लोककाव्य आल्हा में पृथ्वीराज का व्यक्तित्व एवं कृतित्व

डॉ. प्रणव देव


मध्यकालीन वीरगाथाओं ने साहित्य एवं इतिहास-लेखन को अनेक अनतिख्यात आयाम दिये हैं। मध्यकालीन लोककाव्य आल्हा ने जहाँ एक ओर साहित्य में लोकभाव, गेयता, अभिनय, मौखिक परम्परा, राष्ट्रीय भाव जैसे उदात्त मूल्यों को सम्पुष्ट किया, वहीं दूसरी ओर इतिहास के अनेक छोटे-बडे नायको के व्यक्तित्व-कृतित्व को समझने में सहायता प्रदान की। रायपिथौरा पृथ्वीराज चौहान पूर्व मध्यकालीन राजस्थान का विराट व्यक्तित्व था। जिसने सम्पूर्ण उत्तर भारत को अपनी दिग्विजयनीति से प्रभावित
किया था।
लोककाव्य आल्हा अथवा आल्हखण्ड हिन्दी साहित्य के आदिकालीन वीरगाथात्मक प्रसिद्ध रासोकाव्य परमालरासो के महोबाखण्ड की अनुकृति माना जाता है, जो वीरगाथात्मक लोकगाथा के रूप में उत्तर भारत में बेहद लोकप्रिय रहा है, इसके रचयिता जगनिक हैं। वे तत्कालीन बुन्देलखण्ड के चन्देलवंशीय शासक परमर्दिदेव के दरबारी कवि थे। आल्हखण्ड की जगनिक द्वारा लिखी गई कोई भी प्रति अभी तक उपलब्ध नहीं हुई है, यद्यपि इसकी संकलित की गई प्रतियाँ ही उपलब्ध हैं। जिनका संकलन विभिन्न विद्वानों ने अनेक क्षेत्रों में गाये जाने वाले आल्हा गीतों के आधार पर किया है। इसलिए इसके विभिन्न विद्वानों ने अनेक क्षेत्रों में गाये जाने वाले आल्हा गीतों के आधार पर किया है। इसलिए इसके विभिन्न संकलनों में पाठान्तर मिलता है, यद्यपि इस लोककाव्य का प्रचार-प्रसार समस्त उत्तर भारत में है। उसके आधार पर प्रचलित गाथा हिन्दी भाषा-भाषी प्रान्तों के गाँव-गाँव में वर्षाऋतु में विशेष रूप से गायी जाती है। लिखित साहित्य के रूप में न रहते हुए भी लोकमानस के कण्ठ में जगनिक के संगीत की वीरदर्पपूर्ण हुंकार अनेक बलखाती हुई अब तक चली आ रही है। जिसमें चौहान वंश के प्रतापी शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक सूत्र मिलते हैं।
शास्त्रीय विधानों या नियमों से मुक्त,लोककाव्य परम्परा की भाँति इतने लम्बे अन्तराल में देश और काल के अनुसार आल्हखण्ड के कथानक और भाषा में लोकगायकों ने अनेक क्षेपक एवं क्षेत्रीय अभिरूचि के कथानक
जोड दिये हैं। आल्हा में अब तक अनेक नये हथियारों, देशों व जातियों के नाम भी सम्मिलित हो गये हैं जो जगनिक के समय में अस्तित्व में नहीं थे। साहित्य की दृष्टि से आल्हा में पुनरूक्ति की भरमार है, तथापि विभिन्न युद्धों में एक ही तरह के वर्णन मिलते हैं। अनेक स्थलों पर कथा में शैथिल्य और अत्युक्तिपूर्ण वर्णनों की अधिकता है। यह पृथ्वीराजरासो के महोबाखण्ड की कथा से समानता रखते हुए एक स्वतन्त्र रचना है। इसने लोक जीवन की सुषुप्त भावनाओं को सदैव राष्ट्र गौरव के गर्व से अभिसिंचित रखा है।
पूर्वमध्यकालीन भारतीय इतिहास में जिन शक्तियों ने तुर्क सत्ता के प्रतिरोध में अक्षुण्ण एवं उल्लेखनीय योगदान दिया, उनमें चौहान या चाह्मान वंश अविस्मरणीय रहा है। इस वंश के प्र*तापी शासकों ने अपने भुजबल से अपने तत्कालीन पडौसी राज्यों पर अपना दबदबा बनाये रखा। इतना ही नहीं, इसी वंश के पृथ्वीराज तृतीय ‘‘रायपिथौरा’’ ने अपने समय और समाज का सम्पूर्ण नेतृत्व किया। पृथ्वीराज की प्रारम्भिक विजयों (नागार्जुन का अन्त, भाडानकों का दमन) से लेकर दिगिवजय नीति के प्रसार में उसके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को पहचाना जा सकता है। वर्तमान में पृथ्वीराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से सम्बन्धित इतिहास लेखन में अभिलेखों एवं बहुआयामी साहित्य का उपयोग इतिहासकारों द्वारा किया जाता रहा है। बाहुलेख, कालिंजर और महोबा लेख (विक्रम संवत् १२४०) मदनपुर शिलालेख जैसे अभिलेखों के अतिरिक्त जयानक भट्ट का पृथ्वीराज विजय, जैन ग्रन्थ खरतरगच्छपट्टावली, पृथ्वीराजरासो, रासोसार, सारंगधार पद्धति, प्रबन्ध चिन्तामणि, पुरातन प्रबन्ध संग्रह, हम्मीर महाकाव्य, पृथ्वीराज प्रबन्ध, सुरजन चरित, तबकात-ए-नासिरी, तारीख-ए-फरिश्ता जैसी कृतियों में प्रयोग की गई है। परमालरासो या आल्हखण्ड जैसी रचनाऐं इतिहासकारों द्वारा पृथ्वीराज के इतिहास लेखन में बहुत कम प्रयोग की गई है। प्रस्तुत शोधलेख में लोककाव्य आल्हा१ में प्रतिबिम्बित पृथ्वीराज का व्यक्तित्व एवं कृतित्व की चर्चा की जा रही है।
आल्हाखण्ड के संकलन एवं प्रकाशन का संक्षिप्त घटनाक्रम भी उल्लेखनीय है, उत्तरप्रदेश के फर्रूखाबाद में सन् १८६५ ई. में वहाँ के तत्कालीन कलेक्टर सर चार्ल्स इलियट ने अनेक भाटो की सहायता से इस लोकगाथा को लिपिबद्ध करवाया था। कालान्तर में सर जार्ज ग्रियर्सन ने बिहार में इण्डियन एण्टीक्वेरी, भाग १४ पृष्ठ २०९, २२५ और विसेंट स्मिथ ने बुन्देलखण्ड की बुन्देली भाषा के संदर्भ में लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया, भाग ९-ढ्ढ पृष्ठ ५०२ में भी आल्हखण्ड के कुछ भागों का संग्रह किया था। वाटरफील्डकृत अनुवाद ‘‘दि नाइन लाख चेन’’ अथवा दि ‘‘मेरी फ्यूड’’ के नाम से कलकत्ता रिव्यू में सन् १८७५-७६ में प्रकाशित हुआ था। इलियट के अनुरोध पर डब्ल्यू वाटरफील्ड ने उनके द्वारा संग्रहीत का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया था। जिसका सम्पादन ग्रियर्सन ने १९२३ ई. में किया।
अक्सर आल्हखण्ड की ऐतिहासिकता को अस्वीकार किया जाता है, किन्तु इतिहासकार यह भूल जाते है, कि यह कृति इतिहास न होकर ऐतिहासिक काव्य है और उसकी मुख्य प्रवृत्ति लोक जागरण करते हुए इतिहास गौरव स्थापित करना होता है। इस संदर्भ में डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ऐतिहासिक काव्यो में इतिहास और कल्पना के मिश्रण को महत्वपूर्ण बताया है लेकिन उसके साथ यह भी स्वीकार किया है कि भारतीय प्रवृत्ति कल्पनाविलास की ओर उन्मुख थी, और इतिहास कल्पना को उकसा देनेवाला उपकरण मात्र था। आल्हखण्ड में भी उसी परम्परा का अनुसरण किया गया है। इसमें घटनाओं के वर्णन तथा पात्रों के चित्रण में कल्पना का रंजन ही अधिक है, फिर भी उसका ऐतिहासिक आधार ठोस एवं पुष्ट है। श्री गणेश प्रसाद द्विवेदी ने कथा की ऐतिहासिकता का केवल संभावनाओं के आधार पर और डॉ. शम्भूनाथ सिंह ने प्रबन्ध चिन्तामणि और पुरातन प्रबन्ध संग्रह के साक्ष्य तथा कुछ शिलालेखों के आधार पर निरुपण किया है।२ चन्देलों के इतिहास पर सर्व श्री निमाई शरण बोस३,
एन.एन.घोष, एस.के. मित्र, केशवचन्द्र मिश्र, अयोध्या प्रसाद पाण्डेय४ आदि के शोध ग्रन्थ उपलब्ध हैं, परन्तु फिर भी यह कहना ठीक नहीं होगा कि परमर्दिदेव या परमाल के बारे में इतिहास इससे कुछ अधिक नही बताता है। आल्हखण्ड के पात्रों में परमाल और उनसे सम्बद्ध महत्वपूर्ण घटना चौहानों और चन्देलों का युद्ध ऐतिहासिक है, यद्यपि दोनों के सम्बन्ध में कल्पनापरक अंश भी कम नहीं हैं। तत्कालीन चन्देलों का युद्ध ऐतिहासिक नायको के रूप में बहुत सालों से प्रतिष्ठित है।५ तत्कालीन जेजाकभुक्ति अथवा वर्तमान बुन्देलखण्ड के अनेक स्थलों को इन वीरनायकों से सम्बद्ध किया जाता रहा है। मैहर (सतना, मध्यप्रदेश) की शारदा देवी का मन्दिर आल्हा द्वारा निर्मित बताया जाता है। चिल्हा ग्राम (जिला बाँदा उत्तरप्रदेश) के खण्डहरो को आल्हा ऊदल का राजमहल कहा गया है तथा तमसा नदी के किनारे का एक घाट आल्हा घाट और विंध्यपर्वतमाला में बनी कन्दरा को आल्हा कन्दरा के नाम से जनमानस स्वीकारता रहा है। कुँवर महेन्द्रपाल सिंह ने मदनपुर के मन्दिर में लगे अभिलेख को प्रमाण स्वरूप उद्धृत किया है जो इस प्रकार हैः ओम् सं. १२३५ श्रावन वदि। विकारपथ के महाराज पुत्र श्री आल्हन देव श्री आदित्य मार्स प्रतिदत्त...।६ पृथ्वीराजरासो का महोबा समय और आल्हखण्ड दोनों ग्रन्थ, जो भले ही इतिहासकारों द्वारा चौदहवीं से अठारहवीं सदी के बीच के माने जाते हों, आल्हा ऊदल की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हैं। आल्हखण्ड की मुख्य घटना चन्देलों और चौहानों का युद्ध इतिहास की राष्ट्रीय महत्व की घटना है जबकि अन्य अधिकांश कल्पित पात्र एवं घटनाऐं ऐतिहासिक सम्भावना से पुष्ट हैं और यही विशेषता आल्हखण्ड को ऐतिहासिक काव्य सिद्ध करने में प्रो. नर्मदा प्रसाद गुप्त समर्थ
मानते हैं।७
लोककाव्य आल्हा के कथानक में अद्भुत विस्तार है। उसमें आल्हा उनके पिता और उनके तीन पीढियों की कथा को एक साथ पिरोया गया है। भौगोलिक दृष्टि से तीन राजवंशो को यह कथा सम्मिलित करती हैः
१. दिल्ली/अजमेर का पृथ्वीराज चौहान रायपिथौरा।
२. कन्नौज का गहडवाल वंशी राजा जयचन्द।
३. बुन्देलखण्ड के महोबा/कालिंजर का चन्देल राजा परमाल या परमर्दिदेव।
चरित काव्यों की भाँति इसमें आल्हा, ऊदल और मलखान आदि वीरनायकों के जन्म से लेकर वीरगति तक का रोमांचित करने वाला वर्णन है। मौखिक परम्परा के कारण आल्हखण्ड के कथानक में निरन्तर विस्तार एवं विकास होता गया। जिससे विश्रंखलता आना सहज है, तथापि इसी के कारण इसके कथानक को खण्डों में विभाजित करना पडा ताकि प्रत्येक खण्ड अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता हुआ भी नायक के व्यक्तित्व से बँधा हुआ है। इसका कथानक रूपगाथाचक्र जैसा भी है। जिसमें कुछ पात्रों से सम्बन्धित गाथाऐं एक गाथाचक्र में बँध जाती है और उसकी अन्विति नायक के चरित्र पर आधारित होती है। तात्पर्य यह है कि आल्हखण्ड का कथानक एक विशेष प्रकार है और उसी दृष्टि से उसका परीक्षण करना उचित होगा। इस कथानक के बावन खण्डों की सूची इस प्रकार हैः-
संयोगिता स्वयंवर २. परमाल का विवाह ३. महोबा की लडाई ४. गढ माडो की लडाई ५. नैनागढ की लडाई ६. विदा की लडाई १२. ऊदल की कैद १३. चन्द्राबलि की चौथी की लडाई १४. चन्द्रावली की विदा १५. इंदल हरण १६. सिंगल दीप की लडाई भाग-१, १७. सिंगल दीप की लडाई भाग-२, १८. आल्हा की निकासी १९. लाखन का विवाह २०. गाँ की लडाई २१. पट्टी की लडाई २२. कोट कामरू की लडाई २३. बंगाले की लडाई २३. अटक की लडाई २४. जिंसी की लडाई २५. रूसनी की लडाई २६. पटना की लडाई २७. अंबरगढ की लडाई ३२. ब्रह्म की जीत ३३. बौना चोर का विवाह ३४. धौलागढ की लडाई ३५. गढ चक्कर की लडाई ३६. ढेबा का विवाह ३७. माहिल का विवाह ३८. सामरगढ की लडाई ३९. मनोकामना तीरथ की लडाई ४०. सुरजावती
हरण ४१. जागन का विवाह ४२. शंकरगढ की लडाई ४३. आल्हा का मनौआ ४४. बेतवा नदी की लडाई ४५. लाखन और पृथ्वीराज की लडाई ४६. ऊदल हरण ४७. बेला का गौना ४८. बेला के गौने की दूसरी लडाई ४९. बेला और ताहर की लडाई ५०. चंदन बाग की लडाई ५१. जैतखम्ब की लडाई ५२. बेला सती।
वर्तमान आल्हखण्ड की विभिन्न कथाओं में कुछ आधारों पर एक निश्चित् समानता समझी जा सकती है, परन्तु उसके लिए स्वतन्त्र चर्चा की आवश्यकता है। डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त एक निश्चित तारतम्य को सम्भव मानते हैं।८ इतिहास लेखन की दृष्टि से चन्देल और चौहानों का युद्ध उसकी अधिकारिक कथा है, जबकि अन्य चरित कथाऐं प्रसंगवश हैं। जिनमें पृथ्वीराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को पहचाना जा सकता है। इस गाथा में जिन रूढियों का उपयोग किया वे अधिकांश लोककथाओं में वर्णित हुई हैं। जादू से सम्बन्धित रूढियाँ जैसे जादू की वस्तुओं, जादू की लडाई, पूर्व जन्म की स्मृति, संयोग और वरदान से अस्त्र-शस्त्रों की प्राप्ति, शकुन-अपशकुन, मन्त्र-तन्त्र की लडाई, पूर्व जन्म की स्मृति, संयोग और वरदान से अस्त्र-शस्त्रों की प्राप्ति, शकुन-अपशकुन, मन्त्र-तन्त्र की लडाई, पूर्व जन्म की स्मृति, संयोग और वरदान से अस्त्र-शस्त्रों की प्राप्ति, शकुन-अपशकुन, मन्त्र-तन्त्र की लडाई आदि जनविश्वासो पर आधारित है। पृथ्वीराजरासो में भी पूर्व जन्म की स्मृति, मृत व्यक्ति का जीवित होना, प्रेम-मिलन आदि रूढियो का वर्णन मिलता है। इस सम्बन्ध में अधिक विश्लेषण-विवेचना के लिए स्थान नही है। आल्हा का चरित्र कल्पना परख होता हुआ भी वीरता के आदर्श पर खरा उतरता है। अतः उसमें मध्यकालीन आख्यानों के नायकों की भाँति प्रेम की विलासता और भूख अथवा प्रेम की आध्यात्मिक भावना नहीं है। वरन आल्हखण्ड में लौकिक प्रेम का विशुद्ध मर्यादित रूप दिखाई पडता है। एक तरफ पृथ्वीराज के पौरुष का शौर्य तथा उदारता है, तो दूसरी तरफ नारीत्व का उत्कर्ष एवं मर्यादा। नारी और पुरुष
दोनों समान स्तर पर चित्रित किये गये हैं। दोनों का सम्मान करने वाले कथानक सामन्त युग की अद्भुत देन हैं।
लोककाव्य आल्हा में पृथ्वीराज चौहान को असाधारण ऊर्जा और ओज के व्यक्तित्व का धनी बताया गया है- गज भर छाती पृथ्वीराज की, औ आँखन में है अँगार। यद्यपि इस महाकाव्यात्मक गाथा का नायक पृथ्वीराज को कहीं नहीं बताया गया है, फिर भी उसके विराट व्यक्तित्व के दर्शन अनेक स्थानों पर किये जा सकते हैं। नायकत्व के संदर्भ में दो स्थापनाऐं उल्लेखनीय हैं। पहली यह है कि मूल आल्हखण्ड का नायक परमाल था। बाद में आल्हा को महत्व मिला और उसके बाद ऊदल को ही नायकत्व दिया गया, यद्यपि पहले जब काव्य में नायक परमाल को कायर, दुर्बल और शक्तिहीन कहकर निष्प्रभ चित्रित करने की चेष्टा जगनिक की रानी मल्हना की राजनैतिक अन्तर्दृष्टि, व्यवहार-कुशलता और निश्चल सहानुभूति, सुनवाँ की साहसिकता, वीरता और दृढता तथा बेला का पतिब्रत धर्म भारतीय नारीत्व का आदर्श स्वरूप उभारने में समर्थ है। आल्हा ऊदल की माँ देवलदे तो आदर्श क्षत्राणी वीर नारी और राजमाता हैं। भारतीय नारी के सभी गुण उनमें पूंजीभूत हुए है, इसीलिए कर्नल टॉड ने उनकी प्रशंसा में लिखा है कि विश्व के इतिहास में देवलदे की श्रेष्ठ और उदार देश भक्त की तुलना में किसी स्त्री का उदाहरण नही मिलता।९ यह स्पष्ट है कि आल्हखण्ड मौखिक परम्परा का लोक काव्य है। इसलिए इसमें साहित्य शास्त्रीय विशेषताओं एवं विधानों की खोज करना निरर्थक है किन्तु पूर्व मध्यकाल के महानायक रायपिथौरा पृथ्वीराज चौहान के व्यक्तित्व कृतित्व को पहचानने में यह अवश्य सहायक हो सकता है। बारहवीं सदी के राजपूत युग की संस्कृति के प्रमुख आधार युद्ध और प्रेम थे।१० आल्हखण्ड में युद्धों और विवाहों के अनेक वर्णन युद्ध-वीरता और प्रेम-व्यापार वैशिष्टय से ओतप्रोत हैं। प्रत्येक सर्ग या खण्ड एक युद्ध का आख्यान है। उस समय के साहित्य और समाज में क्षत्रिय जीवन
का प्रमुख आदर्श वीरता है, और व्यक्तिगत वीरता में जिस साहस, विश्वास, दर्प और गौरव की अभिव्यक्ति आल्हखण्ड में हुई है। यह उल्लेखनीय है-
बारह बरस लौ कुकूर जीवै और तेरा लै जियै सियार।
बरिस अठारह क्षत्री जीवै, आगे जीवन को धिक्कार।।
इसी प्रकार एक अन्य प्रकरण में जहाँ एक ओर पृथ्वीराज की रणनीति की जानकारी मिलती है वहीं मल्हना रानी की राज्य चिन्ता भी दृष्ट्रव्य है-
चढी पालकी मल्हना रानी, जगनेरी में पहुँची जाये
गओ हरकारा जगनायक पै, जगनिक सो कही सुनाय
मल्हना आई दरवाजे पै जल्दी चलो हमारे साथ
जगनिक आये और द्वार पै मल्हना छाती लियो लगाय
रो रो मल्हना बात सुनाई हम पै चढै पिथौरा राय
नगर महोबा उन धिरवा लओ फाटक बनद दये करवाय
विपत्ति हमारी मेटन के हित तुम आल्हा को ल्यावो मनाय
मल्हना बोली कातर हुई के, जगनिक संकट हो सहाय
राज्य संकट के समय का वर्णन भी उल्लेखनीय है-
धन्य जनम है वा क्षत्री का परहित सीस देव कटवाय
जग में सुख के साथ सब ही दुख में बिरलेहोय सहाय
पवन बछैरा हरनागर दो तो हम आल्हा पै चलि जाय
मल्हना जगनिक के संग लौटी ब्रह्मानन्द को लियो बुलाय
जगनिक साजै घोडा साजो आरति करी मल्हन के नार
लाज काज सब हाथ तुम्हारे नैइया खेय लगइयो पार
फॉदि बछेडा पर चढ बैइे मनियादेव के चरण मनाय
सबै देवतन को सुमरिन कर जगनिक कूच कियो करवाय
समग्रतः लोककाव्य आल्हा में पृथ्वीराज चौहान ‘‘रायपिथौरा’’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ-साथ तत्कालीन समाज एवं समय के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य यथा व्रत-त्यौहार पर्व महिलाओं के प्रति दृष्टि, सामाजिक संरचना आदि के आदि अनेक सूत्र लोककाव्य आल्हा में मिलते है। जिनका प्रयोग इतिहास के मौखिक स्त्रोत के रूप में
रासो ग्रंथो सहित होना चाहिए। परमर्दिदेव के दरबारी कवि जगनिक द्वारा रचित आल्हखण्ड जैसी लोकगाथाऐं पृथ्वीराज के व्यक्तित्व की प्रशंसा निश्चय ही उसकी चुम्बकीय व्यक्तित्व एवं दिग्विजयी कृतित्व के मूल्यांकन के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। द्य
संदर्भ एवं पादटिप्पणी ः-
१. आल्हखण्ड के अनेक संस्करण एवं पाठ उपलब्ध हैं। जिनमें प्रमुख रूप से श्री शिवचरण का असली आल्हाखण्ड २३ लडाई (इलियट का पाठ २५ वां संस्करण) १९१२ फर्रूखाबाद, उत्तरप्रदेश, श्री शिवचरण लाला का पाठ, (महोबे की बोली में २३ लडाई और बावनगढ विजय) भार्गव पुस्तकालय, बनारस, श्री नारायण प्रसाद मिश्र का पुनरीक्षित एवं संपादित, आल्हखण्ड (असली २३ लडाई, ५२ गढ विजय) लखन १९१२ (एक अन्य संस्करण, १९२५ बनारस) श्री नारायण प्रसाद मिश्र का आल्हाखण्ड बडा, (असली, २३ लडाई ५२ गढ विजय, संकलन, महोबा की बोली में १९२०) चन्दरबरदाई कृत रासों की आल्हखण्ड १९३९, ५२ लडाई १०० गढ विजय, भार्गव पुस्तकालय बनारस तथा श्री नारायण प्रसाद मिश्र का असली आल्हखण्ड २६ लडाई ५५ गढ विजय १९३२, (महोबे की बोली में), श्री सुदर्शन लाल त्रिवेदी का ढेवा का ब्याह संपृक्त, मार्कण्डेय महाद्विज असली आल्खण्ड पूरा ५४ गढ विजय ५४ लडाईयों का हाल, स्टार ऑफ इंडिया प्रेस बनारस १९३५ के अतिरिक्त आशा गुप्ता का आल्हखण्ड अरूणादेय प्रकाशन दिल्ली १९९९, श्री यमुना प्रसाद त्रिपाठी आजादी या मौत अथवा वीरमलखान नाटक (तीन अंकों में) भारती आश्रम लखनऊ, श्री विश्वनाथ शास्त्री का प्रतापी आल्हा और उदल, चौधरी एण्ड संस त्रिवेणी ग्रंथमाला काशी १९३७ उल्लेखनीय हैं।
२. (अ) गणेश प्रसाद द्विवेदी ः हिन्दी के कवि और काव्य, १९३७ ई. पृ. ५०।
(ब) डॉ. शम्भूनाथ सिंह ः हिन्दी महाकाव्य का स्वरूप और विकास पृ. ३४४।
३. डॉ. निमाई शरण बोस के शोध प्रबन्ध ‘‘हिस्ट्री ऑफ द चन्देलाज ऑफ जेजाकभुक्ति’’ का प्रकाशन के.एल. मुखोपाध्याय (पब्लिशर्स एण्ड बुकसेर्ल्स ६/१ए बाच्छाराम
अकरूर लेन कलकत्ता-१२ से १९५६ ई. में हुआ था। जिसका फॉरवर्ड प्रसिद्ध विद्वान ए.एल. बाशम ने
लिखा है।)
४. डॉ. अयोध्या प्रसाद पाण्डेय के शोध ग्रन्थ चन्देलकालीन बुन्देलखण्ड का इतिहास का प्रकाशन हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा सन् १९६८ ई. में किया गया तथापि इसका प्राक्कथन उनके शोध निदेशक एवं प्रसिद्ध विद्वान प्रो. गोविन्द चन्द पाण्डेय ने लिखा है।
५. किंवदन्तियों के संदर्भ में प्रो. नर्मदा प्रसाद गुप्त का लेख आल्हा (परिषद् पत्रिका अप्रेल १९७४ पृ. ९३-९९ तथा उन्हीं का लेख आल्हाः जनश्रुति और इतिहास मे (कादम्बनी, अप्रेल १९७० पृ. १५९-१६३) दृष्ट्रव्य है।
६. स्व. कुँवर महेन्द्रपाल सिंह का मधुकर पत्र के दिनांक १६ मार्च, १९४१ में आल्हा का ऐतिहासिकता और महत्व नामक लेख पृ. ५, तथापि इस अभिलेख को उत्कीर्ण कराने का श्रेय पृथ्वीराज चौहान को दिया जाता है, तथापि इसका सम्पूर्ण वर्णन आक्र्यो, स.रि. भाग १० पृ. ९८-९९, इपी. इण्डिका भाग २१ पृ. १७३-१७४ पर दिया गया है। इसमें यह उल्लेख है कि पृथ्वीराज चौहान ने विक्रमाब्द १२३९ अथवा ११८२-८३ ई. में बुन्देलखण्ड को नष्ट कर
दिया था।
७. प्रो. नर्मदा प्रसाद गुप्तः बुन्देली लोकसाहित्य परम्परा और इतिहास, मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद् भोपाल का प्रकाशन २००१ पृ. १५४ ।
८. आल्हाः नर्मदा प्रसाद गुप्त, प्रथम संस्करण, भूमिका पृ. २-३।
९. कर्नल जेम्स टॉडः एनाल्स एण्ड इंटिक्विटीज ऑफ राजस्थान, १९५०, पृ. ४८८-८९।
१०. (अ) डॉ. प्रणव देवः बुन्देलखण्ड का भौगोलिक इतिहास जयपुर, २००२ पृ. १३१।
११. (ब) डॉ. प्रणव देवः ‘‘बुन्देलखण्ड-ए कल्चरल प्रोफाईल’’ अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, आगरा विश्वविद्यालय १९९५ पृ. १२३।
२-डी २३, हाऊसिंग बोर्ड कॉलोनी, झालावाड, (राज.) ३२६००१ मो. ९+४१४३३०१८८