न आईने न रोशनी न खिडकियाँ,दलदल में जलसा

डॉ. नरेन्द्र शर्मा ‘कुसुम’


रंग बदलता मन
<br/>सहजोद्भूत काव्य-प्रतिभा की धनी लब्ध प्रतिष्ठ कवियत्री जया गोस्वामी के कृतित्व को किसी औपचारिक परिचय की आवश्यकता नहीं है। वे एक लम्बे अरसे से काव्य सृजन में निरत हैं। गीत और गजल के क्षेत्र में उनका अवदान महनीय महनीय और स्पृहणीय है। अब तक प्रकशित उनके अनेक कविता-संग्रह, विशेष रूप से गीत और गजल-संग्रह उनकी विलक्षण काव्य सृजन प्रतिभा के पुष्कल प्रमाण हैं। ‘अभी कुछ दिन लगेंगे’ (१९९५), ‘ये प्रवासी स्वप्न मेरे’ (२०१३)’, ‘हम खग टूटी पाँखों के’ (२०१६); ‘पास तक फासले’ (२०१०) तथा प्रस्तुत समीक्ष्य दो गजल-संग्रहों के अनुशीलन का मुझे यदा-कदा सुअवसर मिलता रहा है। मुझे विस्मय होता है कि इतनी समर्थ कवियित्री की वह व्यापक पहचान अब तक नहीं बन पाई है जिसकी वे सर्वथा अधिकारिणी हैं। संभवतः उनकी स्वभावगत प्रचार पराङ्गमुखता और स्वविलोपन (सैल्फ इफेस्टमेंट) की प्रवृत्ति इसका कारण रही हो। बहरहाल। उनकी सद्यः प्रकाशित इन दो कृतियों के सम्यक मूल्यांकन हेतु इन्हें समीक्षा-गवाक्षों से देखना बेहतर होगा। द्य
<br/>न आईने न रोशनी न खिडकियाँ
<br/>यह गजल-संग्रह जया गोस्वामी का नवीन गजल-संग्रह है जिसमें १०६ गजलें संगृहीत हैं। कहना न होगा कि गीत और गजल की विधायें उनकी प्रिय सृजन-विधायें हैं। उनकी इन विधाओं से गुजरना मानों उनकी अन्तर चेतना की सघन अर्न्तगुहाओं से गुजरने जैसा है, उनकी इन विधाओं से गुजरना मानो उनकी ‘गमेजानाँ’ और ‘गमे दौराँ’ की दुनिया की दुनिया की पथरीली राहों से गुजरने जैसा है, उनकी इन विधाओं से गुजरना मानो चेतन, अचेतन और अवचेतन के अनावृत्त द्वारों से गुजरने जैसा है; उनके प्राणों की अनसुनी झंकृतियों और अनचीन्हे स्पन्दनों को सुनने जैसा है; उनकी अपराजेय प्राणवत्ता और जिजीविषा से रू-ब-रू होने जैसा है। आयें, पुस्तक के पन्ने उलटें। पहले पृष्ठ पर कवयित्री की उदात्त भावना, जो उसे निखिल विश्व चेतना से जोडती है, को देखें ः
<br/>सिर्फ अपने हित जिए तो क्या जिए
<br/>सोच के विस्तार पर ध्यान दें
<br/>फिर आगे-
<br/>लेकिन कवयित्री को ‘फरेबों के हुनर’ से बहुत खतरा है ः
<br/>चुस्त इतना है फरेबों का हुनर
<br/>होशियारी बे-अकल होने लगी
<br/>इस बेरहम दुनिया का वह क्या करे-
<br/>सूरज पर ज्यों बर्फ जमाना नामुमकिन
<br/>त्यों पत्थरदिल को पिघलाना नामुमकिन
<br/>कवयित्री का ‘गमें जानाँ’ जाने
<br/>पोशीदा हैं जाने कितने अफसाने
<br/>कागज पर उनका लिखवाना नामुमकिन
<br/>जन्दगी की तल्ख हकीकत दार्शनिक मुद्रा में ः
<br/>इक्तिदारी, तख्त दौलत नेमतें जद्दों-जहद
<br/>इस जहाँ से चल दिये तो सब पडा रह जायेगा
<br/>विकृत समाज की तस्वीर-
<br/>कसमसाते हैं मगर मच्छों के जबडे
<br/> मछलियों की फिर महक आई हुईं है
<br/>....आज तो मजहबपरस्तों के महाँ भी खास हैं
<br/>हैं न जिनमें आईने ना रौशनी न खिडकियाँ
<br/>प्रकृति-पेम और पर्यावरण-संरक्षण-चेतना-
<br/>एक पीपल पर कुल्हाडी से बचाया शुक्रिया
<br/>कुछ परिन्दों को पुराना आशियाना मिल गया
<br/>लेकिन पुरुष-प्रधान समाज में नारी-जीवन की विडम्बना-
<br/>जिस मकाँ को घर बनाया औरतों ने
<br/>मर्द था मुखत्यार तब भी और अब भी
<br/>बहरहाल, ऐसे उद्धरणों की सूची और भी लम्बी हो सकती है पर कहने का आशय यह है कि इन गजलों में जया गोस्वामी का जो अन्दाजे-बयां है वह उन्हें अन्य गजलकारों से विशेष बनाता है न केवल कथ्य के व्यापक फलक के कारण अपितु इसके पुर असर और पुरकशिश इजहार के कारण भी। पूरी कृति में उन्होंने केवल जिन्दगी की पोशीदा तहों को गजलों में गाया है अपितु इन गजलों में समाज की बदशक्ल हकीकतों को भी आईना दिखाया है। पर एक बात-जरूर है कि इन गजलों में कवयित्री के
<br/>अवसाद की छाया हर कदम पर उसका पीछा करती रहती है, एक गहरा ‘मैलन को लिया’ इन गजलों में महसूस किया जा सकता है चाहे वह व्यक्तिगत हो अथव समष्टिगत। शिल्प के स्तर पर ये गजलें मुकम्मल गजले है। प्रयोगशीलता के सम्पुट से गजलों में नव्यता का स्पर्श संभव हुआ है। हिन्दी, उर्दू और संस्कृत के विलक्षण प्रयोग से गजलों की भव्यता और प्रामाणिकता समृद्ध हुई है। कुछ मिलाकर, ये गजलें सुपाठ्य, सुगेय एवं सुसंप्रेष्य हैं। द्य
<br/>दल दल में जलसा
<br/>यह गजल-संग्रह १०२ गजल-गुलों का एक बेहतरीन गुल दस्ता है जिसकी पुरकशिश खुशबू पूरी कृति को महका रही है। एक ही वर्ष में दो गजल-संग्रहों की रचना और उनका प्रकाशन निस्सन्देह जया गोस्वामी की अकुंठ और अनवरत काव्य-साधना का परिचायक है। जया गोस्वामी जैसे सुस्ताना जानती ही नहीं, ‘चरैवेति, चरैवेति’ की वे साधिका हैं ः
<br/>सुस्ताने लगता है जब भी-भीतर का कोई खरगोश
<br/>कछुआ कहता वक्त नहीं है उठो अभी आराम कहाँ
<br/>वय के अंतिम पडाव पर भी वे सतत-गतिशील एवं प्राणवान हैं हालांकि ‘कुछ खो गया है’, ‘कुछ मिल नहीं पाया’ दुनिया की बेरुखी, रिश्तों की टूटन जैसी अर्न्तभेदी भावनाओं के एक भीषण ज्वालामखी को अपने में समेटे वे चल रही हैं। गजल-दर-गजल हम इससे मुखातिब होते हैं। कोई अतृप्त प्यास, कोई अनबुझी आग, कोई सिसकता दर्द, कोई दरकती साँस-यह सब इन गजलों में महसूस किया जा सकता है। क्य कि यह सब कुछ हमारी अपनी जिन्दगी का भी तो एक अहम हिस्सा है इसलिए इन गजलों में हम अपने को बडी शिद्दत से व्यक्त पाते हैं। आयें, ‘दल दल में जलसा’ का जायजा लें। निर्मलमना कवयित्री की ये पंक्तियाँ काबिले गौर हैं ः
<br/>हमें झूठे दिखावे की कलाकारी नहीं आती
<br/>कि पानी पर लिखावट की अदाकरी नहीं आती
<br/>यह बहुत अच्छा है कि वह इस कलाकारी से बची हुई है इसलिए हरदिल अजीज है। आदमी की
<br/>फितरत में साँप का बयान जरूर आयेगा। अज्ञेय की ‘साँप तुम सभ्य तो हुए नहीं’ कविता याद आ जाती है, अब जया गोस्वामी को सुने-केंचुली में बन्द हैं हम
<br/>साँप के मानिन्द हैं हम
<br/>कवयित्री का अन्दाजे बयां-
<br/>कहने को तो गजल बहुत से कहते हैं
<br/>कहने का अन्दाज निराला अपना है
<br/>क्योंकि सच कहने का उसमें साहस है
<br/>डर रहे हैं लोग क्यों सच बात कहने के लिए
<br/>क्या लिया करते इजाजत गुल महकने के लिए
<br/>उसमें क्रांति, बगावत का जज्बा देखें
<br/>वे रोज रोज हम पर बरसा रहे हैं कहर क्यों
<br/>यह इसलिए हुआ है हम लोग सह रहे हैं
<br/>....निकलती हैं दिली आहें नए अशआर बनकर
<br/>जल है आग सीने में उसे गजालों में ढाला है
<br/>यह ठीक है कि इन गजलों की निर्मात्री बेहद गमजदा है, अपनी खुद की दुनिया में और बाहरी दुनिया में, पर वह समाज की हकीकतों से बेखबर नहीं है, मसलन, बेटियों पर हो रहे बेइन्तहा अत्याचार, पानी की बरबादी, प्रदूषण, आम आदमी की भूख-प्यास की लाचारी और हाकिमों की बेरुखी, प्रकृति का बेहद दोहन आदि। पर उसे न्याय पर भरोसा है चल पडेंगे हजारों कदम
<br/>पर कदम
<br/>हो अगर साथ इन्साफ के रहनुमाँ
<br/>इस सबके बावजूद ‘माँ’ का ख्याल उस भीतर से छू जाता है
<br/>त्रुटियों के हर न्यायालय में
<br/>माँ का निर्णय सिर्फ क्षमा है
<br/>माँ का क्या बस एक दिवस है
<br/>हर दिन हर पल माँ तो माँ है
<br/>अन्त में, जया गोस्वामी उन व्याक्तियों में से हैं जो पांत छोडकर चलना जानती हैं
<br/>आम रस्ते पर चले तो क्या चले
<br/>मुख्तलिफ अपनी डगर पैदा करें
<br/>इन दोनों गजल-संग्रहों को पढकर लगता है कि वे अन्य गजलकारों से काफी आगे निकल गई हैं। आज के माहौल में जहाँ पुस्तकें पढने वाले बहुत कम बचे हैं, वहाँ इन गजलों को पढे बिना कोई इन गजलों की खूबी को कैसे समझ सकता है। इसलिए एक व्यापक पाठक वर्ग आज की बहुत बडी आवश्यकता है। बहरहाल।
<br/>अब गजल रूमानियत का ही पर्याय नहीं रही। जमाना था कि गजल हुस्न और इश्क की जरूरत बन गई थी, जमाना है कि गजल ‘कबीर’ हो गई है। उसके तेवर में रूमानियत भी है पर उसके मिजाज में एक खास तगज्जुल है जो आज के वक्त की खास जरूरत है। वह अब आदमी को गा रही है-
<br/>इस वक्त जब कि कान नहीं
<br/>सुनते कविताएँ
<br/>कविता पेट से सुनी जा रही है
<br/>आदमी गजल नहीं गा रहा है
<br/>गजल आदमी को गा रही है।
<br/>हिन्दी में, गजल एक लम्बा सफर तय करके आई है, यह सफर जारी है जिसमें अनेक हम सफर शामिल हो रहे हैं। जया गोस्वामी का यह सफर जारी रहे, इसी मंगल भावना के साथ मुझे उम्मीद है कि उनके अन्य गजल-संग्रहों के साथ इन दोनों गजल-संग्रहों को रुचिशील गजल प्रेमी जरूर पढना चाहेंगे। इत्यलम्।
<br/>७-च-२, जवाहरनगर, जयपुर-३०२००४ मो. ९४१४८२९३७६
<br/>