डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय से डॉ. अशोक कुमार बैरागी का संवाद

डॉ. अशोक बैरागी


डॉ. अशोक कुमार : हिन्दी भाषा के विकास में योगदानकर्ताओं में आप स्वयं को किस रूप में देखते हैं?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - मेरा जो योगदान है वह हिन्दी भाषा के लेखक के रूप में है। इस विषय में मेरी दो पुस्तकें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं - ‘हिन्दी कल आज और कल’, दूसरी - ‘बाजारवाद में हिन्दी और हिन्दी का बाजार’। मैंने हिन्दी की छह प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया। ‘साक्षात्कार’ मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् की पत्रिका, दूसरी ‘अक्षरा’ मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की पत्रिका को प्रारम्भ करके संपादक किया। फिर कलकत्ता से ‘वागर्थ’ का संपादन किया जो भारतीय भाषा परिषद् की है। इसके बाद भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘ज्ञानोदन’ का प्रारम्भ एवं संपादन किया। भारत भवन भोपाल से निकलने वाली ‘पूर्वग्रह’ का संपादन किया और साहित्य अकादमी दिल्ली की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ का संपादन किया। इस तरह हिन्दी की प्रतिष्ठित और श्रेष्ठ पद्धिकाओं का संपादन किया। इसके साथ आलोचना, नाटक, निबंध आदि की पचासों पुस्तकें लिखीं और संपादित कीं। यही मेरा लेखक के रूप में योगदान है।
डॉ. अशोक कुमार - आप हिन्दी भाषा का विकास करने के लिए किन-किन संस्थाओं या संगठनों से जुडे? क्या डॉ. बलदेव वंशी द्वारा संचालित अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन से जुडे?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - देखिए, मैं किसी संगठन से नहीं जुडा या किसी आन्दोलन के कार्यकर्ता के रूप में मेरा कोई योगदान नहीं, जैसा मैंने पहले कहा। डॉ. बलदेव वंशी जी हमारे अच्छे मित्र हैं। हम उनके साथ आयोजनों में, गोष्ठियों में जाते रहे हैं, लेकिन कोई सक्रिय कार्यकर्ता नहीं रहा। मैं तो भारतीय भाषा परिषद् का डायरेक्टर रहा। मध्यप्रदेश अकादमी का सचिव रहा। मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य समिति में रहा और भारतीय ज्ञानपीठ का डायरेक्टर रहा।
डॉ. अशोक कुमार - जिस समय से आपने हिन्दी के लिए कार्य करना प्रारम्भ किया उस दौर में और आज के दौर में कई पीढियों का अंतराल आ गया है। आप आज के युवाओं की मानसिकता में क्या परिवर्तन
देखते हैं?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - देखिए, बात ये है कि हिन्दी लोकभाषा है। यह देशभर में बोली जाती है, समझी जाती है। दूसरी कोई भाषा नहीं जो इतनी सहजता से बोली और समझी जाती हो। अब क्या हो गया है कि जो ग्लोबलाइजेशन या वैश्विकरण का वातावरण बना है तो उसमें आ गया है कम्प्यूटर, उसमें आ गया है मोबाइल और आधुनिक शिक्षा और शिक्षा का माध्यम हो गई है अंगे*जी, तो यह मामला केवल हिन्दी का नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं का है। हाल ही में एक अन्तराष्ट्रीय संस्थान ‘भाषा वसुधा’ के सर्वेक्षण से पता चलता है कि ३१० भाषाएँ समरणासन्न हैं। नयी पीढी जिस भाषा को नहीं पढेगी तो वह उसे कैसे समझ पाएगी। आज शिक्षा का माध्यम अंगेजी हो चुका है जो बच्चों के कोमल दिमाग पर इतना बोझ डालती है कि वह उससे उबर ही नहीं पाते। माता-पिता अपने बच्चे के भविष्य के लिए अर्थात उसके व्यावसायिक कैरियर के लिए अपनी चेतना पर अंगे*जी का इतना दबाव महसूस करते हैं कि घर में भी परदेशी भाषा का वातावरण बनाने कि कोशिश करते हैं। नतीजे में ये पीढियाँ लगातार मातृभाषा से शून्य होती जा रही है। ये पीढी ही तो हमारी भाषाओं की आशा है और ये सारी नई पीढी अंगे*जी में पढ रही है। आप बताइए आज जो हिन्दी का साहित्य है उसे आने वाले पढेंगे ही नही तो साहित्य अंग्रेजी में ही लिखा जाएगा।
डॉ. अशोक कुमार - जी, बिल्कुल सही कहा आपने। जब हिन्दी के साहित्य को कोई पढेगा ही नहीं और समझेगा ही नहीं तो हिन्दी का साहित्य अंगे*जी भाषा में लिखा जाएगा या अनुवाद करके उसे ग्रहण किया जाएगा जबकि सृजन शक्ति अपनी ही भाषा में समृद्धि पाती है?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - आज का युवा अपनी भाषा का एक भी वाक्य अंगेजी मिलावट के नहीं बोल सकता। अंगे*जी भारतीय भाषाओं का स्थान लेने के लिए पूरी तरह तैयार है। हिन्दी भाषा में साहित्य लिखना एक लेखक की मजबूरी है कि वह अपनी अभिव्यक्ति अपनी ही भाषा में कर सकता है। सृजन में लेखक के पास अपनी भाषा का विकल्प नहीं है। आज ज्ञान के जितने विषय हैं सब अंगेजी में लिखे जाते हैं। शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, अर्थशास्त्र, उद्योग, व्यापार और अन्य तकनीकी ज्ञान की पुस्तकें अंगेजी में ही लिखी जाती है। पहले ज्ञान के विभिन्न विषयों की पुस्तकें हिन्दी में लिखी जाती थी। आज भारतीय भाषाओं में मौलिक बौद्धिक चिन्तन का ज्ञान विषयों का अकाल-सा हो गया है। जब तक ज्ञान के सभी विषयों का सृजन अपनी भाषा में नहीं हो तब तक भाषा अपने पैरों पर खडी नहीं होती। भारतीय भाषा साहित्य सृजन तक सीमित होकर लंगडी हो गयी है। अभी उसे अपने पैरों पर खडा होने के लिए साहित्येतर विषयों में आना पडेगा।
डॉ. अशोक कुमार - मतलब कि आज का युवा अंगेजी को ही जो आधुनिक जीवन शैली, वैश्विक प्रगतिशीलता का पर्याय मानता है। वह अपने कैरियर बनाने के चक्कर में अंगेजी के व्यामोह में फंसता जा रहा है और इस प्रभुत्ववादी भाषा के आकर्षण में मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशून्य होते जा रहे हैं और हिन्दी को और अधिक विस्तृत करने के लिए जन-जन की भाषा बानने के लिए साहित्येतर विषयों की पुस्तकें हिन्दी में लिखी
जानी चाहिए?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - बिल्कुल, लिखी जानी चाहिए। तभी हिन्दी जन-जन की भाषा बन सकती है अन्यथा भारतीय भाषाएँ खत्म हो जाएँगी और एक भाषा का मरना एक सभ्यता का मरना होता है। भाषा के इस भूमण्डलीकरण ने सबको कैरियर बनाने की शिक्षा मुहैया की है, परन्तु किसी ने मनुष्य बनने की, ज्ञान, सेवा और अन्वेषण के गंभीर क्षेत्रों में अपने को निःस्वार्थ झोंकने की शिक्षा नहीं दी है।
डॉ. अशोक कुमार - संविधान के अनुच्छेद ३४३ (३) में यह प्रावधान है कि संविधान लागू होने से १५ वर्षों तक अंगेजी ही कामकाज की भाषा रहेगी और १९६७ मे भारतीय भाषा अधिनियम १९६७ में इसे अनन्त काल के लिए लागू कर दिया गया। आज सर्वोच्च न्यायालय सहित उच्च न्यायालयों में आवेदन, प्रतिवेदन और निर्णय केवल अंगेजी में ही दिये जाते हैं जबकी हिन्दी सम्पूर्ण राष्ट्र के स्वाभिमान और राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक है। अपनी भाषा के बिना प्रत्येक राष्ट्र गूंगा होता है तो ऐसी स्थिती में क्या हमारी न्याय व्यवस्था गूंगी नहीं हैं?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - हाँ, यह तो एक ऐतिहासिक तथ्य है ही। देखिए, खास बात यह है कि एक ऐसा तरीका निकाला गया है कि हिन्दी संवैधानिक तौर पर जन्मजन्मांतर तक स्वतन्त्र भारत की राष्ट्रभाषा न बन सके। क्योंकि उन्होंने कहा कि यदि एक भी प्रदेश हिन्दी के विरूद्ध होगा तो हिन्दी नहीं बनेगी। अब आप मुझे बताइए कि पूरे देश में कैसे उनकी कही बात लागू हो। दो-चार प्रदेश ही हिन्दी के विरूद्ध खडे हो जाएं तो हिन्दी कभी नहीं बन पाएगी। यह तो हो ही रहा है और हमेशा होगा। अगर कोई यह सर्वे कराए कि अंगे*जी कौन नहीं चाहता। मैं अब की तो कहता नहीं परन्तु १९५०-६० के बीच में अगर यह होता कि अंग्रेजी चाहते हो कि नहीं चाहते हो, तो ज्यादातर प्रदेश यही कहेंगे कि नहीं चाहते। एक भी प्रदेश विरूद्ध हो तो हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं बनेगी यह कोई बात नहीं। मिजोरम, केरल और नागालैण्ड में अंगे*जी ही है। वे कभी चाहेंगे ही नहीं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा बने तो उन्होंने ऐसा नियम बना दिया कि हिन्दी भारत की राजाभाषा, राष्ट्रभाषा जन्मजन्मांतर तक हो ही नहीं सकती। इसलिए हमारा यह कहना है कि यह आन्दोलन होना चाहिए कि संविधान बदलो, संविधान की यह धारा हटाओ। आप पाँच वर्ष और इसे ही रहने दो और पाँच वर्ष बाद हिन्दी हो जाएगी। आप संविधान से यह प्रावधान कि एक भी राज्य विरूद्ध है तो हिन्दी नहीं बनेगी यह तथ्य संविधान से हटाइए। आखिर हमारा संविधान भी तो वोट से ही बना है। हिन्दी को ज्यादा वोट मिले तभी तो वह राजभाषा बनी। तो इसका मतलब यह है कि उस समय भी तो लोग विरूद्ध होंगे। प्रजातंत्र में बहुमत के आधार पर ही निर्णय होते हैं जबकि हिन्दी को लागू करने के संदर्भ में यह बहुमत मान्य क्यों नहीं? संविधान में जो प्रावधान है वह हिन्दी को पूरी तरह खत्म करने को है। ऐसे में हिन्दी कभी भी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकेगी। इसलिए मूलभूत परिवर्तन तो संविधान में ही होना चाहिए। आप कितने ही आन्दोलन कर लीजिये, संगठन बना लीजिए, कितने ही धरने दे दीजिए तो क्या होगा। कुछ नेता कह देंगे कि हम संसद में उठाएंगे। अभी मुलायम सिंह ने क्या कहा पता है आपको?
डॉ. अशोक कुमार - जी, हाँ कल मुलायम सिंह ने कहा हैकि आम बोलचाल की भाषा हर जगह हिन्दी होनी चाहिए।
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - हाँ, इससे क्या होता है कि हम पत्ती-पत्ती सींचते है, इससे कोई पेड बडा थोडे ही होता है। हमेशा सींचा जाता है जड को जबकि आपकी जडें सड गई हैं, आपकी जड कट गई हैं और आप पत्ती सींचते रहो। पेड सूखता रहेगा। यही वर्तमान स्थिति है।
डॉ. अशोक कुमार - क्या कभी आपने व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव किया कि हिन्दी के साथ यहाँ सौतेला व्यवहार हो रहा है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। कोई अनुभव हो तो बताइए?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - हाँ, कई बार। मैं हिन्दी विश्वविद्यालय का सदस्य था। मैं इस बात के लिए वहाँ लडा। सबसे पहले हमें एक ‘विजन प्लान’ दिया अंगेजी में। इसमें २५० पृष्ठों का एक दस्तावेज था ‘विद्या परिषद’ के संदर्भ में। मैं ‘विद्या परिषद’ का सदस्य था और ५-६ वर्ष तक रहा, तो सबसे पहले पहली बैठक में ये बताया गया कि हम क्या चाहते हैं। इस विश्वविद्यालय में हमारी क्या दृष्टि है। तो जो वो ‘विजन प्लान’ था। वो ‘विजन प्लान’ तो खैर नकली था। कम्प्यूटर से उतारा हुआ था। इसलिए विजन तो उसमें कुछ था ही नहीं। लेकिन वो पूरा का पूरा २५० पृष्ठ का जो प्लान था जितना हम लोगों को अध्ययन करना था हमें एक रात पहले दिया गया कि इस पर विचार कीजिए तो मैंने कहा कि मैं इसी वक्त इस्तीफा देता हूँ। दूसरी ओर महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर यह विजन प्लान है भी तो ये अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में भी हिन्दी में नहीं होगा और मैं पूरे पाँच साल तक लडत रहा। मैंने अनेक जगह पत्र भी लिखे लेकिन अंत तक वहाँ के प्राध्यापकों के नियुक्ति पत्र, जिसकी एक कॉपी हमें मिलती थी। वह अंगेजी में ही रहा। वहाँ के सारे प्राध्यापकों के नियुक्ति पत्र अंगेजी में होते थे। अब आप मुझे बताइए कि हिन्दी के बारे में ये तो संवेदनहीनता की चरम सीमा है बल्कि अनुशासनहीनता है, नियमों का उल्लंघन है। हिन्दी विश्वविद्यालय बना किस लिए है?
डॉ. अशोक कुमार - मतलब कि नाम है अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और हिन्दी के लिए ही स्थापित किया गया लेकिन सारे कामों में अंगेजी का प्रयोग करता है वास्तव में हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा था?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - हाँ, यह सब घटिया बात है जो वहाँ हो रही थी। इसके खिलाफ खूब लिखा भी परंतु कोई नतीजा नहीं निकला। नामवर सिंह से कहा कि आफ होते यह क्या हो रहा है तो कहने लगे कि....हाँ...अब क्या बताऊँ, मैंने उस आदमी से कहा...। अरे! ऐसे कहने से क्या होता है।
डॉ. अशोक कुमार - यह तो बडे दुख की बात है कि नामवर सिंह जैसे प्रतिष्ठित धुरंधर लेखक ने भी मन से आपका सहयोग नहीं किया और हिन्दी की उपेक्षा सहन करते रहे?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - और क्या? यह भाषा के प्रति हमारा संवेदनहीनता का ही परिचायक है। अब हम यह बात करते हैं तो कहते हैं ये दकियानुस लोग हैं।
डॉ. अशोक कुमार - सरकार द्वारा अंगेजी को हिन्दी भाषी जनता पर थोपा जा रहा है तो ऐसे में क्या औचित्य रह जाता है राजभाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी का? जबकि सरकार ही अंगेजी का वर्चस्व बनाए रखना चाहती है जिससे एक विशेष वर्ग-इलिट क्लास के स्वार्थ सिद्ध हो रहे हैं? इसमें आप क्या कहगें?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - यह तो बिल्कुल दिखाई पड रहा है। इसमें क्या सम्मति दें। हिन्दी भाषी प्रदेशों में ही सबसे ज्यादा अंगेजी हो गयी है। लोग अपने भविष्य को, कैरियर को देख रहे हैं। हर व्यक्ति स्वार्थी हो गया है। आज देशहित या राष्ट्रीयता की भावना तो बिल्कुल खत्म हो चुकी है। सब अपना-अपना मतलब साध रहे हैं। अपना-अपना धन इकट्ठा कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब राष्ट्रीय भावना ही हमारे भीतर नहीं है तो हम राजभाषा, राष्ट्रभाषा इनकी बात कैसे करेंगे। अगर हमारे यहाँ ‘फ्रेंच’ आ जाए और वह हमारे कामों का, स्वार्थों का माध्यम बनें तो हम उसे ही लिखना, बोलना शुरू कर देंगे। लोग इतना तक नहीं समझते कि यह तो गुलामी का भाषा है।
डॉ. अशोक कुमार - आज देश-विदेश में हिन्दी बोलने व समझने वालों की संख्या और हिन्दी के पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बढ रही है और दक्षिण में हिन्दी का विरोध कम हुअ है, फिर भी हिन्दी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पा रही है?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - नहीं.... कुछ भी नहीं बढ रहा। यह आपकी गलतफहमी है। अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग बंद हो गए हैं और जहाँ कहीं है वहाँ संख्या निरन्तर घट रही है। ये जो हिन्दी वाले एक भ्रांति में जीते हैं, आत्ममोह से घिरे रहते हैं और कहते हैं कि हिन्दी बढ रही है जबकि हमारी हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं का मरण स्पष्ट दिख रहा है। हिन्दी न विश्व में बढ रही है न भारत में। शेष विश्व तो हिन्दी का अध्ययन, अध्यापन और प्रसार तभी करेगा ना जब हिन्दी का वर्चस्व अपने देश में होगा। जब अपने देश में हिन्दी को कोई नहीं पूछता तो वो काहे को पूछेंगे और दक्षिण या पूर्वोतर के अंग्रेजी भाषी राज्य कभी हिन्दी को चाहेंगे, मुझे तो नहीं लगता।
डॉ. अशोक कुमार - भारत एक बहुभाषी देश है आफ दृष्टिकोण से यह बहुभाषिता हमारी उन्नति का आधार है। यदि हाँ तो कैसे?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - क्यों नहीं.....भारत बहुभाषी हमारा गुण है। ‘विविधता में एकता’ तो हमारी भाषायी सांस्कृतिक एकता की पहचान है। बहुभाषी
होना चाहिए।
डॉ. अशोक कुमार - मतलब कि हमारी उन्नति का आधार है?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - हाँ......, देखो ऐसे में दो स्थितियाँ होती है। संसार के हर देश में भाषाएँ अनेक होती हैं। लेकिन उन भाषाओं को जोडने वाली एक प्रमुख भाषा होती है जो वहाँ की केन्द्रीय भाषा होती है। उसी को हम राजभाषा या राष्ट्रभाषा कहते हैं। तो ऐसे ही हमारे देश में भाषायी विविधता का एक गुण है। आप उत्तर म चले जाओ। वहाँ इतनी बोलियाँ हैं कि आप सोच नहीं सकते।
डॉ. अशोक कुमार - उत्तर और पूर्वोतर भारत में सबसे अधिक भाषाओं और बोलियाँ क विविधता है और यह भी कहा जाता है कि ‘चार कोस पर बदले पानी और आठ कोस पर बदले वाणी।’
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - हाँ, वास्तव में वहाँ इतनी बोलियाँ है कि सब समझते भी नहीं इतनी सारी तादाद में हैं। भाषायी विविधता होनी चाहिए। उन्हें पूरी तरह फलना-फूलना चाहिए। उनके विकास के पूरे प्रयत्न किये जाने चाहिए लेकिन उनको जोडने वाली और पूरे देश का काम चलाने वाली एक केन्द्रीय भाषा होती है। उसकी अपनी जगह होनी चाहिए और यह हिन्दी ही हो सकती है।
डॉ. अशोक कुमार - आफ नजारिये से आजादी के बाद कौन-सी भाषा ने देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है ?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - देश के विकास में हिन्दी ने ही योगदान दिया है। अब अंग्रेजी योगदान दे रही है। क्योंकि सब कामकाज अंग्रेजी माध्यम से ही हो रहा है।
डॉ. अशोक कुमार - हिन्दी भाषा को देश की आर्थिक प्रगति का आधार कैसे बनाया जा सकता है?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - आर्थिक प्रगति के जो माध्यम हैं उनमें अगर आप उस भाषा का प्रवेश नहीं करेंगे तो जिस भाषा का वह प्रदेश है तो आर्थिक उन्नति का आधार कैसे बनेगी। आर्थिक प्रगति के माध्यम एक भाषा बोले और आर्थिक प्रगति दूसरी भाषा में हो, तो यह कैसे संभव है?
डॉ. अशोक कुमार - मतलब कि भाषा आर्थिक प्रगति के माध्यमों और उस समाज में संवाद का एक साझा मंच होनी चाहिए। भारत की सांस्कृतिक धरोहर को पुष्ट करने में कौन-सी भाषा ने अधिक महत्वपूर्ण योगदान
दिया है?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - देखिये, बात ऐसी है कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान इनकी एक भाषा थी। चीन से भी अनेक चीजों व भाषा का आदान-प्रदान होता था। यहाँ-वहाँ अनेक चीजो का अनुवाद होता था। गौतम बुद्ध चीन गए, जापान गए, मतलब उनके शिष्य, उनके पुत्र-पुत्री आदि। इन्डोनेशिया, थाइलैण्ड आदि में रामायण गई है, महाभारत गया है। इस तरह से यह आदान-प्रदान चलता रहता है। इनके माध्यम से यह सहयोग बढता है।
डॉ. अशोक कुमार - भूमण्डलीकरण की आँधी में हम अपने भाषायी और सांस्कृतिक बोध को कैसे जागृत व संरक्षित कर सकते हैं?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - आप अपनी भाषा को माध्यम बनाइए। आधुनिक शिक्षा और तकनीकी का माध्यम जब अपनी भाषा बनेगी तो सब संभव है। और यह क्यों नहीं हो सकता। जब जापान, जापानी में सभी तकनीकी काम करता है, चीन करता है, जर्मनी करता है, रूस करता है तो हम क्यों नहीं कर सकते हैं। हिन्दी और देवनागरी लिपि विश्व की सर्वाधिक समृद्ध लिपि है जिसमें संसार की सभी भाषाएँ और हर तरह के उच्चारण लिखे जा सकते हैं। अंगेजी या फ्रांसिसी में सभी उच्चारण नहीं किये जा सकते हैं लेकिन जो फ्रांसीसी या अंगेजी में लिखा है उसका उच्चारण हिन्दी में कर सकते हैं। इससे बढकर लिपि हो ही नहीं सकती। हमारे पास तो है वह शक्ति, पर हम उसका इस्तेमाल करें तब ना। बिलगेट्स ने कहा ही था कि अगर बोलकर लिखने वाली भाषा कम्प्यूटर पर आई तो उसमें सबसे पहले नागरी होगी।
डॉ. अशोक कुमार - जी बिल्कुल सही बताया क्योंकि प्रत्येक भाव, भाषा के लेखन व सम्प्रेषण का गुण नागरी लिपि में है। यही संसार की सर्वाधिक वैज्ञानिक और सरल भाषा है। आजकल अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, हिन्दी अधिकारियों की नियुक्ति हैं तो क्या इनसे कुछ हिन्दी का हित होगा या यह केवल अपने व्यापारिक हितों की पूर्ति करना है?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - अरे! इससे क्या होता है, इतनी छोटी बात से कुछ नहीं होता। वे केवल अपने हितों की पूर्ति करते हैं। दूसरी बात, वे जिस तरह की हिन्दी का इस्तेमाल करते हैं उससे हिन्दी को बिगाडा भी जा रहा है। इससे वो अपनी भाषा को प्रवेश करा करा रहे हैं। यह तो केवल सांत्वना देने या मूर्ख बनाने की बात है। किसी एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी से हिन्दी पत्रिका निकल जाए जिसमें दस लोग कविता, लेख आदि लिख दें तो क्या इससे हिन्दी बढ जाती है।
डॉ. अशोक कुमार - आर्थिक उदारीकरण के नाम पर जो भूमण्डलीकरण है वह हमारी वैदिक धारणा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ से कुछ साम्यता रखता है या नहीं? भाषा और संस्कृति के संदर्भ में...
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - अपनी भाषिक भिन्नता, पारिस्थितिकी और मौलिक सृजनात्मक जिजीविषा के बावजूद भी आज हम ऐसे संसार में रहने को बाध्य हैं जहां कोई आत्मीयता नहीं है। भ्रामक भूमण्डलीकरण हमारी विश्वदृष्टि ‘वसुधैव कुटुकम्बकम’ के विपरीत अर्थ लेकर आया है। यह बाजार उच्च तकनीक, सूचना आदि के नए आदान-प्रदान से युक्त वैश्विक संरचना का दावा करता है। यह विश्व को एकआयामी बनाकर आर्थिक प्रभुसत्ता कायम करने का चक्रव्यूह रच रहा है। इस बाजारवाद का पहला संकट भाषा पर है। लोगों की निगाह में वह भाषा के प्रसार का खुशनुमा वहम पैदा किए हुए है। हमें लगता है हमारी भाषा फैल रही है। टी.वी. चैनलों पर फिल्मों में, कम्प्यूटर पर, विज्ञापनों में सब जगह। संकट को सुख में, संताप को मुग्धता में बदल देना इस बाजार की नयी कला है ऊपर से फैलती हरियाली का प्रिज्म और नीचे से जडें काटने की अदृश्य क्रियाएं। यह बाजारवाद प्रायोजित कार्यक्रम चला रहा है। एक तो लिपि को नष्ट कर रहा है और भाषा को नष्ट करने का सबसे कारगर उपाय है उसकी लिपि का, उसकी भाषिक संरचना को लोप करना और शब्द को अर्थ से विलग करना। इस तरह से उसकी अस्मिता, अभिव्यक्ति और संस्कृति को तिरोहित करना है। एक और बात यह हमारी भाषा को ‘बोली’ में समेटकर उसके भाषिक रूष्प को नष्ट कर रहा है। जिस मिश्रित भाषा को हम बाजार में सब जगह सुनते-बोलते हैं उससे भाषा नहीं फैलती, बाजार फैलता है। इस प्रायोजना से व्यावहारिक दबाव पैदा कर भाषा को धीरे-धीरे मिश्रण के जरिए नष्ट करना तथा उन माध्यमों का तिरस्कार है जिनसे कि अस्मिता बनती है। हम समझते हैं हमने केवल बाजार को बुलाया है... नहीं। वह अकेला नहीं आता। वह अपनी सभ्यता, संस्कृति और मस्तिष्क को साथ लेकर आता है।
डॉ. अशोक कुमार - भाषाएं हमारी सभ्यता और संस्कृति की संवाहक होती हैं। अभी आपने कहा था कि भाषा हवा और पानी की तरह होती है जिन पर सभी का अधिकार होता है फिर भी आप किस आधार पर अंग्रेजी नकारते है?
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय - मेरा वक्तव्य किसी भाषा के विरुद्ध नहीं है। अंग्रेजी एक समृद्ध भाषा है, अद्यतन ज्ञान विज्ञान की भाषा है अतः मैं अंग्रेजी का विरोधी नहीं हूँ। विरोध है तो उसे प्रभुत्ववादी औपनिवेशिकता के ऐसे माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने का जो देशी भाषाओं का और उसमें मातृभाषा शब्द का अस्तित्व मिटा रही है। ?
गाँव व डाक ढुराना, तहसील-गोहाना, जिला-सोनीपत
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