रंग बदलता मन मूल:तमिल जे. चेल्लम जरीना अनुवाद:एस. भाग्यम शर्मा

एस. भाग्यम शर्मा


‘‘बाबूजी आपसे मिलने एक साहब आए हैं......मैनेजर साहब ने मुझे आपको तुरन्त लेकर आने को कहा.....’’
‘‘मैं आपसे कुछ पूछ सकती हूँ क्या ?’’
‘‘क्यों बाबूजी आप इस संस्था को छोडकर जा रहे हो.....ये बात सच है क्या...?’’
वे हँसते हुए बोले ‘‘तुम बोलो कामाक्षी, रहूँ....या जाऊँ ?’’
‘‘ये आप ही फैसला करोगे। पर, एक बात है, आप नहीं हैं तो....इस संस्था......इस संस्था......’’ कुछ कहने आई पर उसका गला भर आया तो आधे में ही चुप हो गई। उसके बाद वे ऑफिस के कमरे के पास आ गये। कामाक्षी बिना बोले ही आँखों को पोछती हुई वहाँ से अंदर चली गई।
‘‘आईये....आईये....ये क्या है सर जी, आप कैसे हो, अच्छे हो क्या....अच्छे हो क्या....’’ कह कर वकील नरसैया ने गंभीर आवाज में उनका स्वागत किया।
‘‘आईये...वकील जी आप कैसे इतनी दूर आए ?’’ दोनों अंदर जाकर पास-पास बैठ गए।
‘‘हाँ आपको कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ.....?’’ प्रश्न
पूछकर रूके।
‘‘आफ बेटे ने ही कहा। आपकी पत्नी के एक्सिडेन्ट केस में अपने पक्ष में फैसला हो गया है। मैं फोन कर रहा था पर मिला नहीं...तो सोचा मैं स्वयं जाकर आपसे मिलकर, बात भी बता दूँ और कुछ पेपर में हस्ताक्षर भी ले लूँ। अतः मैं आफ घर गया। आफ बेटे ने आफ यहाँ होने के बारे बताया। आपकी बहू आँखों में आँसू लाकर रो रही थी। कुछ भी मनमुटाव हो....तो भी आपको उनकी इन्सल्ट करने जैसा फैसला लेकर इस तरह होम में नहीं आना चाहिए था।’’
‘‘जाने दो छोडो! मेरे बेटे को रूपयों के बारे में पता है क्या ?’’ पूछा।
‘‘जस्ट बातों में उन्हें पता चल गया कि १७ लाख रुपये सेंक्शन हो गये। ये बात पता चलते ही वे रूंआसे हो गए और दुखी होते हुए बोले देखो सर जी....ऐसा गुस्सा करके होम में चले गए। फिर यह पता दिया।’’ बोले वकील साहब।
फिर, कुछ-कुछ बात करते हुए अपने साथ लाए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर लेकर रवाना हुए।
‘ओह.....इसीलिए लडका व बहू, यहाँ आए थे क्या ?’ वे सोच में डूब गए।
बहू निरंजना बोली, ‘‘पापा,....मैंने बडी गलती कर दी; आप मन में कुछ मत रखो। बडा मन मुझे माफ कर दीजिये। आपने माफ कर दिया हमें तभी लगेगा जब आप घर आ जायेगे। आफ बिना घर सूना है पापा....‘ कह कर आँसू बहा रही थी। वह दृश्य उनके आँखों के सामने आने लगा.... ये रुपए इतनी ज्यादा रकम होगी ये वे लोग अंदाज नहीं लगा पाये, वे स्वयं भी इसे भूल ही गए थे। एक विशेष आयोजन में जाकर पत्नी के साथ कार से आते समय, सामने से आई एक ए.सी. बस अपना संतुलन खो कर कार से टकराई। दोनों को ही बहुत चोट लगी। चिकित्सा से भी ठीक न हो पत्नी मर गई। मेरी रीढ की हड्डी में लगने से कई महीने अस्पताल में ही रहना पडा आर्थिक प्रबन्धन अपने आप ही बेटे के हाथों आ गया व घर प्रबन्धन बहू के हाथों में आ गया।
कुछ हद तक ठीक होकर घर आने के बाद भी अपना काम अपने आप करने में उन्हें कठिनाई हुई व बहुत कष्ट पाये। अभी तक जीवन में एक चक्रवर्ती राजा जैसे रहने के आदी थे वे। इस नये जीवन ने कई कडवी बातों को सिखा दिया। नई सच्चाईयाँ सामने आई।
इस उम्र में अपनी पत्नी को इस तरह अचानक खोने से ही उनका आधा जीवन खतम हो गया। स्नेह व प्रेम की उम्मीद के बदले उन्हें उपेक्षा व लापरवाही बहुत ही कष्टप्रद लगी। उनका मन व शरीर दोनों ही कमजोर हो गए। बहू की उपेक्षा व अपमान ने उन्हें तडपने को मजबूर किया। उनको बेकार का बोझ मान कर निरंजना व उसके परिवार वालों ने उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया।
अपने बेटे की इस पर मौन स्वीकृति जैसे व्यवहार को वे सहन न कर पाये।
उनके शारीरिक अक्षमता ही उनके लिए अपमान जनक है ये महसूस करने पर वे बच्चे जैसे तडपे। अपने आप को उन्होंने बहुत सीमित कर लिया। अंदर ही अन्दर वे बहुत सिकुड गए। जीवित रहना ही एक दण्ड व बोझ है सोच कर अंदर ही अंदर तडपे।
अचानक एक दिन उनका बेटा, उन्हें इस होम में लाकर छोड गया और रुपए जमा करवा कर चला गया। उन्होंने चोट लगे पक्षी जैसे वेदना को महसूस किया। आज भी वह क्षण ताजा-ताजा जैसे ही याद है।
थोडा-थोडा कर सच्चाई को जान, अपने पश्चाताप को दूर कर धीरे-धीरे, इस संस्था में मन लगा, अपने शरीर को वश में लाते समय ये महसूस किया कि वे ही यहाँ अकेले नहीं हैं ये सभी लोग अकेले हैं। उन्हें समझ में आया कि जवानी, रुपये, स्वास्थ्य सब कुछ अपने पैदा किये बेटे के लिए देकर, वृद्धावस्था में चूस कर फेकी हुए आम गुठली जैसे स्थिति हो जाती है। स्नेह के लिए तडपते यह विनोदात्मक मायाजाल उन्हें भी हाथ फैला कर आँखें भिचका कर बुला रहा है।
वे सावधान हुए, सम्भले,बिजनेस मैन थे ना!! स्वभाव से ही हिसाब करने वाले। धीरे-धीरे संस्था की देखरेख व देखभाल के काम में हिस्सा लेने लगे। उस संस्था व वहाँ रहने वालों को भी आगे लाने के लिए तय करने के बाद, पुरानी बातों को सोच दुखी होने के बदले सामने फैले जीवन को देखने का प्रयत्न किया। इसमें उनकी व्यापारिक बुद्धि उनके काम आई।
ध्यान, योग, आत्मज्ञान आदि से कई बदलाव इस संस्थान में लेकर आए। इसके साथ ही बेकार पडे जमीन में बगीचा, खेलकूद, हाथ-करघा की चीजें बनाना सिखाया। जो सीख कर बनाने लगे उन्हें उन वस्तुओं को बेचने नया रास्ता दिखा उन्हें प्रकाश में लाए। उन लोगों के हाथ में पैसे आये। ‘‘अपनी जिंदगी अपने हाथ में है, अपनी खुशी अपने अंदर है।’’ ऐसी सोच सभी बुजुर्गों में डाली। उन बीजों को बाहर आने में समय लगने के बावजूद हरी-हरी कोपले प्राणों के बाहर आने लगी....हमारे लिए जीवन है, समय, कला है जो अभी भी हम में जिंदा है। ये समझ आने पर...उनके जीवन में चाशनी टपकने लगी। हर एक दिन बोझ जैसे शुरू होने वाला अब नई फूर्ती के साथ शुरू होने लगा। साथ में खुशी भी उनके जिंदगी में आई।
बुजुर्गो की संस्था अब जवानों की संस्था में
बदल गई।
बेटा व बहू के आकर बात करके जाने के बाद वहाँ उदासी छाने लगी जैसा लगा। कामाक्षी, केम्पन्ना, छोटी माँ, पौन्नू, मैनेजर......यही क्यों साथ में रहने वाले लोग भी परेशान हो घूम रहे जैसा लगा। उन्होंने
दीर्घश्वास लिया।
‘‘अप्पा चलें......?’’
‘‘क्यों पापा! सब ऐसा ही पडा है। आपने पैक नहीं किया।’’ निरंजना ने प्यार से पूछा।
क्यों बेटा ? मुझे तो यहीं अच्छा लगने लगा है। ऐसे ही रहते रहूँगा ना.....’’
उस तरफ से जा रहे मैनेजर को निरंजना ने बुलाया, ‘‘साहब....आप ही बताइए.....कोई खराब घडी ने हमें अलग कर दिया.....उसके लिए हमेंशा के लिए अलग ही रहना चाहिए क्या! रिश्ते खतम होते है क्या ?’’ कह कर हिचकी लेकर रोने लगी।’’ आप ही बोलिए साहब.....लोग क्या कहेंगे ? मुझे ही तो बुरा कहेंगे। ससुर को भगा दिया राक्षसी ने....इस बुराई की जरूरत है क्या ?’’ न्याय मांग कर आँसू पोछने लगी।
‘‘हाँ जी....आप जो कह रही हैं वह सही ही है। हम भी सर के बिना कैसे रह पाएंगे। बहुत ही अच्छे है आप। इनका निर्मल मन सोने जैसा......इनके आने के बाद सब कुछ बदल गया। होम घर जैसे हो गया। वही क्या....ऐसा मन किसके पास होगा....? इनको मिले सभी रुपयों को इस संस्था को व अनाथ बच्चों की संस्था को आधा-आधा लिख दिया....इतना बडा दिल किसका होगा?’’ मैनेजर से बात करते दम्पति कुछ समय में ही परेशान हो गए व उन्हें जबरदस्त सदमा लगा।
‘‘क्या ?’’
‘‘क्या कह रहे हो ?’’
‘‘हाँ हाँ...आपको मालूम नहीं होगा ठीक है....अभी अभी ही सभी बंदोबस्त करके थके हुए हैं।’’
‘‘क्यों अप्पा...क्या सच में ?’’
‘‘सच ही है। अपने आप आए रुपये.....मैंने धर्म के लिए लिख कर रख दिया’’
‘‘धर्म के लिए लिखना....? किसे पूछ कर लिखा....बिना वारिस के ये सम्पति है क्या.....? पैदा किया हुआ बेटा नहीं है! पैदा किये अपने बेटे से एक बार पूछना नहीं चाहिए.....छिंः तुम सब मनुष्य हो क्या?.....१७ लाख......पूरे १७ लाख...अपने आप आए रुपये! कर्ण महाराजा जैसे धर्मवीर ने धर्म निभा दिया....ये तुम्हें फलेगा क्या? तुम्हें ऐसे अनाथ जैसे एजेड होम में डाले होने के बावजूद तुम ऐसे हो.....तुम्हारी इतनी हिम्मत है? ऐसे सत्रह लाख को लिख कर रखने का मन कैसे किया.....तू तू....तेरा सर्वनाश हो.....’’ निरंजना सन्निपात के मरीज जैसे आदर की भी अवहेलना कर, जोर-जोर से चिल्लाने से मैनेजर साहब घबरा गए।
‘‘निरंजना...वह मेरी पत्नी के (...) के बदले लिया पैसा है। वह धर्म के लिए जाये वही न्याय है।’’
‘‘आह-आह....हाँ न्याय.....बडे न्याय -य-य...न्याय बडे न्याय को देख को देख लिया....बहुत बडे न्यायाधिपति हो! आपकी पत्नी है तो इनकी अम्मा नहीं है क्या? अम्मा के मरने पर आए पैसों में इनका अधिकार नहीं है क्या? आधा रुपया हमें मिलना चाहिए। पहले जो बन्दो बस्त किया है उसे रुकवाइये।’’
‘‘वह नहीं....हो सकता....निरंजना। करोडो की सम्पति तुम्हे दे चुका हूँ....बिजनेस, घर, बगीचा, गहने, बैंक के रुपए सब कुछ दे दिया....ये पूरे का पूरा रुपया है! मेरी पत्नी का पैसा, मेरी इच्छा के जैसे ही कर दिया....ये पूरे का पूरा मेरा पैसा है! मेरी पत्नी का पैसा, मेरी इच्छा के जैसा कर दिया....तुम लोग जा सकते हो।’’ उन्हें नफरत भरी नजरों से देखने लगी....
‘‘और पेड जैसे क्यों खडे हुए हो चलो....’’ कह कर भूमि को लात मारते हुए पति को हाथ पकड कर घसीटते हुए चली।
‘‘अरे! अरे! आप....सर को लेकर नहीं जा रहीं हैं क्या....?’’ पीछे दौडने वाले मैनेजर को रूक कर जलाने वाले नजरों से देखा।
‘‘इस रिक्त आदमी की! अब हमें क्या जरूरत है ? इसे यहीं रहने दो!’’ चिल्लाकर कह कर उन्हें देख कर अंगुलियों को चटकाती हुई बोली ‘‘मर भी जायें तो अब अनाथ शव ही होगा ये.......पैदा किया लडका दाग देने नहीं आयेगा.....’’ कहने वाली....’’इन्हें क्या देखना.....हम चले! कह कर पति को हाँकते हुए ले गई। वह भी जैसे वह खींचें वैसे ही खींचता चला गया। वहां जो लोग थे वे सदमें में आ गये, पर वे जोर-जारे से हँसे।
बी-४१, सेठी कॉलोनी, जयपुर-३०२००४
मो. ९४६८७१२४६८