पत्रसेतु



मधुमती का अगस्त अंक समय पर प्राप्त हुआ। विस्तृत एवं विचारोत्तेजक संपादकीय के अंत में ‘अनगढ बानी’ के संदर्भ में जो अपील की गई है, पाठकों-शिक्षकों द्वारा नवोदित सृजनशील पीढी को प्रेरित-प्रोत्साहित किए जाने की, वह सर्वथा समीचीन है। ‘एक हिंदी कवि की राष्ट्रवंदना’ आ. कुंदन माली का श्रमसाध्य एवं संदेश परक आलेख साबित हुआ। साक्षात्कार में नंदकिशोर आचार्य के विचार अनुभूत एवं प्रेरणात्कार रहे। इसी प्रकार अन्य लेख ‘उपेक्षिताओं का साकेत’ (डॉ. कन्हैया सिंह), ‘दलित लेखन का अंतर्विरोध’ (डॉ. शैलेन्द्र स्वामी), ‘द्विवेदी युगीन स्व. पं. गिरधर शर्मा ‘नवरत्न’ (ज्ञारसी लाल सैन), ‘भगवती लाल व्यास और उनका काव्य-संसार’, डॉ. नरेन्द्र चतुर्वेदी), ‘कश्मीर का विस्थान सहितय’ (डॉ. शिबनकृष्ण रैणा) आदि भी बहुत कुछ कहते हुए सोचने को बाध्य करते हैं। ‘स्मरणांजलि’ में अखिलेश अंजुम की रचनाएं (गीत-गजल) देकर जो दायित्व निभाया गया वह स्तुत्य है। मुरलीधर वैष्णव, अश्वघोष, श्याम पोकरा, सुरेश सर्वहारा और अन्य रचनाकार भी प्रभावी शिल्प के साथ के साथ उपस्थित हैं। हाँ प्रुफरीडिंग पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
भगवती प्रसाद गौतम, कोटा (राज.)
‘मधुमती’ का अगस्त २०१७ का अंक वक्तसर मिला। पता चला आपने इस लोकप्रिय मासिक पत्रिका का प्रधान सम्पादक का पद संभाल लिया है, ढेरों मंगलकामनाएँ। काश आप साढे तीन वर्ष पूर्व यह पद भार संभाल पाते तो हिन्दी, साहित्य अकादमी, साहित्य, साहित्यकारों एवं पाठकों का और अधिक हित सध पाता। कोई बात नहीं। देर आयद दुरूस्त
आयद। अभिनन्दन।
संपादकीय सारग्रर्भित, समसामयिक, विचारणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है। संपादकीय पत्रिका का मूल्य बढाता है।
अन्तर्पाठ के अन्तर्गत कुन्दन माली का आलेख राष्ट्रीय गीत की परम्परा में एक हिन्दी कवि की राष्ट्र वन्दना में कवि नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘भारत माता’ का सटीक, सुन्दर एवं सार्थक विश्लेषण किया है। जिसमें बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित राष्ट्र गीत ‘वन्दे मातरम्’, रविन्द्रनाथ टैगोर कृत राष्ट्र राष्ट्र गान-जन गण मन अधिनायक जय है की तुलना ‘भारत
माता गीत’ जिसे कवि नागार्जुन ने रचा है में अनेक समानताएँ पाई गई है। यह तो पाना ही है। जब हम माता का यशगाान करेंगे तो अंतर आ ही कैसे सकता है, बशर्ते भाव पवित्र हों।
डॉ. नरेन्द्र चतुर्वेदी ने ख्यातनाम साहित्यकार श्री भगवतीलाल व्यास और उनका काव्य संसार के माध्यम से उनकी कविता-पुस्तक ‘शब्दों की धरती है कविता’ से शानदार परिचय कराया। व्यासजी की कलम को नमन करता हूँ।
महामना की दृष्टि में ‘धर्म ईश्वर’ नामक आलेख में राजीव मिश्र ने सटीक जानकारियाँ दी है। श्यामकुमार पोकरा की कहानी ‘छोटी भाभी’ अच्छी लगी। लघुकथाएँ एवं बालकविताएँ स्तरीय थी।
डॉ. गोपीराम शर्मा का शोध लेख ‘समकालीन हिन्दी कविता में आम आदमी की संवेदनाएँ’ भी अपनी संवदेनाएँ जगाने में सफल रहा।
ऐसे सुन्दर पठनीय एवं संग्रहणीय अंक हेतु मेरी हार्दिक बधाईयाँ स्वीकार करें।
माणक तुलसीराम गौड, बैंगलोर
आपने अगस्त १७ अंक में आजादी के साथ ‘विभाजन’ जोड कर मेरी दुःखती रग पर हाथ रख दिया। कोई जरा कल्पना कर ही देखे कि कोई भरापूरा परिवार अपने घर में बैठा है। उसके घर पर दंगाई हमला करते हैं। वह अपना सिरहाना अलमारी में सज्जा तथा सारा का सारा सामान छोडकर सपरिवार भागता है। उसके सामने उसके बच्चों औरतों का कत्ल कर दिया जाता है। दस लाख लोग विभाजन के नाम पर मार डाले गए थे और बेशुमार बंधक हुए थे। कोई भुक्तभोगी कैसे भूल सकता है भला। आपने डॉ. महेश शर्मा का हवाला दिया है। उन्होंने तो यहां तक लिखा है कि स्वतंत्रता दिवस को शोक दिवस के रूप में मनाना चाहिए। देश टूटा था। मैंने अपने उपन्यास ‘टूटी हुई जमीन’ का गुजराती अनुवाद उन्ह ही भेंट किया है।
डॉ. सदानंद सप्रे ने ही कहा था ‘‘सहगल साहब’’ जैसे परिवारों की कीमत पर हमें आजादी मिली, जिन्हें हम स्वतंत्रता दिवस पर याद नहीं करते।
खूब मसाला है, शोधार्थियों के लिए विभाजन पर लिखी १४ कहानियों का संग्रह जल्दी आ रहा हैं।
हरदर्शन सहगल, बीकानेर
‘मधुमती’ का अगस्त-२०१७ का अंक पढने को मिला। सबसे पहले संपादकीय से आमना-सामना हुआ तो चकित रह जाना पडा क्योंकि कई दशकों से ऐसा विश्लेषणात्मक और विचारोत्तेजक संपादकीय पढने को नहीं मिला था। सब से पहले नये संपादक डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ ने इस पर क्षोभ प्रकट किया कि स्वतंत्रता दिवस पर हम औपचारिक उत्सव जरूर मना लेते है किंतु देश की उपब्धियों, समस्याओं और मुसीबतों पर चिंतन-विश्लेषण करने के बजाय आवेश में आकर किसी न किसी पर सारा दोषारोपण कर के छुट्टी पा लेते हैं और सारी ‘‘अव्यवस्था के सनातन व्यवस्थापक’’ बने रहते हैं।
तत्पश्चात् संपादकीय में हमारे पुरातन सांस्कृतिक राष्ट्रगान के स्थान पर पश्चिम से आयातित राजनीतिक राष्ट्रवाद पर चर्चा की गई है। इसी संदर्भ में लोकमानस में गहराती हुई इस धारणा पर भी टिप्पणी की गई है कि सभी कार्य राज्य ही करेगा अतः नागरिकों को अपने स्तर पर कुछ न करके केवलपात्र सरकार के भरोसे ही बैठे रहना चाहिए। बेशक यह मानसिकता सरकारों को सर्वसत्तात्मक बनाती है और लोक को असहाय।
इसके बाद संपादकीय लोकतंत्र के तीन प्रकाश स्तंभों-समता, स्वतंत्रता और बंधुता पर दृष्टिपात करते हुए हमारी बौद्धिक गुलामी की तरफ इंगित करता है। राजनीति के ‘सर्वग्रासी वर्चस्व’ के कारण हमने भारतीय चिंतन परंपरा की उपेक्षा की और पश्चिम के अंधानुकरण को ही प्रगति का पर्यावाची मान लिया। इस प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता, जो यात्रा का आरंभ था उसे ही गन्तव्य मान लिया गया।
अब, आगे से ‘मधुमती’ में संपादकीय पढने की भी उत्सुकता बनी रहेगी।
राजेन्द्र गर्ग, जयपुर
मधुमती जुलाई अंक साभार मिला। दीर्घा अन्तराल पश्चात संपादकीय पृष्ठ के दर्शन हुए जिसमें आपकी सशक्त लेखनी द्वारा साधिकार स्पष्ठ किया गया है कि अब मधुमती का साज-श्ृगार ‘आधुनिक’ सोच के अनुसार होगा। आपने पूर्ववर्ती चिन्तन को आधार बनाते हुए स्वनिर्मित रीति-नीति को आकार दिया है जिसके विषय में अभी कुछ कहना शीघ्रता होगी। तथापि नवोन्मेशी संकल्पना के प्रति जिज्ञासा के कुछ बिन्दु उभर रहे हैं। ‘अन्तर्पाठ’ में जिस प्रकार महाकवि तुलसी के एक दोहे का ‘भाव पल्लवन’ प्रस्तुत किया गया है क्या यह किसी कथावाचन की शैली का आभास नहीं देगा। वक्ता को बताया जायगा कि ‘माँगी नाव केवट आना, कहइ तुम्हार भरमु मैं जाना’, यहाँ ‘मरमु’ बताने में अनके तर्क-कुतर्क देकर अनेक पृष्ठ भरे जाएँगे। ‘पुरा प्रसंग’ भी कालजयी साहित्य से विदों के विषय में मनीषी चिन्तकों का प्रदेय-पठन होगा जो विपुल भात्रा में यत्र तत्र उपलब्ध है और उसका पिष्टपेषण ही सम्भव है। सबसे कूतूहलतापूर्ण ‘ईलोक’ की ‘रिपोर्टिगं है जिसका सुधी पाठ को से कोई सम्बन्ध नहीं है, विशेषतः वे जो पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के पाठाभ्यासी है। इस विषय-वस्तु में उत्कृष्ट पत्रिका में देने का क्या औचित्य!
रचना चयनित करना सम्पादक का गुरुतर दायित्व तथ्य विशेषाधिकार है तथापि पहले से लेगें ढेर को मूल्यहीन, कालातीत, अथवा अमान्य बना देना भी स्वस्थ-मानसिकता नहीं। पत्रिका मूलतः राज्याधारित है और इसका इस अंक से प्रमाण भी मिल रहा है। कविताएं स्तम्भ में प्रकाशित दस कवियों में से नौ कवि मूल राज्य के हैं। कहानी गीत-गजल, लघु कथाएं, बाल जगत, में भी मूल राज्य के रचनाकारों को प्रमुखता दी गयी है। सारतः पाठक की धारणा एवम् दृष्टि पूर्वा ग्रही हो सकती है आशा है। धनात्मक भाव भी दृष्टव्य हो। मैं मधुमती का विनम्र ग्राहक हूँ। अस्तु पाठकीय पेम से विरत नहीं हो सकता।
गौरी शंकर वैद्य विनम्र, लखनऊ
मधुमती का जुलाई अंक पढा। पलनेश ठकुराती का लेख मुंशी पे*मचन्द के देशप्रेम से जुडे समग्र साहित्य
से अवगत्त कराता है। उसका सार इसमें स्पष्ट झलकता है। निर्मल तेजस्वी की रेखाचित्र कविता अच्छी लगी। इस अंक में दिढो व्यग्य बेहद पसन्द आयें और मधुमती का ये स्वरूप मन को बहुत भाया। और सपांदकीय टीम को बहुत बहुत धन्यवाद।
अशोक चौधरी, जोधपुर
आकर्षक आवरण चित्र से सुसज्जित ‘मधुमती’ का अगस्त अंक इस बार कुछ विलंब से प्राप्त हुआ। यह हर्ष का विषय है कि राजस्थान साहित्य अकादमी लोगों में पढने की अभिरूचि पैदा करने के लिए इतने कम मूल्य में यह पत्रिका उपलब्ध करवा कर सार्थक पहल कर रही है। आज पुस्तकों, पत्रिकाओं के पठन-पाठन में जो ह्वास हो रहा है। उससे सांस्कृतिक विकलांगता पैदा हो रही है। पुस्तकें, पत्रिकाएं हमारे दिल और विभाग को रौशनी देती है। ‘मधुमती’ में आलेख, कहानी, गीत, गजल, कविता, लघुकथा, शोध आलेख, पुस्तक समीक्षा, बाल साहित्य, साहित्यिक समाचार वह सब कुछ तो है जो इसे संपूर्ण उत्कृष्ठ साहित्यिक पत्रिका का दर्जा देती है। राजीव मिश्र का महामना की दृष्टि में धर्म एवम् ईश्वर एवम् डॉ. शिबन कृष्ण रैना का आलेख कश्मीर का विस्थापन साहित्यः जलावतनी का दर्द अभी बाकी है, मुरलीधर वैष्णव (दस का नोट), मनोज वार्ष्णेय (सोशल भेडिया), श्याम कुमार पोकरा (छोटी भाभी) की कहानियां दिल को गहराई तक प्रभावित करती हैं। प्रीता भार्गव, रोजलीन, राजकुमार कुम्भज, किरण राजपुरोहित, अखिलेश अंजुम एवम् कुंदन सिंह सजल की काव्य रचनाएं उम्दा हैं। बाल जगत बच्चों व बडों सभी के लिए पठनीय है। पुस्तकों की समीक्षाएं जानदार है। याने सब रचनाएं एक से बढकर एक-किसी एक की प्रसंशा करना दूसरे के साथ अन्याय होगा फिर भी बहुत ज्यादा प्रभावित कर रही है, कहे बिना भी नहीं
रहा जाए।
एक सुझाव है। पत्रिका कम्प्युटराईज्ड छपती है, खर्च भी वही वही आता है। रचनाओं के प्रस्तुतिकरण को अच्छे ले आउट (पेज डिजायन) के साथ मनभावन रूप
दिया जा सकता है। इससे पाठकों की पढने की जिज्ञासा में बढोतरी होगी। सुंदर, उत्कृष्ट प्रकाशन के लिए
हार्दिक शुभकामनाएं।
राजकुमार जैन ‘राजन’, आकोला
‘‘...लेख गारेख योग और हिन्दी भक्ति काव्य (प. २३-२६) में डॉ. कन्हैया सिंह ने पृ. २५ पर लिखा है- कि....’’ मजे की बात यह है कि हर भक्ति सम्प्रदाय पर गोरखनाथ का आतंक छाया है।’’ यहाँ विद्वान लेखक लगता है ‘‘आतंक’’ शब्द का गलत प्रयोग कर गये। संत साहित्यवेताओं में किसी ने भी गोरख का आतंक छाया है मेरी दृष्टि में नहीं कहा है। यह तो कई शोध ग्रथों से स्पष्ट हो चुका है कि हर भक्ति सम्प्रदाय गारेखनाथ से प्रभाविकत रहा है। लेख में शब्द आतंक लोगों को भ्रमित करता यहाँ उपयुक्त शब्द तो प्रभाव होता तो लेख की सार्थकता अधिक होती। खैर! इसी अंक में डॉ. शैलेन्द्र स्वामी का लेख ‘दलित लेखन का अन्तर्विरोध’ (प. ३४-२६) तथ्यपरक है, उत्तम ईलोक चौपाल (प. १४१) डॉ. राजेन्द्र कुमार सिघंवी मधुमती की एक नई उपलब्धि है, रुचिकर, ज्ञानवर्धक व बहस का मुद्दा भी है।
स्वामी खुशालनाथ ‘धीर’, बाडमरे
मधुमती अगस्त २०१७, का समय की पाबंदी के साथ मिला। लम्बा सम्पादकीय, पाठकों को, ठहर कर सोचने को बाध्य करता है। सम्पादकीय, दर्पण का कार्य होता है। इसके लिए बधाई। पुरा प्रसंग में, अंगरेज स्त्रोतं (भारतेन्दुजी) व्यंग्य, आज ही नहीं, भविष्य में, प्रासंगिक रहेगा। इसे व्यंग्यकारों को प्रेरणा मिलेगी। कविताएं, प्रभावपूर्ण होना चाहिए। हाँ, स्वर्गीय अखिलेश ‘अंजुम’, सर्वश्रीरामस्नेही लाल शर्मा, कंदनसिंह सजल, अश्वघोस की गजलें, मन को छूने में सक्षम है। इस बार, बाल पाठकों को २१-इक्कीस कविताएं बडी संख्या में, कविताऐं बेहद सरल तरीके से कही है जो बच्च को आसानी से ग्रहण कर लेगें। सभी कवियों को, बच्चों के लिए, लेखन करते रहना चाहिए। जिससे बच्चे संस्कारवान बने। अनगढ बानी (श्री किशोरनामा) की गजलों को हार्दिक स्वागत
है। गजलें प्रभावित करती है। धीरे-धीरे निखार आता रहेगा। नवोदितों को स्थान दिया जाना ही चाहिए। इन्हें मानदेय भी सम्मानजनक देना ही चाहिए, ताकि प्रोहत्साहन से निरन्तरता बनी रहे। लघुकथाएं, शोधलेख, समाक्षा, लेख आदि पत्रिका के अनुकुल है। पत्रिका के आमुख पर, श्री हेमन्त शेष का चित्र महानगरीय परिवेश का दर्शाता है। इस तरह के चिंत्राकन का भी स्वागत है। अंतिम पृष्ठ के भीतर, स्वनाम धन्य साहित्यकार, सर्वश्री भारतेन्दु, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद दिवेदी के चित्रों का प्रकाशन, साहित्य प्रेमियों को आनन्दित करता है। आगामी अंक की प्रतिक्षा रहेगी।
अब्दुल सत्तार अन्जान, तराना
मधुमती का अगस्त २०१७ का अंक प्राप्त हुई। प्रधान संपादक डॉ. इन्दुशेखर तत्पुरुष की संपादकीय बहुत ही अच्छी लगी।
कवर पेज पर जन गण मन अधिनायक जय हे गीत की पहली बार पांचों छंद पढने को मिली। जो बेहद पसंद आई।
लेख-गोरख योग और हिन्दी दलित लेखन का अन्तर्विरोध, बेहद उपयोगी लगा। कविताएं भी गुदगुदाने वाली लगीं। कहानी दस का नोट, छोटी भाभी भी खूब पसंद आई। बाल जगत की सभी कविताएं खूब पसंद आई। नया स्तम्भ अनगढ बानी शुरु करने के लिए बधाई।
बद्री प्रसाद वर्मा ‘अनजान’, गोरखपुर (उ.प्र.)