तीन लघुकथाएँ

पूर्णिमा मित्रा


इजी डील
उस दिन दोपहर को पूर्णा साइबर कैफे में बैठी थी। थोडी देर बाद पडौसी धर्मचन्द्र का बेटा राकेश, उकसे पास आकर बोला, ‘‘वाओ पूर्णा दी, अच्छा हुआ आप यहाँ मिल गई। मेरा एक काम करोगी?’’
पूर्णा ने विंडो स्क्रीन पर नजर गडाते हुए कहा, ‘‘पन्द्रह अगस्त आने वाला है। इसमें देश के भूले बिसरे क्रांतिकारीयों के बारे में सर्च कर रही हूँ। विद्यालय के बच्चों को इनके बारे में बताऊंगी। बोलो, मुझसे क्या काम है?’’
इसमे शादी करने वाले वेबसाइट में से कोई ड्राईवॉर्सी या विडो का कॉन्टेक्ट एड्रेस नोट कर लिजिए। पर यहां वाली नहीं, अमेरीका वाली।’’ पूर्णा की ओर एक कागज बढाते हुए रॉकी ने आदेशात्मक ढंग से कहा।
‘‘पर क्यों? किसके लिए?’’ पूर्णा ने तीन बार दसवीं में फेल रॉकी को आपादमस्तक देखकर हैरानी से पूछा।
‘‘अरे, अपने लिए। और किससे लिए?’’ बस एक बार नीली आंखों वाली ग्रीनकार्ड होल्डर से मामला सेट हो जाए तो अपनी तो ऐश हो जाए।’’ रॉकी की बातों गौर आँखों में मस्ती की लहर, हिलौरें मारने लगी। ‘‘पर यहां तुम्हारे पापा की दुकान कौन सम्भालेगा? पहले से मैरिड औरत से तुम्हारी शादी की बात, तुम्हारे ऑर्थोड्राक्स पैरेन्ट्स मान जाएंगें?’’ पूर्णा ने अन्यमनस्क होकर पूछा। उसके सवालों से तिलमिलाते हुए रॉकी उपेक्षाकृत ढंग से बोला, ‘‘यह तो एक इजी डील है अमेरिकन सिटीजनशिप पाने के लिए। एक बार अमेरिका सैटल हो जाऊ फिर....।’’ ‘‘सॉरी रॉकी। ऐसे किसी वेबसाईट से ग्रूम-कॉन्टेक्ट करने का तरीका मुझे नहीं मालूम।’’ उसने रॉकी की बात काटते हुए कहा।
‘‘आप लेडी हो, राईटर हो। आफ थू* मामला आसानी से सेट हो जाता। पर आप तो किसी काम की नहीं हो।’’ उसकी तरफ उपेक्षा भरी दृष्टि डालकर रॉकी वहां से चलता बना।
तभी विंडोस्क्रीन पर भारत के महान शहीदों की तस्वीर उभरने लगी। मन ही मन उन्हें नमन करते हुए, उसने सोचा कि एक ओर ऐसे भी पुरुष हुए हैं जिन्होंने देशहित में प्राणों का बलिदान देने में जरा भी संकोच नहीं किया। दूसरे ओर रॉकी जैसे पुरुष भी हैं जिनके लिए पौरुष का मतलब सिर्फ ग्रीनकार्ड होल्डर से शादी करने तक सीमित है। इसके लिए भले ही उन्हें अपने परिवार और देश की इज्जत दांव पर लगानी पडे ? ‘साक्षात अन्नपूर्णा’
निर्जला एकादशी के दिन शहर का तापमान ४६ डिग्री पहुंच गया था। सत्तर वर्षीया कमला जी ने पडोसिनों की देखदेखी निर्जला रहने का व्रत तो रख लिया, लेकिन थोडी देर बाद ही बढती उम्र और गर्मी की मार से वे बेहाल होने लगी।
दिन बहलाने के लिए वे बैठक में बैठी टी.वी. देखने लगी। करीब ग्यारह बजे उनके दरवाजे में किसी ने दस्तक दी। उनकी बहू पूजा ने लपककर दरवाजा खोला। सामने बैसाखियों के सहारे खडे वृद्ध बाबूलाल जी को देखकर वो हैरानी से बोली ‘‘हे..., बाबूजी इस चिलचिलाती धूप मे आप यहाँ घर में सब ठीक-ठाक तो है?’’
बाबूलाल जी डगमगाते कदमों से बैठक में पडी कुर्सी पर बैठते हुए बोल, ‘‘बेटी जरा ठण्डा पानी तो पिलाना। सुबह से व्रत के चक्कर में भूख प्यास के मारे जान निकल रही है।’’
पूजा जल्दी से पानी का गिलास देते बोली ‘‘सरला आंटी कहाँ है? इस बूढापे में व्रत रखने की सलाह आपको किसने दी? आपको कुछ हो गया तो.....?
एक साँस में पानी का गिलास खाली करते हुए वृद्ध बाबूलाल भर्राये स्वर में बोले, ‘‘बहू ने यह सलाह दी है। खुद तो मंदिर जाकर पंखी, शक्कर के गोले, मटकी दान करके अपने कमरे में ए.सी. चला कर पडी है
और मुझे.....।
क्षणभर कमला जी के सामने आये दिन व्रत उपवास करने वाली और पण्डितों को साग्रह भोजन कराने वाली सरला का चेहरा घूम गया।
तभी एक ट्रे में दो गिलास आम का पना और नाश्ता सजाकर लाती हुई पूजा बोली, ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा...।
तिपाई में ट्रे रखकर, आँखें और वाणी में ममत्व छलकाती पूजा विनम्र स्वर में बात पूरी करते हुए कहा, ‘‘तनमन को स्वस्थ और स्वच्छ रखकर ही नारायणरूपी नर सेवा कर सकते हैं, दूसरों की देखादेखी नहीं।’’
बाबूलाल अपलक पूजा को देखकर सोचने लगे साक्षात् माँ अन्नपूर्णा उनके सामने खडी है। द्य
श्रद्धा और श्राद्ध
पूर्णा बाजार से सब्जियाँ लेकर मुदित भाव से घर लौट रही थी। रास्ते में बौखलाई सी पूजा मिल गई। उसे उलाहना देती हुई बोली, ‘‘मुझे पहले पता होता तो मैं आपसे सामान मंगवा लेती। आज मेरी सास का वार्षिक श्राद्ध है ना। पण्डित जी को टिफिन पहुँचाना है। अरे, हाँ आफ भाई लोग भी पितरों का श्राद्ध करते होंगे? कौन से पण्डित जी को बुलाते हैं? हमारे वाले पण्डित जी बडे बिजी रहते हैं।’’
पूजा की ओर मुस्कुराते हुए पूर्णा मुस्कुराते हुए पूर्णा राजदाराना ढंग से बोली, ‘‘पता है, भाभी मेरे पैदा होने पर मेरे पिता ने शंख बजवाया था। अन्नप्राशन के समय, जनेऊ डलवाया था। इसीलिए मैं भी पितरों और पिता का श्राद्ध करती हूँ।’’ ‘‘पर हमारे वाले पण्डित जी तो कहते हैं बेटियों के हाथ से पिण्डदान, तर्पण, मृत्युभोज से पिता-माता और पितरों की आत्मा को तृप्ति नहीं होती।’’ आधुनिक पूजा, किसी दकियानूसी कुपमण्डूप स्त्री की तरह चौंक कर बोली। पूर्णा अपनी हँसी दबाकर बोली- ‘‘तो घर में मर्दों को यह सब करने दिजिए ना आप काहे टेंशन लेती हैं....।’’ ‘‘पर घर के मर्दों को काम-धन्धे से फुर्सत ही कहां है जो....,’’ पूजा खिन्न स्वर में बोली। वाह घर के मर्द धन्धों में मस्त, औरतें पोंगा पथियों के गोरखधंधों में पस्त।’’ मन ही मन बुदबुदाकर, पूर्णा एक क्षण ठिठकी। फिर निर्णयात्मक स्वर में बोली,‘‘मेरे लिए श्रद्धाया देय इति, श्राद्धधम् है। पितरों को स्मरण करके, किसी जरूरतमंद की वांधित मदद करने में मुझे जो खुशी मिलती है, वो शब्दों से परे है। इसके लिए मुझे किसी तीसरे की सलाह की जरूरत नहीं है।’’
‘‘पर लोग-बाग’’ पूजा ने चुनौती देने के अंदाज में कहा।
‘‘उसके लिए आप जैसी धर्मभीरू लेडीज हैं ना।’’ कहते हुए पूर्णा तेज कदमों से अपने घर की तरफ
चल दी। द्य
ए -५९, करणी नगर, नागाणेची जी रोड, बीकानेर