विलेाम का उल्टा

अरविन्द सोरल


विलोम का उल्टा
<br/>‘विलोम का उल्टा’ पढने के उपरांत यह सुनिश्चित है कि दिनेश सिंदल एक नैसर्गिक प्रतिभा से संपन्न जन्म जात कवि हैं। उनकी भाषा रसमय होने के साथ उन्मुक्त तथा तीनों आयामों में खूब विस्तृत है। मुहावरों की अर्थवत्ता को अपनी अनुभूति की स्पष्टतम् अभिव्यक्ति के लिए ढालना और विस्तार देना उन्हें बाखूबी आता है। वे अपने मंतव्य में हमेशा स्पष्ट होते हैं। पहेलियाँ नहीं गढते। छंद पर उन्हें पूरा अधिकार है। उन्हें शेर का कथ्य सूझता भी खूब है। जहाँ तक गजल के विधान गत शिल्प की बात है तो उनकी गजलें पढते हुये ऐसा नहीं लगा कि उनके नाप तोल के उपकरणों में कहीं खोट है। एक आध जगह कसावट में ढील ढाल रह भी गयी हो तो सेर भर उडद की काली दाल में एक आध कंकर तो लाजमी है ही।
<br/>दिनेश की गजल में वाकदग्धिता है। पढने में आनन्द आता है। उनमें बेहतर शेर कहने की क्षमता है। उनमें हिन्दी गजल का प्रबोध है। वस्तुतः हिन्दी गजल का उत्स नवगीत है। वे कवि जो नवगीत के स्कूल के थे जब गजल में हाथ आजमाने लगे तो हिन्दी कविता की संस्कृति की छवि उसमें उभरनी ही थी। यही हिन्दी गजल है। नये बिम्ब, विस्तृत संदर्भों की पट कथा कहते प्रतीक, भाषा में ना कहते हुए भी शब्दों और वाक्यों के अंतराल में बहुत कुछ कह जाना, नेपथ्य में संवेदना के अतिरिक्त की उपस्थिति हिन्दी नवगीत के यही मुख्य लक्षण थे जो अपने आप हिन्दी गजल में प्रवेश कर गये। हिन्दी गजल का विशिष्ट प्रबोध काव्य प्रतिभा का एक और पक्ष हुआ। यह प्रबोध दिनेश में है।
<br/>इतना सब होते हुये भी दिनेश प्रस्तुत संकलन में अपनी प्रतिभा तथा सामर्थ्य से पूरा न्याय करते नजर नहीं आये। पहली बात तो यह कि दुष्यन्त
<br/>के प्रभाव म यह मान लिया गया है कि गजल वही सार्थक होती है जिसमें विरोध के स्वर हों। यह विरोध किस के प्रति है कोई नहीं जानता। जो भी है जैसा भी है हम सबका है। हमारा ही बनाया हुआ है। अच्छा बुरा जो करना है हमें ही करना है। शिकायत आखिर किसकी और किस से। दिनेश भी इस कुंठा से मुक्त नहीं है। लगभग भी गजलों में यही स्वर है। फिर वे जल्दी में भी दिखते है। जो सूझा तुरंत मिसरे में ढाल देते हैं। अपने विचार को जमीन पर पाँव टेकने नहीं देते। उस विचार का विश्लेषण नहीं करते और ना उस विचार को यथा सम्भव सीमा तक फैल पसरने देने की प्रतीक्षा करते हैं। सुंदर अभिव्यक्ति की नैसर्गिक प्रतिभा से तराशा गया शेर पढने सुनने में तो सुन्दर लगता है किंतु स्थायी भाव का संवाहक नहीं बन पाता। अतः उद्धरणीयता एवं संग्रहणीयता के गुणों से वंचित रह जाता है। अक्सर पहला मिसरा बहुत संभावना वाला होता है किंतु धैर्य के अभाव में मिसरा सानी उसे भी कमजोर कर देता है। किन्तु दिनेश जब पूरी फोर्म में होते हैं तो बेहद ताकतवर तथा खूबसूरत शेर कहते है।
<br/>बेरोजगारी की पीडा और उसके कारण जीवन के स्वाभाविक आनन्द से वंचित रह जाना अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त करते हैंः-
<br/>रोजगारी दफ्तरो की ठोकरें मिलती रहीं
<br/>प्यार के किस्से नहीं हैं जब जवानी के लिए
<br/>छद्म जीवी लोगों के दोहरेपन की अभिव्यक्ति देखेंः-
<br/>ठंडक पहुँचाने आये देखो हमको
<br/>वे जिनकी बातें ही आग उगलती हैं।
<br/>तथा
<br/>अगर थे मोम तो आहों से पिघलते
<br/>अगर पत्थर थे तो क्यों भुरभुरे थे।
<br/>बढने के बजाय घटते जाना और अभावों से निरंतर संघर्ष की अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकों की ताजगी और नयापन देखें
<br/>जीवन जोड गुणा सब भूला
<br/>तेरे बाकी भाग देखकर
<br/>इसी प्रकार हमारे समाज में स्त्री की स्थिति का मार्मिक चित्रण करते हैंः-
<br/>हर मोड पर पीती रही है जहर का प्याला
<br/>बेटी हमारे दौर की सुकरात हो गयी
<br/>रिश्तों में आये अन्तर तथा जीवन की आपा धापी और मरिचिकाओं पर खूब सूरत टिप्पणी देखेंः
<br/>गागरों के वास्ते ठहरी कहाँ
<br/>है नदी के पास सागर का पता
<br/>उनमें नये प्रतीक नये मुहावरे गढने की पूरी क्षमता हैं किंतु गजल में एक दिक्कत है। इसमें की गयी सारी मेहनत का बहुत बडा हिस्सा काफियों की तलाश में खर्च होता है। फिर उन काफियों को फिट करने की चुनौती होती है। यह काम कर पाने के लिए बडे धैर्य की आवश्यकता होती है। इस धैर्य के अभाव में बात बन नहीं पाती अतः परिणाम अक्सर ही मिडीयाकर आते हैं। यही चुभने वाली स्थिति समीक्ष्य संकलन में बार बार उपस्थिति होती है। कुछ बेहद स्तरीय व खूबसूरत शेरों के बीच ढेरों सतही ओर बार बार दोहराई गयी घिसी पिटी बातें आती हैं।
<br/>बहुत सारे लोग बच्चे जैसे उत्साह में अनाप लिख रहे हैं। पत्रिकाओं मे कसे हुए संपादन के अभाव में छप भी जाते है और फिर अपने आपको फन्ने खाँ उस्ताद समझदार प्रबोध संपन्न समर्थ कवि हैं। थोडे धैर्य के साथ चिंतन को विस्तार लेने दे तो बहुत बडी कविता का सृजन सुनिश्चित है। प्रस्तुत संकलन का आकार तथा उसमें संकलित गजलों से ऐसा लगता है कि वे हमेशा जल्दी में रहते हैं। उन्हें पहली ट्रेन पकडनी होती है। उन जैसा स्तरीय कवि जब काफीय बाजी के चक्कर में पडता है तो
<br/>नतीजा देखें-
<br/>काँप जाता है यह दशहत में अभी तक
<br/>कैसे कह दूँ दिल मेरा लातूर ना था
<br/>घूमता था दास कबीरा की तरह मैं
<br/>साथ इकतारा लिये संतूर ना था
<br/>इस तरह की काफिये बाजी कविता के व्यक्तित्व को ही कमजोर करती है। सिंदल समझदार कवि हैं वे अपने आपको रोक सकते थे। लातूर के १९९६ के भूकम्प का संदर्भ कितनों की पहुँच में होगा और फिर इकतारा और संतूर प्रतीकों से किन प्रतिकूलताओं का उद्घाटन हो रहा है?
<br/>वैसे जिन्दल का व्यन्जना बोध भी शालीन तथा सुरूची पूर्ण हैः-
<br/>जन्म पत्री नहीं मिली तो क्या
<br/>बैंक की पास बुक मिला प्यारे
<br/>और
<br/>घर की पत्नी तो मुझे वेतन लगी हर माह का
<br/>और तुम लगती हमेशा अन्य आमद की तरह
<br/>सिन्दल सामर्थ्यवान हैं। उनसे और अधिक गंभीर, समय के समानान्तर स्थायी कविता की अपेक्षा है। वो थोडे धैर्य के साथ अपने चिन्तन को विस्तार लेने दें तो उनके द्वारा बडी कविता का सृजन सुनिश्चित है।
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