दो गीत

सूर्य प्रकाश मिश्र


रात-रानी
दुल्हन बनी रात की रानी
उपवन के सब पुष्प सो गये
लेकिन ये कह रही कहानी
बडे ध्यान से पीपल सुनता
मौन खडा है सपने बुनता
हँस कर कभी बजाता ताली
दूर हो गई मन की चिन्ता
लेकिन जाने किस प्रसंग पर
छलक पडा आँखों से पानी
लता लग रही एक परी है
आलिंगन में बद्ध खडी है
लगता है सर्वस्व पा गई
मन प्रसन्न है हरी भरी है
कबसे सुनती चली आ रही
लेकिन लगती नई कहानी
बादल हँसते जोर-जोर से
तारे लगते हैं विभोर से
पवन सुन रही ध्यान लगाकर
हर प्रसंग को बडे गौर से
चन्दा मौन खडे रहने की
निभा रहा है रीति पुरानी
चाँद सोचता चलते-चलते
सभी पुष्प दिन में ही खिलते
लेकिन रात में खिलने वाले
दिलवाले बिरले ही मिलते
ऐसे दिल वालों की होती
अलग हमेशा एक कहानी द्य
शाम
आई शाम लगाकर लाली
चाँद आ गया है कुछ पहले
आने वाली रात निराली
मधुर स्वरों में गीत गा रहे
पंछी उडते चले जा रहे
उनकी मस्ती में शामिल हो
काले बादल सुर मिला रहे
पवन मस्त हो लगी झूमने
कण-कण लगा बजाने ताली
रात सुहानी जब आयेगी
धरती शीतल हो जायेगी
सुनकर ये संगीत निराला
मधुर स्वप्न में खो जायेगी
कल आने का वादा करके
सूरज ने चुपचाप विदा ली
गगन हो गया रंग-बिरंगा
मेघ बह रहे जैसे गंगा
श्वेत बादलों की ये टोली
लगती जैसे कंचन जंघा
तारे खिलने लगे पुष्प से
भरने लगी पुष्प से डाली
जैसे-जैसे रात आयेगी
सारी बगिया भर जायेगी
हर सिंगार के फूलों जैसे
प्रातः बेला झर जायेगी
जिसने ऐसा बाग लगाया
होगा बडा विलक्षण माली द्य
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