नैहर

हरिप्रकाश राठी


चढते चैत्र की आज दूसरी रात थी
क्षितिज के उस पार चन्द्रदेव अभी आधे ही उठे होंगे कि कुमुदिनियों ने झूम कर उनका स्वागत किया। चन्द्र दर्शन से उनका हर पत्ता ऐसे खिल उठा जैसे किसी कवि को दाद मिलने पर उसका अंग-अंग खिल उठता है। सभी कुमुदिनियाँ अपने सहस्त्रों कर फैलाकर मानों चन्द्रदेव से अनुनय विनय कर रही हों, आज रात हमारे आगोश में आओगे ना! कुमुद भला इस प्रलाप को कैसे सहते। नजदीक आकर बोले, ‘बावरियों! जरा पानी में नीचे झाँक कर देखो, उन्हें तो हमने कैद कर लिया है। अगर सारी रात हमारे पास रहोगी तो सुबह उन्हें छोड देंगे।’ सहमी हुई कुमुदिनियाँ चुपचाप कुमुदों के समीप आ गई। चकवे ने चकवी को, चकोर ने चकोरनी को एवं मोर ने मोरनी को इसी गुह्य रहस्य को समझाया। देखते-देखते आसमान के पश्चिमी छोर पर केसर, कुंकुम एवं रोली बिखर गई। पेड, पौधे, जंगली घास एवं सभी वनस्पतियाँ पवन के मंद-मंद झोंकों के साथ झूमने लगे।
ऊपर उठे हुए चन्द्रदेव अब ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो कोई बलिष्ठ युवक कंधे पर कलश लिये अमृतदान करने निकला हो।
माघ में बिल्ली कार्तिक में कुतिया एवं चैत्र में लुगाई का अलग ही आलम होता है।
टेबल लैम्प की मद्धम रोशनी में प्रभा, राकेश से न जाने क्या अनर्गल प्रलाप कर रही थी। सर्वथा अनर्गल।
‘शादी किये सात वर्ष हो गए। पहले तो प्रशंसाओं के पुल बाँध देते थे, अब क्या हो गया। आज खुलकर मेरी तारीफ करो।’ कहते-कहते ही उसने राकेश का हाथ अपने हाथ में ले लिया।
जिसके दस सिर हो वह औरतों से बहस कर सकता है।
डबल बेड पर नाइट सूट पहने राकेश ने विस्मय से प्रभा का चेहरा देखा जैसे किसी कठिन पहेली का उत्तर ढूँढ रहे हों। प्रभाव की इन बातों को सुनकर कौन कहेगा कि वे दोनों यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हैं।
उसके सिर में अंगुलियाँ घुमाने हुए राकेश कुछ देर चुप रहे पर जब प्रभा ने अपनी बात दोहराई तो बोले, ‘अच्छा हुआ विधाता ने पहले आदमी बनाया अन्यथा पहले स्त्री सृजन कर लेता तो वहीं उलझ जाता।’
‘यानी पहले कच्चा माल फिर फिनिशिड् राकेश ने बात को बढाया।
‘यस इनडीड।’
दोनों एक साथ ठठाकर हँस पडे। मद्धम रोशनी में राकेश ने प्रभा की दूध-सी धवल मुस्कराहट के दर्शन किये। सचमुच प्रभा आज भी उतनी ही खूबसूरत थी। खुले लम्बे केश, गहरी आँखें, तीखा नाक एवं सुघड बत्तीसी मानों स्वर्ग से अप्सरा उतरी हो।
‘तुम्हारे गुणों की अब मैं क्या प्रशंसा करूँ, तुम तो गुणातीत हो।’ राकेश अब तक उसके पाँवों को अपने पाँवपाश में ले चुके थे।
‘बोर मत करो! आज तो बस मेरे रूप की तारीफ करो। वैसे ही जैसे तुमने सुहागरात के दिन की थी।’
‘क्या की थी?’
‘तुम्हें याद नहीं!’ वह लजाकर बोली।
‘अब वो बातें अच्छी थोडी लगती हैं।’
‘कहा न करो!’ प्रभा की तीखी आँखों के आदेश को भला राकेश कैसे ठुकराते।
‘प्रभा! तुम्हारे कहने से नहीं पर आज भी पूरी ईमानदारी से कहता हूँ कि तुम सचमुच बहुत सुन्दर हो। अब मैं तुम्हारे खुले केशों की तुलना काले उबालों से नहीं करूँगा, न ही तुम्हारे रूप की चाँद से, अब तो तुम इन उपमाओं को भी लजाने लगी हो।’
प्रभा बौरायी-सी राकेश से लिपट पडी।
अनंग मौन पदचाप से कमरे में प्रविष्ट हो चुके थे। देव आएँगे तो उनकी आराधना भी होगी।
कमरे की चारों दीवारों ने अपनी सहस्त्रों मिचमिच आँखों से इस दृश्य को देखा खिडकी से झाँकती चाँदनी भी इस अभिसार का गवाह बनी पर उसके पेट में बात पचे तो। चुगलखोर चाँदनी ने हरामखोर हवाओं को यह बात बता दी। हवाओं ने यह बात पेड, पौधों, पशु-पक्षियों सभी में फैला दी। जड-चेतन सभी को कहने का अवसर मिल गया, ‘अरे यह विवेकसम्मत मनुष्य इतना कामातुर है तो हम जड मूर्ख भला कैसे नियंत्रण करें।’ पलभर में सम्पूर्ण प्रकृति ही मानो व्यभिचारिणी बन गई।
अनंग आराधना के बाद मियाँ बीबी फिर बतियाने लगे। कमोबश अब दोनों का मुँह आमने-सामने नहीं था दोनों निढाल पडे थे।
तन दे मन ले।
सही समय जानकर प्रभा ने मतलब की बात छोडी।
‘आपको एक बात बताना ही भूल गई। कल सुबह मुझे लेने आएँगे। दोपहर उनके साथ कार से रतलाम निकल जाऊँगी। दोनों बच्चे भी चार रोज से नानी के यहाँ हैं, उन्हें भी वापस लाना है।’ प्रभा लेटे-लेटै बोली।
राकेश के चेहरे की रंगत बदल गई गोटी बिठाना कोई प्रभा से सीखे। वे इस बात के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। प्रभा का नैहर जाना उन्हें काफी कष्टप्रद लगता था। मन ही मन सोचा ये औरतें कितनी होशियार होती है। बकरी ने दूध दिया और मैंगनी डाल दी। कमाऊ बीबी के साथ और मुसीबत पर इनका करे भी क्या। घी का लड्डू टेडा ही भला।
‘वहाँ कितने रोज रहोगी ?’ राकेश मुँह लटकाते हुए बोले।
‘सात रोज! पूरे एक साल से जा रही हूँ।’ प्रभा चहकते हुए बोली।
‘कभी इतना भी सोचा है तुम्हारे बिना अकेले कैसे रहूँगा। अकेले घर फाडे खात है। खाने की व्यवस्था और करो।’
‘मुझे समझ में नहीं आता मेरे नैहर के नाम से तुम्हारी नानी क्यूँ मर जाती है। जब भी पीहर जाने की बात करो, ऊँट की तरह बर्राने लगते हो। मम्मी पन्द्रह दिन से बीमार है। जाना तो हम दोनों को साथ चाहिए, लोग तो यह कहेंगे एक बेटी-दामाद हैं वो भी मिलने नहीं आए। आप तो वाकई ३८ गुणों के दूल्हे हैं।’
‘ये ३८ गुण क्या होते हैं ? ३६ गुण तो सभी बताते हैं। दो अतिरिक्त कौन-से हैं ?
‘खुद को उपजती नहीं, दूसरे की मानता नहीं।’
दोनों फिर खिलखिलाकर हँस पडे।
उनके सामने एक दिव्य पुरुष खडा था। गहरा काला रंग, स्थूल देह, प्रशस्त ललाट तिस पर नगीनों जडा सोने का मुकुट, कानों में चमचमाते कुण्डल एवं भाल पर विष्णु तिलक जिसके बीच में सिन्दूर की मोटी बिन्दी लगी थी। उनकी बडी-बडी आँाखों में अंगारे दहक रहे थे। दायें कन्धे से त्रिवली तक आकर तिरछा घूमता जनेऊ , बायें कन्धे पर सोने की चमचमाती गदा, गले में हीरों, पन्नों एवं मोतियों के नौलख हार, नीचे पीली धोती एवं पाँवों में खडाऊ । उनका प्रभा मण्डल मुकुट एवं नगीनों की चमक को भी फीका कर रहा था। इस प्रभा मण्डल से सारा कमरा देदीप्यमान हो गया।
राकेश को मानों काठ मार गया। वे भय के मारे थर-थर काँपने लगे, चूलें ढीली हो गई। होठ उबलते देग के ढक्कन की तरह फडफडने लगे। ‘ओम् सूर्याय नमः’ के मन्त्र ओर तेज हो गए। कैसी अकल्पनीय बला सर पर आई। जस-तस संयत हुए तो हकलाकर बोले।
‘आ...आ..आ..आप कौन हैं ?
‘मैं यमराज हूँ। तुम्हारा समय पूरा हो गया है, तुम्हारे प्राण लेने आया हूँ।’
जब मरण निश्चित हो तो देव आराधना ही अंतिम अवलम्ब बन जाती है। राकेश की हालत उस सहमें हुए हिरन की तरह थी जिसके सामने खूंखार शेर आ खडा हुआ हो।
‘ओम् सूर्याय नमः’ के प्रलाप और तेज जहो गए। वे हाथ जोडकर यमराज के आगे नत हो गए।
‘इस प्रलाप को बंद कर। क्या तुम्हें पता नहीं सूर्य मेरे जनक हैं। मरते हुए किसी के मंळ से उनके मन्त्र निकले तो मैं उसके प्राण नहीं ले सकता। मैं प्राणघाती हो सकता हूँ पितृघाती नहीं।’ यमराज गम्भीर स्वर में बोले।
राकेश को मानो संजीवनी मिल गई। अंधा क्या चाहे दो आँखें। यमराज के मुँह से ही उनकी कमजोरी जानकर उसने कूटनीति का बाण संधान किया। सत्य की राह पर चलने वाले देव मनुष्य के इसी अस्त्र से ढीले पडते हैं।
‘आप कैसे पितृ प्रेमी हैं। मैं तो वर्षों से सुबह सूर्य नमस्कार करता हूँ। सुबह-शाम सूर्यदेव के जप करता हूँ। पीढियों से वे हमारे आराध्य हैं फिर असमय ही आपका आगमन कैसे हो गया? मेरे छोटे-छोटे दो बच्चे हैं। मेरी पत्नी तो मेरे निधन का समाचार सुनकर पागल हो जाएगी। आपको क्या मालूम पितृविहीन पुत्र परकटे पक्षी की तरह होता है। मुझे पता है मेरी माँ ने मेरे पिता के असामायिक निधन के पश्चात मुझे कैसे पाला है। क्या हर बार आपको सूर्य पूजक का ही घर मिलता है? क्या आप जानते हैं प्रभा विधवा होकर कैसे उम्र काटेगी? विधवाओं की विडंबनाओं को आप देव पुरुष क्या समझें। स्वर्ग में तो कोई विधवा होती नहीं।’ राकेश ने साहस बटोरकर ब्रह्यास्त्र संधान किया। मरता क्या न करता।
‘व्यर्थ प्रलाप मत कर। मौत सर खडी है तो हमें ही पट्टी पढा रहा है। मैं तो काल का दूत हूँ। काल कसाई से भी अधिक क्रूर होता है। वह न बूढा देखता है न बालक। न राजा देखता है न रंक। मृत्यु मुहूर्त देखकर नहीं आती। मौत के रथ नहीं जुतते। वह तेरे पहले भी चल रहा था एवं तेरे बाद भी ऐसे ही चलेगा। यह महान् अस्तित्व किसी के आने जाने से प्रभावित नहीं होता। पीपल के पेड से एक पत्ता गिर जाए तो पेड को फर्क पडता है क्या?’
‘पर मेरा परिवार तो तबाह हो जायेगा प्रभु!’
‘यह तेरा भ्रम है। मैं ऐसे कई बच्चे जानता हूँ जिनके पिता बचपन में ही चले गए, आज वे उन बच्चों से भी आगे हैं जिनके पिता वर्षो उनके साथ रहे। तू स्वयं इसका एक जीवंत उदाहरण है। यही नहीं ऐसी विधवाएँ बता सकता हूँ जो पति होने तक कृशांगी थी एवं बाद में गजगामिनी बन गई। पुत्र! संसार में कोई अपरिहार्य
नहीं है।’
‘फिर मैंने वर्षों आपके जनक सूर्यदेव की जो आराधना की है, उसका क्या फल? मैंने तो सुना है सूर्य आराधना कभी निष्फल नहीं आती। पिता का मान रखने के लिए तो राम चौदह वर्ष वन में चले गए थे। किंवदंती है कि अनेक पुत्रों ने पितृ सम्मान के लिए अपने शीश कटवा दिए। आप फिर अपने पितृभक्तों पर यह कहर क्यूँ बरपा रहे हैं? क्या आप भी अपने अनुज शनि की तरह मेरे आराध्य सूर्यदेव के परम शत्रु हैं?’
‘तुमने तो अजीब धर्मसंकट में डाल दिया पुत्र! मुझ पर हजार लांछन लगा पर पितृघाती होने का कलंक मत मढ। अब मैं तुम्हें वर देने को मजबूर हूँ। प्राणदान के अतिरिक्त कुछ भी वर माँग ले।’
‘प्रभा कल सुबह आ रही है। आप उसके आने तक मेरा आतिथ्य स्वीकार करें। उसके आते ही जब मैं कुण्डा खोलूँ, आप मेरे प्राण हरण कर लेना। इस बहाने उसे यकीन तो होगा कि मैं उसकी जुदाई में मर गया। हर बार पुराने खिलौने की तरह ठोकर मारकर नैहर चली जाती है। हाँ, उसके आने तक आप मेरे अधीन रहेंगे। आपको मेरे प्रश्न का उत्तर देना होगा।’
‘तुम्हें भी तो अपने नैहर ही ले जा रहा हूँ पुत्र! वहीं तो तुम्हारा मूल धाम है, वहीं तो परमात्मा निवास करते हैं।’
‘इन गूढ बातों पर मैं बाद में चर्चा करूँगा। अभी भोर होने में छः प्रहर शेष है। पहले मेरे द्वारा मांगे गए वरदान पर सहमति प्रकट करें।’
‘तथास्तु!
इतना कहते ही यम अतिथि बनकर उसके अधीन हो गए।
यम अब मंद-मंद मुस्कराने लगे थे।
सिर्फ भक्त में ही इतनी शक्ति होती है कि वह असीम शक्तिमान देवताओं को भी अपना बंधक बना लेता है। देवों की महानता तो देखो, जिन्हें बडे-बडे योगी, मुनि एवं तपस्वी पार नहीं पाते, भक्त सहज ही उन्हें अपने पेम-पाश में बाँध लेता है।
अतिथि माँ जाये से बडा होता है। देवतुल्य। लेकिन जब देव स्वयं अतिथि बनकर पधारे तो आतिथ्य में
कैसी कमी।
राकेश अब तक सहज हो चुके थे। मन ही मन सोचने लगे क्या देव इतने सरलमना होते हैं ? घर बैठे आतिथ्य का ऐसा सुअवसर तो जन्म जन्मांतर के पुण्य के संचय होने से ही मिलता होगा। जब सुबह तक मर ही जाना है तो कम से कम देव आतिथ्यि का पुण्य तो लूँ।
वे चमराज को अपने ड्रांइगरूम में ले आए।
उन्होंने यमराज के हाथ से गदा ली एंव उसे आदर पूर्वक दीवान पर रखी। गदा रखकर उन्हें सोफे पर विराजने का अनुरोध किया। अपने वरदान के अधीन यमदेव उसके आग्रह को कैसे ठुकराते।
राकेश तुरन्त रसोई में गए। कुछ क्षण बाद एक खाली परात, को रखा। अपने हाथों से यमदेव के पाँवों को परात में रखकर बर्तन के पानी से पखारा। फिर उन पाँवों को अपने हाथों में लेकर नेपकीन से पौंछा। यमदेव ने पाँव नीचे रखे ही थे कि राकेश परात के पानी को चरणामृत की तरह पी गए।
वे पुनः उठे एवं एक थाली में कंकुम, रोली, अक्षत, दीपक, पान, सुपारी एवं गुड आदि पूजा का सामान लेकर बाहर आए। उन्होंने यमराज का तिलक कर उनके माथे पर अक्षत लगाया। दीपक जलाकर उनकी पूजा की एवं मुँह में गुड एवं पान दिया। फिर इधर-उधर देखकर बोले, ‘प्रभु! इस अकिंचन के घर में आज पुष्प नहीं है। मैं आपको हृदय के पुष्प एवं भवनाओं का नैवेद्य अर्पित करता हूँ। मेरी पूजा में कमी रह गई हो तो क्षमा करें।’
यह कहते-कहते उन्होंने दण्डवत् कर यम को पुनः प्रणाम किया।
प्रेम का पान हीरा समान। यह विहृल हो उठे। उसे उठाते हुए बोल, ‘तुम्हारे आतिथ्य से मैं अभिभूत हूँ। आज तुमने जन्म-जन्मान्तरों का पुण्य पा लिया। तुम्हारा अतिथि सत्कार प्रशंसा से परे है। आजकल मृत्युलोक में लोग आतिथ्य का महत्त्व ही भूल गये हैं। जिस घर में अतिथि का सम्मान न हो उस घर के अनेक पुण्य क्षय हो जाते हैं। वहाँ से श्री, सम्पत्ति, वैभव सदैव के लिए चले जाते हैं। अब तेरे बाद इस घर में सदैव श्री, सम्पत्ति निवास करेगी।’
राकेश की आँखें प्रेमाश्रुओं से नहा गई। संयत होकर बोले, ‘प्रभु! आज मैंने क्या नहीं पाया। आफ दर्शन कर लेने के पश्चात् भला किसे श्री, सम्पत्ति की चाह रह जाती है। कौन-सा भोगने योग्य सुख शेष रह जाता है। देव! मेरी तो पीढियाँ तर गई।’
इस वार्तालाप के पश्चात् कुछ क्षण दोनों मौन रहे।
कभी-कभी मौन व्याख्यान से भी अधिक प्रभावी हो जाता है। यम अब भी राकेश के अधीन थे। राकेश किसी गहरे चिंतन में डूबे थे। वे इन दुर्लभ, अमूल्य क्षणों को खोना नहीं चाहते थे। कई ऐसे प्रश्नों का उत्तर चाहते थे जिन्हें मनुष्यता सदियों से खोज रही हैं। जीवन-मृत्यु से जुडे असंख्य प्रश्न उनके जेहन में उभरने लगे। यम से अधिक कौन सुपात्र होगा जो इनका उत्तर दे सके, इन गुत्थियों को खोज सके। गम्भीर मनन एवं चितन करने के पश्चात् राकेश ने प्रश्न किया, ‘प्रभु! मृत्यु क्या होती है? हम सभी मृत्यु से इतना भयभीत क्यों होते हैं?’
‘तुम्हारा प्रश्न गूढ एवं गुह्य है पुत्र! वस्तुतः मृत्यु नाम की कोई चीज है ही नहीं। मृत्यु आत्मा का पडाव है, विश्राम बिन्दु है सिर्फ देह का अन्त होता है, अवसान होता है। इसीलिए तुमने देहान्त एवं देहावसान तो सुना होगा, आत्मांत अथवा आत्मावसान नहीं सुना होगा। जैसे मनुष्य वस्त्रों को त्यागकर नये धारण कर लेता है वैसे ही आत्मा अपने कर्मबन्धन पूर्ण होते ही देह छोड देती है। वह अपनी नयी यात्रा पर निकल जाती है। जैसे पकता है, फिर गिरता है, फिर-फिर पकता है-गिरता है, वैसे ही आत्मा नये-नये परिधान ग्रहण करती रहती है। मृत्यु सरासर झूठ है। हम मृत्यु में छिपे जीवन को नहीं जान पाते। मृत्यु इसलिये हमें भयभीत करती है। जीवन की मृत्यु कैसे ? मृत्यु से वही भयभीत होते हैं जो शरीर को ही जीवन समझ लेते हैं।’
‘यह आत्मा क्या है प्रभु?’
‘यह आत्मा तुम सबके हृदयों में परमात्मा की प्रतिनिधि रूप में विराजमान है। यह परमात्मांश ही है। साक्षी है यह तुम्हारे एक-एक कर्म का। यही आत्मा तुम्हें पल-पल बोध देती है। नित्य एवं सनातन है यह। जैसे एक कम्प्यूटर अनेक कम्प्युटरों से एवं फिर मुख्य कम्प्यूटर से आपस में जुडा होता है, यही आत्मा की स्थिति है। इस आत्मतत्त्व को जान लेने के पश्चात् जानने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता। इसे जानते ही मृत्यु गिर जाती है।
मनुष्य अज्ञेय से ज्ञेय बन जाता है। आत्म-तत्त्व का ज्ञान ही अमृत है।’
‘इस आत्म-तत्त्व को कैसे जानें प्रभु?’
‘पुत्र! इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए तुम्हें महायज्ञ करना होगा। जप, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्रणिधान इस यज्ञकुण्ड की ईटें होंगी। परोपकार, परदुखकातरता एवं क्षमा आदि दिव्य गुणों से स्वयं को पवित्र करना होगा। लोककल्याण को जीवन का ध्येय बनाना होगा। श्रेयस्कर कार्य करने होंगे। अपने स्वार्थों की तिलान्जलि देनी होगी। तब प्रज्वलित होगी तुम्हारे भीतर ज्ञानाग्नि। यह ज्ञानाग्नि ही तुम्हारे कर्मों को दग्ध करेगी। तुम्हारे भीतर ही छिपी है यह अग्नि, तुम्हें ही इसे जलाना होगा। इस ज्ञान को जाने बिना मनुष्य सुखी हो ही नहीं सकता। दीर्घायु मनुष्य भी इसे जाने बिना अल्पायु है। जीवन की कला जानने के लिए तुम्हें मृत्यु की कला जाननी होगी और मृत्यु की कला है सबके प्रति शुभ संकल्पों से भरना, सबके कल्याण की कामना करना चाहे वो हमारा परम शत्रु ही क्यों न हो। जब हम यह जान लेते हैं कि सबके हृदय में एक ही ईश्वर का अंश निवास करता हे फिर हमारा किससे विरोध हो सकता है!’
‘फिर मोक्ष क्या है पुत्र ?’
‘यही मोक्ष है पुत्र! जिन्हने आत्म तत्त्व को जान लिया, वे जीते जी ही मुक्त हैं। इसको जानते ही सारे दुःख तिरोहित हो जाते हैं। कोई पीडा नहीं रह जाती। जीवन
संगीत से भर जाता है। मृत्यु महात्मा है पुत्र, जिसे आत्म बोध हो जाए उसकी मृत्यु कैसे ? उसे मृत्यु का भय भी कैसे हो सकता है, तब मृत्यु के समय तुम वैसे ही प्रसन्न होंगे जैसे स्त्री नैहर जाते हुए होती है। तुम सबका नैहर वहीं तो है।’
‘प्रभु! क्या इस आत्म तत्त्व को जानने के सभी अधिकारी हैं या इसमें आयु, गोपनीयता आदि कोई
बन्धन है ?’
‘आत्म तत्त्व जाने के सभी अधिकारी हैं पुत्र। इसमें आयु का कोई बंधन नहीं। सभी सुपात्र हैं। धुव एवं प्रहलाद इसे अल्पायु में ही जान गए। महावीर ने इसे यौवन में जाना। कइयों को इसका ज्ञान अधेड अवस्था अथवा बुढापे में हुआ। असंख्यजन इसे जाने बिना ही मर गए। बोध्गम्यता की कोई उम्र नहीं होती। जागो तभी सवेरा। इसमें जाति, धर्म एवं संस्कृति का भी कोई बंधन नहीं। इसके लिए तो मात्र आस्था भरे अंतःकरण चाहिए। लोककल्याणकारी कोई भी ज्ञान गोपनीय नहीं होता पुत्र! ज्ञान-गंगा जितने नहाए, अच्छा है। ज्ञान का एकाधिकार महापाप है। अगर नदी का पानी ठहर जाएगा तो उसमें सडाँध ही पैदा होगी। श्रद्धा से जन हितार्थ, ज्ञान के प्रचार एवं प्रसार को ही गुणीजन श्राद्ध कहते हैं। यही श्रेष्ठ तर्पण है। ज्ञान ही एकमात्र ऐसी निधि है जो बाँटने से बढती है।’
आत्म मंथन में प्रहर पलक झपकते बीत गये।
मुर्गे ने बांग दी, मुल्ले ने अजान। मंदिरों में शंख ध्वनि गूंजी।
राकेश के सर पर काल बादलों की तरह मंडराने लगा था, पर अब वे अविचल एवं अडिग खडे थे।
आत्मतत्त्व जान लेने के पश्चात् मृत्यु का भय कैसा?
निर्भय और निःशंक राकेश प्राण विसर्जन को तैयार थे।
तभी दरवाजे पर बेल बजी। शायद प्रभा आ गई थी।
नींद में राकेश बडबडाये जा रहे थे, ‘अब मृत्यु का भय कैसा........
बेल पर बेल बज रही थी। राकेश हडबडाकर उठे तो अपने बैड पर थे। तो क्या यह एक स्वप्न था। उन्होंने आँखें मलकर चारों और देखा। यम गायब थे। रात दूध पीते ही उन्हें नींद आ गई थी। नींद में ही इतना लम्बा घटनाक्रम हो गया। कैसा अलौकिक स्वप्न था।
उन्होंने तुरंत उठकर दरवाजा खोला। प्रभा एवं बच्चे बाहर खडे थे।
घर में घुसते ही प्रभा बोली, ‘मैं नहीं होती हूँ तो घोडे बेचकर सोते हो। काश! भगवान ने पुरुषों का भी नैहर बनाया होता तो औरतें भी कुछ रोज चादर
तानकर सोती।’
‘सबका नैहर एक ही जगह तो है प्रभा।’ राकेश दार्शनिक अंदाज में बोला।
‘जब तक कोई जगाने वाला नहीं आता, मनुष्य तन्द्रा में ही जीता है प्रभा!’
उत्तर देते हुए राकेश भीतर चले गए।
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