तीन कविताएँ

गरिमा चारण


एक अनुकृति सी
तू मेरी प्रथम कृति मैं तेरी अनुकृति,
रूप, रंग, भिन्न तुझमें ही विचरती
स्नेह पगी पुष्प गन्ध पूरित,
शब्द मेरे आकार तेरा लेते
ढल जाता तेरा बिम्ब मेरे काव्य में,
प्रारम्भ करती संवेदन अहसास से
लिख सकूँ उस महाकोश को,
तेरे प्रेम के हर स्वछन्द क्षण को
जो स्वंय में जीवन्त अनन्त है,
तेरे स्नेह नेत्र वारिद पलकों में
आलोकित मेरा करुणा संसार
नेत्र जो चरणों से आगे न बढे,
कर तेरे आशीष स्नेह से उठे
शब्द तुम्हारे ब्रह्माण्ड सारा,
मेरे जीवन का अटल आधार
तेरी पगडण्डी को उकेरने का,
करती हूँ प्रत्यके प्रहर प्रयास
उभर आता है तेरा ही बिम्ब,
जब भावों का रंग उनमें भरती हूँ
वीरान सी राहों में जैसे कोई साया,
एक अनुकृति सी आकृति लेता बन
झलक तेरी स्मृति को झंकृत कर देती,
विचारों को न मिलता साहिल
कौन मैं सामर्थ्यधारी, महाज्ञानी?
जो क्षण में लिख दे महा काव्य को,
जिसके लिए भीतर समर हुआ
ज्वालामुखी सा जो दहकता रहा
पर तेरे मात्र स्मरण से युगों का,
लावा शीतल बन नशों में पिघलता
तुझसे रंग, रूप, आकर विकार भिन्न हूँ,
आत्मा, प्रेम, भाव से तेरा ही अंग हूँ
किन्तु भोर की लालिमा भर देती,
मेरी कृति में आलौकिक तेरी महक
और में नित्य प्रति उन रेखाओं में,
ढूँढती मेरे जीवन का लिखित सत्य
जो उन रेखाओं और रंगो के बीच,
मेरी कृति को आलम्बन देता अनन्त......
उग आती हरी दूब सी
भावों को पिरोना
या है कुछ उससे आगे
भावों का भीतर उमडना
या उस कारण की ध्वनि
जिससे भाव निमित्त हुआ
उस स्थिति का शंखघोष
जो समर सा हृदय भीतर
अतृप्त इच्छाओं का गान
कविता की गुथी उलझन
कवि का आत्मचिंतन
उभरी रेखाओं का त्रिपुंड
विहाग किसी का आत्मपीडन
क्या है एक रेखाचित्र कृषक का
या मेघदूत वो विरहन
कविता है क्या व्यंग्यविधान
कविता मूर्छित का जीवन गान
बच्चे की किलकारी की मधुर तान
भक्त का याचना पत्र विशाल
कविता उग आती हरी दूब सी
है क्या कविता जो भाव जगाती
बंद मुख से सब कह जाती
कविता तो सौम्य काव्य है
सहज पुष्प का कोमल
जल की शीतल बौछार सा
जहां मोडो मुड जाये
जिस मिट्टी में चाहो उग जाये।
उतर आता तू राग सा मुझमें
ख्वाबों की लकीर धुंधला अक्स
रंग भरने तुझे आते क्या ?
क्या आता तुमको साथ निभाना
कुमुदनी का मृणाल बन जाना
महक तेरे अस्तित्व की,
मेरे वजूद को सांसे दे जाना
काजल रेखा भर दो मेरे जहन में
पलकों के स्वांग में परिभाषित
हो हर रूप रंग से उजला
न कोई दम्भ रहे बाकी
न हो कोई अन्तस में कालिमा
आ जाये भीतर वो आभा
कोई राह में न बंधी रहे बाधा
दुनिया के लिए तू महज
अकेले में स्वंय को उभारना
खाली लकीरों में तेरा निखर आना
सांझ ढले मल्हार सा मुझमें
उतर आता तू राग सा मुझमें। द्य
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