चार गजलें

तबस्सुम ‘कशिश’


(१)
अब तो बस लोट के आ जाओ के याद आई है
यूँ सनम दिल ना दुखाओ के याद आई है
गम में डूबे हुये मायूस है कंगन मेरे
आओ छू कर इन्हें खनकाओं के याद आई है
अब तो ये रंग-ए-हिना बुझ सी गई हाथों की
बन के सतरंग झमक जाओ के याद आई है
तन्हा-तन्हा सी हर इक शाम है आशियाने की
आओ हर शय मे महक जाओ के याद आई है
हसरते दिल की कहीं टूट कर दम तोड न दे
आओ, आ जाओ, आ भी जाओ के याद आई है द्य
(२)
जहर उनपे उगल रहे हो तुम
जिनके साये में पल रहे हो तुम
देख कर उसके हुस्न-ए फानी को
इस कदर क्यों मचल रहे हो तुम
मैं नजर से यूँ पीने आई हूँ
मैकदे से निकल रहे हो तुम
छीन लेगा सुकून वो तुमसे
ऐसे साँचे में ढल रहे हो तुम
मुतमईन इसलिये हुई हूँ मैं
धीरे-धीरे सँभल रहे हो तुम
पुर कशिश हो गई है हयात मेरी
तुमको जलना है जल रहे हो तुम द्य
(३)
जन्दगी का सफर है सुहाना
हमसफर साथ तुम भी निभाना
आओ कुछ देर ही साथ बैंठे
जन्दगी का कहाँ फिर ठिकाना
जख्म इतने दिये बेरुखी ने
अब तो दुश्वार है मुस्कुराना
ये भी चाहत की है इक निशानी
रूठ जाऊँ अगर तो मनाना
दिल की फरियाद है तुमसे इतनी
तुम नजर से ना मुझको गिराना
प्यार से प्यार को आम कर दो
याद तुमको करेगा जमाना
ए ‘‘कशिश’’ लुत्फ आयेगा तुमको
साज-ए-दिलपर मुझे गुनगुनाना द्य
(४)
यहाँ से अब किधर जायें समझ में कुछ नहीं आता
यहीं पर क्या ठहर जायें समझ में कुछ नहीं आता
सुनो क्या हाल दिल का है तुम्हे अब कैसे समझायें
या जी जायें के मर जायें समझ में कुछ नहीं आता
बहुत सी ख्वाहिशे पलती है दिल में आजकल अपने
के पूरी सबको कर जायें समझ में कुछ नहीं आता
सियासत दार को केवल सियासत करने से मतलब
गरीबी कैसे हटवाऐं समझ में कुछ नहीं आता
अदब से दूर है बच्चे बडो की अब नहीं सुनते
अदब अब कैसे सिखलायें समझ में कुछ नहीं आता द्य
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