तीन लघुकथाएं

आभा सिंह


ताप की छाँव
पचास डिग्री तापमान में रेगिस्तान गाँव की साइट झुलस रही थी। सिंचाई के लिये खेतों में पक्की व बडी नालियाँ बनाई जा रही थीं। हाथों में कट्टे पहने मजूरों ने लोहे की भारी भरकम गरम शटरिंग उठा कर नाले में जमाई। औरतें गट्टी, बजरी तथा सीमेंट का मिला मसाला लाने लगीं। मसाला शटरिंग में भरा जा रहा था। काम तेजी से चल पडा।
साईट के एक किनारे पर औरतों ने कट्टों पर अपने तीन-चार बच्चे सुला दिये थे। धूप से बचाने के लिये ओढने उढाये थे। ओढने के भीतर शिशु हाथ पैर चलाते, कभी करवट लेते। कभी रोते कभी सो जाते।
एक बच्चा काफी देर से रो रहा था। निरी धूप में उन्हें पडा देख कर नया आया ओवरवियर बेचैन हो गया। उसने एक बडी उम्र के मजदूर को आवाज दी।
‘अरे...झिंगोला....’
मजदूर दौडकर आया और हाथ जोडकर खडा हो गया।
‘रतनू नाव है साब’
‘हाँ हाँ ठीक है, इन्हें छाया म लिटवा।’ बच्चों की तरफ इशारा किया।
रतनू ने दाएँ से बाँए देखा।
‘साब छाँय कठै छै ई जगै।’
ओवरसियर ने भी चौतरफा नजर घुमाई। न कहीं पेड था न मकान, सूने सट्ट भाँय-भाँय करते खेत थे।
एक तरफ टैंकर खडा था।
‘अरे, उधर टैंकर के नीचे सुलवा।’
‘घणों कादो है बठै साब।’
‘मूरख, छाँव तो है न।’
रतनू ने मुस्कराने का फीका सा प्रयास किया।
‘बेचिंत रहो साब जी, या मजदूराँ रा टाबर छै, अईयाँ ई तावडा मायने पडा पडा मोटयार हो जावेला। कोई बात कोनी साब, आग पीबा जाणै छै ई सगला, आग ई नै कोन पी सकै।’
अनुभूति
विनीत बाबू शहर में ड्यूटी पर आये थे। दो दिन का टूर था। दिन भर काम में व्यस्त रहे। गेस्ट हाऊस तक आते आते बदन थक कर चूर हो गया। दफ्तर में तो एसी आपाधापी न थी पर सडक पर ट्रैफिक की रेलमपेल। धूप, धुँआ, धुल-धक्कड। जी ही घबरा गया। कमरे में थोडा सुकून मिला। चाय ने चुस्ती ला दी। मूड बदलने को कमरे से लगी छोटी बाल्कनी में आ गये। शाम का झुटपुटा था। सडक पार बगीचे की हरियाली ने आँखों और मन में तरावट भर दी। वे कुर्सी लाकर बैठ गये और आसपास की हलचल व बगीचे की चहलपहल से जी बहलाने लगे। खाने में देर थी। बस फिर सोना ही था।
सुबह उठे तो उन्हें बगीचा याद आ गया। अकेले बैठ कर खाली दिवारें क्या ताकना? सैर ही ठीक रहेगी। बगीचा सचमुच मोहक था, पेड, पौधों, फूलों से लदा-फदा। कितने ही लोग टहल रहे थे, बच्चे, बूढे, औरतें। वे घास पर उतर आये। कचनार के पेड के नीचे फूल बिखरे पडे थे। क्यारियों में गुलाब थे। उन्होंने चार-पाँच फूल चुन लिये। रानी रंग के गुलाब व हल्के बैंगनी कचनार। बेहद मोहक। फूलों को सराहते वे बैंच पर बैठ गये फिर फूलों को बैंच पर रख कर घूमने के लिये उठ खडे हुए। रूमाल को भी फूलों के साथ ही रख दिया।
उन्होंने ताजगी महसूसते हुए बाग के नौ-दस चक्कर लगाये। लौट कर उसी बैंच तक आ गये। पसीजी हथेलियाँ पोंछने के लिये रूमाल उठाने लगे पर रूमाल कहीं नहीं था। विनीत ने इधर-उधर देखा, बैंच के नीचे झुका, सचमुच रूमाल नहीं था, बैंच पर रखे गुलाब और कचनार उन्मुक्त मुस्करा रहे थे।
अंकल जी, विनीत ने घूम कर देखा, सामने खेल रहे बच्चे खडे थे।
अंकल जी, क्या ये फूल खेलने के लिये ले लें?
विनीत ने सिर हिलाया।
अरे? आप को तो बहुत पसीना आ रहा है। ये लो, मरे हैण्ड टॉवल से पोंछ लो।
बच्चों की आँखों में चमकते तारे, होठों पर चंचल मुस्कान और अंजलि में रखे फूल......अरे, खिला-खिला सा क्या लग रहा है? द्य
संवाद
गाडीवान ने ऊँट को लढ्ढे से खोल कर नीम की छाँव में बैठा दिया। ऊँट निढाल पसर गया। उसकी बेजान सी गर्दन धरती पर फैल कर और लम्बी लगने लगी।
गाडीवान छागल उठा कर पानी लाने चल पडा। लौटा तो ऊँट स्थिर ही पडा था। छागल उसके मुँह के पास रख कर गाडीवान ने पुकारा- नंदी ऊठ, पानी पी ले- उसने नारियल के खोले से पानी उसके मुँह में डाला। पानी की ठंडक से उसे चेत आया। वह खोले को चाटने लगा। दो-चार घूँट पानी पीकर फिर बेजान सा हो लुढक गया।
गाडीवान उसके करीब बैठ गया, पगडी उतार कर जमीन पर रख ली और दोनों हाथों से ऊँट की गर्दन सहलाने लगा, नंदी देख मने छोड मत जाजियो भाया, मूँ तो काँई करै लूँ। आँख्या खोल। पाणी होर पी लै, नंदी, पर नंदी हिला तक नहीं। नीम की छाया में आकुल गाडीवान ने तीन दिन गुजार दिये। पेट, पीठ, गर्दन सहलाते-सहलाते ऊँट से न जाने कितना प्रलाप कर डाला। वह जान रहा था कि नंदी बहुत बीमार है। बाल्टी भर पानी में दवा घोल कर नंदी के मुँह में डालता रहा। थोडी-थोडी देर में हूकती आवा*ा लगाता- नंदी रे। कभी अपनी छाती मसलता, कभी माथे पर हाथ रखकर उदास बैठ जाता।
आते-जाते लोग बाते फेंक कर मार है थे। क्या गँवार है, मरे ऊँट में लगा पडा है, इतनी सेवा ठूँठ की करता तो वह भी फल दे देता।
गाँवडे हैं साले, साफ-सफाई क्या जानें? कितना गंदा मचा रखा है? काम खतम तो उठ कर चल देगा फिर कराते रहो साफ-सफाई। सचमुच गमट्टे ही रहेंगे ये तो।
अरे ऊँट मरमरा गया तो और आफत।
पुलिस में कम्पलेंट कर दी है, वे आके हडकायेगें तभी ये ठीक होगा...साला।
कॉलोनी वालों की शिकायत पर पुलिस वाले भी आ कर धमका गये, पर गाडीवान जैसे बहरा हो गया था। उसे ऊँट के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था। धीरज धरे वह उसकी सेवा में लगा हुआ था। चौथे दिन ऊँट की आँखों में छोटी सी झिरी खुली। गाडीवान नन्दी को पानी पिलाने की कोशिश करने लगा-पी लै नंदी, चोखा छै। डाग्दरी दवा छै ई मायने, तू ठीक हो जायेलो। तू म्हारा नसीब छै नंदी, भाया, म्हारा बेटा...। भावों की उमडन और आवाज की तडप मानो नंदी ने भी बूझ ली। धीरे-धीरे दो-चार घट पानी पी लिया।
गाडीवान के कलेजे में कितने ही समय से धुकपुक करती अकुलाहट घुमड रही थी। लोगों की लानतें, घृणा....सबसे ज्यादा चुभ रहे थे गँवई होने के ताने। मन को कचोट रहे थे। वह अब धैर्य खो बैठा और ऊँट से चिपट गया।
ई सैर वाला...गँवई-गाँवडा सुणर सुणर कान ई पाक गिया, गाँव वाला कईंया मिनख कोनी, मूँ अर तू मिनख कोनी।
ऊँट ने गर्दन गाडीवान के कंधे पर रख दी। द्य
८०/१७३, मध्यम मार्ग, मानसरोवर, जयपुर (राज.)-३०२०२०
मो. ०८८२९०५९२३४