दो गीत

डॉ. कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’


(१)
जीवन की झोली में खुशियाँ भरनी हैं हर पल की
आज हमारा तो अपना है, फिर क्यों चिंता कल की
घूम-घूम कर खुशियाँ बाँटो
सब मिल सांझ सकारे
दीखे कोई नहीं पराया
मन से सभी दुलारे
होठों पर मुस्कानें दीखें, उनके हल्की हल्की
आज हमारा तो अपना है, फिर क्यों चिंता कसकी
कर्मक्षेत्र अद्भुत है अपना
संकल्पित हों सारे
अब तक रहे अधूरे सपने
इन पर खूब बिचारे
सीमा, समय छोडकर आगे गति होगी हलचल की
आज हमारा तो अपना है, फिर क्यों चिंता की कल
साथ हमारे हो जाएगा
समय ‘अचूक’ सुहाना
आशाओं के दीप जलाओ
गीत सुरीले गाना
हरियाली हर तरफ बिखेरें, हालत जो मरुथल की
आज हमारा तो अपना है, फिर क्यों चिंता कल की

(२)
वर्तमान के साथ लिखेंगे, सपने कुछ कलके
हार जीत में रहें फासले बस ही दो पल के।।
अग्नि परीक्षा में साधक को
तपना होता है
फिर जाकर जीवन का सपना
अपना होता है
मधुर सुहानी होती बरसा, फिर हलके-हलके
वर्तमान के साथ लिखेंगे, सपने कुछ कलके।।
नव मानव के पीछे-पीछे
हो इतिहास नया
खरी कसौटी पर फिर उतरे
जया और विजया
नहीं साथ होना पल भर भी, ठग, प्रपंच, छलके
वर्तमान के साथ लिखेंगे, सपने कुछ कलके।।
नाच गान कर रही कल्पना
इस सुबोध मन में
घूम-घूम कर जैसे नाचे
मोर किसी वन में
हृदयांगन जब सराबोर हो, प्रेम नीर छल के
वर्तमान के साथ लिखेंगे, सपने कुछ कलके।।
कौन ‘अचूक’ रोक फिर सकता
साहस है किस में
पद प्रहार से पर्वत होगा
सदा सदा बस में
पथ अवरोधक हट जाएंगे, सब इस भू-तल के
वर्तमान के साथ लिखेंगे, सपने कुछ कलके।।
३८-ए, विजय नगर, करतारपुरा, जयपुर-३०२००६
मो. ०९९८३८११५०६