रामचरितमानस केप्रथम छन्द में काव्य

गोपीनाथ पारीक ‘गोपेश’


वर्णनामर्थसंद्यानां रसानां छन्दसामपि ।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ ।।
वैसे तो इस छन्द के माध्यम से सरस्वती और गणेश की तुलसी ने वन्दना की है, जिसका अर्थ है- अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलकारी वाली सरस्वती जी और ऐसे ही गणेश जी की मैं वन्दना करता हूँ। इसी छन्द में काव्य का लक्षण भी समाहित है। इसे ध्यान में रखते हुये इसका अर्थ इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है- ‘काव्य वह शब्दार्थमयी रचना है जो रसात्मक, छन्दोबद्ध और मंगलकारी हो’।
इस छन्द के आधार पर तुलसी के काव्य की ही नहीं पूरे काव्य सिद्धान्तों की व्याख्या की जा सकती है।
वर्ण- यह वर्ण अक्षर, शब्द, वाक्य और भाषा सभी का द्योतक है। सामान्यतया वर्ण का अभिप्राय है- ‘कवि के अभीष्ट अर्थ का संप्रेषण करने वाली भाषा’। जिस प्रकार संगीतकार स्वरों के माध्यम से और चित्रकार रंगों के माध्यम से अपनी कला को अभिव्यक्त करता है, वैसे ही कवि भी शब्दों के माध्यम से अपने भावों को व्यक्त करता है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने तो कविता को वर्णमय चित्र कहा है। इसे शब्द ब्रह्म के रूप में भी देखा गया और कहा गया है- ‘एकः शब्दः सम्यक ज्ञातः सुष्ठु प्रयुक्तः सवर्गे लोके च कामधुक भवति।’
अर्थ- जिसकी प्रतीति कराने के लिए शब्द का व्यवहार किया जाता है, उसे अर्थ कहा जाता है। इन दोनों का सन्तुलित नियोजन आवश्यक है। जब यह प्रश्न उठता है कि काव्य का काव्यत्व अर्थ में है या शब्द में, तो कहा गया है कि- तात्त्विक दृष्टि से दोनों एक हैं केवल व्यावहारिक दृष्टि से भिन्न प्रतीत होते हैं।
शब्द और अर्थ का नित्य सम्बन्ध है। कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य के प्रथम श्लोक में ‘‘वागर्थविव संपृक्तौ...’’ कह कर दोनों के नित्य सम्बन्ध को स्वीकार किया है। तुलसी ने सीता और राम की भांति वाणी और अर्थ को भिन्न होते हुये भी अभिन्न कहा है-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न ।
बंदौ सीताराम पद जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न ।।
जहाँ तक ब्रह्म विस्तृत है उतना ही शब्द (वाक) भी विस्तृत है- यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक (ऋग्वेद)। यही विश्वकर्मा ऋषि है। इसी से यह संसार रचा गया है-
वाक वै विश्वकर्मार्षि वाचाहीदं सर्वकृतम्।
-शतपथ ८-१-२-९
कौषातकी उपनिषद् में यह भी कहा गया है कि शब्द के उच्चारण को ही नहीं उच्चारण कर्त्ता के व्यक्तित्व को भी समझना चाहिए- ‘न वाचं विजिज्ञासीत् वक्तारं विद्यात्’। कवि शब्दों की योग्यता, आकांक्षा और संनिधि का सम्यक ध्यान रखते हुये अपनी रचना में उनका यथोचित विन्यास करता है। शब्द और अर्थ के संतुलित नियोजन में ही कवि की कुशलता प्रकट होती है। तुलसी इसी तथ्य को प्रकट करते हैं-
कबिहि अरथ आखर बल साँचा ।
अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा ।।
अत एव भामह ने काव्य को शब्दार्थमय कहा है- ‘शब्दार्थो सहितौ काव्यम्’ (काव्यालंकार)। और पतञ्जलि शब्द अर्थ का नित्य सम्बन्ध मानते हुये कहते हैं-
‘सिद्धे शब्दार्थ सम्बन्धे’ (नित्य पर्यायवाची सिद्ध-शब्दः)- व्याकरण महाभाष्य।
ऐसे ही इन दोनों के सन्तुलन को बनाये रख कर कही गयी कवि की वाणी अजर-अमर बन जाती है-
कुछ रजकण ही छोड यहाँ से चल देते नरपति सेनानी।
सम्राटों के शासन की बस रह जाती अवशेष कहानी।
गल जाती है विश्व विजेता चक्रवर्तियों की तलवारें-
युग युग तक, पर इस जग में है अजम अमर कवि की वाणी।
कवि की भावना और भावुकता ये सब उसकी इस वाणी से ही मुखरित होते हैं।
रस- अभिनव गुप्त, मम्मट आदि गौरवशाली आचार्यों ने रसों की संख्या नौ ही माना है। काव्य शास्त्रीय परम्परा में श्रंगार वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, शान्त, रौद्र, भयानक और वीभत्स ये नौ रस विख्यात हैं। जिनके क्रमशः रति, उत्साह, शोक, विस्मय, हास, शम, क्रोध, भय और जुगुप्सा ये स्थायीभाव हैं। इनके अतिरिक्त साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ आदि ने वत्सल रस को भी स्वीकार किया है, जिसका स्थायीभाव वात्सल्य स्नेह है। इसी प्रकार वैष्णव आचार्यों ने भक्तिरस को विशेष महत्व दिया है, जिसका स्थायीभाव भगवद् भक्ति है। कई विद्वान भक्तिरस को शान्त रस के अन्तर्गत मानते हैं
विश्वनाथ ने तो काव्य को रसात्मक वाक्य ही कहा है- ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।’ शब्द अर्थ यदि काव्य का शरीर है तो रस काव्य की आत्मा है। तुलसी जिस रस को काव्य की आत्मा मानते हैं वह भक्तिरस ही है। तुलसीदास मूलतः दास्य भक्तकवि हैं, अतः उनका सर्वोपरि रस भक्तिरस ही है।
कालिदास की भाँति तुलसी ने शिव पार्वती के श्ाृंगार का वर्णन नहीं किया-
जगत मातु पितु शम्भु भवानी ।
ताहि श्रंगार न कहौं बखानी ।।
किन्तु सीताराम के श्ाृंगार का मर्यादित रूप में वर्णन किया है। सीता हरण के बाद राम के वियोगी रूप का बडा मार्मिक वर्णन किया है। राम के बाल रूप में वात्सल्य रस का, नारद मोह के समय हास्यरस का, लंकादहन के समय भयानक रस का, लक्ष्मण-परशुराम संवाद के अवसर पर रौद्ररस का, राम-रावण युद्ध के समय वीररस का और दशरथ निधन तथा लक्ष्मण के शक्ति लगने पर करुणरस का तुलसी ने उत्तम वर्णन किया है। कवितावली के उत्तरकाण्ड में विनयपत्रिका-वैराग्यसंदीपनी के कई पद्यों में शान्त रस की भी योजना हुई है।
किन्तु तुलसी के द्वारा कोई भी रस निरुपित हुआ हो उसका पर्यवसान भक्ति में ही हुआ है। तुलसी द्वारा वर्णित भक्ति मानव की नैतिकता का ही पर्याय है।
विश्वनाथ ने ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’ कहने के साथ ही यह भी कहा है कि गुण, अलंकार और रीतियाँ काव्य की उत्कृष्टता के कारण होते हैं-
उत्कर्षहेतवः प्रौक्ता गुणालंकाररीतयः।
ये तीनों काव्य की शोभा बढाने वाले हैं। गुण का रस से नित्य सम्बन्ध है और अलंकार शब्दार्थ पर आश्रित
है। अलंकार की निबंधना स्वाभाविक तथा उपयुक्त समय पर होनी चाहिए, अन्यथा रचना का सौन्दर्य कुंठित हो जाता है। वामन, जयदेव आदि ने अलंकार को विशेष महत्व दिया है। हिन्दी कवि केशवदास भी निरलंकार वनिता की भाँति निरलंकार कविता को शोभाहीन
मानते हैं-
भूषन बिन न बिराजहीं
कविता वनिता मित्त। - कविप्रिया
विशिष्ट पद रचना को रीति कहते हैँ आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा कहा है। इनमें गुण मुख्यतः तीन हैं- माधुर्य, ओज और प्रसाद। श्ाृंगार, करुण, और शान्त रस में चित्त की आल्हाद रूपा द्रुति अवस्था माधुर्य है। वीर वीभत्स और रौद्ग रस में चित्त की विस्तार रूपा दीप्ति अवस्था ओज है तथा सभी रसों में चित्त की प्रसन्नता प्रसाद है। इस प्रकार माधुर्य और ओज परस्पर प्रतिद्वन्द्वी हैं किन्तु प्रसाद की स्थिति सर्वत्र विहित है। अलंकार अनेक हैं, जिनमें कई शब्दालंकार हैं तो कई अर्थालंकार। रीतियाँ मुख्यतः तीन हैं- वैदर्भी, गौडी और पांचाली। रुद्रट ने लाटीया नामक अन्य रीति का अन्वेषण किया है। भौगोलिक विशेषताओं पर आधारित ये प्रवृत्तियाँ ही साहित्य में रीतियाँ हैं। दो, तीन अथवा चार पदों तक के समास करने पर पांचाली; पाँच-छै-सात पदों तक के समास में लाटीया, आठ या इससे अधिक पदों के समास में गौडीया और बिल्कुल समास न करने पर वैदर्भी रीति मानी जाती है। रस जहाँ भाव पक्ष के अन्तर्गत आता है, वहाँ ये गुण, अलंकार आदि कलापक्ष के अन्तर्गत आते हैं।
तुलसी के काव्यों में बहुत से प्रसंगों में से एक एक उदाहरण क्रमशः माधुर्य, ओज और प्रसाद गुण के प्रस्तुत हैं-
हारि थक्यो करि जतन बहुत विधि तातें कहत सबेरो।
तुलसीदास यह त्रास मिटे जब हृदय करहु तुम डेरो।।
-विनय पत्रिका
भुजबल भूमि भूप बिन कीन्ही ।
विपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ।। रा.च.मानस
तरुवर वास इन्हहिं विधि दीन्हा ।
धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा ।। रा.च.मानस
यद्यपि वामन, जयदेव ने अलंकारों को विशेष महत्त्व दिया है किंतु इनसे पहले भामह ने इसकी प्रमुखता प्रदर्शित की थी, अतः अलंकार सम्प्रदाय के प्रवर्तक के रूप में भामह को याद किया जाता है। यद्यपि भरत ने प्रारम्भ में अनुप्रास, उपमा, दीपक और रूपक इन चार अलंकारों का उल्लेख किया था किन्तु धीरे धीरे इनकी संख्या १२५ तक पहुँच गयी। कुवलयानन्द में इनका उल्लेख मिलता है।
तुलसी यद्यपि अलंकारवादी नहीं हैं फिर भी अलंकार प्रेमी अवश्य हैं। उनकी अलंकार प्रियता स्थान-स्थान पर दर्शनीय है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
रुपक- उदित उदयगिरि मंच पर रघुवर बाल पतंग।
विकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग।।
उत्प्रेक्षा- उठिकर जोरि रजायसु माँगा।
मनहुँ वीर रस सोवत जागा।।
श्लेष- रावन सिर सरोज बन चारी।
चल रघुवीर सिलीमुख धारी।।
(शिलीमुख=बाण, भ्रमर)
यमक- तीखे तुरंग कुरंग सुरंगनि साजि चढे छाँटि छैल छबीसे।
अनुप्रास- सजनी ससि में समसील उभै नव नील सरोरुह से विकसे।
उपमा- कागर कीर ज्यों भूषन चीर
सरीर लस्यो ताजे नीर ज्यों काई।...
बाप को राज बटाउ की नाई।।
तुलसी ने अधिकतर वैदर्भी रीति को ही अपनाया है। विनय पत्रिका के बहुत पदों में अवश्य गौडीया या पांचाली रीति का निर्वाह हुआ है।
छन्द- किसी भी काव्य के कलापक्ष का छन्द एक महत्व- पूर्ण अंग है। ‘छन्दः’ पादौ तु वेदस्य’ कहा गया है। छन्द के बिना काव्य पंगु होता है। छन्द से ही काव्य में रमणीयता आती है। यद्यपि बाद में गद्य को भी साहित्य में महत्व दिया गया किन्तु तुलसी ने छन्दोबद्ध कविता को ही स्वीकार किया है। ‘छन्द सोरठा सुन्दर दोहा’ के अनुसार रामचरितमानस में मुख्यतः चौपाई, दोहा और सोरठा को उपयोग में लाया गया है। इनके अतिरिक्त हरिगीतिका, चवपैया आदि हिन्दी छन्दों तथा अनुष्टुप, मालिनि, शार्दूलविक्रिडित आदि संस्कृत छन्दों को भी उपयोग में लाया गया है। तुलसीरचित ‘रामललानहछू में हंसगति छन्द है तो कवितावली में कवित्त और सवैया हैं। गीतावली, कृष्णगीतावली और वियपत्रिका में गीत हैं तो बरवै रामायण में बरवै छन्द हैं। बरवै छन्द में प्रथम और तीसरे चरण बारह-बारह मात्राओं को होते हैं तो दूसरे और चौथे चरण में सात सात मात्रायें होती हैं।’ छन्द के अन्त में जगण रोचक होता है-
जनम जनम जहँ जहँ तनु, तुलसिहि देहु ।
तहँ तहँ राम निवाहिब, नाथ सनेहु ।।
मंगल- यथार्थतः मंगल, काव्य का लक्ष्ण न होकर उसका फल होता है किन्तु उस फल को ध्यान में रखते हुए मंगलविधान काव्य में करना यहाँ अभिप्रेत है। काव्य की कसौटी दो प्रकार की होती है- एक रमणीयता की और दूसरी श्रेष्ठता की। कविता की रमणीयता रस, भाव, गुण, अलंकार, छन्दयोजना आदि में है और काव्य की श्रेष्ठता का एक मात्र निकष लोकमंगल ही है-
कीरति भनिति भूति भलि सोई ।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई ।।
अर्थात् कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गंगा की तरह सबका हित करने वाली ‘साहित्य का प्राणतत्त्व नैतिकता’ शीर्षक से लिखते हैं कि ‘‘विश्व के साहित्यों का अनुशीलन करने से ज्ञात होता है कि प्रत्येक साहित्य में नैतिकता का तत्व सर्वोपरि रहा है। इसका कारण संभवतः यह है कि नैतिकता मनुष्य के मंगल से जुडी हुई है। जो साहित्य लोक मंगल के लिए लिखा जाता है वही श्रेष्ठ एवं चिरस्थायी होता है। यह बात यूनानी रोमन, अंग्रेजी, संस्कृत तथा हिन्दी साहित्यों के प्रायः सभी विश्व की भी भाषाओं में रचे साहित्यों में नैतिकता का तत्व सदैव विद्यमान रहा है। प्लेटो, अरस्तू, पोप, लौंजाइनस आदि पाश्चात्य साहित्यकारों ने साहित्य में नैतिकता पर विशेष बल दिया है। हिन्दी कवियों में तुलसी एक ऐसे कवि हैं जो लोकमंगल को ही काव्य का लक्ष्य स्वीकार करते हैं। इस नैतिकता को मात्र सामाजिक आचार न मानकर मानवता का पर्याय ही समझना चाहिए। (मधुमती, अगस्त १९९३)।
तुलसी का स्वान्तः सुखाय रचित साहित्य वस्तुतः लोकहिताय या बहुजन हिताय है। तुलसी के सभी प्रामाणिक काव्यों में रामचरित मानस, गीतावली, विनयपत्रिका और कवितावली गौरवग्रन्थ कहे जाते हैं। इनमें भी सर्वाधिक ख्याति प्राप्त महाकाव्य है- ‘रामचरित मानस’। जन-मानस को भावतरंगित कर देने वाला यह एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें भक्ति की भूमि पर इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र, कथाकाव्य, चरितकाव्य और लोककाव्य का अनूठा समन्वय मिलता है। यह रामचरित मानस काव्य-प्रेमियों की दृष्टि में श्रेष्ठ महाकाव्य, धर्मबुद्धि जनसाधारण का महनीय धर्मग्रन्थ और भक्तों के लिए भक्तिरस का अजस्र स्त्रोत है।
नाभादासजी ने तुलसी को भक्तमाल का सुमेरु कहा है। तुलसी की भक्ति विवेचना करते हुये हिन्दी साहित्य के अद्वितीय समीक्षक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं- ‘भक्तिरस का पूर्ण परिपाक जैसा तुलसी दासजी में देखा जाता है वैसा अन्यत्र नहीं। भक्ति में प्रेम के अतिरिक्त आलम्बन का महत्त्व और अपने दैन्य का अनुभव परम आवश्यक है। तुलसी के हृदय से इन दोनों अनुभव परम आवश्यक है। तुलसी के हृदय से इन दोनों अनुलता, प्रफुल्लता, पवित्रता सब कुछ प्राप्त हो सकती है।’
तुलसी भक्तों के सुमेरु ही नहीं, कवियों के भी सुमेरु हैं। हिन्दी साहित्य के पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाबू श्यामसुन्दरदास का कहना है- ‘हिन्दी कविता के कीर्ति-मन्दिर में गोस्वामीजी का स्थान सबसे ऊँचा और सबसे विशिष्ट है। उस स्थान के बराबर का स्थान पाने वाला अब तक कोई उत्पन्न नहीं हुआ। इस अवस्था में हमको गोस्वामीजी को हिन्दी कवियों की रत्नमाला का सुमेरु मानकर ही साहित्य-विकास के सिद्धान्त की समीक्षा करनी पडेगी।’ ?
२१, रामेश्वर धाम, मुरलीपुरा स्कीम,जयपुर ३०२०३९
मो. ९२१४८८१३७५