हम भूलते नहीं हैं

डॉ. मदन केवलिया


अब यह विचारणीय विषय बन गया है कि अच्छी स्मृति वरदान है या विस्मृति। बुढापे में स्मृति-लोप एक बीमारी मानी जाती है, किंतु क्या थोडी-बहुत विस्मृति अच्छी चीज नहीं है?
कल एक व्यक्ति बता रहा था कि पुरानी यादें कभी-कभी घातक होती हैं। उसके पडोसी ने १० वर्ष पूर्व आँख का ऑपरेशन कराया पर उसकी आँख की ज्योति बहुत कम हो गई थी और अब उस आँख से दिखना ही बंद हो गया। उस डॉक्टर का एक सहायक उसे दिल्ली में मिला जो अब वहीं काम करता है उसने बताया कि ऑपरेशन से पूर्व मैंने डॉक्टर से कहा भी था कि मरी*ा की आँखों का टेंशन ७० से ऊपर है, अभी ऑपरेशन मत कीजिए। किन्तु डॉक्टर ने कहा था- एक तो हम पैसे ले चुके हैं और फिर इसके बडे भाई ने मेरे अग्रज को विश्वविद्यालय चुनाव में हराया था। हम कोई बात भूलते नहीं हैं।
सुनकर सभी अवाक रह गए। बेचारे मरीज का क्या दोष था? मुझे अपने जीवन की एक घटना याद आ गई। बुरी यादें तो पीछा करती ही रहती हैं। एक संस्थान के इन्टरव्यू में दो विशेषज्ञ मुझसे प्रश्न पूछने लगे। मैंने खूब तैयारी कर रखी थी, अतः सभी प्रश्नों के उत्तर पूरे विश्वास के साथ देता रहा। दोनों ही संतुष्ट लग रहे थे। तभी एक विशेषज्ञ ने पूछा अब पी.एच.डी. भी कर लो। उन दिनों यह अर्हता अनिवार्य तो नहीं थी, किन्तु उसका महत्व बढ रहा था। मैंने आत्मविश्वास से भरकर शोध कार्य का विषय तथा निर्देशक का नाम बता दिया। वे उन दिनों गुजरात में कार्यरत थे। सुनते ही प्रश्नकर्ता आगबबूला हो गए- ‘वे तो स्वयं पी.एच.डी. नहीं है। वे गाइड कैसे हो सकते है?
‘उन्हें अनुभव के आधार पर कई विश्वविद्यालयों ने शोध निर्देशक के रूप में मान्यता दे रखी है’ मैंने विनम्रतापूर्वक कहा।
‘मैं नहीं मानता’ वे चिल्लाए, ‘अच्छा, जाओ अब’। मैंने उठकर हाथ जोडे। मेरी आँखों में आँसू देखकर दूसरा विशेषज्ञ कुछ पसीजा होगा। तभी तो इतने पदों की उस सूची में मेरा अंतिम नाम रखा गया था।
राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता तो सामाजिक जीवन में ऐसा क्यों होता है। पीढी-दर-पीढी रंजिश चलती रहती है। उसे प्रातः उदय
का शौक है। एक दिन कुछ लोगों के आगे बाइक पर खडा एक अधेड सा व्यक्ति अपनी वीर गाथा सुना रहा था। मैंने पूरी घटना तो नहीं सुनी किंतु इस अंश पर ध्यान दिया। ‘उस प्रोफेसर ने मुझे क्लास से निकाल दिया तो मैंने मन में गांठ बांध ली। मैं भी कई सालों तक उस कॉलेज में प्रोफेसर बना। प्रशासनिक सेवा की एक परीक्षा में मैंने जाँच में पाया कि उसी प्रोफेसर का पुत्र परीक्षा दे रहा हैं। मुझे मौका मिल गया। वह परीक्षा की कॉपी मुझे देकर बाहर गया तो मैंने इधर-उधर देखकर उसके कई उत्तर ही काट दिए। मजा आ गया।’
मुझसे न रहा गया- ‘उसके बेटे का क्या दोष था?’
‘मैं अपना अपमान कैसे भूलता?’; वह कहकर चला गया।
प्रशासनिक सेवा की बात सुनकर वहाँ उपस्थित एक सेवानिवृत्ति वयोवृद्ध बोला- ‘भई, दुनिया बहुत खराब है। मेरे एक सहपाठी ने परीक्षा के समय मेरी लिखित एक कॉपी उठा ली तो मैंने निरीक्षक से शिकायत कर दी और उसे खूब डाँट पडी। चेतावनी भी दी गई। कालांतर में मैं स्कूल टीचर बन गया और वह सहपाठी प्रशासनिक सेवा में आ गया। संयोग से वह हमारे नगर में ही नियुक्त हुआ। उसने घर का पता जोधपुर दे रखा था, अतः यहाँ उसकी पोस्टिंग हो गई। चुनाव के दिन थे। मेरी पत्नी सख्त बीमार थी, पर उस सहपाठी ने मुझे दूरदराज के गांव में चुनाव के लिए नियुक्त कर दिया। मैं उसके घर पहुँचा। घंटे भर इन्तजार करने के बाद वह उस कमरे से गुजरा। चपरासी फाइलें लिए हुए पीछे-पीछे था। मैंने गिडगिडाते हुए अपनी पत्नी की बीमारी का हवाला दिया और नगर में ही या निकट के किसी स्थान पर भेजने का निवेदन किया। वह बेरूखी से बोला- ‘मैं कुछ नहीं कर सकता। आप मेरी शिकायत कलेक्टर साहब से कर दीजिए। शिकायत करना तो आपकी पुरानी आदत है।’ फिर तेजी से कार में बैठ गया। वह परीक्षा के समय की शिकायत को नहीं
भूला था।
जिंदगी कैसे-कैसे व्यंग्य करती रहती है। पुरानी बातें याद करके हम व्यंग्य बाण छोडते रहते हैं। एक परिचित ने बताया कि एक गांव में उसके पडदादा ने मकान बनवाया था। खिडकी निकालने पर पडदादा जी का पडौसी से झगडा हो गया था। मुकदमाबाजी भी हुई थी। फैसला पडदादाजी के पक्ष में गया। पडौसी के वकील ने आगे भी इस केस को लडा पर सफलता नहीं मिली। मुझे भी किसी केस के सम्बन्ध में मुकदमा करना पडा। मेरे विरूद्ध उसी वकील का पडपौता तैयार हो गया और साम-दाम-दंड-भेद से मुकदमा जीत गया। मुझे यह सब पता नहीं था। कचहरी से निकलते समय वह मेरे पीछे आया और बोला- आज मेरे पडदादा की आत्मा को शांति मिल गई होगी। मैं कुछ भी नहीं समझा। बाद में सारा रहस्य ज्ञात हुआ।
अरस्तू ने मनुष्य को ‘सामाजिक पशु’ (सोशल एनिमल) कहा था। अनेक घटनाएँ मनुष्य के विचित्र आचरण की पुष्टि करती है। हम वर्तमान में नहीं जीते, अतीत में जीकर अपनी और दूसरों की जिंदगी खराब करते रहते हैं। व्यक्ति साधु-संन्यासी तो है नहीं, उससे भूलें भी होती रहती है, जिनका दंड वह समय-समय पर भुगतना पडता है। हम सब ये दंड भुगतते ही हैं, हमारी पीढियाँ भी भुगतती रहती है। एक व्यापारी ने पडौसी व्यापारी के यहाँ (जो उसका भतीजा था) आयकर विभाग का छापा पडवाया, उसने एक जासूस वहाँ छोड रखा था, जो सारे खातों की फोटोप्रति अपने ही व्यापारी को देता रहता था। वह स्वयं भी कोई ईमानदार नहीं था, पर भतीजे ने किसी बात पर उसकी आर्थिक हानि पहुँचाई थी। खून के रिश्तेदार भी अपमान नहीं भूलते।
स्मृतियाँ तंग ही करती हैं। रंजिश तो इश्क की तरह होती है, जिसे भूला नहीं जा सकता। कुछ लोग इन्हीं पीडादायक यादों के सहारे, लोगों को परेशान करते रहते हैं। अक्सर भ्रमण पथ पर ये क्रियाएँ होती रहती है। सभी फुर्सत में होते हैं।
मेरी आँखों में ग्लूकोमा (काला मोतिया) है। परिचित लोगों को कह रखा है कि ‘आपको मैं पहचान नहीं पाऊं तो बुरा मत मानना। मेरी आँखों की दुर्दशा पर दया करना।’ लेकिन कुछ व्यक्ति जानबूझकर पूछते हैं- ‘पहचाना क्या?’ अब पूरे शहर को बताने से रहा, किंतु जिनको कह रखा है, वो भी यही प्रश्न करते हैं तो क्या कहूँ? फोन पर कई पूछते हैं, ‘पहचाना क्या?’ मेरे लैंडलाइन (फोन) में चित्र तो आता नहीं पर मानव प्रकृति को क्या कहा जाए?
एक शंका का निवारण तो हुआ। बात यह थी कि कभी मैं शहर के प्रत्येक कवि सम्मेलन में जाता था, बढ-चढकर भाग लेता था, पर अब तो-
‘आँख ने मदन निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।’
इस बहाने अपने प्रिय शायद गालिब को याद करता हुआ उक्त शंका की बात करता हूँ। एक महाशय (जबकि उन्हें मेरी आँख की स्थिति का पूरा पता है) रोज भ्रमण पथ पर मिलते ही पूछते हैं ‘कल के विराट कवि सम्मेलन में आप नहीं थे। बुलाया नहीं था क्या? मैं क्या उत्तर देता? वे प्राय बुलाते भी नहीं हैं और फिर मैं बिना किसी के सहायता के जा भी नहीं सकता। गत सप्ताह व्यंग्य विषय पर बोलने के लिए मुझे बुलाया गया। पुराने अध्ययन के आधार पर मैं तैयार हो गया। पुस्तक का लोकार्पण भी था। मुझे मुख्य अतिथि का पद मिला। सभी अखबारों में लोकार्पण का फोटो था। मैं बीच में खडा था, अतः ध्यान जाता था। समाचार में मेरी बात भी प्रमुखता से छापी गई थी। दूसरे दिन घर के निकट के भ्रमण पथ पर वही महाशय मिले, सोचा आज तो फोटो की बात करेंगे, पर वे बिल्कुल नहीं बोले, मैं क्या कहता? तीसरे दिन किसी कवि गोष्ठी का समाचार छपा होगा ‘मैं तो अखबार पढ नहीं पाता।’ वे महाशय उस देखते ही बोले- ‘कल के कवि सम्मेलन में आपका नाम नजर नहीं आया।’
मैं चिढ गया- ‘जब फोटो तक छपती है, वह भी आपको नजर नहीं आती। पर पचासों के नामों के बीच मेरा नाम ढूंढने की कोशिश जरूर कर लेते हैं।’
उस व्यक्ति ने मुस्करा कर बात टाल दी। दूसरे दिन दिल की बात कह दी- ‘मैं भी कवि हूँ। आपने एक बार कवि गोष्ठी में मुझे नहीं बुलाया था।’ अब मेरे सामने सब कुछ स्पष्ट था। हम ‘त्रियाचरित्र’ कहकर महिलाओं को कोसते हैं, पर क्या ‘परपीडक पुरुष चरित्र’ कम है। ऐसे लोगों की कतई कमी नहीं है। वे दूसरों को परेशान करने के अवसर तलाशते रहते हैं। ऐसे लोगों की स्मृति बहुत तेज होती है, पर वे इसका अनुचित ‘लाभ’ उठाते हैं।
आपने वह दंतकथा पढी-सुनी होगी। एक भेडिया, बकरी से बोला- ‘मुझे गाली क्यों दी।’ बात बढी तो भेडिया बोला- ‘तूने नहीं तो तेरे बाप ने या बाप के बाप ने गाली दी होगी।’ फिर भेडिया बकरी को खा गया। आज का आदमी भी उस पशु से कम नहीं, आदमी भी सामने वाले को खाता रहता है। द्य
‘प्रतिमा’, सी-६८, सादुलगंज, बीकानेर ३३४००३ (राज.)
मो. ९९२८३७५२९८