जन्म शताब्दी वर्ष पर मुक्तिबोध को याद करते हुए

डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’


नई कविता के सर्वाधिक चर्चित कवियों में मुक्तिबोध अग्रगण्य हैं। प्रायः सभी प्रमुख आलोचकों ने मुक्तिबोध की कविता को अपनी आलोचना का विषय बनाया है। यहाँ तक कि अपने हथियार भाँजने और एक-दूसरे पर छोडने का मैदान भी। अटूट रचनात्मक ऊर्जा से सम्पन्न बडे कवियों का मूल्यांकन स्वाभाविक ही सब अपनी-अपनी मान्यताओं से, अपने तराजू और अपने ही बांट-बटखरों से किया करते हैं और भिन्न-भिन्न प्रकार के मूल्यांकन, पुनर्पुनर्मूल्यांकनों की भूमिका बनते-बनाते रहते हैं। अपनी एक कविता ‘एक अन्तर्कथा’ में मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘‘मूल्यांकन करते एक दूसरे का, हम एक दूसरे को संवारते जाते हैं।’’
मूल्यांकन करना वस्तुतः संवारते रहने की प्रक्रिया का आधार है। यह हमारी समझ को संस्कारित करने का आधार होता है। मुक्तिबोध दुरूह और संश्लिष्ट कवि हैं। वे प्रगतिशील चेतना के कवि होते हुए भी आत्मपरक कविताओं के रचयिता हैं। वे कलावादी और रहस्यवादी कवि हैं। वे व्याख्यान शैली के कवि हैं और उनमें गहरी लयात्मकता है। वे सघन बिंबों की श्रखला के कवि हैं। ऐसे अनेक वादी-विवादी-संवादी स्वर मुक्तिबोध के काव्यानुशीलन-कर्ताओं ने प्रस्तुत किये हैं। किन्तु मुक्तिबोध अपनी कविताओं में कविता विधा के प्रति आत्माभिव्यक्ति के अपने ही उपकरण के प्रति क्या धारणा रखते हैं? इस तथ्य पर उतना मूलगामी विमर्श नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था। मुक्तिबोध द्वारा रचित-खचित भयानक हिडिंबानुमा विकृताकृति बिंबों के घटाटोप गर्जन-तर्जन में उनके ही विश्वसनीय स्वर कहीं दबकर रह गये।
‘चकमक की चिंगारियाँ’ में वे लिखते हैं ‘‘हर पल चीखता हूँ शोर करता हूँ। कि वैसी चीखती कविता बनाने में लजाता हूँ।’’ इन पंक्तियों में मुक्तिबोध का स्पष्ट मन्तव्य है कि संघर्षपूर्ण जीवन की कष्टमय परिस्थितियों से आहत मन भले ही चीखता-चिल्लाता है पर कविता में इस तरह चीखना-चिल्लाना अनुचित है। वास्तविक जीवन में व्यक्ति कितना भी शोर मचाए, शिकवा-शिकायत करे, नारे लगाए, चिल्लाए- गो कि ये सब संघर्ष और प्रतिरोध के विविध स्वरूप हैं- किन्तु कविता में इस तरह हो-हल्ला करना लज्जास्पद है। तो क्या इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वाकस्फीति के अभ्यासी मुक्तिबोध की प्रदीर्घ कविताओं में यदि कहीं इस तरह की नारेबाजी के स्वर सुनाई पडें तो वे काव्यवस्तु की दृष्टि से कोई उद्धरणीय या प्रदर्शन के योग्य नहीं हैं। ऐसे उद्धरण-प्रसंग किसी मतवाद की प्रचार-पुष्टि भले ही करते हों किन्तु काव्य-वस्तु के रूप में कवि जिनके कारण स्वयं को लजाता हुआ सा महसूस करे, उन्हें ही
उद्धरणीय बनाना अनैतिक ही नहीं कवि के साथ अन्याय भी है।
‘अंधेरे में’ कविता में वे लिखते हैं कि ‘‘ कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूँ/ वर्तमान समाज में चल नहीं सकता/ पूंजी से जुडा हृदय बदल नहीं सकता।’’ यह मुक्तिबोध की अतिप्रसिद्ध काव्योक्ति है। वर्ग-संघर्ष की अवधारणा के पक्ष में उद्धृत किये गये कवितांशों पर एक सरसरी दृष्टि दौडाई जाए, तो यह संभवतः सर्वाधिक उद्धृत की गई पंक्तियों में से एक होगी। विचारणीय है कि कविता में इस तरह की सपाट-उक्ति की आदत से स्वयं को दूर रखने की बात कहकर तत्काल वैसा ही कह डालना क्या दर्शाता है? क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता कि यह बात विचार प्रक्रिया के अन्तर्गत तीव्र आवेग में निस्सरित भावावेशपूर्ण उक्ति है। यह कविता की मलभूत आवश्यकता के कारण नहीं आयी। अगर आयी होती तो कवि को यहाँ यह सफाई देने की जरूरत नहीं होती कि ‘‘कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूँ.....’’ मुक्तिबोध यहाँ यह स्पष्ट कर देते हैं कि मैं यद्यपि कविता में ऐसा कह भले ही रहा हूँ पर कविता में इस तरह कहना मेरा स्वभाव नहीं हैं, क्योंकि यह काव्योचित नहीं हैं।
प्रश्ा* यह है कि ऐसी कौनसी विवशता है जिसके कारण मुक्तिबोध को जो बात काव्योचित नहीं लग रही है उसे भी वे अपनी कविता में शामिल कर रहे हैं? ऐसा क्यों है कि जब भी काव्य-रचना-प्रक्रिया की बात आती है तो मुक्तिबोध स्वयं को इस तरह अन्तर्द्वन्द्व में फंसा पाते हैं और अन्तविर्रोधी या संशयग्रस्त बात कह उठते हैं? मुक्तिबोध एक ओर तो अपना वैचारिक अधिष्ठान माक्र्सवाद में पाते हैं जिसकी चिंतन प्रक्रिया और निष्कर्ष यथार्थ बोध पर आधारित है, दूसरी ओर उनकी सृजनशील चेतना उन्हें सर्वहारा जीवन की सहज अभिव्यक्ति (यथार्थवादी प्रविधि!) ‘सपाटोक्ति’ में कहने से रोकना भी चाहती है।
वस्तुतः मुक्तिबोध सतत् संघर्ष के कवि हैं। अविराम आत्म-संघर्ष। काव्य में संघर्ष ही उनका राम है, संघर्ष ही अभिराम। इस संघर्ष में वे अपनी शक्ति ‘समष्टिवाद’ में पाते हैं और साधनापथ ‘व्यष्टिवादी’ चुनते हैं। यही मुक्तिबोध की सीमा भी है, शक्ति भी और सौंदर्य भी। यह तनाव मुक्तिबोध को चैन से नहीं बैठने देता, पैर के नीचे आये हुए जलते अंगारे की तरह उन्हें निरंतर नचाता रहता है, उनके सम्मुख तीखे प्रश्र खडे करता है- ‘इस चौडे ऊँचे टीले पर’ कविता में उनका प्रश्र है- ‘‘मुझको अपना चेहरा ही अजनबी दिखता/आइना ही गलत या कि देखना गलत है/ या मेरा चेहरा ही बदला करता हरदम/ हाय-हाय, यह क्या सवाल है/ क्या बवाल है?’’
‘मुझे नहीं मालूम’ कविता में वे स्वयं से
पूछते हैं ‘‘सही हूँ या गलत हूँ या और कुछ/सत्य हूँ कि मात्र मैं निवेदन सौन्दर्य।’’ संशयात्मा कवि यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्र उठाता है कि- मैं सत्य हूँ या केवल निवेदन सौन्दर्य हूँ? मेरी स्थापनाएँ वास्तविक हैं कि मात्र कलात्मक अभिव्यक्ति? मैं जो कह रहा हूँ वह सच है कि बनावटी है? मुक्तिबोध सवाल उठाकर ही नहीं रह जाते, वे उस सवाल से जूझते भी हैं।
गहराई से देखें तो यह सर्जक मुक्तिबोध और विचारक मुक्तिबोध का द्वन्द्व है और इस द्वन्द्व में जीत आखिर सर्जक मुक्तिबोध की होती है। इसीलिए कविता में वे बिंबों और फैंटेसी के माध्यम से अपनी बात कलात्मकता के साथ रखकर संतुष्टि महसूस करते हैं। मुक्तिबोध का कवि आशान्वित होकर कहता है- ‘‘मैं विचरण करता सा हूँ एक फैण्टेसी में/यह निश्चित है कि फैण्टेसी कल वास्तव होगी।’’ अपनी फैंटेसी के प्रति अटूट विश्वास रखते हुए वे ‘एक अन्तर्कथा’ में लिखते हैं- ‘‘वे जगत समीक्षा करते-से, मेरे प्रतीक रूपक सपने फैलाते हैं आगामी के।’’ मुक्तिबोध की कविता इन कलात्मक उपकरणों- प्रतीक, रूपक आदि के माध्यम से जगत समीक्षा करते हुए जीवन के प्रति एक उम्मीद जगाती है, भविष्य का एक सुखद स्वप्र दिखाती है। वह भविष्यवाणी नहीं करती, भविष्य में सपने के सत्य होने की उम्मीद को जिंदा रखती है। किन्तु अन्तःसंघर्ष की वह आंच कभी धीमी नहीं पडती, अनवरत सुलगती रहती है। यह अन्तःसंघर्ष उनकी कविता को एक ऐसे आलोक और ओज से भर देता है जो इस प्रकार के अन्तः संघर्षों से वंचित कवियों की कविताओं में दूर-दूर तक दिखाई नहीं पडता है। अपनी फैंटेसी को वास्तविक होने का सुखद स्वप्र मुक्तिबोध न तो किन्हीं निद्रामधुर क्षणों में पालते हैं, न मन के लड्डुओं की भाँति पलक झफ ही लपक लेते हैं। संगत निष्कर्षों के प्रतिपल काँपते उस अरुण-कमल तक पहुँचने के लिए वह अपने आत्म का जैसा आलोडन-विलोडन करते हैं, वैसा मंथन समकालीन किसी कवि की कविता में नहीं दिखाई पडता। चेतना को झकझोर देने वाले विचित्र ऊहापोह भरे आत्ममंथन के उपरान्त वह इसे अधिगत करते हैं। इस आत्मसंघर्ष में कितनी ही अधूरी, कृत्रिम और छल-प्रपंच भरी स्थापनाओं के दुर्दम्य अवरोधों को वे एक-एक कर ध्वस्त करते हैं, तब कहीं उन्हें यह जीवन-सत्यों के द्युतिमान् मणि मिलते हैं। वे लिखते हैं- ‘‘मैं अपनी अधूरी दीर्घ कवितायें/सभी प्रश्रोत्तरों की तुंग प्रतिमाएं/गिराकर तोड देता हूँ हथोडे से/कि वे सब प्रश्र कृत्रिम और उत्तर और भी छलमय।’’ इस तरह मुक्तिबोध निरंतर अपने प्रश्र और उत्तरों का परीक्षण और शोध करते रहते हैं और अर्जन-सर्जन-विसर्जन का एक सत्यान्वेषी क्रम कविता में स्थापित करते हैं।
अपने काव्य बिंबों के बारे में मुक्तिबोध कहते हैं- ‘‘मेरी ये कविताएँ भयानक हिडिम्बा हैं। वास्तव की विस्फारित प्रतिमाएँ, विकृ ताकृति बिम्बाएँ हैं।’’ जिस प्रकार ग्रोथ हार्मोन की असंतुलित वृद्धि से कुछ बच्चों का विस्फार होकर वे विकृताकृति-अतिकाय-हो जाते हैं उसी प्रकार जीवन की संघर्षपूर्ण वास्तविकताएँ मुक्तिबोध के काव्यहार्मोन से विस्फारित होकर विकृताकृति बिम्ब वाली हो जाती हैं। विकृताकृति शब्द में विकृत शब्द का वह प्रचलित अर्थमात्र नहीं है, जिसमें विद्रूप की ध्वनि आती है। यह विद्रूप के साथ विचित्रता, विभिन्नता और विस्तार को भी अभिव्यंजित करता है। जैसे भारतीय दर्शन में सांख्याचार्यों ने ‘प्रकृति’ के विस्तार के रूप में ‘विकृति’ शब्द का प्रयोग किया है।
यहाँ यह भी विचारणीय है कि जीवन के कष्ट, असंतोष और संघर्ष की आँच में ये फैंटेसी आनन्दरूप न होकर वेदनास्वरूप होती हैं और इस कारण वे प्रसन्नरूपा न होकर भयानक किस्म की होती हैं। सर्वविदित है कि मुक्तिबोध अपनी कविताओं में ‘सत्-चित्-आनन्द’
के पारम्परिक त्रिक के स्थान पर ‘सत्-चित्-वेदना’ का उल्लेख करते हैं। मुक्तिबोध का यही अन्तःसंघर्ष उनकी सीमाएँ भी तय करता है। वे इस अन्तःसंघर्ष में इस कदर उलझे हुए रहते हैं कि उनकी कविता का परिभ्रमण-पथ बहिर्जगत में बहुत फैला हुआ नहीं मिलता। वह अन्तर्जगत के घेरों से निकल ही नहीं पाता। वहीं परिक्रमा करता रहता है। उनकी कई कविताएँ एक ही ‘महाकविता’ के अनुच्छेदों -सी लगती हैं। वस्तु-विन्यास की दृष्टि से वे इतनी मिलती-जुलती हैं कि उनके कुछ अंश इधर के उधर कर दिए जाएं तो भी खास फर्क नहीं पडता। उनकी लय नहीं टूटती। ये कविताएँ बस्ती के अलग-अलग घरों की तरह नहीं अपितु एक विशाल भवन के ऐसे कक्षों की तरह हैं जिनकी खिडकियाँ, दरवाजे एक-दूसरे में खुलकर बे-रोकटोक आवाजाही की संभावनाएँ सुलभ कराते हैं।
मुक्तिबोध की सृजनपरक धारणा को समझने के लिए ‘चकमक की चिंगारियाँ’ का यह अंश महत्वपूर्ण है- ‘‘नह होती कहीं भी खतम कविता नह होती/ कि वह आवेग-त्वरित काल-यात्री है/ व मैं उसका नहीं कर्ता/पिता-धाता/ कि वह कभी दुहिता नहीं होती/ परम स्वाधीन है, वह विश्व शास्त्री है/ गहन गंभीर छाया आगमिष्यत् की/ लिए, वह जनचरित्री है/ नये अनुभव व संवेदन/ नये अध्याय-प्रकरण जुड/ तुम्हारे कारणों से जगमगाती है/ व मेरे कारणों से सकुच जाती है/’’ कविता का कवि से स्वतंत्र होना, नये-नये अनुभवसंवेदनों, प्रकरणों, घटनाओं और विषयवस्तुओं से उसका जगमगाना और स्वयं रचयिता के कारणों से उसका सकुच-सिमट जाना आदि कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु हैं जो मुक्तिबोध के सृजन विधान का रहस्य खोलते हैं और मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया को समझने का सुदृढ आधार प्रदान करते हैं। इनकी पडताल की जानी चाहिए।
ऋग्वेद में कहा है- ‘कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः।’ इस प्राचीनतम उक्ति को सर्जक स्वरूप पर आरोपित करके देखें तो पायेंगे कि मनीषी, परिभू और स्वयंभू- इन तीनों तत्वों का एकात्म कवि-पुरुष के सर्जनात्मक व्यक्तित्व को गढता है। स्वयंभू, परिभू और मनीषी- इन तीनों के समवेत से ही काव्यसर्जना संभव होती है। मुक्तिबोध ने अपनी आलोचना में जिस आत्मचेतस् और विश्वचेतस् की बात कही है वे क्रमशःस्वयंभू और परिभू के ही अपररूप प्रतीत होते हैं और मनीषी अर्थात् एक विवेचक-आलोचक प्रत्येक रचनाकार में विद्यमान रहता ही है। कुन्तक के शब्द उधार लेकर कहें तो सर्जक की इन तीनों अवस्थाओं में ‘परस्परस्पर्धिसमभाव’ विद्यमान ही रहता है। सर्जक के सृजन की वरावरता इन तीनों धातुओं के सावयविक समायोजन पर निर्भर है। जब कवि यह कहता है कि मैं उसका कर्ता, धाता-पिता नहीं तो वहाँ तात्पर्य यह है कि अकेला स्वयँभू तत्व अर्थात् केवल आत्मचेतस् उसे नहीं रच सकता। यहां विश्वचेतस् की सहभागिता भी अपरिहार्य है। आत्मचेतस् सर्जन का निमित्त कारण है तो उपादान (समवायी) कारण वह परिभू तत्व अर्थात् विश्वचेतस् है जो नये अनुभव-संवेदन और नये अध्याय-प्रकरणों से प्रक्रिया को निरंतर आवेगवती-वेगवती बनाता है। जिसके कारण ‘‘कविता जगमगाती है।’’ कविता प्रस्फुटित और प्रकाशित होती जाती है। इस कार्य-कारण श्रखला को दर्शन की शब्दावली में ही आगे बढाया जाए तो कहना होगा कि ‘मनीषी तत्व’ सृजन के असमवायी कारण के रूप में परोक्षतः विद्यमान रहता है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध, ‘मैं उसका कर्ता, पिता या विधाता नही हूँ’- यह कहते हुए कविता को कवि की दुहिता या कामिनी मानने की स्थापित मान्यता का निषेध कर यहाँ कविता की ‘स्वायत्तता’ की ओर संकेत करते हैं। किन्तु ध्यान रखने की बात है कि यह स्वायत्तता कवि के आत्मचेतस् की अपेक्षा से है न कि उसके विश्वचेतस् की अपेक्षा से। कविता जितनी ‘स्वायत्त’ है उतनी ही ‘लोकायत्त’ भी है और इसी कारण वह विश्व की शास्ता और आगमिष्यत् की गहरी छाया बनती है।
कविता अपनी पूर्ण निर्मित में स्वायत्त इस प्रकार होती है कि कवि के चित्त में उमगने वाले बिंब-प्रतीक-फैण्टेसी आदि स्वतंत्र प्रक्रियावश उद्भासित होते हैं। इन पर कवि का नियंत्रण नहीं होता है। जिस स्वरूप में यह बिंब-प्रतीक आदि कवि-चित्त में जगमगाते हैं, वह स्वरूप कवि के इच्छाधीन नहीं होता। कवि का नियंत्रण उनमें से चयन करने अथवा उन्हें रूपान्तरित (विकृत!) करने भर का है। इन बिंबों प्रतीकों की उद्भावना में कवि की इच्छा, आकांक्षा हेतु नहीं होती, वरन् नये अनुभव-संवेदनों, घटनाओं, प्रकरणों का जुडना ही हेतु होता है, कविता इन्हीं कारणों से जगमगाती है, उद्भूत होती है। कविता को परम स्वाधीन इसलिए भी कहा है कि वह कार्य-कारण सिद्धान्त पर घटित नहीं होती। जिन सिद्धान्तों पर वह घटित होती है उन पर रचयिता का वश नहीं चलता। कार्य-कारण सिद्धान्तों पर दर्शन, विज्ञान या ‘वाद’ गढे जाते हैं, कविता नहीं। माक्र्सवाद हो या पूंजीवाद, व्यक्तिवाद हो या समाजवाद, मानववाद हो या अस्तित्ववाद, कवि चाहे किसी भी घेरे में खडा हो, स्वायत्त होना कविता का स्वभाव है, अगर ‘वह’ है तो।
यह विचारणा हमें यह कहने का अवसर भी देती है कि जो कवि अपनी कविता को अपने विचारों के घेरे से बाहर निकलने की इजाजत नहीं देते, कविता अपनी स्वाभाविक गति से यदि ऐसी कोशिश करती हुई दिखाई भी देती है, तो हठपूर्वक उसके पर काट देते हैं, वे सच्चे कवि नहीं होते। उनकी कविताएँ उनकी संकीर्णता का शिकार होकर अविकसित, बलहीन अथवा कुपोषित रह जाती है चाहे वह कितनी ही वृहदाकार हो। संवेदना कविता रचना की अनिवार्य शर्त है। किन्तु मुक्तिबोध ने संवेदना के साथ ‘ज्ञान’ शब्द को भी जोडकर इसे एक विशिष्ट आयाम प्रदान किया, ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान के रूप में उनके काव्य का अनुशीलन करते हुए हम यह भी देखते हैं कि मुक्तिबोध के ‘ज्ञानात्मक संवेदन’ के प्रभाव में ‘भावात्मक संवेदन’ कहीं दब कर रह गया।
मुक्तिबोध के यहाँ सर्वसाधारण के संघर्ष, कष्ट आदि के दृश्य बहिर्जगत के घटक बनकर नहीं अपितु अंतर्जगत के घटक बनकर आते हैं। मुक्तिबोध की अब तक प्राप्त अधिकांश आलोचना या समीक्षा से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके यहां मनुष्य के राग-विराग, हर्ष-विषाद, संघर्ष और संवेदनापूर्ण घटनाओं के विवरण, उनके दैनन्दिन जीवन से जुडे हुए सामाजिक-पारिवारिक भाव-भीने प्रसंग नहीं हैं। यह सच है कि मुक्तिबोध की कविता में ऐसे प्रसंग कम हैं किंतु ऐसा नहीं है कि उनका सर्वथा अभाव है। यह अलग बात है कि उनके रागात्मक, भावात्मक संवेदनापूर्ण प्रसंगों की चर्चा ही नहीं की गई।
अपनी कविता ‘मुझे याद आते हैं’ में एक गर्भवती स्त्री का जैसा सशक्त चित्रण मुक्तिबोध ने किया है वह दुर्लभ है। ‘‘आंखों में तैरता है चित्र एक/ उर में संभाले दर्द/ गर्भवती नारी का/ कि जो पानी भरती है वजनदार घडों से/ कपडों को धोती है भाड-भाड/ घर के काम बाहर के काम सब करती है/ अपनी सारी थकान के बावजूद/ मजदूरी करती है/ घर की गिरस्ती के लिए ही/ पुत्रों के भविष्य के लिए सब।’’
एक श्रमजीवी गर्भवती माता का यह मार्मिक चित्र हमारे हृदय को अपार करुणा से भर देता है। खास बात यह है कि मुक्तिबोध जब यह चित्रण करते हैं तो यहां उनका पूरा रूप-विधान बदला हुआ सा लगता हैं। भाषा की दृष्टि से कोई दूसरे ही मुक्तिबोध दिखाई पडते हैं। अपनी कविताओं में जटिल और संश्लिष्ट शब्दों के अभ्यासी मुक्तिबोध इस प्रसंग में ऐसा एक भी शब्द प्रयुक्त नहीं करते जो बोलचाल की साधारण भाषा से इतर हो। किन्तु मुक्तिबोध का वैशिष्ट्य यह चित्र खेंचने भर में नहीं है। इस स्थिति में प्रश्नाकुल मुक्तिबोध की कविता जिस ओर जाती है वह देखते बनता है। आगे वे लिखते हैं ‘‘करती है वह इतना काम/क्यों किस आशा पर/प्रश्न पूछता हूं मैं, आंखों के कोनों पर उत्तर के प्रारंभिक/कडुए-से आंसू ये मिठास छू ही लेते हैं।.... यदि उस श्रमशील नारी की आत्मा/सब अभावों को सहकर/कष्टों को लात मार निराशाएं ठुकराकर/किसी धुव लक्ष्य पर/खिंचती सी जाती है। जीवित रह सकता हूं मैं भी तो वैसे ही।’’
घनघोर कष्टों और अभावों भरे जीवन में भी अडिग रहकर निराशा से दूर रहने वाली भारतीय गर्भवती गृहणी से जब यह कवि जीने की प्रेरणा लेता है तो यह प्रसंग जीवन में आस्था की तलाश का प्रेरक उदाहरण बन जाता है। मुक्तिबोध इस कविता में एक ऐसे दोराहे पर हैं जो बरबस हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। यहां वे उस गृहणी से विद्रोह करवाते हुए कविता को आगे बढाने के बजाय उसकी अदम्य जिजीविषा और श्रमसाधना को उभार कर स्वयं उससे आस्था और दृढता की प्रेरणा लेते हैं और कह उठते हैं- ‘‘जीवित रह सकता हूं मैं भी तो वैसे ही।’’ कवि का यह भाव पाठक को अंदर तक छू जाता है और ये पंक्तियां जीवन में आस्था का तीर्थ बन जाती हैं।
इसी कविता में प्रस्तुत भारतीय ग्राम्यजीवन की संध्या का संवेदना-सजल चित्रण भाव-विह्वल कर देता है। वे लिखते हैं- ‘‘धुंधलके में खोये इस/रास्ते पर आते-जाते दीखते हैं/लठ-धारी बूढे-से पटेल बाबा/ऊँचे-से किसान दादा/वे दाढी-धारी देहाती मुसलमान चाचा और/बोझा उठाये हुए/माएँ, बहनें, बेटियाँ.../सबको ही सलाम करने की इच्छा होती है,/सबको राम-राम करने को चाहता है जी/आंसुओं से तर होकर प्यार के.../(सबका प्यारा पुत्र बन)/सभी ही का गीला-गीला मीठा-मीठा आशीर्वाद/पाने के लिए होती अकुलाहट।/किन्तु अनपेक्षित आंसुओं की नव धारा से/कण्ठ में दर्द होने लगता है।’’ इस अंश में वर्णित सामाजिक रिश्तों की आर्द्रता से हमारा हृदय भीग जाता है। गांव के बुजुर्गों का गीला-गीला और मीठा-मीठा आशीर्वाद दूर तक पाठक का पीछा करता है।
कौटुम्बिक सम्बन्ध किस तरह जीवन का संचार करते हैं, जीवनरस प्रदान करते हैं, यह मुक्तिबोध की कविता ‘जब प्रश्नचिह्न बौखला उठे’ के इस अंश में द्रष्टव्य है- ‘‘झुरमुर-झुरमुर वह नीम हंसा/चिडिया डोली/फर-फर आंचल तुमको निहार/मानो कि मातृभाषा बोली/जिससे गूंजा यों घर-आंगन/खनके मानो बहुओं की चूडी के कंगन/मैं जिस दुनिया में आज बसा/जन-संघर्षों की राहों पर/ज्वालाओं में/मांओं का, बहनों का सुहाग सिन्दूर हंसा बरसा-बरसा/इन भारतीय गृहिणी-निर्झरिणी-नदियों के/घर घर में भूखे प्राण हंसे/दिल में आंसू के फव्वारे/लेकर मेरे ये छन्द/बाबरे बुरी तरह यों अकुलाकर/बूढे पितृश्री के चरणों में लोटपोट कर/ऐसी पावन धूल हुए/बहना के हिय की तुलसी पर/घन छाया कर/मंजरी हुए/भाई के दिल में फूल हुए।’’ इसी कविता में वे आगे लिखते हैं- ‘‘जिनके स्वभाव के गंगाजल ने/युगों-युगों को तारा है/जिनके कारण यह हिन्दुस्तान हमारा है।’’
जनवाद, प्रगतिवाद, माक्र्सवाद, रहस्यवाद, व्यक्तिवाद आदि की चक्करघिन्नियों में घनचक्कर हुए आलोचकों ने मुक्तिबोध की कविता में घर-आंगन में खनकती बहूओं की चूडियां, मां-बहिनों के हंसते सुहाग सिन्दूर, बूढे पितृश्री के चरणों में लोटपोट करती पावन धूल, बहिन के हृदय में विराजमान तुलसी की मंजरी, गंगाजल आदि के दर्शन भी कर लिये होते तो मुक्तिबोध की कविता में विद्यमान भारतीय आत्मा का एक नूतन परिदृश्य भी पाठकों के सामने आता। इधर ‘डूबता चांद कब डूबेगा’ कविता में हमें एक अलग ही मुक्तिबोध नजर आते हैं। वे बलिदानी पन्नाधाय और वीर शिवाजी को भी याद करते हुए लिखते हैं-
‘‘अम्बर के पलने में उतार रवि-राजपुत्र/ढांककर सांवले कपडों में/रख दिशा-टोकरी में उसको/रजनी-रूपी पन्ना दाई/अपने से जन्मा पुत्र-चन्द्र फिर सुला गगन के पाले में/चुपचाप टोकरी सिर पर रख/रवि राजपुत्र ले खिसक गई।/पुर के बाहर पन्ना दाई। यह रात मात्र उसकी छाया/घबराहट जो कि हवा में है/इसलिए कि अब/शशि की हत्या का क्षण आया।’’..... ‘‘कारा के चौकीदार कुशल/चुपचाप फलों के बक्सों में/युगवीर शिवाजी को भरते/जो वेश बदल, जाता दक्षिण की ओर निकल।’’
भारत के इन बलिदानी, संघर्षशील व्यक्तित्वों को काव्यवस्तु के रूप में नियोजित करते हुए मुक्तिबोध को उनमें न मध्यकालीन सामन्तवाद दिखाई पडता, न शोषकवर्ग का प्रतिनिधित्व। प्रत्युत् वे उनमें भारत के सांस्कृतिक गौरव के उन्नायक ‘युगवीर’ के ही दर्शन करते हैं। यही नहीं इसी कविता में मुक्तिबोध कृष्ण जन्म की घटना को भी उल्लेखनीय बनाते हैं- ‘‘आंखें फाडे मैंने देखा मन के मन में/जाने कितने कारावासी वसुदेव/स्वयं अपने कर में शिशु-आत्मज ले/बरसाती रातों में निकले/धंस रहे अंधेरे जंगल में/विक्षुब्ध पूर में यमुना के/अति दूर, अरे, उस नन्दग्राम की ओर चले।’’
मुक्तिबोध की एक अन्य कविता ‘पता नहीं’ में विष्णु की नाभि से उद्भूत कमल पर प्रकटित ब्रह्मा का चित्र यहां इस रूप में उभर कर आता है- ‘‘उत्कलित हुआ प्रज्ज्वलित कमल/यह कैसी घटना है/कि स्वप्न की रचना है।/उस कमलकोष के पराग स्तर/पर खडा हुआ-/सहसा होता है प्रकट एक/वह शक्ति पुरुष’’ मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता ‘चंबल की घाटियां’ पढते हुए तो मैं ठिठक ही गया। ‘‘...क्रमशः विकसन/पुनः संगठन पुनः परीक्षा पुनः प्रवर्तन/पुनरपि परिणति’’....।
बहुत परिचित सी ध्वनि मन में गूंज उठी पर एकाएक वह पकड में नहीं आयी। दुबारा ध्यान से पढा तो मैं स्तब्ध रह गया। आद्यशंकराचार्य की ‘चर्पट पंजरिका’ कौंध गयी- ‘पुनरपि जनमम् पुनरपि मरणम्/पुनरपि जननी जठरे शयनम्/इस संसारे खलु विस्तारे....’’ वही लय, वैसी ही आवृत्ति।
शंकराचार्य और मुक्तिबोध की उक्त पंक्तियां परस्पर गलबहियां करती दिखाई पडीं। किन्तु मुक्तिबोध का वैशिष्ट्य शंकराचार्य के वाकप्रवाह के साथ अनुधावन करने और ऐसी ‘गतिमय संगतियां’ स्थापित करने मात्र का नहीं अपितु अपने युगानुकूल प्रश्न खडे करने और उनका अपना उत्तर खोजने की छटपटाहट में है, जो वे स्वयं आगे लिखते हैं- ‘‘ऐसी गतिमय संगतियों की पीडाएं दीजिए/परन्तु पहिले/पत्थरी ढांचें से छुटकारा मिल जाए।’’
भारतीय लोकजीवन में रचे-बसे ऐसे आत्मीय और रागदीप्त चित्र मुक्तिबोध की प्रगाढ भावात्मक संवेदना का दिग्दर्शन कराते हैं। यह उनके विचारदर्शन और उनके ज्ञानात्मक संवेदन के अतिरिक्त उनके कृतित्व का एक अन्य पक्ष है। ?
पुनश्च :
विगत दिनों राजस्थान सरकार ने राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष को पहली बार राज्य मंत्री का दर्जा प्रदान किया है। राज्य सरकार के इस निर्णय से साहित्य की प्रतिष्ठा बढी है। हम साहित्य के प्रति राज्य सरकार की इस संवेदनशील पहल के लिए आभार व्यक्त करते हैं।
‘मधुमती’ के अक्टूबर २०१७ के अंक में प्रुफ की अनेक अशुद्धियां रह गयी हैं। इसके लिये क्षमाप्रार्थी हैं तथा भविष्य में इसका पुनरावर्तन न हो, इसका पूर्ण प्रयास रहेगा। इन अशुद्धियों की ओर अनेक पाठकों ने फोन तथा पत्र द्वारा हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। एतदर्थ उनका आभार तथा उनसे अपेक्षा है कि वे आगे भी इसी तरह हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे।