तीन लघुकथाए

छगनलाल व्यास


नमन
महात्माजी ने अपने प्रवचन के मध्य प्रश्ा* किया-
‘दुनियाँ में सबसे अधिक पूजनीय कौन है?’
किसी ने कहा- पृथ्वी...
किसी ने माता-पिता को पूजनीय कहा।
तब किसी ने और किसी को....।
लेकिन महात्माजी के उत्तर से संतुष्ट नहीं दिखायी देने पर
शिष्य ने गुरुजी से ही राज खोलने की बात कही- उन्होंने कहा ‘बेटी’।
सभी के मुँह खुले के खुले रह गये।
महात्माजी ने जिज्ञासा शांत करते हुए कहा बेटी घर
छोडकर पराये घर को, पराये पुरुष को अपना कर उसका दिल जीतती
उस घर में वह दूध में मिश्री की भाँति घुलती है। सदैव नये घर को उच्च
प्राथमिकता देते हुए जन्मवाले घर का भी पूर्ण ख्याल रखती है। क्या
ऐसी बेटी पूजनीय नहीं।
हाँ...बेटी व बेटी को जन्म देने वाली माँ को नमन।
कहते हुए महात्मा जी ने अपना प्रवचन आगे बढाया। द्य
खुशी की ताली
बर्तन स्वयं पर इतराता हुआ इतना प्रसन्नचित था मानों
कहीं से खुशी की ताली प्राप्त हो गयी हो।
अन्य ने पूछा- इतना क्यों खुशी से झूम रहा है...क्या
खुशी की ताली प्राप्त हो गयी।
उसने कहा- हाँ....! यही तो खुशी की बात है।
कैसी ताली? कहाँ से मिली? अन्य ने उत्सुकता से पूछा।
तब बर्तन धीरे-धीरे बोला - ‘मेरा जन्म इसलिए हुआ कि व्यक्ति आवश्यकतानुसार वस्तु ले सके, उपयोग करे, व खुशी से जीवन बिताये। अधिक जरूरत है तब बडा बर्तन..अत्यधिक न्यून पर हाथ हथेली भी। यही
है खुशी की ताली। आवश्यकता से अधिक संचय....आवश्यकता से अधिक उपभोग यानि खुशी
को खोना।
मानव इस वार्तालाप को सुन हतप्रभ खडा था। द्य
ममता
चिडिया अपने नन्हें बच्चे हेतु दाना लेकर
तीव्रता से उस तक पहुँची तब ‘बच्चा’ मानों उसी के इंतजार में था यह उसके हाव-भाव से स्पष्ट दृष्टिगोचर होते ही माँ की ममता ने उसे छुआ। दाना उसकी चोंच में देते हुए ‘माँ’ स्वयं को धन्य मान रही थी। बच्चे ने पंख धडधडा कर ‘माँ’ का आभवादन करते हुए दाना ग्रहण किया इसे भाँप ‘माँ’ का मन मयूर नाचने लगा...वह उसके इर्द गिर्द धूमने लगी....पँख धडधडाती उसे उडाने का अभ्यास करवाती
दाना-पानी का प्रबंध भी करती।
समय के साथ बच्चा सक्षम हुआ...। वह ‘माँ’ से अलग थलग हुआ लेकिन माँ की ममता ज्यों की त्यों थी। वह आज भी बच्चे हेतु आँखे बिछाये बैठी थी....। बिना किसी लाग-लपेट...बिना किसी स्वार्थ....लोभ प्रपंच....।
यह है ममता...मानव हतप्रभ था....ममता का कोई सानी नहीं.....। द्य
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