आहट बुनता हुआ परिंदा

डॉ. हरीदास व्यास


सुबह माँ सबसे पहले उठती है। पर उसके उठ जाने का अनुमान किसी आहट या आवाज से नहीं, रसोई की लाईट से होता है। विंशी मेरे दफ्तर रवाना होने तक बामुश्किल उठ पाता था। माँ उसके जगने के इंतजार में कई बार चाय का पानी चढा चुकी होती। सुबह होने के बाद घर में पहला वाक्य मैं ही बोलता-‘‘चलता हूँ माँ!’’
छुट्टी के दिन दोपहर तक भी शायद ही कोई वाक्य बोला जाता हो, रविवार की दुपहरी माँ मंदिर जाते हुए कहती-‘‘दर्शन कर आती हूँ।’’ घर में हम तीनों ऐसे ही आधे-अधूरे वाक्य बोलते।
हर घर के वातावरण की अपनी एक लय होती है, निश्चित ध्वनियाँ और सन्नाटे होते हैं। इन सबसे मिल कर जो कुछ भी हमारे कानों में गूँजता है, वह इतना परिचित हो जाता है कि आँखें बंद कर भी अपने घर के भीतर पहुँचते ही उसे पहचाना जा सकता है।
मुझे हमेशा आश्चर्य होता है कि इतनी कम ध्वनियों से एक घर का जीवन भला कैसे चल सकता है! माँ भी पता नहीं कैसे काम करती है कि रसोई से बरतनों की आवाज तक कभी नहीं आती। सुबह-सुबह उसके होठ जरूर हिलते हुए दिखाई देते हैं पर यह अनुमान ही करना होता है कि वह कोई जाप या पाठ कर रही होगी।
घर की इस निश्चित लय में तब जरूर परिवर्तन होता जब किसी सुबह विंशी बहुत जल्दी तैयार हो कर अपने कमरे से बाल काढता या जेब में रूमाल ठूँसता हुआ रसोई में घुसता। मुझे कभी पता नहीं चला कि वह घर से रवाना होते हुए माँ को क्या बोलता होगा। उस समय उसके कदमों की आहट मुझे घर में एक ऊ र्जा भरी अतिरिक्त ध्वनि लगती जो उसके जाने के काफी देर बाद तक मेरे कानों में गूँजती रहती। घर की वह एक मात्र चुस्त-ध्वनि होती थी। इस एक आवाज को छोड दें तो घर में विंशी की भी कोई और ध्वनि नहीं थी। रात देर तक उसके कमरे में लाईट जली रहती। वह किताबें पढता हुआ या झुक कर कुछ लिखता हुआ दिखाई देता, पर तब भी कागज की फडफडाहट तक सुनाई नहीं देती। मैं जानता था वह किसी परीक्षा की तैयारी नहीं कर रहा। पिछले काफी समय से उसका मीडिया के लोगों के साथ मिलना-जुलना हो रहा था। पर वह उन लोगों की तरह कतई ‘लाउड’ नहीं था।
लोकल चैनल पर विंशी पर विंशी को लोगों ने कई बार देखा, दफ्तर के लोगों ने भी मुझे लगता है मेरे ऑफिस जाने के बाद माँ के बीच संवाद चलते रहते। बातूनी नौकरानी की तरह वह माँ के आस-पास बनी रहती। मुझे लगता है मेरे ऑफिस जाने के बाद माँ उसे भी चले जाने का संकेत दे देती होगी और वह बेमन से रवाना होती होगी। सर्दियों में माँ का इस तरह चले जाने का संकेत करना उसे *जरूर अपमानजनक लगता होगा। पर माँ तटस्थ बनी रहती। विंशी बडे दिनों की छुट्टियों में जब अपनी मम्मी से मिलने ‘शिप टाऊ न’ जाता, उन दिनों माँ का यह तटस्थ भाव और कठोर हो करहर समय उसके चेहरे पर तना रहता। विंशी के लौट आने के कई दिनों बाद तक भी माँ का चेहरा सहज नहीं हो पाता था। पर अब बडे दिनों के आने से पहले ही उसकी उदासी बढने
लगती है।
आखिरी बार विंशी बडे दिनों से काफी पहले ही चला गया था। बेशक अपनी मम्मी के पास नहीं। उसके जाने से पहले घर की निश्चित लय में दो-तीन असामान्य परिवर्तन हुए। ऐसा तो पहले भी कई-बार हुआ है कि विंशी अपने से दो तीन दिनों तक बाहर ही नहीं निकलता। न उसका कोई दोस्त घर पर आता था, न ही उसके लिए कभी फोन बजता। वह खुद भी शायद ही कभी किसी को फोन करता था, लेकिन उस बार सात-आठ दिनों से वह अपने कमरे में ही था, माँ ने रविवार की सुबह यह बात मुझे बहुत चिंता करते हुए कही-‘‘कपडे तक नहीं बदले, दिन-रात सोता या पढता रहता है। खाना बहुत कम खाता है, उसे देखों!’’
माँ की आवाज में भय थरथरा रहा था।
उसी दोपहरी माँ ने उस लडकी के लिए दरवाजा खोला। माँ से कुछ पूछने के बाद वह विंशी के कमरे
में गई।
लंबे समय बाद घर में पहली बार एक अनजानी लय और अलग स्वर की धीमी आवाज सुनाई दे रही थी। मुझे अच्छा लग रहा था। आवाज में करुणा और विनय थी। विंशी लगभग चुप था। पर जो कुछ बोला-धीमा और कठोर आवाज में।
माँ पानी और चाय लिये लॉबी में ही असमंजस में अभी भी खडी थी, तभी लडकी कमरे से बाहर निकल कर बिना इधर-उधर देखे सीधे दरवाजे की ओर बढ गई। वह चेहरे-मोहरे और पहनावे से बहुत शालीन दिखाई दे रही थी। उसके झुके चेहरे के बावजूद मुझे लगा कि उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं।
लडकी के जाने के बाद घर में रोज वाला सन्नाटा कुछ और भारी हो कर फैल गया। घर में सभी लोग, सामान यहाँ तक कि हवा भी जैसे काफी देर तक
जमी रही।
वे नवंबर के बीच के दिन थे-सर्दियों की आहट लिये पर खामोश। दिन की धूप कमजोर और पीली पडने लगी थी। शामें मैली और धुंधली होने लगी थीं। ऐसी ही एक शाम दफ्तर से लौटने पर माँ ने बताया विंशी बिना कुछ बोले बैग लेकर गया है।
ऐसा पहली बार हुआ था। माँ को बताए बिना वह कभी घर के बाहर नहीं जाता था। माँ बेहद चिंतित थी। उसकी तसल्ली के लिए ही मैं उसे साथ लेकर विंशी के कमरे में गया। पता नहीं आखिरी बार कब मैं उसके कमरे में गया था। पत्रिकाओं, अखबारों और किताबों से कमरा अटा पडा था। कुछ सामान बहुत करीने से रखा हुआ था पर कुछ बेहद बेतरतीब। इजिप्ट की एक बडी पेंटिंग न जाने कब उसने अपने कमरे में लगाई थी। मेज पर एक खूबसूरत कलाई-घडी थी। मैंने उसे कभी यह घडी पहने हुए नहीं देखा। इतनी महँगी घडी खरीदना और उसे पसंद ही नहीं था, *ारूर किसी ने भेंट की होगी। पलंग पर एक अकेला कागज पेन के नीचे रखा हुआ था। लंबे समय बाद मैं उसकी लिखावट देख रहा था। कुछ देर मुझे समझ
आया कि यह बिना संबोधन का पत्र विंशी ने मेरे लिए ही लिखा था। शाम बहुत गहरी और काली हो चुकी थी। माँ बिना कुछ बोले मेरी ओर एकटक देख रही थी।
मैं जानता हूँ वह अब नहीं लौटेगा। उसने जो तय कर तय लिया, उसे वह हर हाल में करेगा। मुझे इस बात का संतोष है कि उसने अपना बदला किसी अन्जान से लेने का सिलसिला तोड दिया। मुझे सचमुच उस पर गर्व है। पर अन्जानी जगह में अन्जाने लोगों के बीच दम तोड रहे विंशी का विचार आते ही असहनीय बेचैनी होने लगती है। फिर कई दिनों तक उसकी तलाश में निकल पडता हूँ, शहर दर शहर स्वयंसेवी चिकित्सा संस्थानों, स्पेशल वॉर्डों, कच्ची बस्तियों, सरकारी अस्पतालों में भटक कर लौट आता हूँ, ऐसी ही एक निराश-यात्रा से लौटने पर वही लडकी माँ के पास बैठी हुई दिखी। उसने विस्तार से बताया कि पानी के राशनिंग की खबर लेकर लोकल से लौटते हुए विंशी की बाँह में किसी ने तेज सुई गडा दी। उस वक्त तो उसे कुछ भी समझ में नहीं आया पर घर आने के बाद जेब में मिले कागज के पुर्जे से वह सब समझ गया। उस पर लिखा था-‘‘मौत के क्लब में आपका स्वागत है।’’ तभी से वह सतर्क था। आखिरी बार खून की जाँच पोजिटिव थी। तब वह मौत के इस सिलसिले को यही रोक दने और बिस्तर पर मरने की बजाए अपने पैसे रोगियों के लिए अंतिम सांस तक कुछ करने का निश्चय कर चुका था।
अब यह घर और भी खामोश हो गया है। माँ विंशी के कमरे की बत्ती शाम होते ही जला देती है। सुबह मेरे ऑफिस जाने से पहले वह कई बार चाय का पानी चूल्हे पर चढाती रहती है। घर में दिन भर का एक मात्र वाक्य मैं ऑफिस जाते हुए अब भी बोलता हूँ-‘‘चलात हूँ माँ!’’ पर माँ इसे भी कई बार नहीं सुनती। उसकी आँख विंशी के कमरे पर टिकी रहती है।
गली सं. २, चौपासनी ग्राम, जोधपुर-342014
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