दो कविताएँ

आशा शर्मा


बिल्ली का बच्चा
स्कूल से मुन्नी रोती आई
टीचर ने की कान खिंचाई
मम्मी ने लडिया के पूछा
किस कारण से हुई पिटाई
क्या तुमने की नहीं पढाई
या फिर पोएम नहीं सुनाई
शायद सब बच्चों ने मिलकर
आपस में की हाथापाई
मुन्नी ने रोकी सुबकाई
फिर धीरे से बात बताई
रधिया अपने झोले में रख
इक बिल्ली का बच्चा लाई
मैडम जी कक्षा में आई
उन्हें देख बिल्ली घबराई
शायद उसको भूख लगी थी
म्याऊँ-म्याऊँ वो चिल्लाई
फिर बिल्ली ने उधम मचाई
सबको नानी याइ दिलाई
आगे बिल्ली पीछे टीचर
फिर भी उसको पकड न पाई
प्रिंसिपल गुस्से में आई
हमसे ऊठ-बैठ करवाई
सुन मुन्नी की बिल्ली गाथा
मम्मी मंद-मंद मुस्काई द्य
हवा हठीली
ओ नखरीली हवा हठीली
कितने रूप दिखाती हो
गर्मी में लू, सरदी में तुम
शीतलहर बन जाती हो
क्या सूरज की नातिन लगती
उसका रौब जमाती हो
जैसा उसका मूड लगे तुम
वैसा हुकुम बजाती हो
बादल के घोडे पर चढ के
रिमझिम बारिश लाती हो
डाली-डाली पर इठलाती
मीठी सरगम गाती हो
सागर में तुफान उठाती
चक्रवात कहलाती हो
सूखे पत्ते थर-थर काँपे
जब गुस्से में आती हो
एक सरीखी सदा बहो ना
क्यूँ इतना इतराती हो
गर्मी में लू, सरदी में क्यूँ
शीतलहर बन जाती हो
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