराधीनता के कारण पुरुष पर निर्भर रहना ही नारी की दुःस्थिति का कारण है, यही सुमित्रा का मत है। उसका कहना है- ‘‘बेचारी औरत कमा नहीं सकती, इसलिए उसकी यह दुर्गति है। मैं कहती हूँ अगर मर्द अपने परिवार भर को खिला सकता है, तो क्या स्त्री अपनी कमाई से अपना पेट नहीं भर सकती?’’७ इसी उपन्यास के अन्य दो नारी-पात्र, प्रेमा और पूर्णा भी औरतों की स्थिति को सुधारना चाहती हैं। इन नारी पात्रों के द्वारा प्रेमचन्द मध्यवर्गीय स्त्रियों में जो निर्भयता एवं अपने पैरों पर खडे होने की जो इच्छा विद्यमान है उसे शक्तिशाली बनाना चाहते हैं। ‘निर्मला’ नामक उपन्यास की नायिका निर्मला को भी अनमेल विवाह का शिकार होना पडता है जिसका कारण है आर्थिक पराधीनता के कारण दहेज न दे पाना। फिर भी चौदह साल की वह लडकी टूटती नहीं, अपने पिता की उम्र के पति को और बच्चों को उसने सँभाला। वह *ान्दगी भर पतिव्रता रही जिसे औरत का सबसे बडा गुण माना जाता है। लेकिन उसके पति का अपनी पत्नी के प्रति शक एवं उसके मन में उपस्थित हीन मनोग्रन्थि की वजह से उसका परिवार टूट जाता है। वह अनपढ लडकी अपने परिवार और पति को बचाने के लिए ज्यादा कुछ न कर पायी। उसके हालात ने उसे स्वार्थी बनाया, उसे सिर्फ अपनी बच्ची की चिन्ता थी। आखिर जन्दगी एवं हालात से लडते-लडते उसके अभिशप्त जीवन का अंत हो जाता है। आर्थिक एवं सामाजिक विषमता के बीच घुटती हुई मध्यवर्गीय नारी जीवन का यर्थाथ चित्रण इस उपन्यास में मिलता है।
<br/><br/>‘कर्मभूमि’ उपन्यास की नारी पात्र ‘सुखदा’ बहुत ही साहसी औरत है। वह अकेले जीवन बिताना चाहती है। उसका कहना है- ‘‘इसी शहर में हजारो औरतें अकेली रहती हैं फिर मेरे लिए क्या मुश्किल है। ...मैं खुद अपनी रक्षा कर सकती हूँ।’’ उसका यह कथन उसके अन्दर छिपी हिम्मत और ताकत का एहसास कराता है। सुखदा मेहनत करनेवालों के लिए लडाई करती है और जेल जाती है। उसकी नस-नस में देशप्रेम, दलित मानव एवं नारी जाति के अधिकार को प्राप्त करने का अरमान आदि भरा हुआ है। सुखदा को प्रेमचन्द ने दृढ संकल्पवासी, कर्मठ एवं सशक्त नारी के रूप में प्रस्तुत किया है। इसी उपन्यास के नैना, मुन्नी आदि नारी पात्र भी अपनी ताकत को पहचान लेते हैं और नारी जाति के लिए कुछ-न-कुछ करना चाहते हैं। ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास की विलसी तथा ‘रंगभूमि’ की सोफिया भी सशक्त नारी पात्रों के उदाहरण हैं। अपने अन्तिम लेकिन अपूर्ण उपन्यास ‘मंगल सूत्र’ के द्वारा भी प्रेमचन्द ने मध्यवर्ग के अन्तर्गत नारी मुक्ति की समस्या को प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास की पुष्पा एक मध्यवर्गीय नारी है जिसे अपने पति केअन्याय को सहना पडता है। अपने प्रगतिशील विचारों के कारण वह समझ पाती है कि आर्थिक अभाव ही पति के ऐसे व्यवहार की वजह है। पुष्पा औरतों को आत्म-निर्भर बनकर पुरुष की दासता से मुक्ति पाने का आह्वान करती है। अपने नारी पात्रों के द्वारा प्रेमचन्द ने मध्यवर्गी नारी के आक्रोश को वाणी देकर उसे जन जन तक पहुँचाने का कार्य
<br/><br/>करते हैं।
<br/><br/>प्रेचन्द ने अपने उपन्यासों के द्वारा मध्यवर्गीय नारी की कमजोरियों को पहचानकर, उनसे मुक्त होकर अपने अन्दर जो शक्ति है उसे जगाकर अपने ही नहीं अपनी बहनों के भी अधिकारों के लिए लडने तथा अन्याय के विरोध करने को तैयार हो जाती है। प्रेमचन्द के उपन्यासों के नारी पात्र अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व रखते हैं और जो अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्यों से अवगत हैं। ?
<br/><br/>संदर्भ :
<br/><br/>१. प्रेमचन्द : एक सिंहावलोकन : संपादक. प्रो. ह. श्री. साने, पृ. १३
<br/><br/>२. वही, पृ. १०
<br/><br/>३. प्रेमचन्द : एक सिंहावलोकन : संपादक. प्रो. ह. श्री. साने,
<br/><br/>पृ. १५१
<br/><br/>४. प्रेमचन्द : घर में : श्रीपत राय, शिवरानी देवी, पृ. २६०
<br/><br/>५. गबन : प्रेमचन्द, पृ. १०३
<br/><br/>६. गोदाम : प्रेमचन्द, पृ. १६४
<br/><br/>७. प्रतिज्ञा : प्रेमचन्द, पृ. ११०
<br/><br/>८. कर्मभूमि : प्रेमचन्द, पृ. १२३
<br/><br/>नेदुम्परंपिल, कुलत्तूर, करिमणल पौ.ओ.
<br/><br/>तिरुवनंतपुरम-६९५५८३ (केरल)
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