गंगा की व्यथा

उमेश कुमार चौरसिया


पात्र : गंगा, कपिल मुनि, अंशुमान, भागीरथ, भगवान विष्णु, बालक, कुछ स्त्री-पुरुष
(पानी की कलकल ध्वनि। हवाओं की सरसराहट। सितार का धीमा-मधुर संगीत)
सूत्रधार-१ : गंगा, पवित्र, निर्मल गंगा जिसे तुम लोग गंगा माता कहकर पुकारते हो। अध्यात्म भारत की आत्मा है और भारत की आध्यात्मिक शक्ति की आधार है गंगा। गंगा के ही पावन तटों से गूँजते मंत्रों की दैवीय आस्था ने संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति और धर्म को प्रतिष्ठित किया है।
(ओंकार के गूँजते स्वर। फिर पानी के बहने की कलकल ध्वनि)
सूत्रधार- २ : आज मैं तुम सबको गंगा की कहानी सुनाने आया हूँ। निर्मल गंगा की कहानी....
(कुछ स्त्री-पुरुष कवितामय स्वर में कहते हैं)
स्त्री-पुरुष : सुनो सुनो सब सुनो सुनो, गंगा की ये कथा सुनो
गंगा कोई नदी नहीं है, यह तो हमारी माता है
पाप सारे गंगा धोती, पुण्य हमें मिल जाता है।
वर्षों का इतिहास समेटे, कहती अपनी कथा सुनो
सुनो सुनो सब सुनो सुनो, गंगा की ये कथा सुनो।
वन-वन बहती निर्मल गंगा, शांत और स्थिर रहती है
ऊँचे पर्वतों से गिरती, तीव्र वेग में बहती है
देवतुल्य भागीरथी मुख से, कहती अपनी कथा सुनो
सुनो सुनो सब सुनो सुनो, गंगा की ये कथा सुनो।
सूत्रधार-३ : पराक्रमी राजा सगर के साठ हजार बलशाली पुत्र थे। एक बारा राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ किया। देवराज इन्द्र ने सोचा कि अश्वमेद्य यज्ञ के द्वारा कहीं राजा सगर उनका सिंहासन ही न हथिया लें। तब इन्द्र ने दैत्य का रूप धारण करके यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और भगवान विष्णु के अंशावतार कपिलमुनि के आश्रम में छुपा दिया। राजा सगर के पुत्र जब यज्ञ-अश्व को खोजते हुए महर्षि कपिलमुनि के आश्रम पहुँचे और देखा कि अश्व वहाँ बंधा हुआ है तो आवेश में आकर उन्होंने कपिलमुनि को
अपशब्द कह दिये। क्रोधित कपिल मुनि ने सभी सगर पुत्रों को भस्म कर दिया। (अनुकूल संगीत बजता रहता है।) राजा सगर के पौत्र अंशुमान ने अनुनय-विनय और स्तुति कर कपिलमुनि का क्रोध शांत किया।
कपिल मुनि : उठो वत्स अंशुमान, तुम्हारी तपस्या और साधना से हमारा क्रोध शांत हो गया है।... कहो, क्या मांगते हो वत्स।
अंशुमान : महर्षि कपिल मुनि, मैं जानता हूँ कि मेरे तातश्री राजा सगर के पुत्रों ने आपका अपमान करने का घोर अपराध किया था।... आफ शाप से वे सभी भस्म हो गए है।... महर्षि मेरी प्रार्थना है कि कृपा करके उन्हें पुनर्जीवित करने का उपाय बताएं।
कपिल मुनि : (गूँजते हुए स्वर) तो सुनो वत्स, देव सरिता गंगा की पवित्र जलधारा की सगर-पुत्रों का उद्धार कर सकती है।
सूत्रधार : तब गंगा स्वर्ग में रहती थी। गंगा को देवलोक से पृथ्वी पर लाना भला कोई आसान काम थोडे ही था। पहले राजा सगर फिर पौत्र अंशुमान ने अनेक वर्षों तक कठोर तप किया। उनकी मृत्यु के उपरान्त अंशुमान के पौत्र भागीरथ ने भगवान विष्णु की मनपूर्वक आराधना की। भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और गंगा को
आदेश दिया।
विष्णु : देवी गंगा! तुम नदी के रूप में पृथ्वी पर जाओ और सगर-पुत्रों का उद्धार करो। तुम्हारे पवित्र जल के स्पर्श से वे सभी शाप मुक्त होंगे।... इतना ही नहीं वत्स भागीरथ, पृथ्वी पर जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक तुम्हारे निर्मल जल में स्नान करेगा उसके सभी पापों का नाश हो जाएगा।
भागीरथ : मैं धन्य प्रभू। आपकी असीम कृपा से प्राप्त होने वाली गंगा के पवित्र जल से पृथ्वी पर सभी का कल्याण हो सकेगा।
विष्णु : ...किन्तु गंगा को पृथ्वी पर ले जाने में एक विकट समस्या भी है वत्स भागीरथ। स्वर्ग से धरा की ओर प्रवाह में गंगा का वेग इतना तीव्र होगा कि उसे धरती संभाल नहीं सकेगी और गंगा सीधी पाताल में चली जाएगी।
भागीरथ : प्रभू! इसका समाधान भी आप ही बताने की कृपा करें।
विष्णु : उपाय तो है किन्तु केवल महादेव के पास। गंगा के प्रबल वेग को केवल शिव ही अपनी जटाओं में रोक सकते हैं।
सूत्रधार-१ : भगवान विष्णु ने शिव से आग्रह किया तो उन्होंने स्वीकार कर लिया और तब गंगा चल पडी स्वर्ग से पृथ्वी की ओर...
(तीव्र जल वेग, तेज हवाओं, तूफान जैसी ध्वनियों और प्रलय जैसे स्वर। तीव्र संगीत)
सूत्रधार-३ : गंगा की जलधारा के पलयंकारी-भाषण वेग को महादेव शिव ने अपनी जटाओं में बांध लिया और फिर अपनी जटा की एक लट खोलकर मेरी एक जलधारा को पृथ्वी की ओर छोड दिया... मैं शांत... धीमी गति से पृथ्वी पर प्रवाहित होने लगी...
(कल-कल बहती नदी के स्वर, सितार का मधुर संगीत)
भागीरथ : हे परम कल्याणी देवी गंगा! मैं भागीरथ इस धरा पर आपका स्वागत करता हूँ।... पापों को हर लेने वाली पुण्यमयी माँ गंगे आपको कोटि-कोटि नमन!
(‘हर हर गंगे जय माँ गंगे’... भजन के स्वर सुनाई देते हैं)
सूत्रधार-२ : भागीरथ के कठोर तप के प्रताप से गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई... इसीलिए इसे भागीरथी भी कहते हैं।... गंगा आज भी हिमालय की अनेक पर्वत श्रृंखलाओं में विचरण करते हुए, विविध जल धाराओं के रूप में अपना मार्ग प्रशस्त करती हुई, देवभूमि भारत की पवित्र धरा की प्यास बुझाने का संकल्प लिए, अनन्त यात्रा पथ पर प्रवाहित हो रही है।... हिमकन्दराओं से उठने वाली ऋषियों-मुनियों-तपस्वियों की भक्तिमय भाव तरंगें और वेद ऋचाओं से उत्पन्न देव धवनियां गंगा के जल को युगों-युगों से पावन बनाती आ रही हैं।
(ओंकार व मंत्रोच्चार के गूँजते हुए आध्यात्मिक स्वर)
(शांति मंत्र के मधुर संगीतमय स्वर-
ऊँ द्यौ शान्तिरन्तरिक्ष २५ शान्तिः पृथिवि शान्तिरापः शान्ति रोषधयः
शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्ति सर्व २५ शान्ति
शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि।।
ऊँ शान्तिः शान्तिः। सर्वरिष्ट सुशान्तिर्भवतु।।)
सूत्रधार-१ : गंगा पावन मोक्षधाम ‘बद्रीनाथ धाम’ से पाण्डुकेश्वर में गुरु गोविन्द सिंह की तपस्थली हेमकुण्ड साहब से होते हुए विष्णुप्रयाग, नन्दप्रयाग पहुँचती है। इस पर्वत क्षेत्र में गंगा की यात्रा कुछ विशेष हो जाती है। पहाडों में गूँजते मधुर प्रेमगीत मानो सारे वातावरण में प्यार की मिठास घोलते हैं।
(पहाडी गीत-संगीत की मधुर धुन सुनाई देती है।)
सूत्रधार-३ : तीर्थनगरी रूद्रप्रयाग पहुँचकर अपनी चिरसंगिनी मंदाकिनी से अलिंगनबद्ध होकर गंगा भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग केदारनाथधाम में देवादिदेव महादेव शिव के चरण पखारती है। इस पावन तीर्थ में आकर सभी के दुःख दूर हो जाते हैं जब सभी तीर्थयात्री श्रद्धापूर्वक शिव को पुकारते हैं-
(‘ऊँ नमः शिवायः। ऊँ नमः शिवायः।’ के गूँजते संगीतमय स्वर के साथ शिव स्तुति)
सूत्रधार- २ : श्रीनगर की घाटी को पार करते हुए गंगा भक्तों का कल्याण करने वाली धर्म नगरी ऋषिकेश पहुँचती है और फिर मोक्षदायिनी पुण्य देवभूमि तीर्थनगरी हरिद्वार में प्रवेश करती है।
(शंख, घण्टे-घडियाल के साथ गंगा आरती के स्वर)
सुना ना आपने गंगा सदियों से सौ योजन क्षेत्र में जीव, वनस्पति, जलवायु को पवित्र करती पावन तीर्थस्थलों में जल के, स्पर्श मात्र से मानव के दुःख हरकर, उसे पापों से मुक्त कर पुण्य फल प्रदान कर रही है।... किन्तु मानव ने गंगा के साथ ये कैसा घोर अन्याय किया... सर्वत्र सुख फैलाने वाली गंगा आज स्वयं व्यथित है, दुःखित है, पीडित है...
(कुछ स्त्री-पुरुष गाते हुए आते हैं)
स्त्री-पुरुष : सुनो सुनो सब सुनो सुना,
गंगा की ये व्यथा सुनो
भारत की सभ्यता-संस्कृति का,
पुण्य प्रताप फैलाती आयी
वन-जन-जीव सभी को पाला,
सदियों से जीवन देती आयी
श्रद्धा से है पास जो आता,
कहता वो इसको गंगा माता
माता की ये व्यथा सुनो,
सुनो सुनो सब सुनो सुनो,
गंगा की ये व्यथा सुनो, गंगा की ये व्यथा सुनो।
बालक का स्वर : तुम्हें क्या दुःख है गंगा माँ। मुझे बताओ ना। मैं तुम्हारी आँखों में आँसू नहीं देख सकता माँ। तुम्हारी व्यथा क्या है मुझे बताओ ना गंगा माँ... बताओ ना मुझे...
गंगा का उदास स्वर : तुम कौन हो बालक?
बालक का स्वर : मैं नन्हा हूँ गंगे... आज का नन्हा... कल का भविष्य...
गंगा : हाँ सच कहा तुमने... आज का बालक ही तो मनुष्य जीवन का भविष्य है।
बालक : तभी तो कहता हूँ माँ गंगे... मुझसे कहो तुम्हारी व्यथा... मैं सुनूंगा तुम्हारी पूरी कथा... क्या तुम दुःखी होकर मानव का साथ छोड दोगी?... तो फिर हमारा क्या होगा?... हमारा क्या दोष है माँ?
गंगा : दोष तुम्हारा नहीं है नन्हें... आज के स्वार्थी मानव समाज का है... जो ऊपर से तो मुझे गंगा माँ कहकर आरती उतारता है पर मेरी पवित्रता का जरा भी ख्याल नहीं रखता।... मैं पृथ्वी पर आयी हूँ मानव सभ्यता का उद्धार करने... किन्तु आज वही मानव मेरी निर्मलता को नष्ट कर रहा है... मुझे गंदा-विषैला बनाकर प्रताडित कर रहा है... दूर-दूर से आन वाले धर्म स्नेही तीर्थयात्री ढेर सारा कचरा और पॉलीथीन की थैलियां आदि मुझमें फेंक रहे हैं, स्वयं स्नान करके पाप मुक्त होना चाहते हैं, किन्तु मुझमें साबुन का जहर घोल रहे हैं... मुझमें मल-मूत्र विसर्जित कर रहे हैं... हजारों घरों का मल और अपशिष्ट मेरे जल में प्रवाहित कर रहे हैं... मृत पशुओं को बहा
रहे हैं।
अमृत सा मेरा पवित्र-स्वच्छ जल आज प्रदूषित हो रहा है, इसमें जहर घुल रहा है... मनुष्य का ये कैसा धर्म है? कौनसी सभ्यता है? कैसी आस्था है?
बालक : ओह! सच में इतने स्वार्थी और अधर्मी हो गए हैं भारत के लोग?... माँ मुझे घर पर भी पीने का पानी देती है तो साफ करके छानकर देती है... फिर क्या ये लोग इतना भी नहीं समझते कि जिस जल को पवित्र मानकर हम श्रद्धा से पूजते हैं... उसे खुद ही गंदा-जहरीला बना रहे हैं... यह तो मूर्खता ही है ना माँ गंगे। हमारी टीचर एक कहावत कहती हैं- ‘अपने पैरों पर कुल्हाडी मारना’। ये तो वही बात हुई ना।
गंगा : ..... पवित्र नदियों का पानी इसी तरह प्रदूषित होता रहा तो महामारी फैलेगी, कैंसर, विकलांगता, रक्त-चाप, त्वचा रोग, पथरी, पीलिया, फेंफडें की बीमारियां, लीवर व आँतो की गंभीर बीमारियां फैलेंगी... मुझे प्रदूषित करने का घोर पाप मानव जाति ने किया है इसका प्रयाश्चित भी उन्हें ही करना होगा, तभी मैं फिर से उनके पापों का हरण कर उनका जीवन सुख-समृद्धिपूर्ण बना सकूंगी।
बालक : अपनी माँ का ख्याल रखना तो हम सबका कर्त्तव्य है...
गंगा : (रूंआसी होकर) मेरा तो मन भर गया है... अपनी दुर्दशा की पीडा मैं कब तक सह.... मेरी कराह क्या कोई सुनेगा?.... (गूँजते स्वर)... क्या गंगा मर जाएगी। मेरा राष्ट्रीय नदी का होने गौरव क्या कलंक बन जाएगा। मेरा अस्तित्व समाप्त होगा तो आस्था भी टूट जाएगी... धर्म-आध्यात्म विस्मृत हो जाएगा, अवनति की ओर चला जाएगा। क्या तुम लोग ऐसा होने दोगे?... क्या तुम चुपचाप यह सब देखते रहोगे?...
(सितार का करूण संगीत)
मेरी रक्षा करो हे महादेव...। मेरे जल में घुल रहे प्रदूषण से मेरा दम घुट रहा है... मैं मर रही हूँ प्रभो।... हे भागीरथ, कहाँ हो वत्स, घोर तपस्या करके जिस निर्मल-मोक्षदायिनी गंगा को तुम इस धरती पर लाये थे... उसका पवित्र जल अब जहरीला होता जा रहा है... मेरे गर्भ में पलने वाले अनेक दुर्लभ जीव-जन्तु आज विलुप्त हो रहे हैं... मुझे गंगा माँ कहकर देवी की तरह पूजा-अर्चना करने वाले इस देश में मेरी दर्दभरी पुकार सुनने वाला क्या कोई नहीं है?... अपनी गंगा माँ की पवित्रता की रक्षा करो मेरे पुत्रों... अपनी गंगा माँ को बचा लो... बचा लो
गंगा को....
(सितार का करूण संगीत बजता रहता है)
(कुछ स्त्री-पुरुष कवितामय स्वर में कहते हैं)
स्त्री-पुरुष : गंगा करे पुकार मुझको जीने दो, मोक्षदायिनी माँ को निर्मल रहने दो।
वन-जन-जीव सबको गले लगाती, पुण्य लुटाती है और सबके पाप मिटाती।
मत दूषित करो कल-कल बहने दो, मोक्षदायिनी माँ को निर्मल रहने दो।
नगर-डगर में जाती जीवन फैलाती, गंगा ही तो इस धरा को स्वर्ग बनाती
धर्म-आस्था को जन-जन में रहने दो, मोक्षदायिनी माँ को निर्मल रहने दो । द्य
बी-१०४, हरिभाऊ उपाध्याय नगर-मुख्य, अजमेर-३०५००४ (राज.) मो. ९८२९४८२६०१