कहानी -ममता

केवल गोस्वामी


मुझे खूब अच्छी तरह से याद है वह बरसात का महिना था। माँ मुझे दुनियाँ के हादसों से बचाने के लिए आँचल में छिपाए बैठी थी। पाँच वर्ष का बच्चा इतना छोटा भी नहीं होता कि कोई माँ उसे इस तरह छाती से चिपकाए रहे। पर यह माँ थी कि पलभर को भी अपने से अलग नहीं करना
<br/>चाहती थी।
<br/>दो वर्ष पूर्व अचानक पिता की मृत्यु हो गई थी, पिता पुत्र के सुख को तरसता चला गया और पुत्र पिता के लाड से हमेशा के लिए वंचित हो गया। माँ भीतर ही भीतर भले ही टूट गई थी, पर बिखरी नहीं। क्यों कि उसकी आँखों के सामने एक सपना था, जिसे परवान चढाना था।
<br/>शायद उसकी परिक्षाओं का अंत नहीं हुआ था। गाँव में प्लेग की महामारी फैल गई। उसके पास सबसे बडी पूँजी उसके लाडले बच्चे थे। दोनों बच्चियों और एकमात्र लाडले पुत्र को लेकर वह और लोगों की भाँति ईश्वर की मंशा से शहर की ओर चल पडी।
<br/>शहर में उसकी माँ भाई, बहन थी जिसके पास ईश्वर का दिया सभी कुछ था, चूंकि उसके पिता की नौकरी दूर-दराज के शहरी इलाकों में थी, इसलिए नए घर की देखभाल करने के लिए कोई तो चाहिए था।
<br/>दुर्भाग्य यहाँ भी उसके साथ-साथ आया। अभी पूरी तरह से गठरी झोला खोला भी नहीं था कि शहर में मजहबी फसाद शुरू हो गए। जो जिसके हाथ लगा लेकर पुलिस की निगरानी में शहर की सरहद पर बने कैम्प में आ गए। उसकी बहन का परिवार भी उसी कैम्प में आन मिला।
<br/>बारिश इतनी तेज थी कि लगता था प्रलय कहीं आस-पास ही है। तेज बौछारें तम्बू के भीतर आ-आ कर आक्रमण करने पर तुली थी, पर वह औरत हमेशा की तरह चट्टान की भाँति हर आक्रमण का सामना कर रही थी।
<br/>उसके बहनोई, सालिगराम बाबू को नौकरी के दिनों से खबरें सुनने का खब्त था। कैम्प अधिकारी के तम्बू में रेडियो का प्रबंध था। बाबू सालिगराम मिन्नत-चिरौरी कर ऐन खबरों के समय अधिकारी के तम्बू में पहुँच जाते। उनकी यह खब्त एक दिन रंग लाया। जैसे सचमुच आकाशवाणी हुई हो, उनके बेटे रामप्रकाश ने रेडियो पर दिल्ली से घोषणा कराई थी।
<br/>उनकेक नाम से हवाई जहाज में पाँच सीटें बुक कराई थीं। खबर सुन कर बाबू सालिगराम की आँखों में एक बारगी चमक आ गई। जिन्दगी फिर से हिलौरें लेने
<br/>लगी थी।
<br/>माल-असबाब का मोह आडे आ रहा था किन्तु जीवन को मोह उससे कहीं बडा था। जिन्दा बच निकले तो सामान तो फिर भी बन जाएगा। औरत ने जिम्मा लिया की वह अपनी जान पर खेलकर भी तिनका-तिनका लेकर आएगी। बदले में इस आग के दरिया से उसके बच्चे यदि सही सलामत पार उतर जाएं! बात तय हो गई।
<br/>हवाई जहाज के पहले सफर का रोमांच बिलकुल भी नहीं था हमारे भीतर। हम तीनों की आँखों में माँ का चेहरा बसा था जो शायद फिर देखने को मिलेगा भी या नहीं। इसलिए घंटे भर के उस सफर में एक बार भी आंखें नहीं खुली। हाँ जिद करके एकाध आंसू जरूर आँखों से टपक पडा, पता नहीं कैसे?
<br/>अमृतसर मौसी का जाना पहचाना शहर था। सुबह सवेरे सफे द सिल्क की साडी में, हाथ में चाँदी का गिलास लिए जब वह दुर्गियाना मंदिर की ओर जाती थी तो किसी सेठानी से कम नहीं लगती थी। हम दोन भाई-बहन फटेहाल इस आस से उसके पीछे-पीछे जाते थे कि शायद कोई दाता मौसी के बोलों और हमारे हाल को देखकर पिघल जाए।
<br/>इन बेचारे बच्चों को बाप मर गया है और माँ बिछड गई है, मौसी रहती। हम सिकुड कर और भी जमीन में धंस जाते। मौसी के भव्य चेहरे से ऐसा झलकता जैसे वह बहुत बडा पुण्य का कार्य कर रही हों।
<br/>जिस रात माँ लौटी थी वह भी भयानक वर्षा की रात थी। उस गहन अंधकार में कैम्प के गेट पर ट्रक की बत्तियों की तेज रौशनी फैल गई थी। मौसी एक-एक नग को देख परख रही थी। माँ बिछुडे बच्चों को छाती से चिपका कर विश्वास करने की कोशिश कर रही थी की वह सच था या सपना? हमारी आँखों से लगातार बरसात हो रही थी। बादल शर्मिन्दा होकर चले गए थे।
<br/>माँ की आँखों में आने वाले कल के सपने आकार ले रहे थे। उसकी छाती में होने वाली तेज धडकने, ममता की स्किगध गंध हमारे बिसरे वजूद को समेट रही थी। हम एक बार फिर जीवन के सत्य को पहचान रहे थे । द्य
<br/>जे ३६३, सरिता विहार, मथुरा रोड, नई दिल्ली-११००७६
<br/>मो. ९८७१६३८६३४
<br/>