दो गीत

सत्यदेव संवितेन्द्र


जीवन सारा बीत गया
सिमट गईं पलभर में सांसें, जीवन सारा बीत गया।
सुनते रहे रुदाली के स्वर, प्राणों का संगीत गया।
चुनकर अपने हर संकट को,
मन ही मन स्वीकार किया।
पंच-तत्त्व को ही ‘मैं’ माना,
इस ‘मैं’ से ही प्यार किया।
जिसने आत्म-तत्त्व को जीता वो जगती से जीत गया।
सुनते रहे रुदाली के स्वर, प्राणों का संगीत गया।
इस दुविधा में अन्तर्मन की,
चादर पर भी छेद हुए।
मतभेदों से आगे बढते,
मनभेदों में कैद हुए।
जो रहीम का पानी था वो आंखों से बह रीत गया।
सुनते रहे रुदाली के स्वर, प्राणों का संगीत गया।
समय-बही के पन्नों पर ही ,
रच डाले हैं गीत कई।
इसीलिए तो मिल जाते हैं,
इन गीतों के मीत कई।
लेकिन मुश्किल के मातम में भूल हृदय का गीत गया।
सुनते रहे रुदाली के स्वर, प्राणों का संगीत गया।
समय-बही के पन्नों पर ही,
रच डाले हैं गीत कई।
इसीलिए तो मिल जाते हैं,
इन गीतों के मीत कई।
लेकिन मुश्किल के मातम में भूल हृदय का गीत गया।
सुनते रहे रुदाली के स्वर, प्राणों का संगीत गया। l
साथ छोडकर मत जाना
चार दिनों का साथ, छोडकर मत जाना।
चलना पग-पग धार, दौडकर मत जाना।
पार करेंगे हम पथ जीवन का सारा।
ज्यों नदिया के दो तट लेकिन इक धारा।
साथ रचा है जिसने वही हमारा भी,
निराकार है वही जगत का ओंकारा।
बांधा उसका सूत, तोडकर मत जाना।
चलना पग-पग धार, दौडकर मत जाना।
रहे संग तो सांस-सांस को जी लेंगे।
जहर मिला तो आधा-आधा पी लेंगे।
मिली सपन की चादर फटी-पुरानी तो,
मिलकर दोनों अपने हाथों सी लेंगे।
अंतिम दम तक राह मोडकर मत जाना।
चलना पग-पग धार, दौडकर मत जाना।
पहले ही तय कर लेना जो करना है।
सदा संग दोनों का जीना-मरना है।
रहे हमेशा आस एक उस मालिक की,
जैसे भी रह लेंगे, उसका शरना है।
और किसी की आस जोडकर मत जाना।
चलना पग-पग धार दौडकर मत जाना।
उद्भव, ४५, आदिनाथ नगर, पिपली सर्किल, जोधपुर-३४२०१४ (राज.)